Thursday, June 30, 2011

शाही तरंग-गणक मुख्य पृष्ठकहानियाँलोक कथाएँलघु कथाएँ

बहुत पहले श्रीनगर में नित्यानन्द नाम का एक धनी युवक रहता था। उसके पिता उसके लिए काफी धन और ज़मीन छोड़ गये थे। उसने उपजाऊ जमीन अन्य किसानों को पट्टे पर दे दी थी और इस तरह वह हर महीने काफी धन कमा लेता था। इसलिए अब उसे जीवन-निर्वाह के लिए कमाने की जरूरत नहीं पड़ती थी।
नित्यानन्द का पड़ोसी सोमनाथ था। उसमें कोई विशेष गुण या प्रतिभा नहीं थी। फिर भी लोग उसका और उसके परिवार का बहुत आदर करते थे। उसे प्रभावशाली होने का गर्व था। ऐसा इसलिए था कि वह राज्य में लेखाधिकारी के प्रतिष्ठित पद पर काम करता था। नित्यानन्द स्पष्ट देखता था कि उसका पड़ोसी ऊँची प्रतिष्ठा का आनन्द ले रहा है। फिर भी, उसने उसकी ओर तब तक अधिक ध्यान नहीं दिया जब तक एक दिन एक घटना नहीं घट गई जिसके कारण उसकी मनोवृत्ति में परिवर्तन आ गया।

ऐसा हुआ कि एक दिन दोनों पड़ोसियों के लड़के खेलते-खेलते झगड़ने लगे। धीरे-धीरे यह बड़े झगड़े में बदल हो गया। दोनों लड़कों की माताएँ भी बाहर निकल पड़ीं और झगड़े में शामिल हो गईं। आह! दोनों प्रौढ़ स्त्रियॉं - नित्यानन्द की पत्नी राधा और सोमनाथ की पत्नी कान्ता-एक दूसरे पर चीखने - चिल्लाने लगीं। ‘‘मेरे साथ बदतमीजी करने का मजा तुम्हें जल्दी ही चखने को मिलेगा, राधा! तुम्हारा मर्द तो एक नम्बर का आलसी है, लेकिन मेरा आदमी एक सम्मानित और विश्वास पात्र अधिकारी है।’’ कान्ता चीखती हुई अपने बेटे को खींच कर घर में चली गई।

जैसे-जैसे दिन गुजरने लगे, राधा और उसके पति यह अनुभव करने लगे कि उनके पड़ोसी उन्हें परेशान करने पर तुले हुए हैं। सोमनाथ के पास काफी अधिकार होने के कारण वह नित्यानन्द को तंग करने लगा। उसने उस पर आरोप लगाया कि उसने कर अदा नहीं किया है। नित्यानन्द को अपने को निर्दोष प्रमाणित करने के लिए उसके कार्यालय में जाना पड़ता था।


नित्यानन्द और राधा दोनों ने अपमानित महसूस किया। ‘‘क्यों कि तुम सोमनाथ की भॉंति कोई प्रतिष्ठित नौकरी नहीं कर रहे हो, इसलिए उसकी पत्नी ने तुम्हें निकम्मा कहा । तुम क्यों नहीं एक सम्मानित नौकरी पाने की कोशिश करते जिससे हम उस बदतमीज दम्पति को सबक सिखा सकें।’’ नित्यानन्द की पत्नी आँखों में आँसू लिये मानो पछताती हुई बोली।

नित्यानन्द इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने लगाऔर सचमुच, एक नये उत्साह से प्रेरित होकर वह तुरन्त नौकरी खोजने में लग गया। उन दिनों स्थानीय बहालियॉं राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती थीं जो सीधे राजा के प्रति उत्तरदायी होता था। वह राज्यपाल से मिला और उनसे प्रशासन में कोई नौकरी दिलाने का अनुरोध किया - कोई भी नौकरी! लेकिन राज्यपाल ने कहा कि कोई स्थान खाली नहीं है।

बिना हतोत्साहित हुए उसने साहस करके फिर अनुरोध किया, ‘‘सर, मुझे पैसों के लिए नौकरी नहीं चाहिये, बल्कि सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए । बिना वेतन की नौकरी मिल जाये तब भी मैं सन्तुष्ट रहूँगा। कृपया मुझे निराश न करें।’’ इस असामान्य अनुरोध पर राज्यपाल को हँसी आ गई। ‘‘क्यों नहीं इस व्यक्ति को प्रसन्न कर दें।’’ उसने सोचा।

लेकिन ऐसे स्पष्टतः अनुभवरहित व्यक्ति को भला कौन-सा काम दिया जाये। राज्यपाल ने थोड़ी देर तक सोचा और तब अन्ततः कहा, ‘‘केवल एक काम मैं अभी दे सकता हूँ। तुम्हें आपत्ति न हो तो शहर से होकर बहनेवाली नदी की लहरों की गिनती का काम कर सकते हो!’’

नित्यानन्द सरकारी नौकरी के लिए इतना निराश हो गया था कि उसने तुरन्त इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। वह गम्भीरतापूर्वक अपना कर्त्तव्य निभाने लगा। शाही मोहर के साथ बहाली का आदेश पाकर और एक खाता लेकर नाव में बैठ गया। उन दिनों नदी से ही आम रास्ता जाता था। इसलिए उसने एक पुल के पास जो यातायात का सबसे व्यस्त स्थान था, अपनी नाव बॉंध दी और नदी की लहरें गिनने लगा। यह खबर कुछ ही दिनों में जंगल की आग की तरह सर्वत्र फैल गई।

नया शाही अधिकारी, तरंग-गणक घाटी भर में चर्चा का विषय बन गया। लोगों ने इस असाधारण नियुक्ति के उद्देश्य के बारे में अटकलें लगानी शुरू कर दीं। जो भी हो, नित्यानन्द के पड़ोसी उसे आदर और आश्चर्य के साथ देखने लगे। राधा ने भी देखा कि पड़ोस में उसका महत्व बढ़ गया है और उसे इस बात पर बहुत सन्तोष हुआ।

इस प्रतिक्रिया से उत्साहित होकर नित्यानन्द ने अपना अधिकार नये क्षेत्रों में बढ़ाना शुरू कर दिया। खाते में लहरों की गणना लिखते समय वह नाविकों को दूर रहने का आदेश देता और लहरों की गिनती के बहाने उन्हें कई घण्टों तक रोक कर रखता था। अब, यह कुछ ऐसा था जिसका अनुमान नाविकों ने कभी नहीं किया था। उन्होंने जल्दी ही महसूस किया कि यदि उन्हें अपना व्यापार चलाना है तो अधिकारी को खुश रखना होगा। जल्दी ही, यद्यपि नित्यानन्द को वेतन नहीं मिलता था, वह नाविकों से अच्छा पैसा ऐंठने लगा।

और अन्त में वह अवसर आ गया जिसका उसे बहुत दिनों से इन्तजार था। एक दिन जब नित्यानन्द अपने काम में व्यस्त था, अचानक उसकी खुशी का ठिकाना न रहा जब उसने सोमनाथ और उसके परिवार को शिकारा में अपनी ओर आते हुए देखा। वे अपने सर्वोत्तम परिधान में सुसज्जित थे, क्योंकि वे अपने किसी सम्बन्धी के विवाह में शामिल होने जा रहे थे। जैसे ही शिकारा आवाज की पहुँच की दूरी में आया, नित्यानन्द ने आदेश दिया, ‘‘रुक जाओ।’’

जब सोमनाथ ने कारण जानना चाहा, तब नित्यानन्द ने उसे बताया कि उसकी नाव से लहरों के गिनने में बाधा पहुँच रही है। उसने नाविक को तब तक रुकने के लिए कहा जब तक उसका काम खत्म नहीं हो जाता। और इतना कह कर वह लहरों को बार-बार गिनने तथा गिनती को खाते में लिखने लगा। कई घण्टे बीत गये।

सोमनाथ परेशान हो गया, क्योंकि विवाहोत्सव में उसकी उपस्थिति अनिवार्य थी। वह नित्यानन्द को डॉंट-फटकार भी नहीं सकता था, क्योंकि वह सरकारी काम पर था! आखिरकर उसे मजबूरन झुकना पड़ा और उस घूर कर देखनेवाले तरंग-गणक से अनुरोध करना पड़ा कि उसे मेहरबानी करके जाने दे। नित्यानन्द ने सिर हिला कर एक अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ उसे जाने की अनुमति दे दी।

तब से सोमनाथ और कान्ता अहंकार की मनोवृत्ति को भूल गये और सावधानी पूर्वक ध्यान रखने लगे कि कभी उनके व्यवहार से नित्यानन्द और उसके परिवार को चोट न पहुँचे। वास्तव में वे दोनों अच्छे मित्र बन गये।


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