Thursday, June 30, 2011

नियमों का पक्का

शंकर विष्णुपुर का निवासी था। वह धनी था। उसके कुछ नियम थे। उन नियमों के अनुसार, शुक्रवार को छोड़कर किसी भी दिन जो भी धन माँगने आता था, यथाशक्ति उन्हें वह देता था। जान भी चली जाये, पर शुक्रवार को न ही किसी दूसरे को धन देता था और न ही किसी से लेता था। नियमों का वह सही-सही पालन करता था, इसलिए उसे लोग नियमों का पक्का आदमी कहते थे।
उसी गाँव में शंकर का बाल्य मित्र जोगी भी रहता था। वह भी कभी धनाढ्‌य़ था, पर व्यापार में उसने सब कुछ खो दिया। थोड़ा-बहुत जो बच गया, उसने उसे गिरवी पर रख दिया। उसे चिंता होने लगी कि यही स्थिति बनी रहेगी तो बहुत ही जल्दी उसका राज़ खुल जायेगा और लोग जान जायेंगे कि उसका दिवाला निकल गया। उसे मालूम था कि मित्र शंकर से माँगने पर धन देकर वह सहायता करेगा पर जोगी ऐसा नहीं कर पाया, क्योंकि वह आत्माभिमानी था। वह इसी कोशिश में था कि उसकी समस्या का स्थायी परिष्कार हो। वह किसी के सामने हाथ फैलाने के पक्ष में नहीं था।
ऐसे समय पर सुदर्शन नामक एक त्रिकाल ज्ञानी उस गाँव में आये। वे देवालय के प्रांगण में ठहरे। गाँव के लोग उनसे मिलने आते थे और सुदर्शन दिव्य दृष्टि से भविष्य को देखकर उन्हें उपाय सुझाया करते थे।
जोगी ने भी एक दिन उन्हें अपना दुखड़ा सुनाया। तब सुदर्शन ने उससे कहा, ‘‘भगवान में तुम्हें विश्वास है। परंतु तुमने आज तक दैव कार्यों के लिए एक दमड़ी भी खर्च नहीं की। तुम्हारे कष्टों का यही कारण है। जहाँ विश्वास हो, वहाँ वितरण भी होना चाहिये। तुम किसी शुक्रवार के दिन, सौ अशर्फियों की क़ीमत की भगवान की कांसे की मूर्ति खरीदो और पूजा मंदिर में उसका प्रतिष्ठापन करो। दूसरे दिन उस मूर्ति को लाभ पर किसी को बेचोगे तो तुम्हारे बुरे दिन मिट जायेंगे और अच्छे दिन निकल आयेंगे।''

उस समय शंकर भी वहाँ था। उसने साधु से कहा, ‘‘महात्मा, पूजा गृह में कांसे की जो मूर्ति रखी जाती है, उसकी क़ीमत ज़्यादा से ज़्यादा दो अशर्फ़ियों की होगी। जो मूर्ति बिक चुकी है, उसे भला कोई ज़्यादा दाम देकर क्यों खरीदेगा? इसलिए, कोई और सुगम मार्ग हो तो मेरे मित्र को सुझाइये।''
इसपर सुदर्शन ने हँसते हुए कहा, ‘‘पुत्र, दैव लीलाएँ विचित्र होती हैं । इस विषय को लेकर तुमने संदेह व्यक्त किया। हो सकता है, तुम्हीं अपने मित्र की सहायता करने आगे आओगे। भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, कोई बता नहीं सकता।'' शंकर ने ‘न' के भाव में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘अपने मित्र को धन देकर सहायता शायद करूँ, पर एक छोटी-सी कांसे की मूर्ति को सौ अशर्फियाँ देकर खरीदने का समर्थन नहीं करूँगा।''
उन बातों को सुनकर जोगी हताश हो गया । उसे लगने लगा कि उसकी दशा में कोई परिवर्तन होनेवाला नहीं है। इसके बाद, सुदर्शन उस गाँव से चला गया।
एक दिन दुपहर को गर्मी से बचने के लिए शंकर और उसकी पत्नी चारुमति पिछवाड़े के आम के पेड़ की छाया में आकर बैठ गये। उस समय कोई नया आदमी आया तो नौकर ने दरवाज़ा खोला और उसे शंकर के पास ले आया। उस आदमी ने शंकर को प्रणाम किया और पीने के लिए पानी माँगा। उसकी पत्नी लोटे में पानी ले आयी। पानी पीने के बाद उसने शकार से कहा, ‘‘मेरा नाम माल्य है।
व्यापार मेरा पेशा है। एक बैलवाली गाड़ी में बैठकर देश भर घूमता हूँ और विविध प्रदेशों में उपलब्ध होनेवाली विलक्षण वस्तुओं को खरीदता रहता हूँ। एक प्रदेश की वस्तुएँ दूसरे प्रदेशों में बेचता रहता हूँ। आज सवेरे ही मैं इस गाँव में आया हूँ। आधे से ज्यादा वस्तुएँ बेच डालीं। सवेरे से कुछ खाया भी नहीं। बड़ी भूख लगी है। क्या बता सकते हैं कि यहाँ भोजन कहाँ मिलेगा?''

शंकर ने कहा, ��भूखों को भोजन खिलाना, उनका आतिथ्य करना हमारा धर्म है। तुम्हें भोजनालय चाहिये तो मैं तुम्हें राह नहीं दिखा सकता। जाकर किसी और से पूछ लेना।��

माल्य शंकर के मन की बात समझ गया। उसने वहीं भोजन करना चाहा तो चारुमति ने तुरंत उसका इंतज़ाम किया। माल्य जब भोजन कर रहा था तब पड़ोसी के बुलाने पर शंकर उसके घर चला गया।

भोजन कर चुकने के बाद माल्य ने गाड़ी के अंदर रखी चीज़ें चारुमति को दिखायीं। मुरली बजानेवाले कृष्ण की कांसे की मूर्ति ने उसे आकर्षित किया। जब उसे मालूम हुआ कि उसकी क़ीमत एक सौ दस अशर्फ़ियाँ हैं, तो उसने कहा, ��साधारणतया कांसे की ऐसी छोटी मूर्ति की कीमत दो अशर्फ़ियों से ज़्यादा नहीं होती। क्या इस मूर्ति की कोई विशिष्टता है।��

माल्य ने मुस्कुराते हुए कहा, ��यह अकबर बादशाह के जमाने की मूर्ति है। महाभक्त मीराबाई ने कुछ समय तक इसकी पूजा की और फिर इसे किसी भक्त को दान में दे दिया। एक गृहस्थ ने मुझे इसे नब्बे अशर्फियों में बेचा। दस अशर्फ़ियों का लाभ लेकर सौ अशर्फ़ियों में बेचना चाहता हूँ।��

��यह मूर्ति देखने में बड़ी ही सुंदर है। मीराबाई से पूजी गयी मूर्ति खरीदना भाग्य ही तो है। पर इसके लिए रक़म भी तो होनी चाहिये न? रक़म हो तो यह किसी भी दाम पर खरीदी जा सकती है।�� अपनी असहायता जताते हुए चारुमति ने कहा। माल्य ने कहा, ��देवी जी, यह क़ीमत दूसरों के लिए है। आपको चाहिये तो इसे भेंट स्वरूप दे सकता हूँ।��

चारुमति कुछ कहने ही वाली थी कि इतने में शंकर पडोसी धनीराम के साथ वहाँ आया। विषय जानकर उसे इस बात पर आश्र्चर्य हुआ कि साधु सुदर्शन के कहे अनुसार ही कांसे की एक छोटी मूर्ति उसके घर बिकने आयी। उसने माल्य को जोगी की कहानी भी सुनायी।

माल्य उसे सौ अशर्फ़ियों पर बेचने को तैयार हो गया। शंकर ने तुरंत जोगी को ख़बर भेजी। जब जोगी वहाँ पहुँचा तो उसने उससे कहा, ��आज शुक्रवार है। साधु की बतायी मूर्ति बिकन के लिए तुम्हें ढूँढ़ते हुए आयी है। इसे तुरंत स्वीकार कर डालना।��


जोगी ने दीन स्वर में कहा, ��अब मेरे पास एक अशर्फ़ी भी नहीं है। मेरे लिए तुमने बहुत कष्ट उठाया। पर क्या करूँ, बदनसीब जो ठहरा।�� ��जोगी, अपने को बदनसीब क्यों मानते हो? तुम तो खुशनसीब हो। कर्ज तुम्हें नहीं मिलेगा तो क्या हुआ? मुझे तो मिलेगा। क्यों धनीराम।�� कहते हुए उसने धनीराम की ओर देखा।
शंकर साधारणतया किसी से कर्ज़ नहीं मॉंगता। इसलिए धनीराम �न� नहीं कह सका। कहा, ��कल तक मुझे यह रक़म मिल जानी चाहिये। रक़म लौटाने का वादा करोगे तो ज़रूर दूँगा।�� शंकर ने लौटाने का वादा किया।
यों जोगी ने, माल्य को सौ अशर्फ़ियाँ चुकाकर कांसे की मूर्ति खरीद ली। साधु के कहे अनुसार उसका प्रतिष्ठापन पूजा मंदिर में किया, और पूजा की। दूसरे दिन शंकर ने एक सौ दस अशर्फ़ियाँ देकर जोगी से वह मूर्ति खरीदी।
तब चारुमति ने कहा, ��देखा, लोग आपको नियम का पक्का मानते हैं। पर अब जाहिर हो गया कि आप नियम के पवके नहीं हैं। जान जाए, पर आप कभी भी किसी से कर्ज नहीं लेते, पर आपने धनीराम से कर्ज़ माँगा।��
शंकर ने हँसते हुए कहा, ��अपनी ज़रूरत के लिए मैं कर्ज़ नहीं लेता, यह मेरा नियम है। मैंने धनीराम से जो कर्ज लिया, वह मेरे लिए नहीं था, जोगी के लिए था। इस विषय में भी मैंने नियमों का सही पालन किया। नियमों को भंग नहीं किया। मैंने ठीक कहा न?��
चारुमति ने मुस्कुराकर कहा, ��हाँ, ठीक ही कहा। अपने लिए कर्ज न मॉंगने के नियम से उत्तम नियम है, दूसरों के लिए कर्ज़ माँगने का नियम। आप जैसे उत्तम व्यक्ति से जोगी को रक़म मिली है। इसलिए वह अक्षय धन साबित होगा। वह उसकी स्थिति में अवश्य ही परिवर्तन लायेगा।��
चारुमति के कहे अनुसार ही, जोगी की स्थिति में बड़ा परिवर्तन आया। उसका व्यापार फिर चमक उठा और कुछ ही समय के अंदर वह गाँव के भाग्यवानों में से एक माना जाने लगा।


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