Thursday, June 30, 2011

विनय का शास्त्र ज्ञान

वेणु शर्मा प्रसिद्ध वैद्य हैं। अपने गाँव में ही नहीं, आसपास के गाँवों में भी उनकी बड़ी ख्याति है। हर कोई उनकी चिकित्सा-पद्धति की खूब प्रशंसा करता है। एक दिन रोगियों की जांच और उन्हें स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक सलाह देने के बाद घर के अंदर जाने ही वाले थे कि बीस साल का एक युवक वहाँ आया। उसने शर्मा को सविनय प्रणाम किया।
वेणु शर्मा ने सोचा कि वह शायद किसी रोग से पीड़ित है और दवा लेने आया होगा। वे उससे पूछने ही जा रहे थे कि इतने में उस युवक ने आगे बढ़कर कहा, ‘‘मेरा नाम विनय है। पिछले दस सालों से प्रसिद्ध वैद्यों की सेवा में रह चुका है और वैद्य शास्त्र संबंधी बहुत-से ग्रंथों का पठन भी किया। वैद्य शास्त्र के बारे में अच्छी जानकारी भी पायी। आपकी सेवा करते हुए यहाँ भी रहना चाहता हूँ और स्वयं वैद्य बनकर रोगियों की चिकित्सा करना चाहता हूँ। कृपया आप मुझे इसकी अनुमति और आशीर्वाद दें।''
उसकी बातों को सुनते हुए वेणु शर्मा को लगा कि उसमें विद्या की मात्रा कम है और आवश्यकता से अधिक दंभ है। उन्होंने उस युवक से कहा, ‘‘मेरी सेवा-शुश्रूषा तुम किसी भी दिन शुरू कर सकते हो। अभी-अभी ख़बर मिली है कि शरभ ने अपने घर के पिछवाडे के केले के पेड़ के पत्तों को काटते हुए अपना हाथ काट लिया। उसकी फ़ौरन चिकित्सा होनी चाहिये। तुम ही बताओ कि अब क्या करें?''
विनय घबराता हुआ बोला, ‘‘सब ग्रंथ अपने अतिथि गृह में छोड़ आया हूँ। ऐसी दुर्घटनाओं की चिकित्सा कैसी हो, यह चरक में या सुश्रुत में क्या लिखा हुआ है, देखकर आता हूँ।'' कहकर वह जाने लगा।
वेणु शर्मा ने उसे रोकते हुए कहा, ‘‘तुम अगर चरक व सुश्रुत ग्रंथों को पढ़ने लगोगे और उसके बाद ही चिकित्सा करोगे तो तब तक शरभ का पूरा का पूरा रक्त बह जायेगा और वह परलोक सिधार जायेगा। एक काम करना। अच्छा यही होगा कि कुछ और समय तक उन ग्रंथों का अध्ययन गंभीरतापूर्वक करते रहना।''


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