Thursday, June 30, 2011

दर्पण में युद्ध

शंकर सोलह साल का नादान किशोर था। उसके जन्म के तीसरे ही साल उसकी माँ पार्वती का निधन हो गया। उसके पिता श्याम ने लक्ष्मी से दूसरी शादी कर ली। क्रमशः लक्ष्मी ने दो लड़कों को जन्म दिया। वह अपने बेटों से बेहद प्यार करती थी और गाँव की पाठशाला में पढ़ने भेजा करती थी। पर शंकर से घर का और खेत का काम कराती थी। फिर भी उसे इसकी कोई शिकायत नहीं थी।
यों समय बीतता गया। श्याम अचानक बीमार पड़ गया। वह समझ गया कि अब ज़िन्दा रहना मुश्किल है। किसी भी क्षण मौत उसे निगल सकती है। उसने पत्नी और बेटों को अपने पास बुलाया। फिर पत्नी से कहा, ‘‘शंकर मासूम है। उसकी परवरिश की जिम्मेदारी तुम्हें सौंप रहा हूँ। अपने सगे बेटों की तरह इसे भी प्यार दो ।'' फिर इसके दूसरे ही दिन वह मर गया।
पर लक्ष्मी का इरादा कुछ और ही था। वह शंकर को घर से निकालने की योजना बना रही थी। उसने उससे कहा, ‘‘बेटे, कल रात को तुम्हारे पिता सपने में दिखायी पड़े और उन्होंने यह दर्पण मुझे सौंपा। उन्होंने कहा कि यह दर्पण बड़ा ही महिमावान है। इसे अपनी जायदाद का हिस्सा मानो।''
श्याम की पहली पत्नी पार्वती को यह दर्पण एक साधु के उजड़े आश्रम में मिला था, जब वह खेत में काम करके घर लौट रही थी। लोग अब भी कहा करते हैं कि वह साधु बड़ा ही महिमावान था। खेत से घर पहुँचने के बाद पार्वती ने यह दर्पण अपने पति के सुपुर्द कर दिया।
शंकर ने अपनी सौतेली माँ की बातें शांति से सुन लीं और दर्पण को लेते हुए कहा, ‘‘माँ, तो क्या अब मुझे घर से निकल जाना होगा?'' उसके सवाल में मासूमियत भरी हुई थी।

‘‘हाँ बेटे, तुम्हारे पिता ने इस दर्पण को अपनी जायदाद के एक हिस्से के रूप में तुम्हें सौंपने के लिए कहा था। इसका मतलब यही हुआ कि इसे लेकर तुम घर से बाहर चले जाओ और जैसा जीना चाहते हो, जीओ।'' फिर उसने उसके हाथ में चार रुपये थमा दिये।
शंकर ने उसी दिन एक फटी थैली में अपने कपड़े रख लिये और उनके बीच में सावधानी से दर्पण रखकर घर से चल पड़ा। शाम तक राजा के क़िले के पास की सराय में पहुँचा। आधा रुपया चुकाकर सराय में ही खाना खा लिया और उनके दिये एक कमरे में सो गया। धीरे से उसने फिर थैली से दर्पण निकाला।
दर्पण देखने में बड़ा ही सुंदर था। शंकर ने उसमें अपना प्रतिबिंब देखा और अपने ही आप कहने लगा, ‘‘पिताजी, माँ ने कहा था कि यह दर्पण बड़ा ही महिमान्वित है। पर उसने यह राज़ नहीं बताया कि यह महिमा क्या है और कैसे जानी जाए।'' यों सोचते हुए वह उस दर्पण को अपने सीने पर रखकर सो गया।
ठीक, आधी रात के समय, सराय में कोलाहल मच गया। वहाँ के लोगों की बातों से उसे मालूम हुआ कि व्याघ्रकेतु नामक पड़ोसी राजा ने राजा मित्रवर्मा पर अचानक आक्रमण कर दिया और किले को घेर लिया। अब दोनों राज्यों की सेनाओं में घमासान लड़ाई होने लगी। मित्रवर्मा भी शत्रु सेनाओं का सामना करने निकल पड़े। प्रजा मित्रवर्मा को बहुत चाहती थी, क्योंकि उनका शासन बडा ही न्यायपूर्ण था। जनकल्याण ही उनका एकमात्र लक्ष्य था।
सराय का मालिक वहाँ रहनेवालों को बताने लगा कि व्याघ्रकेतु कितना बड़ा दुष्ट, महत्वाकांक्षी और क्रूर है। वह कहने लगा। ‘‘हमारे राजा मित्रवर्मा युद्ध करने चल पड़े। भगवान से हमारी प्रार्थना है कि उनकी विजय हो।''
इन बातों को सुनते ही शंकर ने अपने दर्पण में देखते हुए कहा, ‘‘कितना अच्छा होगा, अगर धर्मात्मा मित्रवर्मा विजयी हो जायें।''
बस, दूसरे ही क्षण बिजली कौंध उठी और दर्पण में से ततैया जैसे छोटे आकार के सैनिक कुकुरमुत्तों की तरह बाहर आ टपके और दृढ़ सेैनिकों के रूप में परिवर्तित हो गये। वे बड़ी ही तेज़ी से आगे बढ़े और शत्रुसेना पर पिल पड़े।

इस आकस्मिक व भयंकर परिणाम को देखते हुए व्याघ्रकेतु चकित हो ही रहा था कि इतने में उसने देखा कि उसके सैनिक एक-एक करके धराशायी हो रहे हैं। फिर दर्पण में से एक लंबी रस्सी निकली और उसने व्याघ्रकेतु को घेरकर बाँध लिया।
अभी-अभी युद्धक्षेत्र में आये मित्रवर्मा ने भी उन वीर सैनिकों को देखा, जो दर्पण में से आये और शत्रु संहार में लगे हुए हैं। फिर उसने यह भी देखा कि एक रस्सी ने व्याघ्रकेतु को बाँध लिया। राजा स्वयं सराय आये और शंकर से मिलकर कहा, ‘‘इस महिमान्वित दर्पण के कारण ही राज्य बच गया। तुम्हारा नाम क्या है और कहाँ के हो?''
शंकर ने अपना विवरण सविस्तार दिया।
उसने कहा, ‘‘इस दर्पण से मेरा क्या भला होगा, यह खुद मैं नहीं जानता। बस, मैंने इतना ही चाहा कि धर्मात्मा राजा मित्रवर्मा की विजय हो। देखते-देखते दर्पण में से सैनिक निकल आये और दुश्मनों को हरा दिया।''
राजा ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ‘‘पता नहीं, तुम्हारी सौतेली माँ ने किस आशय से तुम्हें यह दर्पण दिया, पर इससे राज्य का महान कल्याण हुआ। आज ही तुम्हें गुरुकुल में भर्ती कराऊँगा और विद्याभ्यास का प्रबंध करूँगा। यह क्या तुम्हें स्वीकार है?''
शंकर सिर हिलाते हुए अपनी सहमति दे ही रहा था कि इतने में सबने देखा कि उसके हाथ में रखा हुआ वह दर्पण हवा में उड़ गया और बड़ी ध्वनि करता हुआ टुकड़ों में टूट गया।
यह दृश्य देखकर शंकर निराश हो गया और दर्पण के टुकड़ों को ध्यान से देखने लगा। तब राजा मित्रवर्मा ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘दर्पण के दूर जाने पर दुखी मत होना। महिमाएँ और मंत्र मनुष्य की प्रगति व विकास के लिए अधिक समय तक सहायता नहीं पहुँचाते। मनुष्य को चाहिये कि वह आत्मविश्वास व साहस के साथ अपनी प्रगति व विकास स्वयं कर ले। अब चलो।'' कहते हुए राजा उसे लेकर चल पड़े। अब शंकर के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।


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