हीरा लाल मुश्किल से दस वर्ष का रहा होगा जब उसकी माता और पिता दोनों गुजर गये। जब वे खेत पर काम कर रहे थे उनके ऊपर बिजली गिर पड़ी। वे एक जमीन्दार की नौकरी करते थे। जमीन्दार को छोटे बच्चे पर दया आ गई। बालक अब जमीन्दार के परिवार के साथ रहने लगा। उसने उसे भोजन के साथ सोने के लिए अपने बड़े घर में एक कोना दे दिया। जमीन्दार की पत्नी यद्यपि दयालु थी, फिर भी उससे काम अवश्य करवाती थी। उसे करने के लिए हर तरह का काम दिया जाता था और जिसे करने में उसे कोई आपत्ति नहीं होती थी, क्योंकि आखिर उसे दिन में तीन बार खाना दिया जाता था और जब जमीन्दार का परिवार आराम करता था तब वह भी विश्राम कर सकता था। इसलिए वह कभी शिकायत नहीं करता था। दो वर्ष बाद जमीन्दार ने देखा कि हीरालाल तगड़ा हो गया है और सोचा कि खेत पर वह अधिक उपयोगी हो सकता है, जहाँ हीरालाल के माता-पिता की मृत्यु के बाद उसने दो मजदूरों को बहाल किया था। उसने एक मजदूर को हटा दिया और हीरालाल को दूसरे मजदूर की मदद करने के लिए कहा।
‘‘बाबूजी, आपने पाँच सालों तक मेरी देखभाल की, उसके लिए मैं आप का कृतज्ञ हूँ। अब मुझे अपनी देखभाल स्वयं करनी चाहिये। मैं आप का उपकार कभी नहीं भूलूँगा।''
‘‘वह तो ठीक है, लेकिन यह तो बताओ कि कहाँ जा रहे हो?'' जमीन्दार ने अपनी चिन्ता और निराशा छिपाते हुए पूछा।
‘‘मालिक, मैं कुछ काम की तलाश में बनारस जाना चाहता हूँ। लोग कहते हैं कि बनारस बहुत बड़ी जगह है, इस गाँव से बड़ी और वहाँ नौकरी मिलना मुश्किल नहीं है।''
‘‘लेकिन हीरालाल, क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि बनारस बहुत दूर है?'' जमीन्दार ने उसे याद दिलाते हुए कहा। ‘‘वहाँ पहुँचने में बहुत दिन लग जायेंगे। तब तक तुम कैसे गुजारा करोगे?''
‘‘मैंने उसके लिए सोचा है, मालिक,'' हीरालाल ने कहा। ‘‘पिछले पाँच सालों की मजदूरी देकर आप मेरी सहायता कर सकते हैं।''
कुछ क्षणों के लिए जमीन्दार भौचक्का रह गया। इस पर विचार करने के लिए वह समय चाहता था। ‘‘लेकिन क्या जाने के लिए तुमने पक्का इरादा कर लिया है?''
‘‘हाँ मालिक, मैंने पक्का इरादा कर लिया है।'' हीरालाल ने दृढ़ निश्चय के साथ कहा।
‘‘ठीक है, तब'', जमीन्दार ने कहा, ‘‘जैसी तुम्हारी मर्जी।'' तब वह अन्दर गया और चाँदी के पाँच सिक्के लेकर बाहर लौटा।
‘‘रख लो इन सिक्कों को, तुम्हारी सेवा के हर वर्ष के लिए एक-एक सिक्का। पर याद रखो, यदि तुम कभी वापस आना चाहो तो हमेशा आ सकते हो।'' जमीन्दार ने कहा।
देने के नाम से हीरालाल को खाने के पैकेट की याद आ गई जो जमीन्दार की दयालु पत्नी ने उसे दिया था। उसने उसका कुछ हिस्सा वृद्ध को भी दिया। खाते समय वह सोचने लगा कि किस प्रकार की विद्या उसका नया गुरु उसे देने के लिए कह रहा है।
दूसरे दिन प्रातःकाल वृद्ध व्यक्ति और बालक दोनों बहुत देर तक बातचीत करते रहे। वृद्ध व्यक्ति ने अपने अनुभवों के बारे में बताते हुए कहा कि कैसे उसे दुनिया से संन्यास लेना पड़ा। ‘‘अब हमारे पास सिर्फ एक चीज़ रह गई है।'' यह कहते हुए उसने अपने झोले से चन्दन की लकड़ी की एक बांसुरी निकाली और उसे हीरालाल को दिया।
‘‘मैंने क्या अपराध किया है, मालिक?'' लड़के ने बड़ी विनम्रता से पूछा।
हीरालाल को आश्चर्य हुआ, चाँदी के पाँच सिक्के दो वर्षों तक घर में किये गये कठिन काम और तीन वर्षों तक खेत पर की मेहनत के बदले बहुत कम थे। जो भी हो, अब वह जमीन्दार की नौकरी सदा के लिए छोड़ रहा था, इसलिए उसने उससे बहस या सौदा करना अच्छा नहीं समझा। उसने जमीन्दार को धन्यवाद दिया और हाथ जोड़ कर विदा लेते हुए जैसे ही दरवाजे से बाहर पाँव रखा कि जमीन्दार की पत्नी लंच पार्सल देती हुई बोली, ‘‘यह रख लो, हीरालाल, कम से कम एक दिन तो भूख से बच जाओगे।''
हीरालाल ने झुककर खाने का पैकेट ले लिया और कृतज्ञता की नजरों से उसे देखा। फिर चुपचाप वहाँ से चल पड़ा। लड़का चलता रहा, चलता रहा बिना इसकी परवाह किये कि बनारस तक पहुँचने में पता नहीं उसे कितने दिन लगेंगे जहाँ उसने अपनी किस्मत आजमाने का फैसला कर लिया था।
शाम होते-होते वह काफी थक गया। उसने एक बड़े वट वृक्ष के नीचे आराम करने और सोने का स्थान ढूंढ लिया। कुछ कदम दूर पहले से एक वृद्ध व्यक्ति लेटा हुआ था और सोने की कोशिश कर रहा था। उसके बाल में जटाएं थीं जिन्हें उसने सिर के ऊपर बाँध रखी थीं। उसके कपड़े फटे पुराने थे।
लड़के को देख कर वह उठ बैठा और उससे बातचीत करने लगा। हीरालाल ने अपनी राम कहानी सुनाते हुए कहा कि बनारस में कुछ काम-धन्धा करने की बड़ी तमन्ना है। उस वृद्ध व्यक्ति के चेहरे पर एक मन्द मुस्कान फैल गई। ‘‘बेटे, आखिर तुम आ गये। मैं अब तक तुम्हें अपनी विद्या देने का इन्तजार कर रहा था।''
‘‘लम्बी यात्रा के कारण तुम काफी थक गये हो और तुम्हें विश्राम की आवश्यकता है। मैं तुम्हें विद्या कल प्रातःकाल दूँगा जब तुम ताजा रहोगे।'' यह कह कर वह लेट गया और शीघ्र ही उसे नींद आ गई। हीरालाल भी अपने स्थान पर सो गया।
लड़के ने बाँसुरी को लेते हुए कहा, ‘‘लेकिन बाबा, मैं तो बाँसुरी बजाना जानता नहीं।''
‘‘आह! मैंने अब तक तुम्हें यह बताया नहीं।'' वृद्ध व्यक्ति ने कहा। ‘‘तुम्हें सिर्फ इसमें फूँकना है और बाँसुरी से संगीत निकलेगा। जो भी संगीत सुनेगा, वह नाचने लगेगा। इसके संगीत में इतनी शक्ति है। लेकिन इसे जादू की बाँसुरी न कहो, क्योंकि यह कोई और जादू नहीं कर सकता। नाचना शुरू करने पर वह तभी नाचना बन्द करेगा, जब तुम बाँसुरी बजाना बन्द कर दोगे। तब वह संगीत से प्राप्त आनन्द के बदले कुछ तुम्हें देना चाहेगा। इस तरह बाँसुरी तुम्हारी जरूरतें पूरी कर देगी।''
हीरालाल ने उस वृद्ध व्यक्ति को साष्टांग प्रणाम किया और उसका आशीर्वाद लेकर वह पुनः अपनी यात्रा पर चल पड़ा। अचानक उसे एक पक्षी की कूजिका सुनाई पड़ी। और उसे बाँसुरी बजाने का मन हुआ। उसे नहीं मालूम था कि उसे कोई देख रहा है। अचानक उसकी नजर एक आदमी पर पड़ी जो देखने में बदमाश जैसा लग रहा था। वह उठ कर बाँसुरी की धुनपर नाचने लगा। बालक उत्साहित होकर बाँसुरी बजाता रहा और वह आदमी जो अब उतना भयानक नहीं लग रहा था, नाचता रहा। शीघ्र ही वह, ऐसा लगा जैसे नाचते - नाचते थक गया हो। हीरालाल ने बाँसुरी बजाना बन्द कर दिया। उस आदमी ने हीरालाल के पास आकर उसे गले लगा लिया। ‘‘मुझे आज तक ऐसी शान्ति कभी नहीं मिली। ले लो ये सारे आभूषण, चूड़ियाँ, रत्न ।'' उसने अपनी गठरी खोली और हीरालाल ने चमकदार कण्ठे, चूड़ियाँ , अंगूठियाँ, रत्न आदि देखे।
‘‘मैं चोर हूँ'', उस आदमी ने कहा, ‘‘और ये सब मैंने कई घरों से चुराये हैं। मैंने अब चोरी छोड़ देने का निश्चय किया है और मुझे इन सब चीजों की जरूरत नहीं है। ये तुम्हें काम देंगे।'' उसने लड़के के हाथ में गठरी थमा दी और उसके प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किये बिना वह चला गया। हीरालाल अवाक्-सा थोड़ी देर वहाँ खड़ा रहा, फिर अचानक प्राप्त उस धन को ‘सावधानी' से अपनी गठरी में बाँध आगे चल पड़ा।
दुर्भाग्यवश हीरालाल अभी बच्चा होने के कारण नहीं समझ सका कि चोर, दन्तकथाओं के तेन्दुए की तरह जो अपनी चित्ती बदलना नहीं चाहता, बहुत दिनों तक शान्त नहीं बैठ सकता । बालक से अलग होने पर वह गंभीरता से विचार करने लगा कि वह बच्चे से अपना धन कैसे वापस ले ले। उसने पहले उसकी बाँसुरी की चोरी करने के लिए सोचा। लेकिन उसे बाँसुरी बजाना नहीं आता था। नहीं, उसे बच्चे से आभूषण छीन-झपट कर नहीं लेना चाहिये और इसे एक और चोरी-डकैती की तरह नहीं लगना चाहिये।
तब तक चोर दूसरे गाँव में पहुँच चुका था। वह एक व्यापारी के रूप में गाँव के सरपंच के पास पहुँचा। उसने एक कहानी गढ़ी और अन्त में कहा, ‘‘इस बालक-ठग ने धोखा देकर मेरे सारे आभूषण लूट लिये। मैं तो बर्बाद हो गया।'' उसने किसी तरह कुछ घड़ियाले आँसू बहाये जो उसके गालों पर टपक पड़े।
‘‘घबराओ नहीं दोस्त'', गाँव के मुखिया ने विश्वास दिलाया, ‘‘वह बालक इस गाँव से होकर ही गुजरेगा। उसके आते ही उसे गिरफ्तार कर लिया जायेगा।'' फिर उसने कुछ तगड़े लोगों को लड़के को पकड़ कर अपने पास लाने का आदेश दे दिया।
हीरालाल ने गाँव में प्रवेश करते ही कुछ लोगों की भीड़ देखी। कुछ लोग लाठी और भाले से लैस थे। वह उन्हें देखकर चकित रह गया। उसने महसूस किया कि विरोध करना बेकार है। लोग उसके हाथ बाँध कर उसे सरपंच के पास ले गये।
‘‘जैसेकि तुम्हें मालूम नहीं हो!'' सरपंच ने उपहास के साथ कहा। ‘‘ये हमारे दोस्त हैं जिन्हें तुमने लूटा है। इनके आभूषण कहाँ हैं? जल्दी निकालो।''
‘‘मैं देता हूँ, लेकिन पहले मेरे हाथ तो खोलिये।'' उसने निर्भीक होकर कहा। गाँववालों ने उसके हाथ खोल दिये। उसने तुरन्त बाँसुरी बाहर निकाल कर उसे बजाना शुरू कर दिया। बाँसुरी से मंत्रमुग्ध कर देनेवाला संगीत निकलने लगा। वहाँ बैठे सभी लोग, सरपंच तथा सरपंच का तथाकथित दोस्त भी, नाचने लगे। किसी तरह व्यापारी वेशधारी चोर चिल्लाकर बोल सका, ‘‘नहीं, उसे बाँसुरी मत बजाने दो। वह कभी बजाना बन्द नहीं करेगा!''
चोर के भीड़ की दृष्टि से ओझल होते ही लोगों ने हीरालाल का स्वागत करते हुए उसकी जय-जयकार की, ‘‘तुम हमारे नायक हो! कृपा करके अब हमारे साथ इसी गाँव में रह जाओ!''
सरपंच समझ नहीं सका कि उसका तात्पर्य क्या है? क्या इसके पहले लड़के से उसकी भेंट हो चुकी है? नहीं तो उसकी बाँसुरी के बारे में उसे कैसे मालूम होता? तब तक और भी गाँववाले उस मुग्धकारी संगीत सुनकर आ गये और नाचने लगे। हीरालाल बाँसुरी बजाता गया।
‘‘रुक जाओ, कृपया, रुक जाओ!'' वह चिल्ला पड़ा। ‘‘मैं अपराध स्वीकार करता हूँ।'' हीरालाल ने बाँसुरी हटा ली। कुछ देर हाँफने के बाद वह बक पड़ा, ‘‘वह चोर नहीं है! मैंने ही लोगों से आभूषण लूटे हैं। उसकी गठरी में वही लूट का माल है जो मैंने उसे बाँसुरी बजाना बन्द करने के बदले दिया है। उसने पहले ही मुझे दण्ड दे दिया है और मैं नहीं चाहता कि किसी और को भी यह दण्ड मिले।''
सरपंच ने राहत की सांस ली। तब तक हीरालाल ने डाकू द्वारा दिये गये आभूषणों की थैली निकाल कर सरपंच के आगे रखते हुए कहा, ‘‘उसने आभूषणों की यह गठरी मुझे देते समय अब चोरी नहीं करने का वचन दिया था। सब के सामने अब फिर इससे वचन लीजिये कि अब से एक नई जिन्दगी शुरू करेगा।
डाकू ने औपचारिक शपथ ली। सरपंच ने कहा, ‘‘हम लोग तुम्हें आजाद कर रहे हैं, लेकिन फिर कभी पकड़े गये तो दण्ड दिया जायेगा।''
सरपंच ने तब कहा, ‘‘आ जाओ, हीरालाल! पहले हमलोगों के साथ भोजन कर लो। बाद में तुम्हारे निवास का प्रबन्ध कर देंगे।''
हीरालाल प्रसन्न था, क्योंकि अब बनारस जानेवाले थकाऊ मार्ग पर जाने का प्रश्न नहीं रहा।
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