Thursday, June 30, 2011

बचपन में सुनी कहानी

आन्ध्र प्रदेश की नाजविद निवासी मालती चेन्दूर मुख्यतः स्वयं-शिक्षित थीं। उनकी पहली कहानी ‘आनन्द वाणी' में प्रकाशित हुई, जिसमें उनका उपन्यास ‘चम्पकम चेदा पुरुगुलु' भी धारावाहिक रूप से प्रकाशित किया गया। जब ‘आन्ध्र प्रभा' का प्रकाशन 1952 में आरम्भ किया गया, तब इसका स्तम्भ ‘नारी तथा गृह' मालती को दिया गया, जिसे उन्होंने 45 से अधिक वर्षों तक निभाया। सबसे अधिक लोकप्रिय तेलुगु साप्ताहिक ‘स्वाति' में वह एक नियमित स्तम्भ में लिखती रहीं। उनकी कृतियॉं हिन्दी, गुजराती, उड़िया तथा कन्नड़ में अनूदित हो चुकी हैं। उन्होंने लगभग 300 अंग्रेजी उपन्यासों का तेलुगु में अनुवाद किया है। उन्हें 1992 में भारतीय भाषा पुरस्कार (कोलकाता), 1987 में आन्ध्र साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 1993 में केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पहली महिला लेखिका हैं जिन्हें उपन्यास के लिए पुरस्कार दिया गया।
अन्य बच्चों की तरह मैंने भी सियार-कौआ, गरीब बुढ़िया जैसी कहानियाँ सुनी होंगी; पर वे मुझे याद नहीं हैं। जब मैं सात-आठ साल की थी, तब चांदनी रात में चटाई बिछाकर अपने बहनोईजी से कई कहानियॉं सुना करती थी। उनमें से एक कहानी अब भी मुझे बखूबी याद है। कहानी बताने की उनकी पद्धति अब भी मेरे कानों में गूँजती रहती है।
मेरे बहनोईजी उन दिनों में निजाम प्रांत के शिक्षा विभाग में काम करते थे। प्रशिक्षण कॉलेज के प्रिन्सपल रह चुके थे। सेवा-निवृत्त होने के बाद भी, मेरे रचयित्री होने के बाद भी, वे मुझे कहानियाँ सुनाया करते थे। मेरे रचयित्री होने का पूरा श्रेय उन्हीं को है। उन्हीं की वजह से कल्पना शक्ति मुझमें जगी। वे कहानियाँ बताने में इतने प्रवीण थे कि मुझे लगता था, मानों मैं आकाश में उड़ रही हूँ। उनकी बतायी अनेक कहानियों में से ‘‘अण्डा जैसा धान्य दाना'' नामक कहानी आज भी मुझे कल्पना लोक में विचरने ले जाती है। मुझे यह कहानी बेहद पसंद है।
मेरा समझना है कि यह लोक कथा है। एक दिन शाम को जब बच्चे खेल रहे थे, तब उन्हें कांटों की झाड़ियों के बीच एक अंडा दिखायी पड़ा। बच्चों ने सहज ही कुतूहलवश उस अंडे को अपने हाथों में लिया और उसे बड़े ही ग़ौर से देखने लगे। वे इस निर्णय पर नहीं आ सके कि यह अंडा है या और कुछ।

उस समय उस रास्ते से गुज़रते हुए एक आदमी ने उन बच्चों को एक आणा देकर उसे खरीद लिया। वह आदमी भी उस अंडे को ग़ौर से देखने लगा। उसने उसे उलट-पलटकर खूब देखा, पर उसकी समझ में नहीं आया कि यह किस पक्षी का अंडा है। उसने सोचा ‘इस अंडे को ले जाकर राजा को दूँ तो वे अवश्य ही पुरस्कार देंगे।' बड़ी आशा लेकर वह उस अंडे को राजा के पास ले गया। राजा ने उस आदमी को पुरस्कार दिया और स्वयं तल्लीन होकर देखने लगे कि यह किस पक्षी का अंडा हो सकता है। किन्तु उनकी भी समझ में नहीं आया। उन्होंने उसे राज दरबार के दरबारियों के हवाले किया और यह बताने के लिए कहा कि यह किस पक्षी का अंडा है। उन्होंने भी उसे अपने हाथों में लिया और उलट-पलटकर देखा। वे भी किसी निर्णय पर नहीं आ पाये।
वह अंडा जब एक खिड़की में रखा गया तब एक मुर्गे ने उसे अपनी चोंच से मारा। फिर भी वह नहीं फूटा। अब विश्वस्त रूप से मालूम हो गया कि वह अंडा नहीं है। अब इस समस्या का हल कैसे होगा, कौन करेगा? सभासदों की सलाह लेकर राजा ने सब पंडितों और विज्ञों को बुलवाया और पूछा, ‘‘यह कौन-सा अंडा है? असल में यह अंडा है या नहीं? फैसला कीजिये और बताइये।'' उन सबने उसे ध्यान से देखा, उसकी खूब परीक्षा की और कहा, ‘‘यह हमसे संबंधित विषय नहीं है। इसके बारे में वे ही लोग बता सकते हैं, जो भूमि पर खेती करके जीते हैं। आप देश के किसानों को बुलवाइये और उनकी राय लीजिये।''
राजा ने मुनादी पिटवायी कि ‘‘कृषि क्षेत्र में जो प्रवीण हैं, उनमें से कोई आगे आये और इस पहेली को सुलझाये।'' पर कोई नहीं आया।
इतने में सैनिक राज्य भर में ढूँढ़कर एक ऐसे किसान को ले आये, जो बढ़िया फसल उगाता था, जिसकी भूमि बहुत ही उपजाऊ थी। यह किसान चल नहीं सकताथा । दो लकड़ियों के आधार पर चलता हुआ वह बूढ़ा किसान राजा के पास आया। वह बूढ़ा किसान सुन नहीं सकता था, उसे दिखायी भी नहीं देताथा । यानी वह किसान लंगड़ा, बहरा और अंधा था।

राजा के पास जो अंडा था, उसे उसने टटोलकर देखा और कहा, ‘‘मैंने अपने पूर्वजों से सुना है कि वे इतने बड़े-बड़े मक्के उगाते थे, जिनके दाने अंडे जैसे बड़े-बड़े होते थे। पर मैंने तो इतना बड़ा मक्का कभी नहीं उगाया। पर मेरे पिताजी यह कहा करते थे कि अपने जमाने में वे इतने बड़े-बड़े धान्य के दाने उगाते थे।'' कांपते हुए बड़े ही नीरस स्वर में उस किसान ने कहा। उसकी बातें सुनकर राजा निराश नहीं हुए। उन्होंने अपनी हठ भी नहीं त्यजा।
राजा ने सैनिकों को आज्ञा दी कि वे इस बूढ़े के पिता को ढूँढ़कर ले आयें।
दूसरा जो किसान आया, लकड़ी के सहारे वह धीरे-धीरे लंगड़ाता हुआ आया। आँखों से वह देख तो सकता था, पर उसे सुनाई नहीं पड़ताथा । वह आदमी देखने में इतना कमज़ोर भी नहीं लगताथा । राजा ने उसे अंडा जैसे धान्य के दाने को दिखाते हुए पूछा, ‘‘क्या तुमने इसे कभी देखा? क्या अपने खेत में तुमने इसे उपजाया?'' तो उसने कहा, ‘‘नहीं, मैंने कभी नहीं देखा, उपजाया भी नहीं। ऐसे बड़े धान्य के दाने के बारे में मेरे पिताजी कहा करते थे। मेरे पिताजी से पूछियेगा।''
उस तीसरे दादा को यानी दो लकड़ियों के सहारे आये किसान के दादा को सिपाही ढूँढ़कर ले आये। यह बूढ़ा आराम से पैदल चल कर आया। उसके दोनों पैर बिलकुल ही सही सलामत थे। आदमी भी हट्टा-कट्टा था। उसे अच्छी तरह सुनायी पड़ता था। आँखें देख सकती थीं।
राजा ने अंडा जैसा बड़ा दाना उसके हाथ में रखा और पूछा, ‘‘दादा, क्या कभी ऐसे धान्य के दाने को इसके पहले कभी देखा?''
दाने को हथेली से पकड़कर उसने कहा, ‘‘कितने लंबे समय के बाद इतना सुंदर धान्य देखने को मिला। अपने बचपन में हमारे खेत में ऐसा ही धान्य उपजाते थे।'' आश्चर्य और आनंद से भरे स्वर में उसने कहा।
‘‘क्या इतना बड़ा दाना अपने खेत में उपजाते थे?'' राजा ने पूछा।
‘‘हाँ, हमारे खेत में अंडे जैसे बड़े-बड़े दाने उगाते थे। उस खेत से उगे हर दाने से हथेली भर का आटा निकलता था। इससे वहाँ के सब लोग पेट भर खाते थे और संतृप्त होते थे'', बूढ़े ने राजा से स्पष्ट कहा।

राजा ने आश्चर्य-भरे स्वर में पूछा, ‘‘दादा, तुम्हारा खेत कहाँ है?''
‘‘वह किसी एक का खेत नहीं था। सबका था। भगवान ने खेती करने के लिए यह भूमि सब मनुष्यों को दी।'' दादा ने कहा।
‘‘जो उपजाते थे, वह सबके लिए पर्याप्त होता था? बचा-खुचा क्या करते थे?'' राजा ने पूछा।
‘‘बेचना-खरीदना हम जानते ही नहींथे । सच कहा जाए तो उस ज़माने में हम धन के बारे में जानते ही नहीं थे। सब मिल-जुलकर मेहनत करते थे। जो उपजाते थे, सब आपस में बांट लेते थे और पेट भर खाते थे। हमारे बचपन में धान्य का दाना इतना बड़ा और इतना मजबूत होता था'', दादा ने कहा।
‘‘तो फिर अब ऐसा क्यों नहीं है?'' राजा ने पूछा।
‘‘मानव में धन की आशा बहुत बढ़ गयी। कोई एक मेहनत करे तो दूसरा उसे खरीद लेता है। यह धन क्या आया, फसलें और दाने क्रमशः छोटे-छोटे होते जा रहे हैं'', दादा ने कहा।
‘‘दादा, मेरा एक संदेह है। तुम बिलकुल सही-सलामत हो। पैर, कान, आँखें सब इंद्रियाँ अच्छी तरह काम कर रही हैं। तुम्हारे बेटे का एक पैर नहीं है। पोते के दोनों पैर नहीं हैं। तुमसे भी अधिक बूढ़े लग रहे हैं। इसका क्या कारण है?'' राजा ने पूछा।
‘‘अपने जमाने में हम खूब मेहनत करते थे और खेती करते थे। समान रूप से मेहनत करते थे और सब एक समान खाते-पीते थे। अब मेहनत करनेवाले कम हो गये, बैठकर खानेवालों की संख्या बढ़ गयी। मेरा बेटा और मेरा पोता दोनों इसी श्रेणी में आते हैं। भगवान ने हमें यह भूमि दी, परिश्रम करके हल चलाने और फसल उगानेके लिए । भूमाता की दी हुई फसल को बराबर बांटनेके लिए । पर, अब ऐसा नहीं कर रहे हैं। इसी वजह से धान्य बीज दुबले-पतले हो गये हैं।'' वृद्ध ने गंभीर स्वर में कहा।
कितने ही साल पहले यह कहानी मेरे बहनोईजी ने सुनायी थी। तब मुझे मालूम नहीं था कि यह टालस्टॉय की कहानी है। सूर्य चंद्र की भी दृष्टि जहाँ नहीं जाती, वहाँ रचयिता की दृष्टि जाती है। टालस्टॉय ऐसे महान दार्शनिक थे।



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