Thursday, June 30, 2011

नूपुरों की छमछम

जयंत गंगवर जमींदार के दिवान में काम करता था। वह बहुत ही अच्छे स्वभाव का था, साथ ही अ़क्लमंद भी। इसी वजह से दिवान में काम पर लग जाने के थोड़े ही समय के अंदर उसने अच्छा नाम कमाया।
उसके माता-पिता ललितपुर नामक गाँव में रहते थे। जब वह नौकरी पर लग गया, वे भी गंगवर आ गये और बेटे के साथ रहने लगे। शहर में आ जाने के बाद भी जयंत स्वग्रम को नहीं भूला। अपने दोस्तों के साथ उसके रिश्ते जैसे के तैसे बने रहे। जब-जब उसे मौक़ा मिलता था, उनसे मिलने से वह चूकता नहीं था।
दीपावली त्योहार के अवसर पर जयंत अपने बाल्य मित्रों से मिलने और कुछ दिन उनके साथ रहने ललितपुर आया। महेंद्र, शिवदास, गुणशेखर और मनोहर उसके घने दोस्त थे। गाँव आने पर उसके मित्र बेहद खुश हुए। उन चारों दोस्तों के घर अगल-बग़ल में ही थे। चूँकि जयंत वहाँ चार दिनों तक रहनेवाला था, इसलिए यह निश्चय हुआ कि एक-एक दिन वह एक-एक के घर में रहेगा और उनका आतिथ्य स्वीकार करेगा।
पहले दिन जयंत, महेंद्र के घर में रहा। भोजन कर चुकने के बाद दोस्तों ने आपस में गपशप की और बचपन के मधुर क्षणों को याद किया। गाँव की वर्तमान स्थिति तथा देश की राजनीति के बारे में भी बातें हुईं। फिर इसके बाद बाकी तीनों दोस्त अपने-अपने घर चले गये।
रात को सोने के पहले महेंद्र ने बहुत ही भक्तिपूर्वक हनुमान का स्मरण किया और हनुमान चालीसा पढ़ता रहा। जयंत ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘लगता है, दैवभक्ति बहुत बढ़ गयी है। क्या वैरागी बनने का इरादा है?
‘‘नहीं, नहीं, भय बहुत बढ़ गया है, इसलिए रक्षा के लिए हनुमान जी को याद कर रहा हूँ। वे संकट मोचन हैं न?'' महेंद्र ने कहा।
‘‘क्यों?'' जयंत ने पूछा।

‘‘यह एक लंबी कहानी है। बहुत रात हो गयी, सो जाओ।'' महेंद्र ने कारण बिना बताये कहा और जयंत के सवाल को टाल गया।
जयंत कुछ कहे बिना लेट गया।
आधी रात के बाद जयंत जाग पड़ा। उसे नूपुरों की छमछम धीमी ध्वनि में सुनायी पड़ी। उसने मुड़कर देखा कि महेंद्र चादर ओढ़कर भय के मारे थरथर कांप रहा हैऔर कुछ मंत्र बोल रहा है। थोड़ी देर बाद नूपुरों की छमछम बंद हो गयी।
सवेरे, जयंत ने महेंद्र से नूपुरों की छमछम के बारे में पूछा।
‘‘तो क्या वह ध्वनि तुम्हें भी सुनायी पड़ी? क्या बताऊँ? एक महीने से यह कामिनी पिशाचिनी इधर-उधर घूमती-फिरती है। घर खाली भी नहीं कर सकता, क्योंकि भला अपने घर को छोड़कर कहीं और कैसे जाऊँ? उस पिशाचिनी से छुटकारा पाने के लिए भूतवैद्यों की सहायता ली। ताबीज़ भी बांधे। इनपर बहुत खर्च किया। पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ।''
‘‘अरे यार, भूत, पिशाचों पर इन दिनों में भी तुम विश्वास करते हो?'' जयंत ने पूछा।
‘‘करूँ नहीं तो क्या करूँ। जब से उन नूपुरों की ध्वनि सुनायी पड़ने लगी है, तब से घर में अशुभ ही अशुभ हो रहा है,'' महेंद्र ने कहा। ‘‘तो इस विषय पर हमारे दोस्तों से बात नहीं की? उनसे उपाय पूछ सकते थे। असलियत का पता आसानी से लग जाता।'' जयंत ने पूछा।
‘‘इस विषय को लेकर उनसे चर्चा करूँ तो वे मुझे कायर, अन्धविश्वासी, गंवार, पुरानपंथी आदि ठहरायेंगे और मेरा मज़ाक उड़ाएँगे। इसी डर से चुप हूँ।'' महेंद्र ने कहा।
दूसरे दिन जयंत शिवदास के घर में ठहरा। उस दिन की रात को भी उसने नूपुरों की छमछम सुनी। उस रात को वह छमछम की ध्वनि थोड़ी-बहुत स्पष्ट थी।
दूसरे दिन जब जयंत ने इसके बारे में शिवदास से पूछा तो उसने कहा, ‘‘ज़ोर से मत बोलो। नूपुरों की छमछम के बारे में मैंने मंदिर के पुजारी से पूछा। पुजारी ने बताया कि वह छमछम महालक्ष्मी की है और वह घर में प्रवेश करने से हिचकिचा रही है। उसे प्रसन्न करने के लिए उन्हीं से विशेष विधियों से अनुष्ठान और मूल्यवान सामग्रियोंवाली पूजाएँ भी करा रहा हूँ।''

जयंत ने इसपर कोई टिप्पणी नहीं की।
‘‘यह बात हमारे दोस्तों से किसी भी हालत में मत बताना,'' शिवदास ने इस ढंग से यह कहा, मानों कोई बड़ा रहस्य बता रहा हो।
तीसरी रात जयंत ने गुणशेखर के घर में बितायी। उस रात को नुपूरों की छमछम और निकट से सुनायी पड़ी। जयंत ने देखा कि गुणशेखर अब भी जागा हुआ है, तो उसने उससे कहा, ‘‘नूपुरों की छमछम सुनायी पड़ रही है न?''
‘‘हाँ, इधर कुछ दिनों से मैं भी वह ध्वनि सुनता आ रहा हूँ। हमारे घर के पिछवाड़े में ज़मीन के नीचे निधि है। वह बाहर प्रकट होने को आतुर है। यह उसीकी आवाज़ है। इसीलिए छिपे-छिपे पिछवाड़े को खुदवा रहा हूँ। परंतु, वह निधि हाथ नहीं आ रही है। यह बात किसी से भी मत बताना,'' गुणशेखर ने धीमे स्वर में कहा।
जयंत लेटे-लेटे सोचने लगा कि उसके दोस्तों ने नूपुरों की छमछम के विषय में जो कारण बताये, वे सच नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे अवश्य ही कोई दूसरा कारण होगा। वे सब अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार उनकी अपनी गढ़ी हुई कल्पनाएँ हैं। वे असली कारण जानने की बजाय अपनी पूर्व धारणाओं के आधार पर कुछ कहानी गढ़ लेते हैं। असली कारण जानने के लिए पूर्वाग्रहों से ऊपर उठ कर सोचना होगा।
चौथे दिन जब वह मनोहर के घर में था, तब उस रात को नूपुरों की छमछम और निकट से सुनायी पड़ी। जयंत ने देखा कि जैसे ही यह आवाज़ हुई, मनोहर बग़ल के कमरे में गया। फिर थोड़ी देर बाद वह छमछम की ध्वनि बंद हो गयी। मनोहर लौटकर आया और चुपचाप पलंग पर लेट गया।

सवेरे, जयंत ने मनोहर से नूपुरों की छमछम की ध्वनि के बारे में पूछा, तो मनोहर ने सिर झुकाकर कहा, ‘‘तुम तो जानते ही हो कि हाल ही में मेरी शादी हुई है। मेरी पत्नी को नींद में चलने की बीमारी है। बिना सोचे कब तक मैं भी जागा रहूँगा और उसकी रखवाली करूँगा, इसलिए मैंने उसके पैरों में नूपुर बांधने की आदत डाल दी। जब वह नींद में चलने लगती है, तब उन नूपुरों की छमछम की आवाज़ सुनकर मैं जाग उठता हूँ। उठकर उसे ले आता हूँ और पलंग पर सुला देता हूँ। एक बार सुला दिया, तो वह जागती ही नहीं।''
‘‘तो तुम्हारी पत्नी के नूपुरों की छमछम की ध्वनि दिन में क्यों सुनायी नहीं देती?'' जयंत ने संदेह व्यक्त किया।
‘‘नूपुर पहनना वह बिलकुल पसंद नहीं करती। इसलिए उसके सोने के बाद नूपुर बांधता हूँ और उसके जागने के पहले ही निकाल देता हूँ। अभी-अभी तो हमारी शादी हुई है। धीरे-धीरे उसे समझाऊँगा और नूपुर पहनने की आदत डालूँगा।'' मनोहर ने कहा।
जयंत को नूपुरों की ध्वनि की असलियत का पता लग गया। दूसरे दिन जब वह दोस्तों से मिला तो उसने उनसे बताया, ‘‘आपने जो ध्वनि सुनी, वह नहीं तो कामिनी पिशाचिनी की ध्वनि है, न ही महालक्ष्मी की, वह मनोहर की पत्नी के पैरों में बंधे नूपुरों की छमछम है। अब ही सही अंध-विश्वासों से दूर रहो और व्यर्थ ही धन खर्च मत करो। ऐसी स्थिति फिर कभी आ जाये, जो कि हम सब की जिन्दगी में आती रहती है, तो पहले की बनी धारणाओं से मुक्त होकर तर्क संगत विचार से काम लिया करो। स्वस्थ रहो और शांति से जीओ।''
अपने अविवेक पर दोस्तों ने शर्म के मारे सिर झुका लिया। इसके बाद, एक-दूसरे को देखते हुए ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।

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