
हनुमान रंगापुर का निवासी था। उसके बीसवें साल की उम्र में उसके माँ-बाप एक नाव की दुर्घटना में मर गये। अब उसके जीने का कोई सहारा नहीं रहा। उसके पिता के दोस्त प्रसाद ने उसे अपने घर में जगह दी।
प्रसाद की सलाह के अनुसार हनुमान ने उसी से कर्ज़ लिया और चार बकरियाँ खरीदीं। उन्हें चारा खिलाकर बड़ा किया और वे अब बिल्कुल ही स्वस्थ दिखने लगीं। एक दिन उसने उन्हें बेच दिया और प्रसाद का कर्ज़ चुका दिया। जो रक़म बच गयी, उससे दस बकरियाँ खरीदीं। अब उसके जीने की समस्या का समाधान हो गया। थोड़े दिनों के बाद लोग उसे बकरीवाले हनुमान के नाम से पुकारने लगे।
दो सालों में उसके व्यापार में पर्याप्त वृद्धि हुई। एक गरीब परिवार की लड़की लक्ष्मी से उसने शादी भी कर ली। वह भी जंतुओं और पक्षियों को जान से ज़्यादा प्यार करती थी। पर, पति का व्यापार उसे अच्छा नहीं लगा। नयी-नयी आयी थी इसलिए पति से वह कुछ कह नहीं पायी। परंतु मन ही मन यह चिंता उसे खाये जा रही थी।
थोड़े-दिनों के बाद लक्ष्मी ने साहस बटोरा और पति के इस व्यापार के बारे में अपना विचार प्रकट किया। तब हनुमान ने अपनी लाचारी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘यह व्यापार है। कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है।'' लक्ष्मी यह सुनकर चुप रह गयी।
एक दिन जब पति हाट से लौटा और नहा-धोकर खाना खाने लगा तब लक्ष्मी ने कहा, ‘‘जिस बकरे को आप आज बेचकर आ गये, उसे आप बहुत चाहते थे। कसाई के हाथों उसे आप कैसे सौंप आये?''

‘‘वह मोटा था, सुंदर दिखता था, इसीलिए उसे अच्छे दाम पर बेच पाया।'' हनुमान ने कहा। लक्ष्मी ने बड़े ही दुख भरे स्वर में कहा, ‘‘आपके ऐसे कठोर स्वभाव के कारण ही अब तक हमारी संतान नहीं हुई। आप कसाई से कम नहीं हैं । ज़िन्दा रहने के कितने ही रास्ते हैं। दो एकड़ पट्टे पर लेंगे। साथ ही दो गायें भी रख लेंगे तो दूध का व्यापार करते हुए आराम से रह सकेंगे।''
‘‘बकवास बंद करो। मुझे तुम्हारी सलाह की कोई ज़रूरत नहीं है। कमा रहा हूँ, घर चलाने भर आवश्यक रक़म तुम्हें दे रहा हूँ। आगे से ऐसी भद्दी सलाहें दिया न क रो। घर में बैठकर राज कर रही हो। बाहर जाओगी तो मालूम होगा कि कमाने के लिए कितनी तकलीफों का सामना करना पड़ता है। चुप हो जा और सो जा।'' हनुमान ने नाराज़ होते हुए कहा।
दूसरे दिन सवेरे उठते ही हनुमान ने पत्नी से कहा, ‘‘गंगापुर के भूस्वामी के बेटे का मुंडन कल हो रहा है। उन्होंने ख़बर भेजी है कि उन्हें ग्रामदेवी को बलि देने के लिए एक बकरी की ज़रूरत है। तड़के ही यह बलि होगी। रात ही को बकरी लेकर मुझे वहाँ पहुँचना है। इसके लिए हमें मोटी रक़म भी मिलेगी। तुम जिस बकरी को प्यार से पाल रही हो, वही इसके लायक़ है। शाम ही को उसे ले जाऊँगा।''
यह सुनते ही लक्ष्मी का मन तड़प उठा। चूँकि उस बकरी की एक आँख नहीं थी, इसलिए वह उसे अपनी संतान की तरह पालपोस रही थी। अब उसे बेचने पर पति तुल गया है। वह बहुत गिड़गिड़ाई, पर हनुमान ने उसकी परवाह नहीं की। उसने साफ़-साफ़ कह दिया कि चाहती हो तो किसी और बकरी को पाल लेना। फिर उसी दिन शाम को बकरी लेकर गंगापुर जाने के लिए निकल पड़ा।
इसके पहले ऐसी अंधेरी रात में दो-तीन बार ही गया था। साधारणतया वह सवेरे ही निकल पड़ता था। उस रात को अचानक बिजली कड़कने लगी, बादल फिर आये और अंधेरा छा गया। जल्दी पहुँचने के लिए उसने सीधे न जाकर नज़दीक का रास्ता पकड़ लिया। इस अंधेरी रात में पहली-पहली बार वह डरने लगा। इसलिए वह तेज़ जाने लगा।
मार्ग मध्य में रास्ते के बग़ल में ही एक खुला कुआँ था। जल्दी पहुँचने की जल्दबाजी में हनुमान उस कुएँ की बात भूल ही गया। चलते-चलते वह कुएँ में गिर गया। डर के मारे वह चिल्लाने लगा। कुआँ गहरा था, इसलिए उसकी आवाज़ किसी को सुनायी नहीं दे रही थी।
हनुमान के साथ आयी असहाय बकरी बड़ी ही दीनता के साथ कुएँ के चारों ओर घूमने लगी। कुएँ में झाँकती हुई अपने मालिक के लिए वह चिल्लाने लगी। उसे बचाने के लिए परेशान बकरी को देखकर हनुमान मन ही मन अपने को कोसने लगा। वह रात भर कुएँ की दीवार को पकड़कर वहीं रह गया। सवेरे बकरी चिल्लाती रही, इधर-उधर भागती रही और आख़िर दो-तीन लागों को अपने साथ ले आयी। कुएँ में झाँकती हुई चिल्लाने लगी। इस बीच कुछ और लोग भी वहाँ आ पहुँचे। उन सबने मिलकर हनुमान को कुएँ से बाहर निकाला।
बाहर आते ही हनुमान ने बकरी को गले लगाया और रोने लगा। बकरी अगर चाहती तो उसे उसी स्थिति में छोड़कर चली जा सकती थी, पर उसने ऐसा नहीं किया। उसने उसे बचाना चाहा, इसीलिए उसने वहीं रहकर पूरी कोशिश की और आख़िर उसे बचा ही लिया। यह सब सोच कर हनुमान की आँखों से एहसान के आँसू बहने लगे। उसने बचानेवालों को धन्यवाद दिया और प्यार से बकरी की पीठ को सहलाते हुए घर लौटा।
बकरी और पति को एकसाथ देखकर लक्ष्मी चकित रह गयी। ‘‘बहुत पहले से ही दूसरे गाँव का धनराज इन सबको बेच डालने के लिए सलाह दे रहा था। वह भी बकरियों का व्यापार करना चाहता है, इसलिए इन्हें बेच डालने के लिए ज़ोर दे रहा था। तुम्हारे कहे मुताबिक पट्टे पर खेत लेकर कल ही से खेती करूँगा। दूध का व्यापार शुरू कर देंगे। बाकी बकरियों को धनराज के हाथ बेच डालूँगा और इसे हम ही रख लेंगे और अपनी संतान मानकर पालेंगे-पासेंगे।'' कहते हुए हनुमान ने प्यार से बकरी को उठाया। लक्ष्मी वैसे यह सब सुनकर बहुत प्रसन्न हुई, क्योंकि वह भी यही चाहती थी। लेकिन उसकी समझ में नहीं आया कि पति में यह परिवर्तन कैसे हुआ। उसने पूछा भी कि आख़िर हुआ क्या? हनुमान ने रात की घटना सविस्तार बता दी।
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