काशीराम शांत स्वभाव का था, साथ ही डरपोक भी। उसके बचपन में ही माँ-बाप गुज़र गये तो उसके दादा ने ही उसे बड़ा किया। एक ही एकड जमीन में वह तरकारियाँ उपजाता था और पास ही के शहर में बेचता था। चंद्रकांता से शादी होने के एक साल के अंदर उसका दादा मर गया।
ऐसे तो काशीराम ने दहेज नहीं माँगा, पर चंद्रकांता के माँ-बाप ने अपनी बेटी को पचास हज़ार रुपयों की रक़म दी। एक दिन रात को अपने पति को भोजन परोसती हुई चंद्रकांता ने कहा, ‘‘हम कब तक ऐसी ज़िन्दगी गुज़ारते रहेंगे। यही काम करते रहेंगे तो हमारी तरक्की ही नहीं होगी। मेरे पास पचास हजार रुपये हैं। एक एकड़ जमीन भी बेच देंगे और शहर में पंसारी की एक छोटी-सी दुकान खोल लेंगे।''
‘‘शहर में घर का किराया बहुत ज़्यादा होता है न?'' काशीराम ने संदेह व्यक्त किया। ‘‘एक काम करना। कल सब्जियों को बेच डालने के बाद कोई खाली घर ढूँढ़ना, पर याद रखना, किराया ज़्यादा न हो। इस कार्तिक माह में ही व्यापार शुरू कर देंगे तो हमें लाभ ही लाभ होगा,'' चंद्रकांता ने कहा।
दूसरे ही दिन, काशीराम सब्जियों को बेच चुकने के बाद, पत्नी के कहे अनुसार घर ढूँढ़ने निकल पड़ा। उसे कहीं भी कम किराये पर कोई घर नहीं मिला। शाम को शहर के बाहर एक पुराना घर उसे दिखाई पड़ा। काशीराम ने वहाँ जाकर चार-पाँच बार दरवाज़ा खटखटाया तो एक बूढ़े आदमी ने दरवाज़ा खोलते हुए पूछा, ‘‘क्या चाहिये?'' ‘‘आपके घर में किराये पर देने के लिए कोई हिस्सा है?'' काशीराम ने पूछा। बूढ़े ने काशीराम को नख से शिख तक ग़ौर से देखा और कहा, ‘‘मैं इस घर को बेचकर अपने बेटे के साथ रह चला जाना चाहता हूँ।
एक साल के पहले ही मैंने पचास हज़ार रुपये देकर इसे खरीदा। उसी क़ीमत पर तुम्हें दे दूँगा। खरीदोगे?'' काशीराम ने अंदर जाकर पूरा घर देखा। ‘इतना बड़ा घर मेरे गाँव में भी इस दाम पर नहीं मिलेगा। पर पूरी रक़म वह दे दे तो व्यापार करने के लिए क्या बचेगा?' वह सोच में पड़ गया। काशीराम को सोच में मग्न देखकर बूढ़े ने कहा, ‘‘ठीक है, दस हज़ार रुपये कम कर दूँगा।
उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। दूसरी रात को इसी भीषण स्वर ने फिर सवाल किया, ‘‘मैं कौन हूँ?'' ‘‘पिशाच, कृपया हमें छोड़ दो। हमें मत सताओ।'' पति-पत्नी ने विनती की। फिर भी उन्हें चाबुक की मारें सहनी ही पड़ीं । तीसरी रात को जब वही सवाल दोहराया गया तो पति-पत्नी ने कहा, ‘‘हमारे लिए भगवान हो।
खरीदना हो तो हफ़्ते भर में आ जाना।'' काशीराम दूसरे दिन चंद्रकांता को शहर ले गया। उस विशाल घर को और पिछवाड़े के बगीचे को देखकर चंद्रकांता बहुत प्रसन्न हुई। खेत बेच दिया और पति-पत्नी ने उस घर को खरीद लिया। अच्छा मुहूर्त देखकर एक हफ़्ते में ही गृह प्रवेश भी कर लिया । चंद्रकांता ने घर को अच्छी तरह से सजाया और दो खिड़कियोंवाले कमरे में बड़ा पलंग भी डलवाया।
उस रात को भोजन कर चुकने के बाद चंद्रकांता ने जंभाई लेते हुए कहा, ‘‘यह हमारा अपना घर है। एक हफ्ते से दिन रात इसे सजाते-सजाते थक गयी हूँ। आज आराम से सो जाऊँगी।'' खिड़की से ठंडी हवा चल रही थी तो लेटते ही पति-पत्नी दोनों सो गये। आधी रात को कोई भयंकर आवाज़ सुनाई पड़ी तो दोनों चौंककर उठे। देखा कि पलंग हिल रहा है, कमरे में रखा सामान डोल रहा है। भय के मारे वे कांप रहे थे। इतने में विकृत हँसी के साथ एक सवाल भी सुनायी पड़ा, ‘‘मैं कौन हूँ?''
वे दोनों डर के मारे थर-थर कांपने लगे। उनके मुंह से एक भी बात नहीं निकली। ‘‘बोलो, मैं कौन हूँ?'' उस भयंकर स्वर ने एक और बार पूछा। चंद्रकांता ने साहस बटोरा और कहा, ‘‘हम नहीं जानते।'' दूसरे ही क्षण उनकी पीठों पर चाबुक की दो मारें पड़ीं ।
वे दोनों दर्द के मारे ज़ोर से चिल्ला पड़े। उनकी चिल्लाहटें सुनते हुए और विकट अट्टहास करते हुए उस विकृत स्वर ने उन्हें चेतावनी देकर कहा, ‘‘कल ठीक इसी समय पर आऊँगा। यही सवाल करूँगा। उत्तर देने के लिए सन्नद्ध रहना।'' पूरी रात वे सो नहीं पाये। वे समझ गये चूँकि इस घर में भूत है, इसीलिए उस बूढ़े ने घर सस्ते में बेच दिया और उनके मत्थे मढ़ दिया।
हम पर दया करो।'' फिर भी चाबुक की चोटों से वे बच नहीं पाये। तब से लेकर हर रात को वह अदृश्य स्वर वही सवाल पूछता रहा। किसी भी उत्तर से बड़ी प्रशंसा सुनने के बाद भी उन्हें वह चाबुक से मारता रहा। इस भय और पीड़ा के कारण काशीराम व्यापार भी शुरू कर नहीं पाया। एक दिन की शाम को उनका नया घर देखने के लिए चंद्रकांता की मौसी का बेटा उनके घर आया।
पूरा घर देखने के बाद उसने कहा, ‘‘यह घर तो काफी बड़ा है। लाख रुपये देने पर भी ऐसा घर नहीं मिलेगा। चालीस हजार रुपयों में ही कैसे खरीद लिया?'' आश्चर्य प्रकट करते हुए उसने पूछा। काशीराम और चंद्रकांता ने कोई जवाब नहीं दिया। वे चुप रहे। मौसी के बेटे को जल्दी भेजने के ख्याल से चंद्रकांता ने अंधेरा होते ही खाना परोसा।
फिर भी वह चले जाने के लिए तैयार नहीं दीख रहा था। थोड़ी देर तक वह इधर-उधर की बातें करता रहा और कमरे के एक कोने में चटाई बिछाकर लेटने की तैयारी करने लगा। ‘‘क्या आज जाने का इरादा नहीं है? इस रात को क्या यहीं रहोगे?'' चंद्रकांता ने निराशा-भरे स्वर में पूछा।
‘‘क्यों मेरे पीछे पड़ गयी हो? कल सवेरे शहर में थोड़ा-सा काम है। उसे पूरा करके जाऊँगा।'' उसने कहा। ‘‘रात को यहीं रहोगे तो तुम चाबुक की मारों से बच नहीं सकते,'' चंद्रकांता के मुंह से निकल पड़ा।
‘‘चाबुक और मारें। बात क्या है?'' उसने पूछा। काशीराम ने दख़ल देते हुए कहा, ‘‘घर में मच्छर ही मच्छर हैं। वे डंक मारेंगे तो समझ लेना, कोई चाबुक से मार रहा है। बेचारी चंद्रकांता यह देख नहीं सकती।'' अब चंद्रकांता से रहा नहीं गया। उसने पूरा विषय उसको सविस्तार बताया और कहा, ‘‘तीस हज़ार भी मिल जाएँ तो हम इसे बेच डालना चाहते हैं।''
‘‘ठीक है, मुझे नींद आ रही है। इसके बारे में कल सोचेंगे", कहते हुए वह चटाई पर लेट गया। आधी रात होते ही वह भयंकर स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘मैं कौन हूँ?'' चिंताग्रस्त काशीराम चौंककर उठ बैठा, ‘‘हनुमान हमें बचाओ,'' कहते हुए वह चिल्लाने लगा। गाँव से आये उस युवक का नाम हनुमान था। वह इस चिल्लाहट को सुनकर जाग पड़ा।
वह भयंकर स्वर फिर से बोला, ‘‘मैं कौन हूँ?'' ‘‘तुम कौन हो? क्या तुम्हें मालूम है, मैं कौन हूँ? हनुमान हूँ, हनुमान। जब मालूम हुआ कि हर रात को आते हो, हमारे बंधुओं को चाबुक से मारते हो, डराते, धमकाते रहते हो तो तुम्हारा अंत करने के लिए ही यहाँ आया हूँ। किसी भी हालत में मैं तुम्हें नहीं छोडूँगा। मुझे अभी नींद आ रही है। कल बताऊँगा कि तुम आख़िर हो कौन?'' हनुमान ने गंभीर स्वर में कहा।
‘‘कब बताओगे, कहाँ बताओगे?'' उस कंठ स्वर ने पूछा। ‘‘वह बात भला कैसे बता सकूँगा? कल मैं तुम्हें जब इमली के किसी पेड़ से बांध दूँगा, बोतल में बंद करके जब मैं तुम्हें ज़मीन में गाड़ दूँगा, सुलगती आग में तुम्हें जब फेंक दूँगा तब बताऊँगा कि तुम कौन हो।'' ज़ोर से हँसते हुए हनुमान ने कहा।

यह सुनते ही भूत भय के मारे चिल्लाने लगा और कहने लगा, ‘‘बाप रे, इतनी बड़ी सज़ा, मैं जाता हूँ, ऐसा मत करना।'' इन शब्दों के साथ ही एक छोटी-सी गठरी पलंग पर गिर पड़ी। गिरने की वजह से गठरी खुल गयी और सोने की अशर्फियाँ पलंग पर बिछ गयीं। इतनी अशर्फियों को देखकर काशीराम और चंद्रकांता स्तंभित रह गये।
हनुमान ने उसकी पीठ थपथपायी तो काशीराम कांपते हुए बोला, ‘‘मैं कौन हूँ?'' ‘‘तुम काशीराम हो। एक मर्द हो। इस घर के मालिक हो। पुरुष होकर तुम्हें यों भयभीत होना नहीं चाहिये। इतनी कायरता नहीं दिखानी चाहिये। जो डरते हैं, उन्हें दूसरे लोग डराते हैं । तुम दोनों ने उस पिशाच का आवश्यकता से अधिक आदर किया, बड़ी नरमी से पेश आये, इसीलिए वह तुम्हें और डराता रहा। भूत, पिशाच और चोर, दुष्ट भी लोगों की कायरता और डर से पनपते हैं और पुष्ट होते हैं।
साहस और निर्भयता के सामने बलवान शत्रु के भी पाँव उखड़ जाते हैं। जब तक तुम डर के मारे गिड़गिड़ाते रहे, उसकी हिम्मत बढ़ती रही। मैंने जब उसे धमकाया तो वह भाग निकला। अब तक तुम ने जो कष्ट सहे, उसके लिए उसने मुआवजा भी चुकाया। अब तो जान गये न, हिम्मत में कितनी ताक़त है। कल ही से व्यापार शुरू कर देना और निश्चिंत होकर सोना।'' हनुमान ने हँसते हुए कहा।
‘‘मुझसे छोटे हो, पर तुमने जीवन सत्य बताकर, मेरी आँखें खोल दीं। हमें भूत की पीड़ा से छुटाकारा भी मिल गया और तुम्हारे कारण धन भी प्राप्त हुआ। तुम्हें एतराज न हो तो जो व्यापार मैं शुरू करने जा रहा हूँ, उसमें तुम्हें भी हिस्सा दूँगा। दोनों मिलकर व्यापार करेंगे। साथ रहोगे तो डर नहीं होगा, कोई चिंता भी नहीं होगी। तुमने ठीक ही कहा, हिम्मत में ताक़त है।'' हनुमान ने काशीराम के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
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