Tuesday, July 5, 2011
धर्मदास की शक्तियाँ
निराश स्वर्णरेखा
धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः उस पुराने पेड़ के पास गया; पेड़ पर से शव को उतारा और यथावत् उसे अपने कंधे पर डाल लिया। फिर श्मशान की ओर जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन्, रुकावटों की परवाह किये बिना अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिए तुम जो अथक परिश्रम कर रहे हो, वह बहुत ही प्रशंसनीय है। जब एक लक्ष्य की सिद्धि के लिए प्रयत्न किये जाते हैं, तब रुकावटों का सामना करना सहज है।
परंतु ऐसे भी प्रबुद्ध मौजूद हैं, जो लक्ष्य की सिद्धि के समय उसे अपने हाथ से फिसल जाने देते हैं। कितने ही कष्ट झेलकर मयूरध्वज की प्रेयसी उसके पास पहुँच पायी, पर उसने बडी ही अनुदारता से उसका तिरस्कार किया। अपनी थकावट दूर करते हुए उसकी कहानी सुनो ।’’ फिर वेताल मयूरध्वज की कहानी यों सुनाने लगाः मयूरध्वज अवंती राज्य का राजा था। मनोविनोद के लिए एक बार वह आखेट करने जंगल गया।
साथियों को छोड़कर वह अकेले ही जंगल में बहुत दूर चला गया। दुपहर तक वह बहुत थक गया और आराम करने एक वृक्ष के नीचे बैठ गया। अकस्मात् झाडियों में से एक बाघ उसपर कूद पड़ा। बग़ल में ही रखे गये धनुष-बाणों तक पहुँचने के लिए भी उसके पास समय नहीं था। फिर भी रिक्त हाथों से उसने बाघ का सामना किया और अपनी पूरी शक्ति लगाकर उसे मार डाला। इस दौरान वह बुरी तरह से घायल हो गया, और फलस्वरूप बेहोश हो गया।
उस समय स्वर्णरेखा नामक एक गंधर्व कन्या अपनी सहेलियों के साथ वहॉं आयी। मयूरध्वज का साहस देखकर वह मंत्रमुग्ध रह गयी। उसकी वीरता व भुजबल ने उसे आश्र्चर्य में डाल दिया। वह बेहोश राजा के पास आयी और बडी ही मृदुता के साथ उसका स्पर्श किया। देखते-देखते राजा के सारे घाव भर गये और वह उठकर बैठ गया। स्वर्णरेखा उसके नवमन्मथ रूप को देखकर उसपर रीझ गयी और उसे एकटक देखने लगी। तब उसने देखा कि राजा भी पलक मारे बिना उसे ही देखता जा रहा है।
लज्जा के मारे उसने सिर झुका लिया। राजा भी उसके अद्भुत सौंदर्य पर मुग्ध हो गया। दोनों ने आपस में बातें कीं, एक-दूसरे के बारे में विवरण जाने। ‘‘राजन्, मैं हृदयपूर्वक आपसे प्रेम करती हूँ। अगर आप सहमत हों तो गांधर्व विवाह करने के लिए मैं सन्नद्ध हूँ।’’ मुस्कुराते हुए स्वर्ण रेखा ने मधुर वाणी में कहा। राजा ने उसके प्रस्ताव पर खुश होते हुए कहा, ‘‘मैं भी तुम्हें बेहद चाहता हूँ।
परंतु मुझे लगता है कि तुम इस विषय में गंभीरता के साथ सोचे बिना कह रही हो । भूलोक में जीवन बिताना कोई आसान काम नहीं है। तुम गंधर्व लोक की सुकुमारी हो। भूलोक में तुम सुखी नहीं रह सकती हो।’’ ‘‘पति का साहचर्य ही पत्नी के लिए स्वर्ग धाम है। क्या आप जानते नहीं कि स्वर्ग धाम दिव्य लोकों से भी उत्तम है?’’ स्वर्णरेखा ने पूछा।
‘‘मैं समझता हूँ कि क्षणिक आकर्षणों में आकर तुम ऐसी बातें कर रही हो।’’ राजा ने कहा। ‘‘नहीं, मेरा प्रेम सत्य है, शाश्वत है,’’ स्वर्ण रेखा ने बल देते हुए कहा। ‘‘तुम्हारा प्रेम कितना सच्चा है, इसे जानने के लिए एक छोटी-सी परीक्षा...’’ राजा अपनी बात पूरी करे, इसके पहले ही स्वर्ण रेखा ने पूछा, ‘‘कहिये, वह परीक्षा क्या है?’’
‘‘अब तुम अपना लोक लौट जाओ। छे महीनों तक इसपर गंभीरता के साथ सोचो-विचारो। तब भी मुझसे विवाह रचाने की तुम्हारी इच्छा प्रबल रही तो अगले भाद्रपद बहुल द्वादशी के दिन यहाँ आना। देखो, उस शांभवि वृक्ष के तले तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा। तभी हमारा विवाह संपन्न होगा। क्या यह तुम्हें स्वीकार है?’’ ‘‘हाँ, हाँ, अवश्य स्वीकार है। हर हालत में आऊँगी।’’ कहती हुई वह सहेलियों के साथ वहाँ से चली गयी।
अपने लोक में पहुँचने के बाद भी, स्वर्ण रेखा, राजा मयूरध्वज को ही लेकर सोचती रही और यों छे महीने बीत गये। अपने निर्णय पर दृढ़ वह भाद्रपद बहुल द्वादशी के दिन अकेले ही भूलोक पहुँचने निकल पड़ी। मयूरध्वज के बताये शांभवि वृक्ष के समीप उसने एक मनोहर सरोवर देखा। उसमें स्नान करने के उद्देश्य से उसने अपने कंठ के महिमावान हार को निकाला और उसे पास ही की फूलों की झाड़ी में लटका दिया। फिर वह सरोवर में उतर पड़ी। वह शीतल पानी का आनंद लेती हुई अपने आप को भूल गयी। अचानक उसे लगा कि उसका शरीर रंगहीन हो गया। वह चौंक उठी और अशुभ की शंका करती हुई तुरंत सरोवर के बाहर आ गयी।
उसने सरोवर के बाहर आकर देखा कि उसके महिमावान हार को एक युवती पहनी हुई है। उसने क्रोध-भरे स्वर में उस युवती से पूछा, ‘‘तुम कौन हो? मेरे हार की क्यों चोरी की? इसे मुझे वापस दे दो।’’ ‘‘मेरा नाम कादंबरी है। शशांकपुर गॉंव की हूँ। मैंने तुम्हारे हार की चोरी नहीं की। मुझे यह दिखायी पड़ा तो मैंने ले लिया और पहन लिया। यह तो मुझे बेहद सुंदर लगा।’’ उस नादान युवती ने कहा। ‘‘कादंबरी, ऐसे आभूषणों का स्पर्श करने तक की भी तुम्हारी योग्यता नहीं है। यह गन्धर्व कन्याओं का अद्भुत शक्तियों से भरा हार है।’’ स्वर्णरेखा ने गुस्से में आकर कहा।
‘‘मुझे किसी प्रकार की अद्भुत शक्तियों की आवश्यकता नहीं है। यह आभूषण मेरे गले में शोभायमान हो तो राजा मयूरध्वज मुझसे विवाह करने से इनकार नहीं करेंगे।’’ कादंबरी ने कहा। उसकी इस बात पर स्वर्णरेखा ठठाकर हँस पड़ी और कहा, ‘‘क्या कहा तुमने? राजा मयूरध्वज तुमसे विवाह करेंगे?’’
‘‘क्यों नहीं करेंगे? इसी काम पर तो मैं राजधानी जा रही हूँ। मैंने साफ़-साफ़ कह दिया कि विवाह करूँगी तो महाराज से ही करूँगी। पर मेरे माँ-बाप और गाँव के लोग भी मेरी बात का विश्वास नहीं करते । मैं तो यह प्रतिज्ञा करके आयी हूँ कि महाराज से विवाह करके रानी बनूँगी। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण होगी।’’
‘‘तुम्हारी प्रतिज्ञा कभी भी पूर्ण नहीं होगी। राजा और मैंने एक-दूसरे से प्रेम किया। उन्होंने मुझसे विवाह करने का वचन भी दिया। उस शांभवि वृक्ष के तले थोड़ी ही देर में हमारा विवाह संपन्न होनेवाला है।’’ स्वर्णरेखा ने कहा। यह सुनते ही कादंबरी के मन में तरह-तरह के विचार उभर आये। उसने ठान लिया कि स्वर्णरेखा उसके मार्ग में एक रुकावट है और उसका अंत ही समस्या का एकमात्र हल है। उसने कहा, ‘‘जिस हार को मैंने पहन रखा है, अगर सचमुच ही वह महिमावान हो तो इसी क्षण तुम तोती के रूप में बदल जाओगी।’’ हार का स्पर्श करते हुए उसने कहा।
बस, देखते-देखते स्वर्णरेखा तोती में बदल गयी। तदुपरांत कादंबरी ने स्वर्णरेखा का रूप धारण कर लिया और शांभवि वृक्ष के पास गयी। उसे ही सच्ची स्वर्णरेखा मानकर मयूरध्वज बहुत आनंदित हुआ और उससे विवाह रचाने उसे राजधानी ले गया। कादंबरी का विवाह मयूरध्वज से बड़े ही वैभव के साथ संपन्न हुआ। वह अवंती राज्य की रानी बनी और यों असाधारण परिस्थितियों में उसकी प्रतिज्ञा पूर्ण हुई।
तोती में बदली स्वर्णरेखा अपनी दुस्थिति पर विलाप करने लगी। एक भील ने उसे पकड़ लिया। और उसे एक कलाबाज़ को बेच दिया। कलाबाज़ ने उसे क्रीड़ाओं में प्रशिक्षित दिया। बातें सखायीं। तोती ने अपनी दुख भरी कहानी एक दिन कलाबाज़ को सुनाई। कलाबाज़ के उसे ढाढ़स दिया।
एक राजकर्मचारी की सहायता लेकर कलाबाज़ ने राजा के दर्शन किये। उसने अपने खेल देखने के लिए राजा से अभ्यर्थना की। राजा ने इसकी अनुमति दी। कलाबाज़ के खेल देखने राजदंपति सहित, राजा के रिश्तेदार, राजकर्मचारी और नगर प्रमुख इकठ्ठे हुए।
कलाबाज़ के खेलों ने उन सबको बहुत ही आकर्षित किया। विशेषकर तोती के खेल-जिस गेंद पर वह खडी थी, उसे ठकेलना, आग के चक्रों से होते हुए दूसरी ओर जाना, कलाबाज़ के बाणों से बचकर निकलना आदिबहुत प्रभावशाली थे। तोती ने साथ ही बड़ी ही मीठी-मीठी बातें सुनायीं, चुटकुले सुनाये। राजा ने उसकी मीठी बातों पर मुग्ध होते हुए कहा, ‘‘ओ तोती, तुम्हारा प्रदर्शन अद्भुत है। माँगो, तुम्हें क्या चाहिये?’’
‘‘जो चाहूँगी, महाराज अवश्य देंगे? अपने वचन से पलट नहीं जायेंगे न?’’ तोती ने कहा। ‘‘अपना वचन अवश्य निभाऊँगा। निस्संकोच माँगो,’’ राजा ने आश्वासन दिया । ‘‘रानीजी का कंठहार चंद क्षणों तक पहनने का भाग्य मुझे प्रसादिये।’’ तोती ने कहा। राजा ने संकेत द्वारा रानी से बताया कि वह अपना कंठहार तोती को दे। परंतु स्वर्णरेखा बनी कादंबरी के दिल में भय पैदा हो गया। उसने कंठहार निकालकर तोती के गले में डाल दिया। दूसरे ही क्षण तोती स्वर्णरेखा के रूप में बदल गयी और कादंबरी अपने असली रूप में प्रकट हुई। आश्र्चर्य में डूबे राजा को स्वर्णरेखा ने पूरा वृत्तांत सविस्तार बताया। इतने में कादंबरी दौडती हुई राजभवन के ऊपर गयी और वहॉं से नीचे कूद कर मर गयी।
‘‘उस धोखेबाज को सही दंड मिला महाराज। अब मुझे अपनी रानी के रूप में स्वीकार कीजिये।’’ स्वर्णरेखा ने कहा। राजा थोड़ी देर तक सोच में पड़ गया और फिर लंबी सांस खींचते हुए कहा, ‘‘मुझे माफ़ करना। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर सकता। कादंबरी के धोखे का शिकार मैं ही नहीं, तुम भी बनी। हम दोनों इसके ज़िम्मेदार हैं। भूलोक में आकर तुमने बहुत कष्ट सहे। जो हुआ, भूल जाआ और अपने लोक में चली जाओ, जहाँ तुम आराम से जिन्दगी गुज़ार सकती हो।’’
राजा की बातों पर स्वर्णरेखा घबरा गयी, पर अपने को संभालती हुई उसने कहा, ‘‘जैसा आप चाहते हैं, वैसा ही करूँगी।’’ यह कहती हुई वह गायब हो गयी और गंधर्व लोक लौट आई। वेताल ने यह कहानी सुनाने के बाद कहा, ‘‘राजन्, राजा ने सुंदरी स्वर्णरेखा का तिरस्कार क्यों किया? राजा स्वर्णरेखा से प्रेम करते हैं या नहीं? वे उससे प्रेम नहीं करते, क्या इसीलिए उससे छुटकारा पाने के लिए ही उन्होंने छे महीनों की अवधि मॉंगी? पहले ही वह उसका तिरस्कार करते तो बेचारी स्वर्णरेखा को इतने कष्ट सहने नहीं पड़ते।
मेरे इन संदेहों के समाधान को जानते हुए भी मौन रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।’’ विक्रमार्क ने वेताल के संदेहों को दूर करने के उद्देश्य से कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि राजा मयूरध्वज ने, स्वर्णरेखा से गाढ़ा प्रेम किया। छे महीनों की जो अवधि तय की, वह केवल स्वर्णरेखा के प्रेम की परीक्षा मात्र के लिए ही नहीं बल्कि अपने लिये भी थी।
इस अवधि में वे स्वयं अपने प्रेम की भी परीक्षा करना चाहते थे। इसपर निर्णय लेने के बाद ही वे स्वर्णरेखा से विवाह रचाने शांभवि वृक्ष के पास गये। परंतु, उसके बाद कादंबरी के रूप में दुर्भाग्य ने उनका पीछा किया। असली स्वर्णरेखा को देखने के बाद, उन्हें मालूम हुआ कि उनके साथ धोखा हुआ है। राजा को यह भी मालूम हो गया कि बाह्य सौंदर्य से आकर्षित होने के कारण ही उनकी यह दुर्गति हुई है।
यह तो विवाह बंधन का उपहास करना हुआ। वे नहीं चाहते थे कि ऐसी ग़लती फिर से दुहरायी जाए। इसी वजह से उन्होंने स्वर्णरेखा की विनती को अस्वीकार किया। यह उनकी बौद्धिक परिपक्वता व अच्छे संस्कारों का परिचायक है। इस विषय में राजा निष्कपट हैं। स्वर्णरेखा ने राजा के इन मनोभावों को जाना और गंधर्वलोक लौट गई।’’ राजा के मौन भंग में सफल वेताल शव सहित गायब हो गया और पुनः पेड़ पर जा बैठा।
(आधारः मनोहर शास्त्री की रचना)
जीवन में उतार-चढ़ाव
Sunday, July 3, 2011
खड्ग महिमा
स्वार्थ में परोपकार
धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पड़े के पास गया। पेड़ पर से शव को उतारा और यथावत् श्मशान की ओर बढ़ता गया। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन, इस भयंकर वातावरण की परवाह किये बिना अपने प्रयासों में मग्न हो। क्या कभी तुमने सोचा कि अब तक तुमसे किये गये सारे के सारे प्रयत्न क्यों निष्फल हुए? आश्र्चर्य तो इस बात का है कि एक बुद्धिमान व विवेकी राजा होते हुए भी अपनी असफलता के कारणों की जड़ में नहीं जा रहे हो।
मैं तुम्हारे हठ की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता, पर तुम्हारी मूर्खता पर भी मुझे दया आती है। कभी-कभी मुझे संदेह होने लगता है कि जो लगन तुम दिखा रहे हो, वह अपन स्वार्थ की पूर्ति के लिए है या परोपकार के उद्देश्य से।
हम देखते रहते हैं कि कुछ संदर्भों में स्वार्थ और परोपकार के बीच के अंतर को जानना बहुत ही मुश्किल का काम है, क्योंकि इनके बीच का अंतर इतना महीन होता है कि हम उन्हें अलग नहीं कर पाते। उदाहरणस्वरूप मैं तुम्हें कमल की कहानी सुनाने जा रहा हूँ। ध्यान से सुनो।’’ फिर वेताल कमल की कहानी यों सुनाने लगाः
कोंडापुर नामक एक बड़े गॉंव में पुरुषोत्तम नामक एक गृहस्थ रहता था। उसके दो बेटे थे। बड़े बेटे का नाम शेखर था। वह अपने पिता की ही तरह दूसरों की भलाई करता था। पर पुरुषोत्तम का दूसरा बेटा कमल स्वार्थी था। किसी की मदद करने से वह कतराता था। पुरुषोत्तम ने अपने दूसरे बेटे कमल को अच्छा बनाने का भरसक प्रयत्न किया, पर उसके प्रयत्न सफल नहीं हुए। मरने के पहले कमल को अपने पास बुलाकर पुरुषोत्तम ने उससे कहा, ‘‘बेटे, इस गांव के लोग अच्छे हैं। यहॉं तुम रह नहीं सकते। अगर तुम सुखी जीवन बिताना चाहते हो तो मेरी एक सलाह है। पास ही के जंगल के बीच एक पर्वत है। उस पर्वत पर चढ़ोगे तो बीच में एक पाताल गुफ़ा है । उस गुफ़ा में अनन्त नामक एक साधु रहते हैं। तुम उनसे मिलोगे तो तुम्हारा भला होगा।’’ यों कह चुकने के बाद वह मर गया।
कमल ने मन ही मन सोचा कि अपने बड़े भाई शेखर को पूरी संपत्ति सौंपने के उद्देश्य से ही पिता ने यह कहानी गढ़ी है। पर जब तक पिता का निधन नहीं हुआ तब तक उसे मालूम नहीं था कि अच्छाई ही उसकी एकमात्र संपत्ति है।
शेखर ने कमल से कहा, ‘‘मेरे ही साथ रहो। मैं तुम्हारी अच्छी तरह से देखभाल करूँगा।’’ कमल को लगा कि अब चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि भाई ने उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। कुछ ही दिनों में गांव के लोग कहने लगे कि भाई हो तो ऐसा, जो अपने छोटे भाई का इतना ख्याल रखता है। वे शेखर की तारीफ़ करने लगे और कमल की निंदा।
‘‘तुम्हारे कहने पर ही मैं यहॉं रह रहा हूँ। पर इसके लिए लोग मुझे दोषी ठहरा रहे हैं, मेरा अपमान कर रहे हैं।’’ कमल ने क्रोध-भरे स्वर में स्पष्ट कह डाला । इसपर शेखर ने हँसते हुए कहा, ‘‘तुम किसी की मदद नहीं करते। अगर चाहते हो कि लोग तुम्हारी प्रशंसा करें तो मेरी तरह तुम भी परोपकार करो, अच्छे मार्ग पर चलो।’’
‘‘दूसरों की भलाई करके पिताजी ने और तुमने क्या साध लिया? उस भलाई से मेरा क्या काम, जिससे एक कौड़ी भी जमा नहीं कर पाता। जीवन में बड़ा बनने की मेरी तीव्र इच्छा है। ऐसा कोई उपाय हो तो सुझाना,’’ कमल ने कहा। ‘‘संपत्ति जुटानी हो तो व्यापार करने की दक्षता चाहिये। कृषि अथवा ललित कलाओं में भी प्रवीणता चाहिये। मैं भी स्वयं ये सब नहीं जानता। तुम स्वयं धन कमाने के उपाय सोचो,’’ शेखर ने सलाह दी।
धन कमाने की इच्छा तो भरी पड़ी है, पर उसे कमाने का कोई भी मार्ग कमल नहीं जानता। इसलिए पिता के कहे अनुसार वह पर्वत की पाताल गुफ़ा में गया और साधु अनन्त से मिला। आनंद की बड़ी दाढ़ी थी और घनी मूंछें थीं। मुख मंडल पर तेजस्विता टपक रही थी। कमल ने अनायास ही उसे प्रणाम किया और कहा, ‘‘स्वामी, मेरे पिताजी ने आपसे मिलने को कहा था। मैं समझता हूँ कि आप ही स्वामी अनन्त हैं।’’
अनंत ने, उसके बारे में विवरण जानने के बाद कहा, ‘‘हॉं, मैं ही अनंत हूँ। शीघ्र ही संपन्न बनने के लिए मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ। पर, इस सहायता से, तुम्हें और मुझे कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।’’ फिर अनंत ने अपने बारे में पूरे विवरण दिये। अनंत और कमल के पिता पुरुषोत्तम एक ही गांव में जन्मे और बड़े हुए। परोपकार ही पुरुषोत्तम का एकमात्र लक्ष्य था। पर अनंत में स्वार्थ आवश्यकता से अधिक ही था।
एक बार दोनों जब पास ही के गांव की ओर जा रहे थे तब उन्होंने एक साधु को देखा, जो सड़क के किनारे गिरा पड़ा था। उसके पॉंव पर एक छोटा-सा घाव भी था। पुरुषोतम ने उसकी सहायता करनी चाही, पर अनंत ने मना किया। फिर भी उसकी बात पर ध्यान न देते हुए उसने पास ही के पौधों से कुछ पत्ते तोड़े और उसका रस साधु के घाव पर निचोड़ा।
साधु उठ बैठा और पुरुषोत्तम के कंधे को थपथपाते हुए कहा, ‘‘बेटे, मेरे पास एक महिमावान तावीज़ है। जिसके पास यह हो, वह जो भी चाहता है, उसे मिल जाता है। मैं तो साधु हूँ। इस तावीज़ से भला मेरा क्या काम? मैं इसे किसी योग्य व्यक्ति को सौंपना चाहता हूँ, इसलिए जान-बूझकर मैंने सांप के डंसने का नाटक किया। इस तावीज़ को लो और सुखी जीवन बिता।’’ यह कहते हुए साधु ने उसे तावीज़ दे दिया।
पुरुषोत्तम ने हाथ जोड़कर कहा,‘‘स्वामी, मैं साधु तो नहीं हूँ, पर मुझे इस तावीज़ की ज़रूरत नहीं है। आवश्यकता से अधिक धन दुख लाता है । आप इसे किसी और को दे दीजिये।’’
साधु ने ‘‘न’’ के भाव में सिर हिलाते हुए कहा,‘‘इस पल से तावीज़ तुम्हारा है। किसी योग्य व्यक्ति को चुनकर तुम ही उसे दे देना। अयोग्य को दोगे तो अनर्थ हो जायेगा।’’
बग़ल में ही खड़ा अनंत चाहता था कि तावीज़ को अपना बना लूँ। इसलिए उसने कहा, ‘‘स्वामी, अनर्थ क्या है और अयोग्य कौन होता है?’’
साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘कुछ बातें ऐसी होती हैंै, जिनकी समझ अनुभव के बाद ही होती है। मैंने कहा था न कि किसी अयोग्य के हाथ यह तावीज़ आ जाए तो अनर्थ होगा। इसलिए कोई भी दीर्घकाल तक इस तावीज़ को अपने पास नहीं रख सकता। किसी को भी दो, यह उसी प्रथम अयोग्य के पास पहुँच जाता है। तब उस प्रथम अयोग्य में जीवन-तेजस्विता कम हो जाती है और वह साधु बन जाता है, पर मोक्ष नहीं मिलता ।’’
साधु को सुनने के बाद पुरुषोत्तम ने अनंत से कहा, ‘‘लगता है कि तुम यह तावीज़ अपनाना चाहते हो। तुम्हें इसे मैं सहर्ष देने को सन्नद्ध हूँ, क्योंकि मेरा विश्वास है कि तुम अयोग्य नहीं हो।’’ यह कहते हुए उसने तावीज़ अनंत को दे दिया।
तावीज को अपना बना लेने के बाद अनंत जो भी मांगता था, उसे वह मिल जाता था। उसका हर काम सफल होता था। परंतु इससे जो आनंद मिलता था, उसे किसी के साथ बांटने के लिए वह बिलकुल ही तैयार नहीं होता था। इसीलिए लोग उसे ईर्ष्यालु कहते थे। एक साल के ख़त्म होने के पहले ही उसने वह तावीज़ किसी और को दिया। पर एक साल के अंदर ही वह तावीज़ उसे वापस मिल गया। जब चार बार ऐसा हुआ तो जीवन से वह विरक्त हो गया। क्रमशः उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया। रोशनी को देखने से भी वह डरने लगा। इन परिस्थितियों में उसने संन्यास ले लिया और इस पाताल गुफ़ा में पहुँच गया।
अपने मित्र अनंत की इस दुस्थिति को देखकर पुरुषोत्तम को दुख हुआ। उसे लगने लगा कि उसके इस दुख का कारण मैं ही हूँ। वह एक बार पाताल गुफ़ा में जाकर उससे मिला और कहा, ‘‘मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि वह तावीज़ तुम्हारी ऐसी दशा कर देगा। जब तक तुम्हें मोक्ष नहीं मिलेगा, तब तक मुझे भी मोक्ष प्राप्त नहीं होगा। इसलिए, उस तावीज़ से तुम मुक्त हो जाओ, इस दिशा में मैं भी प्रयत्न करूँगा।’’ उसने वादा तो कर दिया, पर इतने ही में वह मर गया।
अनंत ने, ताबीज़ से संबंधित सभी बातें कमल को बतायीं और कहा, ‘‘पुत्र, जब तक मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक मेरे जिगरी दोस्त और तुम्हारे पिता को भी मुक्ति नहीं मिलेगी। मेरी और अपनी मुक्ति के लिए तुम्हारे पिता ने तुम्हें यहॉं भेजा, पर तावीज़ का राज़ तुमसे छिपा रखा। अपने स्वार्थ के लिए मैं तुम्हें यह तावीज़ नहीं दे सकता इसलिए मैंने तुम्हें सच बता दिया। किसी भी हालत में इस तावीज़ को एक साल से अधिक समय तक अपने पास रख नहीं सकते। मैं नहीं चाहता कि यह तावीज तुम्हें दूँ और तुम परेशानियों से घिर जाओ। फिर इसे लौटाकर मुझे फिर से परेशान कर दोगे।’’
तब कमल ने विनयपूर्वक कहा, ‘‘मेरे पिताजी परोपकारी थे। उन्हें यह भी मालूम था कि मैं बड़ा स्वार्थी हूँ। वे चाहते थे कि मेरे स्वार्थ में भी परोपकार का मिश्रण हो। यह उनका बड़प्पन है। मेरे पिताजी की आत्मा को और आपको मुक्ति मिल जाए, इसके लिए मेरा स्वार्थ उपयोग में आये तो इससे बढ़कर आनंद क्या हो सकता है। आप तावीज़ मुझे दे दीजिये। मैं वादा करता हूँ कि तावीज़ को शाश्वत रूप से अपने ही पास रखूँगा।’’
अनंत ने कमल को आशीर्वाद देते हुए उसे तावीज़ दे दिया। तावीज़ के मिल जाने के बाद कमल ने जो भी काम किया, वह कामयाब हुआ। पर अब कमल की व्यवहार-शैली में परिवर्तन हुआ। जो संपदा इस तावीज़ के कारण उसे मिली, उसका वह भोग करता रहा, पर साथ ही उनकी मदद भी करने लगा, जो कष्टों में फंसे हुए थे।
यों एक साल गुज़र गया। इस एक ही साल के अंदर कमल ने पर्याप्त संपत्ति जुटा ली। वे संक्रांति के दिन थे। प्रातःकाल ही अनंत गुफ़ा से बाहर आया और सीधे कमल के पास गया। उसने कहा, ‘‘कमल, वह तावीज़ एक बार ज़रा मुझे देना।’’
गले में लटकते हुए उस तावीज़ को कमल ने अनंत के हाथ में रख दिया। अनंत ने उसे उलट-पलट कर देखा और कमल से कहा, ‘‘एक ज़रूरी बात तुमसे कहने आया हूँ। तुम्हारे कारण तुम्हारे पिता की आत्मा को मुक्ति मिल गयी है। मुझे भी मुक्ति प्राप्त होनेवाली है। अब तुम्हें इस तावीज़ की कोई ज़रूरत नहीं है। दुर्भाग्यवश यह किसी अयोग्य के हाथ लग जायेगा तो कहानी की शुरुआत फिर से होगी।’’ यह कहते हुए उसने तावीज़ को आग में फेंक दिया और वहॉं से चलता बना।
वेताल ने यह कहानी कह चुकने के बाद राजा विक्रमार्क से कहा, ‘‘राजन, कमल के स्वार्थ ने परोपकार के लिए मार्ग प्रशस्त किया। तो क्या स्वार्थ प्रशंसनीय है? अनंत के आशीर्वाद से तावीज़ के दुष्ट प्रभावों का अंत हो गया न? मेरे संदेहों के उत्तर जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।’’
विक्रमार्क ने कहा, ‘‘स्वार्थ प्रशंसनीय तो नहीं है। पर, उससे किसी को हानि नहीं पहुँचती हो तो स्वार्थ को ग़लत नहीं कह सकते। कमल स्वार्थी है, पर बुरा नहीं है। जो काम किया जाता है उसके प्रतिफल की वह आशा करता है। अब रही तावीज़ की बात। अनंत के आशीर्वाद से तावीज़ का दुष्ट प्रभाव नहींमिटा । कमल के पिता की अच्छाई के कारण कमल में अच्छा परिवर्तन आया और इस परिवर्तन के कारण ही तावीज़ का दुष्ट प्रभाव मिट गया। उसने ताबीज़ के दुष्ट प्रभाव को भी, अच्छा आदमी बनकर मिटा दिया। उसके द्वारा उसने संपत्ति जुटा ली और अपना जीवन-स्तर बढ़ा लिया। साथ ही उसने ज़रूरतमंद लोगों की मदद की और अच्छा नाम भी कमाया। उसने अपने स्वार्थ के लिए किसी को हानि नहीं पहुँचाई, बल्कि उससे परोपकार ही हुआ। यों कमल तावीज़ पाने के योग्य साबित हुआ।’’
राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित ग़ायब हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा। (आधार कमलेश की रचना)