युगों पहले, एक समय, जब सुम्बा पर महान राजा वुलन का राज्य था, पूरे राज्य को एक महाविपत्ति का सामना करना पड़ा। वहाँ कई वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। सूरज निष्ठुरतापूर्वक धरती को तपाने लगा।
अकाल और सूखा ने द्वीप राज्य का विनाश कर दिया। मवेशी मर गये। फसलें नष्ट हो गईं और नदी-नाले सूख गये। भोजन और जल के लिए लोगों को कठिन संघर्ष करना पड़ा। बहुतों ने भूख, प्यास अथवा रोग के कारण प्राण त्याग दिये। लोगों ने दया के लिए भगवान को पुकारा किन्तु उनका हृदय नहीं पसीजा। राजा वुलन ने यथाशक्ति प्रजा की मदद की। उसने निजी अन्न भण्डार प्रजा के लिए खोल दिया और अपने मवेशी उन्हें बाँट दिये।
लेकिन वह कब तक सारे राज्य को खिला सकता था! उसका भण्डार खाली हो गया। और अब तक वर्षा के कोई आसार नहीं थे।राजा चिन्तित था। ‘अपनी प्रजा को कष्ट में देख कर मुझे बहुत पीड़ा होती है। मुझे इसके लिए कुछ करना पड़ेगा।’ उसने सोचा।
उसने अपने निकटतम सलाहकारों को बुलाया और उनसे पूछा कि प्रजा की सहायता के लिए उसे क्या करना चाहिये। लेकिन वे लोग स्वयं इतने थके माँदे थे कि वे कुछ सलाह न दे सके।
‘‘भगवान हमसे नाराज़ हैं,’’ बार-बार वे यही कहते रहे। ‘‘हम सब ने पाप किया होगा। हम उसी पाप का फल भोग रहे हैं।’’ ‘‘यदि भगवान हमें सजा देना चाहते हैं तो हमें स्वीकार कर लेना चाहिये। यदि वे हमारा विनाश करना चाहते हैं तो हम उससे बच नहीं सकते।’’ एक वयोवृद्ध व्यक्ति ने दुख के साथ कहा। सब लोगों ने हाँ में हाँ मिलाया और फिर उठकर चले गये।
लेकिन राजा वुलन सन्तुष्ट नहीं था। उसने इस समस्या पर महीनों विचार किया । उसकी इस परेशानी से उसकी बेटी रातू न्याले को यह चिन्ता हुई कि राजा परेशानी के कारण कहीं रोगग्रस्त न हो जायें। रातू न्याले राजा की आँखों की तारा थी। और वह भी अपने पिता को दुनिया की हर चीज़ से ज्यादा प्यार करती थी। उसने अपने पिता को समस्या का समाधान करने में सहायता करने का निश्चय किया।
‘‘मेरे सब रत्न, हीरे, मोती और मूल्यवान परिधान ले लीजिये और उनसे प्रजा के लिए भोजन का प्रबन्ध कर दीजिये।’’ रातू ने सलाह दी। ‘‘नहीं मेरे बच्चे,’’ राजा ने प्यार से समझाया। ‘‘सुम्बा में तुम्हारे रत्नों से खरीदने के लिए अन्न नहीं है और हमारे लोग इतने कमज़ोर और थके-माँदे हैं कि भोजन की तलाश में इस द्वीप से बाहर जाना नहीं चाहते। तुम्हारे हीरे-मोतियों से हमारी समस्या का समाधान नहीं होगा।’’ ‘‘सहायता के लिए आप भगवान से प्रार्थना क्यों नहीं करते?’’ न्याले ने पूछा। ‘‘लेकिन किसी कारण से भगवान ही तो हम लोगों से नाराज़ हैं। वे ही तो हमें सजा दे रहे हैं । फिर उनसे मदद की आशा हम कैसे कर सकते हैं?’’ पिता ने कहा।
‘‘उनसे माफी माँग लें और उनसे पूछें कि हम अपने पापों के प्रायश्चित के लिए किस प्रकार की तपस्या करें। वे निश्चित रूप से हमें क्षमा कर देंगे।’’ न्याले ने सलाह दी। राजा वुलन को यह विचार पसन्द आया। उसने प्रधान पुजारी को बुलाया। ‘‘हमें यह पता करना चाहिये कि हम किस पाप का मूल्य अपने और अपने बच्चों के प्राण देकर चुका रहे हैं और यह भी कि हम अपने पापों का प्रायश्चित कैसे करें जिससे भगवान फिर से हम पर प्रसन्न हो जायें।’’ राजा ने पुजारी से कहा।
प्रधान पुजारी ने तुरन्त एक ऐसे उत्सव का प्रबन्ध किया जिससे भगवान का सन्देश मिल जाये। एक सुबह पुजारी ने राजा तथा लोगों के एक बहुत बड़े समूह के सामने एक अनुष्ठान नृत्य आरम्भ किया। तूरही बजाये गये, ढोल पीटे गये तथा एक विचित्र मंत्रोच्चारण किया गया। पुजारी मंत्रोच्चारण और संगीत के ताल पर चक्कर पर चक्कर लगाता रहा।
संगीत का ताल तीव्र हो गया। पुजारी अपने कदम फिर भी मिलाता रहा। तब गति पराकाष्ठा पर पहुँच गई। पुजारी एक विचित्र भावातिरेक में चला गया। वह नियन्त्रण से बाहर हो गया। वह उन्माद में नाचने लगा। जब उन्माद पराकाष्ठा पर बढ़ गया तब वह रोंगटे खड़ा करनेवाली चीख के साथ गिर पड़ा। वह किसी शक्ति द्वारा अधिकृत था।
एक विचित्र कर्णभेदी आवाज़ में वह चीखता हुआ बोला, ‘‘तुमने पाप किया है, हे सुम्बा की प्रजा! तुम्हें अपने पापों का मूल्य चुकाना होगा।’’
लोग भय से पीछे हट गये। वे ज़मीन पर गिर कर बार बार अपना सिर पटकने लगे। ‘‘दया करो, प्रभु!’’ वे पुकारने लगे। ‘‘हमारे पापों को माफ कर दो। हमें बचाओ।’’
‘‘तुम्हारी रक्षा का एक रास्ता है।’’ पुजारी चिल्लाकर बोला। ‘‘यह दिखाने के लिए कि तुम सचमुच पछता रहे हो, तुम्हारे राजा को अपनी सबसे बहुमूल्य चीज़ का बलिदान करना होगा।’’ तब वह अचेत होकर गिर पड़ा और मुँह से फेन उगलने लगा। भीड़ चुपचाप तितर-बितर हो गई।
कैसा धर्मसंकट था? सबको मालूम था कि राजा अपनी बेटी को सबसे अधिक प्यार करता है। पर उसे कौन कहता कि उसे अपनी बेटी का बलिदान कर देना चाहिये? राजा सर नीचा कर महल में चला गया। वह अपनी सबसे प्यारी बेटी न्याले की बलि कैसे दे दे? फिर भी, क्या अपनी प्रजा के कल्याण के लिए कुछ करना उसका कर्त्तव्य नहीं है?
न्याले की सहेलियों ने उसे उत्सव में जो हुआ बता दिया। वह अपने पिता की वेदना समझ सकती थी। वह एक उदार-हृदय और साहसी लड़की थी। ‘यदि मेरे जीवनदान से बहुतों के प्राण बच सकते हैं तो मुझे क्यों नहीं करना चाहिये?’ उसने सोचा।
‘‘पिता, आप हमें भगवान को अर्पित कर दीजिये। मैं अपनी प्रजा के लिए प्रसन्नतापूर्वक अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दूँगी।’’ न्याले ने कहा। राजा वुलन की आँखों से आँसू छलक पड़े। ‘‘मेरी बेटी’’, वह फूट-फूट कर रोने लगा। ‘‘मैं तुम्हें इस तरह कैसे त्याग दूँ?’’
लेकिन न्याले के हठ के सामने पिता को झुकना पड़ा। बलिदान के लिए एक शुभ दिन निश्चित किया गया। सुम्बा की प्रजा अनुष्ठान के रूप में शोभायात्रा बना कर समुद्र तट पर गई जहाँ से न्याले को गहरे समुद्र में फेंककर बलि दी जाती। न्याले उस दिन पहले से कहीं अधिक सुन्दर दिखाई पड़ रही थी। जैसे ही मुख्य पुजारी ने प्रार्थना का मंत्रोच्चारण किया, राजा वुलन ने अपने कांपते हाथों से अपनी बेटी को भूखे सागर में धकेल दिया। वह अदृश्य हो गई। आकाश से एक वाणी सुनाई पड़ी, ‘‘तुम महान हो राजा वुलन। मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारी प्रजा जीवित रहेगी। और तुम्हारी बहादुर बेटी न्याले प्रतिवर्ष दो बार अपनी मातृभूमि में आयेगी। तुम्हें उसका सम्मान करना होगा।’’
और तब से प्रतिवर्ष सुम्बा के तट पर बहुरंगी कीड़े समुद्र से आ जाते हैं। लोगों का विश्वास है कि उनकी उदार राजकुमारी ही लौट कर यह देखने आती है कि वे खुश हैं कि नहीं। वे कीड़ों को एकत्र कर उदार रातू न्याले की स्मृति को सम्मान प्रदान करते हैं।
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