शिवन एक कुलीन परिवार में पैदा हुआ था। वह अपने माता-पिता का दूसरा बेटा था जिसका जन्म बड़े बेटे शंकरन की पैदाइश के दस वर्ष बाद हुआ था। कुछ दिनों के बाद उनकी माता बीमार पड़ गई और मरणास हो गई। अपने पति और बेटों से अंतिम विदाई लेते हुए उसने खास तौर पर शंकरन से कहा, ‘‘अपने पिता के चले जाने के बाद भी नन्हें शिवन का तुम्हें ध्यान रखना चाहिये।'' इतना कहकर उसने सदा के लिए आँखें बन्द कर लीं।
जब शंकरन बड़ा हो गया तब उसके पिता ने उसे विवाह कर लेने के लिए सलाह दी, जिससे घर और उनकी देखभाल के लिए एक स्त्री रह सके । एक सम्प परिवार की पार्वती से उसका विवाह निश्चित हो गया। शीघ्र ही, वह शंकरन के लिए एक स्नेहिल पत्नी, पिता के लिए एक कर्त्तव्यनिष्ठ बेटी और छोटे शिवन के लिए एक ममतामयी माँ सिद्ध हुई।
पार्वती शिवन का विशेष रूप से ध्यान रखती थी। हर रोज सुबह वह उसे स्कूल के लिए तैयार करती और जब वह स्कूल से वापस लौटता तब उसकी पसन्द का भोजन तैयार रखती। उसकी हर जरूरत का वह ख्याल रखती थी और शंकरन अथवा उसके पिता को शिवन के विषय में कभी शिकायत करने का मौका नहीं देती थी। शिवन शीघ्र ही एक सुन्दर नवयुवक के रूप में बड़ा हो गया।
अगले दिन शिवन गौरी के घर गया। जब उसने गौरी के सामने उससे विवाह करने की इच्छा प्रकट की, गौरी को आश्चर्य नहीं हुआ। उसने भी शिवन को देखा था और वह जानती थी कि शिवन का परिवार कुलीन है। किन्तु फिर भी उसके प्रस्ताव को सीधे स्वीकार करना नहीं चाहती थी।
गौरी ने कहा, ‘‘आशा करती हूँ कि यदि मैं तुम्हारी परीक्षा लूँ तो तुम बुरा नहीं मानोगे।'' शिवन की गौरी से विवाह करने के तीव्र इच्छा थी। इसलिए उसने विरोध नहीं किया। वह राजी हो गया। तब गौरी ने अन्दर से एक पात्र लाकर उसे देते हुए कहा, ‘‘इसमें सरसों और तिल के बीज हैं। इन्हें अलग करके तिल के बीज मेरे पास कल लाना।'' शिवन पात्र लेकर घर चला गया पर यह सोचता रहा, ‘क्या यह मूर्खतापूर्ण परीक्षा नहीं है?'
पार्वती चौखट पर मिल गई। ‘‘क्या हुआ शिवन? क्या गौरी से भेंट हुई? और यह पात्र तुम्हारे हाथ में क्यों है?''
शिवन ने गौरी से हुई बातचीत के बारे में बताते हुए कहा, ‘‘ओप्पोल (बड़ी दीदी), वह मुझसे विवाह करना चाहती तो है, पर मेरी परीक्षा लेना चाहती है। उसने तिल और सरसों के बीज से भरा यह पात्र दिया है और कहा है कि तिल के बीजों को अलग करके कल ले आना। मैं रात भर जागकर भी इसे नहीं कर पाऊँगा। क्या करूँ?''
पार्वती तुरन्त समझ गई कि गौरी एक चतुर लड़की है। वह मुस्कुराती हुई बोली, ‘‘घबराओ नहीं, शिवन। यह कल तक हो जायेगा।''

पार्वती ने प्यार से उसे गले लगा लिया और कहा, ‘‘तुम क्या समझती हो कि मैं उसे किसी और लड़की से विवाह करने देती।''
पार्वती पात्र को पिछवाड़े में ले गई और अपने एक नौकर को बुलाकर किसी पेड़्र से एक चींटी-घोंसला ले आने के लिए कहा। चींटियाँ प्रायः पत्तों से घोंसला बनाती है। नौकर ढूंढ़कर चींटियों का एक घोंसला ले आया। पार्वती उसे बरतन में रख कर चली गई।
दूसरे दिन सुबह तक चींटियाँ सरसों के सारे दाने ले जा चुकी थीं और तिल के बीज छोड़ गई थीं क्योंकि वे तिल के बीज नहीं खातीं। पार्वती ने शिवन को बुलाकर उसे पात्र दे दिया। उसने सोचा कि उसकी भाभी गौरी से अधिक सयानी है।
वह गौरी को बरतन वापस देने गया। गौरी मुस्कुराती हुई अन्दर गई और वापस आकर खाली बरतन देती हुई बोली, ‘‘इसमें ओस का पानी जमा कर कल ले आना। तुम्हारी होशियारी की यह दूसरी परीक्षा है।''
शिवन हतोत्साहित होकर घर जाते समय सोचने लगा, ‘सरसों और तिल अलग-अलग करना बल्कि आसान था। पर इतने सारे ओस कल तक मैं कैसे जमा करूँगा? शायद ओप्पोल कोई उपाय बतायेगी।'
शिवन को खाली बरतन के साथ वापस आते देख पार्वती को आश्चर्य हुआ। शिवन बहुत उदास और निराश लग रहा था। ‘‘अब क्या बात है शिवन?'' पार्वती ने पूछा।
शिवन के बताने पर गौरी ने उसे सान्त्वना देते हुए कहा, ‘‘घबराओ नहीं अनिया (छोटा भाई)। मैं कुछ उपाय करती हूँ।'' शिवन मुँह लटकाये चला गया।
पार्वती ने वहाँ के धोबियों को बुलाकर कहा, ‘‘कृपया मेरी मदद कीजिये। अपने सारे कपड़े आज रात को बाहर पसार दीजिये। उनमें ओस जमा हो जायेगा। कपड़ों को निचोड़ कर एक बरतन में ओस जमा कर लीजिये और कल प्रातःकाल मुझे लाकर दे दीजिये। क्या आप मेरी इतनी मदद करेंगे?''
पार्वती बरतन में स्फटिक-सा निर्मल जल देखकर बहुत प्रस हुई और बोली, ‘‘धन्यवाद शिवन। तुम बुद्धिमान हो। पर तुम्हारी बुद्धिमानी की एक और परीक्षा लेना चाहती हूँ। कृपया कल तक मुझे ऐसे एक सौ ताजे पान के पत्ते लाकर दो जो न तो हाथ से तोड़े गये हों और न चाकू से काटे गये हो।''
शिवन को सन्देह हुआ कि यह कैसे सम्भव हो सकता है! ‘बिना हाथ लगाये या चाकू के बिना पान के पत्ते कैसे लायें? यह असम्भव है !' यही सोचता हुआ वह घर पहुँचा।
उसके उदास चेहरे को देखकर भाभी ने समझा कि या तो शिवन अपने उद्देश्य में विफल हो गया या कोई नई पहेली लेकर आया है। शिवन से गौरी की नई पहेली के बारे में सुनकर बोली, ‘‘कोई बात नहीं, मैं इसका भी कोई उपाय सोचती हूँ। परन्तु, कल मैं भी तुम्हारे साथ गौरी से मिलने आऊँगी और उससे पूछूँगी कि कितनी और परीक्षाएँ हैं।''
जब पार्वती शिवन की समस्या के बारे में सोच रही थी तब उसे याद आई कि उसने तोता पाल रखा है। वह तोते को अपने पिछवाड़े के बाग में ले गई जहाँ उसने पान की लता लगा रखी थी। उसने तोते को पिंजड़े से बाहर छोड़ दिया। तोता पान के पत्तों को चोंच से काटकर गिराने लगा। पार्वती ने सौ से भी अधिक कोमल पत्तों को इकट्ठा कर लिया और तोते को फिर से पिंजड़े में बन्द कर दिया।
दूसरे दिन सुबह शिवन के साथ पार्वती भी गौरी के घर गई। उसे देखते ही गौरी घबरा गई और उसके आने का कारण समझ गई। वह झेंपती और शरमाती हुई बोली, ‘‘चेची (बड़ी दीदी), मैं देखना चाहती थी कि शिवन मुझे कितना चाहता है। यदि तुम्हारा देवर मेरी परीक्षा में विफल हो जाता तब भी मैं विवाह के लिए सहमत हो जाती, क्योंकि अब तक उसके समान मैंने किसी और को नहीं देखा है। मुझे माफ कर दीजिये।''
इस प्रकार सयानी और चतुर पार्वती ने शिवन और गौरी का विवाह करा दिया। उसके पति शंकरन और ससुर दोनों ने उसकी चतुराई की सराहना की।
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