Thursday, June 30, 2011

प्राप्ति

भानुचंद्र अपने गुरुकुल में विजयदशमी के दिन नये विद्यार्थियों को भर्ती करते थे। उसी दिन पुराने विद्यार्थी आकर अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते थे, जिन्होंने उनमें विद्या की ज्योति भर दी थी ।
विजयदशमी के अवसर पर कितने ही पुराने विद्यार्थी आये हुए थे, जिनमें से कुछ बहुत ही उत्साही दिख रहे थे तो कुछ निरुत्साही। गुरु ने यह देखा और उनसे कहा, ""जीवन एक विजय और दूसरी विजय के मध्य की यात्रा है। अवसर सोपान के समान हैं। अगर ऐसे अवसर उपलब्ध हों तो भी उनका सदुपयोग करना सबके लिए संभव नहीं है। संभव होना या नहीं होना उनके मनोभावों पर निर्भर है। इसी को हमारे बड़े लोग प्राप्ति, प्रारब्ध कहते हैं। अवसरों के अनुकूल हम अपने मनोभावों को परिवर्तित कर सकें तो प्रगति और आनंद हमारे बायें हाथ का खेल होकर रहेगा। उस स्थिति में चाहे हम किसी भी क्षेत्र में क्यों न हों, किसी भी कार्य को अपने हाथ में क्यों न लें, विजय हमारे हाथ में होगी। यह विषय और स्पष्ट हो, इसे समझाने के लिए एक कहानी बताऊँगा।'' फिर वे यों कहानी सुनाने लगे:
कृष्णनगर के कुछ भक्तों की यह इच्छा दीर्घकाल से थी कि हंसद्वीप के उस पार के प्रवाल द्वीप में स्थित परमेश्वरी देवी के दर्शन कर आयें। एक दिन आवश्यक भोजन पदार्थों को इकठ्ठा करके वे एक नाव में बैठकर निकल पड़े। उस दिन की यात्रा में उन्हें किसी प्रकार की रुकावट का सामना करना नहीं पड़ा।
सूर्यास्त जब होने ही वाला था, तब अकस्मात्‌ आकाश काले मेघों से घिर गया और ज़ोर की बारिश होने लगी। आधी रात तक वह तूफान म बदल गया और भक्तों के हाहाकारों के बीच नाव उलट गयी।

उस नाव में यात्रा करनेवालों में से तीन यात्री मात्र सवेरे समुद्र के बीच में स्थित एक द्वीप के किनारे बच निकले। ये थे, पुजारी नारायण, छोटा व्यापारी भूषण और भिखारी रमण। बच जाने पर उन्हें आनंद तो हुआ, पर उस सूने द्वीप में क्या करना है, कैसे ज़िन्दा रहना है, यह उनकी समझ में नहीं आया। जब उन्होंने देखा कि उस द्वीप में नारियल, खजूर आदि पेड़ भरे पड़े हैं, और उनमें कितने ही फल भी हैं तो कुछ दिनों तक उन्हें खाते हुए वे ज़िन्दा रहे।
"इन फलों को खाते हुए जी तो रहे हैं, पर रहेंगे कहाँ और पहनेंगे क्या? जगन्माता के दर्शन करने निकले तो हमारी यह दुःस्थिति हो गयी। हमारे लोग इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते कि हम कहाँ है। हम मानव मात्र हैं, कर भी क्या सकेंगे। जगन्माता की जो इच्छा !'' लंबी सांस खींचते हुए नारायण ने कहा।
"इतने नारियल, खजूर व्यर्थ हो रहे हैं। इनका व्यापार किया जाए तो लाखों रुपये कमा सकते हैं। पर खरीदनेवाला तो एक भी नहीं है। ध्यान लगाकर देखना कि समुद्र में नावें कहीं दीख तो नहीं रही हैं!'' भूषण ने आशा-भरे स्वर में कहा।
"भरपेट खाने के लिए यहाँ बहुत पड़ा हुआ है। बेकार बकबक मत करो, पेट भर खाओ और आराम करो,'' रमण ने उन दोनों को डांटते हुए कहा।
जैसे-जैसे दिन गुजरने लगे, भूषण और नारायण घर की याद में रोने-बिलखने लगे।
नारायण एक दिन समुद्र के किनारे टहल रहा था तो उसने वहाँ देखा कि एक शिला पड़ी हुई है और वह देवी की मूर्ति है। बड़ी ही सावधानी से उसे वह ले आया और द्वीप के बीच के टीले पर उसे सजाकर उसकी पूजा करने लगा। श्लोकों और मंत्रों को उच्चारित करते हुए, उसकी पूजा करते हुए वह यह भी भूल गया कि वह कहाँ है और अपनों से कितनी दूरी पर है।
भूषण का ध्यान यद्यपि व्यापार की ओर था, पर वह भी हर दिन कम से कम एक बार भक्तिपूर्वक मूर्ति को प्रणाम करता था। "यही मूर्ति हमारे गाँव में भी होती तो जो भक्त सिक्के समर्पित करते, उससे मेरी जिन्दगी आराम से कट जाती। यहाँ तो एक भी ऐसा आदमी नहीं, जो सिक्के देवी को समर्पित करें,'' रमण चिढ़ता हुआ अपने आप कहा करता था।

परंतु, महिमा व दिव्यत्व से भरपूर उस मूर्ति को इन तीनों पर दया आ गयी। एक दिन रात को सपने में नारायण ने उस देवी को देखा। उसने कहा, ""नारायण, जिस देवी की तुम पूजा करते हो, वह मैं ही हूँ। जल्दी ही तुम तीनों के इस अकेलेपन का अंत करूँगी। क्या इस स्थल पर मेरा मंदिर बनाओगे, जहाँ हर रोज़ निरंतर पूजाएँ होती रहें?''
"माँ, यह क्या कह रही हो? जन्म भर मैं तुम्हारी सेवा करता रहूँगा। अपने परिवार से मुझे मिला दो,'' भक्तिपूर्वक नारायण ने विनती की।
"तो ठीक है। कल सवेरे चंद मछुवारे इस द्वीप में प्रवेश करेंगे। उनके द्वारा अपना समाचार अपने परिवारों को भेज दो। एक सप्ताह के बाद पुनः दर्शन दूँगी।'' कहकर देवी अदृश्य हो गयी।
भूषण और रमण ने नारायण की बातों का विश्वास नहीं किया। पर, दूसरे दिन की दुपहर को चंद मछुवारे भटककर इस द्वीप में आये। अब उन्हें विश्वास हो गया कि देवी का वचन सच है। मछुवारे उन तीनों को देखकर आश्चर्य में डूब गये। टीले पर देवी की मूर्ति को प्रणाम करके वे लौटे और कृष्णनगर के उनके परिवारों को यह समाचार दिया।
नारायण और भूषण की पत्नियाँ और उनकी संतान तथा रमण के साथी भिखारी उस द्वीप में पहुँचे। बड़े पैमाने पर देवी की पूजाएँ होने लगीं।
वचन के अनुसार देवी उन तीनों को उनके सपनों में दिखायी पड़ीं और कहा, "तुम्हारी भक्ति पर प्रस हूँ। हर एक को एक-एक वरदान दूँगी। माँगो।''
"सदा तुम्हारी सेवाएँ करता रहूँ और जीवन बिताता रहूँ, यही वर देना माते'', नारायण ने माँगा।

"मैं तुम्हीं पर विश्वास रखता हूँ। मेरा व्यापार खूब चले, धनाढ्‌य बनूँ और पत्नी व संतान समेत जीवन बिताऊँ। कृष्णनगर लौटने के बाद मैं तुम्हारे लिए एक मंदिर बनवाऊँगा। यह आशीर्वाद देना माते'', भूषण ने माँगा।
"माते, मुझे एक चांदी का भिक्षा पात्र प्रदान करना। तुम्हारा नाम लेकर भीख माँगता रहूँगा'', रमण ने माँगा।
"तथास्तु'' कहकर देवी ने आशीर्वाद दिया। जिस दिन भक्त आते थे और वे जो दान देते थे, उन्हीं से नारायण पेट भरता रहा, अन्यथा वह भूखा ही रह जाता था। नारायण सदा देवी के ध्यान में संतुष्ट जीवन बिताने लगा। भूषण द्वीप में भरे पड़े नारियलों व खजूरों का निर्यात करने लगा और बहुत धन कमाया। थोड़े ही समय में उसने लाखों रुपये कमाये।
"चांदी का पात्र लिये भीख मॉंग रहे हो! तुम तो अव्वल दर्जे के सुस्त हो, यह दरिद्रता तुम्हारी निस्सहायता नहीं, एक नाटक मात्र है'', यह कहते हुए कोई भी उसे एक दमड़ी भी नहीं देता था। उस स्थल को छोड़कर रमण कहीं और चला गया।
इस कहानी को सुनकर सभी शिष्य हाँस पड़े। तब गुरु ने कहा, "देखा, तीनों वैभव माँगते तो देवी उन्हें अवश्य देती। परंतु, उन सबकी प्राप्ति व प्रारब्ध हरेक की बुद्धि के अनुरूप मिला। अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार ही उन सब ने देवी से वरदान माँगे। और तदनुसार उन सब के जीवन में अलग-अलग परिवर्तन भी आये। अतः जीवन में परिवर्तन लाना हो तो पहले हमारी बुद्धि में परिवर्तन होना चाहिये। तभी अवसरों का सदुपयोग संभव है। इसीलिए आरम्भ में ही कहा था कि अवसर का सदुपयोग करना या नहीं करना हमारे मनोभाव पर निर्भर करता है।''

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