Thursday, June 30, 2011

गरीब की प्रार्थना

दस साल की उम्र में मातंग के माता-पिता मर गये तो वह दूर के एक रिश्तेदार के साथ रहने लगा। जब उस रिश्तेदार को मालूम हो गया कि मातंग बड़ा ही नादान है तो वह उससे ज़्यादा से ज़्यादा मेहनत कराने लगा। फिर भी उसे खाना पेट भर नहीं देता था। उसकी इस दुस्थिति को पडोसी नागराज ने देखा तो एक दिन उसने उससे एकांत में कहा, ‘‘अरे मातंग, कब तक ऐसी ज़िन्दगी गुज़ारते रहोगे? यही काम कहीं और करोगे तो पेट भर खाना मिलेगा। महिषापुर में पद्मनाभ मेरा रिश्तेदार है। तुम उसके पास चले जाओ। वह कोई अच्छा रास्ता दिखायेगा।''
मातंग महिषापुर गया और पद्मनाभ को अपना दुखड़ा सुनाया। पद्मनाभ ने उससे कहा, ‘‘मैं अमीर नहीं हूँ, नौकर की मुझे कोई ज़रूरत भी नहीं है, पर मेरे रिश्तेदार नागराज ने तुम्हें भेजा है, इसलिए तुम्हें घर में रख लूँगा और पेट भर खाना दूँगा। जहाँ मैं काम करने के लिए कहूँगा, हर रोज़ तुम्हें वहाँ काम करना होगा और किसी से भी रक़म की माँग करनी नहीं होगी।''
भोले-भाले मातंग ने ‘हाँ' के भाव में सिर हिला दिया। पद्मनाभ गाँव के कुछ लोगों के घर उसे भेजता था और उसके बदले धन वसूल करता था। मातंग को हर दिन खाना खिलाता था, पर नकद एक पैसा भी देता नहीं था।
मातंग समझने लगा कि अपने गाँव के रिश्तेदार से यह आदमी बेहतर है।
यों कुछ दिन गुज़र गये। एक दिन सवेरे नींद से जब वह जागा तब उसके बदन में दर्द हो रहा था। उसने पद्मनाभ से जब यह बात कही तो उसने साफ़-साफ़ कह दिया, ‘‘इस बहाने काम करना छोड़ दोगे तो तुम्हें खाना नहीं मिलेगा। याद रखो, काम करने पर ही तुम्हें खाना मिलेगा।''

उस समय मातंग भूखा भी नहीं था, इसलिए वह उस दिन काम पर नहीं गया । वह एक वैद्य के घर गया और उससे अपने दर्द की बात बतायी। वैद्य ने उसकी परीक्षा की और कहा, ‘‘तुम्हें बुखार है। रक़म दोगे तो दवा दूँगा।''
‘‘महाशय, मेरे पास फूटी कौडी भी नहीं है। आप अगर दवा देंगे तो ठीक हो जाने के बाद आपके यहाँ काम करके कर्ज चुका दूँगा।'' मातंग ने कहा। वैद्य ने उसकी शर्त नहीं मानी। उसने कहा, ‘‘जिस किसी के भी घर में काम करोगे, उसका मेहनताना पद्मनाभ को मिलेगा। अब तुम पद्मनाभ से माँगकर रक़म ले आओ। रक़म मिलने पर ही मैं तुम्हें दवा दूँगा।''
वैद्य की बातों से मातंग समझ गया कि पद्मनाभ लोगों के घरों में उससे काम करवाकर उनसे पैसे वसूल कर रहा है। वह सीधे पद्मनाभ के पास गया और वैद्य का कहा बताया।
पद्मनाभ ने नाराज़ होते हुए कहा, ‘‘मैंने तो कहा था कि तुम्हें पेट भर खाना दूँगा, पर मैंने यह नहीं कहा था कि तुम्हारा इलाज कराऊँगा। तुम जो काम करते हो, उसका मेहनताना तुम्हारे खाने के लिए भी पर्याप्त नहीं है। तिसपर तुम्हें घर के चबूतरे पर मुफ़्त में सोने भी देता हूँ।''
‘‘मैं अब बीमार हूँ, इलाज कराने के लिए मुझे पैसे दे दीजिये। फिर उसके बाद आप जो कहेंगे, करूँगा।'' मातंग गिडगिडाया।
परंतु, पद्मनाभ अपनी बात पर डटा रहा और कहा, ‘‘ग़रीब समझकर घर में आश्रय दिया तो मुझ से ही पैसे ऐंठना चाहते हो? जाओ, कोई मदद करने को तैयार हो तो इलाज करा लो।''
मातंग उस हर घर के मालिक के पास गया, जहाँ उसने काम किया। परंतु हर व्यक्ति ने उसकी मदद करने से इनकार कर दिया। वह फिर वैद्य के यहाँ गया और दीन स्वर में उससे कहा, ‘‘मैं अनाथ हूँ। दया करके मेरा इलाज कीजिये। किसी न किसी दिन आपका ऋण अवश्य चुकाऊँगा।'' कहते-कहते उसकी आँखों में आँसू उमड़ आये।
‘‘अनाथों के रक्षक भगवान हैं, वैद्य नहीं,'' वैद्य ने कड़े स्वर में कह दिया।

मातंग निराश होकर शिवालय की तरफ़ जाने लगा। अचानक ज़ोर की वर्षा होने लगी। वह शिवालय के सामने जाकर दीन स्वर में कहने लगा, ‘‘भगवान, आँखों के आगे अंधेरा छा रहा है। कमजोरी के कारण खड़ा भी हो नहीं पा रहा हूँ। तुम्हें ही मेरी रक्षा करनी होगी।'' कहते हुए वह नंदी की मूर्ति के बग़ल में बेहोश होकर गिर गया।
पाँच छः मिनटों के अंदर ही, गोदावरी नदी तीव्र रूप से प्रवाहित होती हुई गाँव में प्रवेश कर गई। उस प्रवाह में सब झोंपडियाँ बह गयीं। कितने ही घर पानी में डूब गये। कितने ही एकडों की फसल नष्ट हो गयी। इस विपत्ति से बचने में सब ग्रमीण जुट गये। ग्रामाधिकारी अपने कर्मचारियों को लेकर सबकी सहायता करने लगा। मंदिर के सामने बेहोश पडे मातंग को किसी ने बचाया और उसे सुरक्षित स्थल पर ले गया।
जैसे ही उस देश के राजा को यह समाचार मालूम हुआ, उसने नंदी वर्मा नामक व्यक्ति को राजप्रतिनिधि बनाकर महिषापुर भेजा। पुनर्वास केंद्रों में निराश्रयों के आश्रय का प्रबंध उसने किया। बाढ़ से पीडित लोगों को आहार, कपड़े दिये गये। चिकित्सा का प्रबंध भी किया गया।
रक़म चुकाये बिना ही मातंग की चिकित्सा हुई। काम किये बिना ही उसे आहार मिला। बाढ़ की वजह से जो बच्चे अनाथ हुए, उनकी पढ़ाई का भी इंतजाम किया गया। मातंग यह सब देखते हुए बेहद खुश हुआ।
मातंग को लगा कि परमशिव ने उसकी प्रार्थना सुन ली और अपने दूत को महिषापुर भेजा। वह नंदी वर्मा से मिला और उसके पैरों को छू कर प्रणाम करते हुए बोला, ‘‘महोदय, परमशिव को धन्यवाद, जिन्होंने मेरी और गाँववालों की रक्षा की। वे अपरंपार हैं।''

नंदीवर्मा की समझ में नहीं आया कि मातंग कहना क्या चाहता है। उसी से पूरे विवरण जानने के बाद उसने मातंग से कहा, ‘‘देखो, मैं शिव का दूत नहीं हूँ। तुम जैसे अनाथों की सहायता करने आया, राजा का भेजा राज प्रतिनिधि हूँ। हमारे देश के राजा उत्तम व आदर्श राजा हैं। वे सुखी होंगे तो तुम जैसे लोगों का भला होगा। परमशिव में अगर तुम्हारा गाढ़ा विश्वास हो तो उनसे प्रार्थना करो कि वे हमारे राजा को स्वस्थ रखें, लंबी उम्र और ऐश्वर्य दें।''
मातंग ने तुरंत आँखें बंद कर लीं, हाथ जोडे और प्रार्थना करने लगा, ‘‘हे भगवान, निस्संदेह ही तुम हर जगह हो। इसीलिए यहाँ खड़े होकर प्रार्थना कर रहा हूँ। हमारे देश का राजा उत्तम व आदर्श राजा है। उनपर अपनी कृपा बरसाइये। हम जैसे अनाथों की सहायता करने हर गाँव, शहर में गंगा मैय्या को भेजना और पानी में डुबो देना।''
नंदीवर्मा नाराज़ हो उठा और कड़कते हुए कहा, ‘‘अरे मूर्ख, यह भी कोई प्रार्थना हुई ! हर जगह बाढ़ आये, यही तेरी इच्छा है? जानते हो, यह कितना अनर्थकारी है?''
नादान मातंग ने कहा, ‘‘महाशय, जब मैं बुखार से तड़प रहा था तब गाँववालों ने मेरी सहायता नहीं की। वैद्य ने भी मेरा इलाज करने से इनकार कर दिया। बाढ़ नहीं आती तो बुखार के कारण शायद मैं मर भी जाता। जिन गरीबों के पास आहार, कपड़े व रहने की जगह नहीं होती, भला बाढ़ से उनकी क्या हानि होगी। राजा जो भी हमें देते हैं, उससे हमारा लाभ ही होता है। लाभ के लिए प्रार्थना करना क्या ग़लत है?''
नंदीवर्मा पहले तो भौचक्का रह गया, पर वास्तविकता जानने के बाद समझ गया कि मातंग की प्रार्थना में कितनी सचाई है। राजधानी पहुँचने के बाद उसने यह बात राजा से बतायी। राजा ने निश्चय किया कि बाढ़ों के समय ही नहीं, बल्कि सब समय वे ग़रीबों की सहायता करेंगे। उन्होंने इसके लिए आवश्यक योजनाएँ बनवाकर उन्हें कार्यान्वित कराया।
मातंग की प्रार्थना के कारण जो योजनाएँ बनीं, उनसे पूरे देश को लाभ पहुँचा।





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