Thursday, June 30, 2011

भगवान की प्रतिक्रिया


माधव एक गरीब लड़का था। वह इतना गरीब था कि उसके लिए विवाह करके परिवार बसाना सम्भव नहीं था। उसके पास कोई नियमित, स्थायी काम नहीं था। जो भी काम उसे मिल जाता, वही वह खुशी से कर लेता और जो कुछ, लोग उसे मजदूरी देते, नकद या अनाज, वह उसे खुशी से लेकर सन्तुष्ट हो जाता।
कभी उसे किसी के लिए सामान लाना पड़ता, कभी जलावन की लकड़ी काटनी पड़ती, कभी कुएँ से पानी निकालना पड़ता, कभी कपड़े धोना पड़ता या कभी नदी में ढोरों को नहलाने ले जाना पड़ता। उसे कभी फुर्सत नहीं मिलती। घर लौटने से पहले वह नदी जाकर स्नान करता और मन्दिर में जाकर कुछ देर प्रार्थना करता।
एक दिन, वह भगवान की प्रतिमा के सामने खड़ा हो आँखें बन्द कर मन्त्र जप रहा था। जब उसने आँखें खोलीं तो उसे लगा कि भगवान उसे दयनीय आँखों से देख रहे हैं। क्या भगवान क्लान्त हैं? मन्दिर का गर्भ-गृह अगरबत्तियों के धूम्र से भर गया था। क्या धूम्र से उनके नेत्रों में जलन हो रही है? मालाओं के भार से उनकी गरदन तो नहीं झुकी जा रही है?
उसने मन में सोचा। ‘‘भगवान, आप थके हुए लगते हैं!'' माधव ने हाथ जोड़े हुए कहा। ‘‘कृपया मेरे घर चलिये, मैं आप के लिए भोजन बनाऊँगा।'' सरल भाव से सीधे-सादे माधव ने कहा। वह प्रतिमा को एक टक देखता रहा।
‘‘क्या भगवान मुझ पर मुस्कुरा रहे हैं?'' उसे लगा कि भगवान के होंठ हिल रहे हैं। उसे आश्चर्य हुआ। ‘‘माधव, घर जाओ, भोजन तैयार करो और फिर वापस आओ।'' भगवान ने कहा। माधव ने चारों ओर नजर दौड़ाई। वहाँ और भी भक्त थे। लेकिन भगवान ने सिर्फ उसी से बात की। उसके नेत्र खुले थे और माधव ने देखा कि प्रतिमा अभी भी मुस्कुरा रही है।

वह मन्दिर से घर की ओर तेजी से चल पड़ा। वह रसोई में जाकर चावल, दाल, सब्जी से सादा भोजन बनाने लगा।
जब भोजन तैयार हो गया, तो दरवाजा बन्द कर मन्दिर की ओर चल पड़ा। अभी वह कुछ कदम ही गया होगा कि उसे एक वृद्ध व्यक्ति ने रोक लिया। वह बहुत वृद्ध और दुर्बल था और लाठी के सहारे भी मुश्किल से चल पा रहा था। ‘‘मैं दिन भर का भूखा हूँ। क्या तुम मुझे कुछ खाना दोगे?'' उसने कहा।
माधव को उस पर दया आ गई। ‘‘आओ मेरे साथ।'' उसने वृद्ध से कहा और उसे वह अपने घर ले आया। वृद्ध ने बैठ कर थोड़ा सा खाना खाया और सन्तुष्ट होकर माधव से कहा, ‘‘धन्यवाद! तुम बहुत दयालु हो। भगवान हमेशा तेरे साथ रहेंगे!'' फिर वह अपनी लाठी पकड़ कर वहाँ से चला गया।
माधव पुनः दरवाजा बन्द करके मन्दिर की ओर चल पड़ा। लेकिन कुछ ही कदम गया होगा कि उसे मार्ग में एक बूढ़ी स्त्री मिली। वह भूखी और दुखी थी। उसे सन्देह हुआ कि क्या वह कम से कम कुछ खाना ही देकर उसका कुछ दुख कम कर पायेगा। उसने उसे घर ले जाकर खाना खिलाया।
उसके खाना खा लेने के बाद माधव ने उसकी आँखों में सन्तुष्टि और प्रसन्नता की झलक देखी। ‘‘बेटे, भगवान तुम्हारा भला करे। मैं इस दिन को कभी नहीं भूलूंगी।'' महिला आगन्तुक के जाने के बाद माधव दरवाजे का सांकल लगा कर जल्दी-जल्दी मन्दिर की ओर जाने लगा।
अभी उसने कुछ ही कदम बढ़ाये थे कि पीछे से किसी ने उसका शॉल खींचा। यह गन्दे फटे कपड़ों में एक भिखारी बालक मालूम होता था जो अपना खाली पेट दिखाते हुए खाने की याचना कर रहा था। माधव समझ गया कि वह भी भूखा है। उसने बिना कुछ सोचे-विचारे तुरन्त उसे अपने घर ले जाकर खाना खिलाया।
खाना खाते समय बालक ने बताया कि वह अनाथ है और भीख माँगने को मजबूर है। माधव को उस पर दया आ गई। ‘‘कल शाम को फिर आ जाना। मैं तुम्हें खाना दूँगा।'' यह कहते हुए मन्दिर जाने के लिए तीसरी बार अपने दरवाजे का सांकल बन्द किया। वह मन्दिर जाकर प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और क्षमा माँगते हुए बोला। ‘‘भगवान, क्षमा कर दीजिये। आप को अपने घर ले जाने के लिए मुझे आने में देर हो गई।''

��लेकिन तुम तो मुझे खिला चुके हो, माधव! ��लेकिन कब प्रभु?�� माधव ने चकित होकर पूछा। ��क्या तुमने एक बूढ़े, एक बूढ़ी और एक अनाथ बालक को नहीं खिलाया? तुम वास्तव में मुझे ही खिला रहे थे। मैं बहुत प्रसन्न हूँ।�� भगवान ने कहा।
��लेकिन आपने मेरे साथ मेरे घर चलने का वचन दिया था!�� माधव ने भगवान को याद दिलाया। ��बहुत अच्छा! मैं चलूँगा। तुम आगे चलो। मैं तुम्हारा अनुगमन करता हूँ।�� भगवान ने कहा।
माधव ने घर पहुँच कर दरवाजा खोला। केवल तभी उसने पीछे मुड़ कर देखा । भगवान देदीप्यमान वहाँ खड़े थे। ��कृपया बैठिये। हे प्रभु! आप मेरे घर पधारे, इसलिए मैं बहुत खुश हूँ। कम से कम मेरा एक फल तो ग्रहण कीजिये।��
भगवान फल खाकर चलने के लिए खड़े हुए। माधव ने उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। जब वह उठा तो भगवान वहाँ नहीं थे। वह भगवान को मन्दिर तक छोड़ने के लिए जाना चाहता था। फिर भी माधव उस शाम को अति प्रसन्न दिखाई पड़ रहा था।
गरीब माधव के घर भगवान आये, यह खबर जमीन्दार कानों तक पहुँच गई। क्या उसने मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिए काफी रुपयों का दान नहीं किया था? फिर भी भगवान उसके घर कभी नहीं आये !
वह मन्दिर में जाकर भगवान के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। ��हे प्रभु! आप मेरे घर कब पधारेंगे?�� उसने पूछा। यह निवेदन कम और आदेश के भाव से अधिक बोझिल था। जमीन्दार ने प्रभु की आवाज सुनी। ��अच्छी बात है। घर जाकर मेरे लिए भोजन तैयार करो और तब मुझे बुलाने के लिए आ जाओ।��
जमीन्दार मुस्कुराता हुआ घर वापस गया। उसने नौकरों को बुला कर भोजन तैयार करने के लिए कहा। जब भोजन तैयार हो गया, जमीन्दार मन्दिर की ओर चल पड़ा। मार्ग में एक वृद्ध व्यक्ति ने उसका मार्ग रोकते हुए कहा, ��मैं भूखा हूँ, क्या कुछ भोजन खिला सकते हो?��
जमीन्दार ने उसे क्रोध से देखते हुए कहा, ��मेरे पास ��इतना समय नहीं है। निकम्मा कहीं का! अच्छे हट्टे-कट्टे लगते हो, कहीं काम क्यों नहीं करते!�� और वह आगे बढ़ गया।

जमीन्दार अभी कुछ ही कदम आगे बढ़ा था कि एक बूढ़ी भिखारिन ने आवाज दी, ��हे मालिक, मैं सुबह से भूखी घूम रही हूँ। किसी ने एक दाना तक नहीं दिया। मैं बहुत भूखी हूँ। भगवान तेरा भला करेगा बेटा! कुछ खाने को दे दो।��
जमीन्दार अपने पर काबू न रख सका। ��ओह! इस गाँव में कितने कुली-कबाड़ी हैं; मैंने सोचा नहीं था।�� वह भिखारिन पर चिल्लाया, ��मेरे पास तुम्हारे लिए समय नहीं है। चली जाओ।�� वह मन्दिर की ओर तेजी से बढ़ा। उसने सोचा भी नहीं था कि उसे फिर कोई मार्ग में रोकेगा।
तभी अचानक एक छोकरा उसके सामने आकर खड़ा हो गया और अपना पेट दिखाते हुए बोला, ��मालिक, मैं कई दिनों से भूखा हूँ। मेहरबानी करके कुछ खाने को दे दीजिये।�� जमीन्दार ने धक्का देकर उसे हटा दिया और मन्दिर की ओर और तेजी से वह बढ़ने लगा।
जब वह मन्दिर पहुँचा तब वह हाँफ रहा था। एक बार फिर वह प्रतिमा के सामने खड़ा था। ��भगवान, देखिये, मैं आप को ले जाने के लिए आ गया हूँ। आप के लिए राजसी भोजन तैयार है।�� ��लेकिन मैं तो पहले ही तुम्हारे पास जा चुका हूँ, लेकिन मेरी ओर ध्यान देने का तुम्हारे पास बिलकुल समय नहीं था।
जब मैं तुम्हारे पास पहले आया तब तुमने मुझे निकम्मा कहा, फिर कुली-कबाड़ी बताया और जब तुमने मुझे रास्ते से धक्का देकर हटा दिया तब मैं हैरान रह गया। जब भी मैं बहुत ही तुम्हारे पास गया, तुमने मेरे साथ रुखाई से व्यवहार किया। फिर मैं क्यों तुम्हारे लिए समय दूँ?�� भगवान ने कहा। जमीन्दार ने प्रतिमा की ओर देखा। लेकिन अब वह कठोर पत्थर से बनी एक मूर्ति मात्र थी।

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