लोग अ़क्सर कहा करते हैं कि हिमाद्रि बेंत के स्वामीजी की बेंत से जो मार खाता है, वह भाग्यशाली बन जाता है। इसका रहस्य जानने की प्रबल इच्छा लेकर नागराज ने स्वामीजी के आश्रम में प्रवेश पाया और वे जो-जो काम सौंपते थे, बड़ी ही सहनशक्ति और श्रद्धापूर्वक के करने लगा।
कुछ दिनों के बाद नागराज झुके हुए आम के पेड़ से फल तोड़ने लगा तब अचानक धम से उसकी पीठ पर बेंत की मार पड़ी। उसने पीछे मुड़कर देखा। जिस स्वामीजी ने उसे मारा था, वे कुछ कहे बिना चले जा रहे थे। तीन दिनों के बाद जब नागराज तरकारियों के पौधों में काम पर लगा था तो स्वीमीजी बेंत से मारकर चले गये। पाँचवें दिन जब वह फूल तोड़ रहा था तब ज्यों ही स्वामीजी ने उसे मारने के लिए बेंत उठायी, नागराज ने मुड़कर देख लिया। तब स्वामीजी बेंत से मारे बिना चुपचाप चले गये। इसके बाद जब-जब स्वामीजी उसे मारने के लिए बेंत उठाते थे, तब-तब वह उन्हें देखकर प्रणाम करता था, जिससे वह बेंत की मारों से बच जाता था।
इसपर बहुत ही प्रसन्न स्वामीजी ने उससे एक दिन कहा, ‘‘पुत्र, तुम जो भी छुओगे, वह सोना बन जायेगा। अब तुम इस आश्रम से जा सकते हो।''
‘‘यह कैसे संभव है?'' उसकी शंका को स्पष्ट करते हुए स्वामीजी ने कहा, ‘‘जो मनुष्य जागा रहता है, उसे किसी भी कमी कशा अनुभव नहीं होता। अब तुममें संपूर्ण रूप से यह चेतना भर गयी है। जो मनुष्य अपने को समझ जाता है, परिस्थिति के अनुसार वह अपने को परिवर्तित करता है। अतः समय ही उसे विजय फलों को प्रदान करता है।'' मुस्कुराते हुए उन्होंने नागराज को आशीर्वाद दिया और वहाँ से चले गये।
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