चन्दन और नन्दन पड़ोसी थे। चन्दन एक धनी व्यापारी था, जबकि नन्दन एक गरीब मजदूर था, जो हर रोज सुबह काम की तलाश करने जाता और शाम को थोड़ी बहुत कमाई करके घर लौटता था। यद्यपि चन्दन के पास वह सब कुछ था जो एक धनी आदमी के पास होना चाहिये, फिर भी वह अपने धन को अनावश्यक कामों पर खर्च नहीं करता था। किसी तरह दोनों पड़ोसियों में दोस्ती हो गई।
नन्दन और उसकी पत्नी चारुमती अपने मित्रों को खिलाना-पिलाना पसन्द करते थे। उनके घर में दिन या रात के भोजन पर प्रायः मेहमान आया करते। चारुमती कभी महंगा खाना नहीं पकाती थी, पर जो सादा खाना बनाती थी, वह स्वादिष्ठ होता था और मेहमानों को पसन्द आता था।
जब नन्दन के घर में मेहमान खाना खाते समय हँसते-बोलते तो चन्दन और उसकी पत्नी परमेश्वरी का ध्यान उधर जाता और वे सोचते कि उनका पड़ोसी थोड़ी-बहुत कमाई से इतने मेहमानों को कैसे खिलाता रहता है।
परमेश्वरी और चारुमती भी अच्छी सहेलियाँ थीं। परमेश्वरी अपनी सहेली से यह जानने को उत्सुक थी कि वह और उसका पति इतने खुश कैसे रह पाते हैं। एक दिन परमेश्वरी ने साहस बटोरकर पूछ ही लिया। ‘‘साफ-साफ बताऊँ बहन, मैं खुद भी नहीं जानती कि मेरा पति कैसे अक्सर मेहमानों को ले आता है। वह सिर्फ इतना ही बताता है कि इतने लोग खाने पर आ रहे हैं। और जो कुछ मेरे रसोईघर में होता है, मैं पका देती हूँ। तुम्हारा पति होशियार है और शायद तुम्हारे सवाल का जवाब दे सकेगा।'' चारुमती ने कहा।
परमेश्वरी कुछ समझ नहीं पाई। ‘‘क्या आपने निनानवे का फेरा कहा? यह क्या होता है? बताइये तो सही!''
चन्दन ने सीधा जवाब नहीं दिया। ‘‘यह इतनी आसानी से नहीं समझाया जा सकता। पर तुम शीघ्र ही इसे होते हुए देखोगी, तब तुम समझ जाओगी।'' चन्दन ने अपनी पत्नी को कुछ और नहीं बताया। परमेश्वरी अभी भी चकित होकर देखती रही।
परमेश्वरी कुछ दिनों तक चारुमती के बारे में भूली रही। और एक दिन उसे यह जान कर ताज्ज्ब हुआ, ‘‘मुझे कई दिनों से चारुमती के घर में मेहमानों की आवाज सुनाई नहीं पड़ी।'' अगले कई दिनों तक पड़ोसी के घर में किसी मेहमान को जाते भी नहीं देखा। उसके बदले यह देखकर उसे आश्चर्य हुआ कि चारुमती और उसका पति दोनों चटाई बुनने में व्यस्त हैं और उनके आंगन में घास का अम्बार लगा है जो शायद चटाई बुनने के लिए हैं। एक रात परमेश्वरी ने पड़ोसी के घर में रोशनी जलते देखी। झांक कर देखा तो वे रात को भी चटाई बुन रहे थे। यह रात-दिन चलता रहा। ओह! वे पैसा कमाने, और अधिक पैसा कमाने के लिए कर रहे होंगे, परमेश्वरी ने सोचा।
इस विचार से वह कई दिनों तक परेशान रही। वह सबसे ज्यादा परेशान इसलिए थी कि चारुमती ने दोपहर के बाद पहले की तरह गप्प करने के लिए उसके घर में आना बन्द कर दिया। वह अपनी उत्सुकता और चिन्ता भी रोक न सकी।
इसलिए, एक दिन दोपहर के बाद, जब चन्दन घर में नहीं था, वह चारुमती के घर गई। चारुमती ने उठकर उसका स्वागत किया, अपने पास बिठाया और फिर परमेश्वरी के सामने चटाई बुनने में लग गई। कुछ देर तक हँसी-मजाक चलता रहा। फिर परमेश्वरी ने पूछा, ‘‘मुझसे मिलना बन्द क्यों कर दिया चारुमती? तुम और तुम्हारे पति हमेशा चटाई बुनते रहते हैं; क्यों? क्या इन दिनों उन्हें कोई काम-धाम नहीं मिल रहा है?''
चारुमती ने अपनी सहेली की आँखों में देखा। ‘‘कृपया यह देखकर चिन्तित न हों कि मुझमें और मेरे पति में कुछ परिवर्तन आ गया है। हमलोगों ने केवल अपनी जीवनशैली बदलने का निश्चय किया है।''
परमेश्वरी को चारुमती की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। क्या वह मुझसे कुछ छिपा रही है? उसे सन्देह हुआ। वह बोल पड़ी, ‘‘मुझे गलत नहीं समझना। पर, तुम किसी मुसीबत में हो तो मुझे बताने में संकोच न करो। मैं तुम्हें मुसीबत से निबटने के लिए काफी धन दे सकती हूँ। मैं अपने पति को नहीं बताऊँगी और न तुम्हें अपने पति को बताने की जरूरत है।''
चारुमती को अपनी सहेली से इतनी कृपा की आशा नहीं थी। ‘‘नहीं परमेश्वरी, वैसा कुछ नहीं हुआ है। मेरे पति को काम मिल जाता है, पर वह कमाई में कुछ और जोड़ना चाहता है।''
‘‘लेकिन क्यों चारुमती?'' परमेश्वरी ने पूछा।
‘‘ठीक है, मैं बताती हूँ, क्यों, पर ध्यान रहे, अपने पति को एक शब्द नहीं बताना।''
‘‘चारुमती, मैं वादा करती हूँ'', परमेश्वरी बोली।
‘‘क्या वे सोने के सिक्के थे? तब तो तुम अचानक धनी बन गई होगी!'' परमेश्वरी ने अपनी खुशी प्रकट करते हुए कहा।
‘‘मेरी सहेली, अधीर न बनो, मेरी बात सुनो।'' चारुमती ने फिर कहना शुरू किया, ‘‘मेरे पति ने थैले का मुँह खोला और जमीन पर सिक्के फैला दिये। वे चाँदी के सिक्के थे। फिर उसने उन्हें गिना। वे निनानवे थे। उसे शक हुआ कि गिनने में उससे गलती हुई है। इसलिए उसने सिक्कों को दुबारा गिना। वे निनानवे ही थे। फिर भी उसे विश्वास नहीं हुआ। इसलिए उसने उन सिक्कों को गिनने के लिए मुझसे कहा। मैंने भी सिक्कों को गिना। मेरे गिनने पर भी वे निनानवे थे।''
हमलोगों ने एक दूसरे को देखा। ‘‘एक सिक्का गायब क्यों है?'' मेरे पति ने मुझसे पूछा। ‘‘हाँ, सौवां सिक्का कहॉं गया?'' हमलोगों को कोई जवाब नहीं सूझा। अचानक उसने कहा, ‘‘मैं जानता हूँ कि क्या करना चाहिये।'' फिर उसने अपनी मजदूरी से एक रुपया निकाल कर उसमें मिला दिया और सभी सौ सिक्कों को थैले में रख कर और उसका मुँह बन्द कर एक तरफ रख दिया।
‘‘तब फिर क्या हुआ?'' परमेश्वरी ने उत्सुक होकर पूछा। उसे लगा कि सुनने के लिए अभी और कुछ शेष है।
‘‘फिर मेरे पति ने उस थैले में हर रोज एक सिक्का डालने का निश्चय किया। और इस तरह बचत करनी शुरू की। कुछ दिन वह काम पर नही जाता और घर पर चटाइयाँ बुनता है। चटाइयों की ब्रिकी से आये धन को भी सिक्कों की थैली में डाल देते हैं।''
‘‘यह तो ठीक है, चारुमती; पर तुम्हारे मेहमानों का क्या हुआ? आजकल वे तुम्हारे घर आते हुए दिखाई नहीं देते?'' परमेश्वरी ने टिप्पणी की।
‘‘अच्छा! वे लोग! अब वे लोग नहीं आते। ऐसा नहीं है कि हम उन्हें बुलाते नहीं, पर कुछ लोग तो यहाँ से चले गये हैं और दूसरे लोगों ने हमें व्यस्त देख कर आना बन्द कर दिया। फिर भी, हम उनकी कमी महसूस नहीं करते।''
परमेश्वरी ने अब अनुभव किया कि कैसे ‘निनानवे' के कारण उसके पड़ोसी के जीवन में परिवर्तन आ गया। जो भी हो, उसने वचन का पालन किया और अपने पति को इसके बारे में नहीं बताया, जिसे, सौभाग्य से, अपने पड़ोसी के बारे में सुनने के लिए समय नहीं था। एक चतुर व्यक्ति होने के नाते उसने अपनी पत्नी से यह रहस्य गुप्त ही रखने का निश्चय किया कि अपने पड़ोसी की जीवन-शैली में परिवर्तन लाने में वही स्वयं जिम्मेदार है। चन्दन और नन्दन दोनों अच्छे मित्र बने रहे।
क्या अनुमान कर सकते हो कि चन्दन का रहस्य क्या था?
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