Tuesday, July 5, 2011

धर्मदास की शक्तियाँ

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड के पास गया, पेड़ से शव को उतारा और यथावत् उसे अपने कंधे पर डालकर स्मशान की ओर बढ़ने लगा। तब शव के अंदर के बेताल ने कहा, ‘‘राजन, कार्य को साधने में तुम जो आग्रह दिखा रहे हो, वह बड़ा ही प्रशंसनीय है। परंतु तुमने इस तथ्य पर कभी ग़ौर किया कि क्या तुम इसमें कभी सफल हुए? मेरी दृष्टि में तो नहीं। फिर क्योंकर इतना कठोर परिश्रम करते जा रहे हो? तुम्हें सावधान करने के लिए मैं धर्मदास की कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जो शक्ति संपन्न होते हुए भी अपने भाई को अपने समान शक्तिशाली बना नहीं सका, माँ की इच्छा भी पूरी कर नहीं पाया। मुझे इस बात का डर है कि तुम भी उसकी तरह कहीं विफल न हो जाओ। थकावट दूर करते हुए धर्मदास की कहानी सुनो।'' फिर वेताल यों सुनाने लगाः

फिर वेताल यों सुनाने लगाः वीरदास शैलवर गाँव का निवासी था। वह चार एकड़ जमीन का मालिक था। उसके तीन बेटे थे। दूसरा बेटा रामदास और तीसरा बेटा कृष्णदास नादान थे। बड़ा बेटा धर्मदास खेती करना नहीं चाहता था। उसने पिता से कह दिया कि मैं गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करना चाहता हूँ। पर वीरदास ने अपने बेटे की इच्छा को मानने से इनकार कर दिया। धर्मदास घर छोड़कर चला गया। वीरदास ने उसका पता लगाने की कोशिश की पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ।
कुछ सालों के बाद वीरदास सख्त बीमार पड़ गया और उसकी वाक् शक्ति जाती रही। बड़े-बड़े वैद्यों ने जांच करने के बाद कह दिया कि इस रोग की कोई दवा है ही नहीं। इसके बाद रामदास और कृष्णदास को उनके हाथों धोखा खाना पड़ा, जिनका उन्होंने विश्वास किया था। कर्ज बढ़ता गया और आखिर खेत और घर भी बेचने की नौबत आ गयी।
इस बीच धर्मदास, सर्वश्रेय नामक गुरु के यहाँ रहकर शिक्षा प्राप्त करने लगा। उन्होंने धर्मदास को कितनी ही विद्याएँ सिखायीं, कितनी शक्तियाँ प्रदान कीं। उन शक्तियों के बल पर वह अपने परिवार की दुस्थिति को जान गया। उसने गुरु से इसका जिक्र किया।
गुरु सर्वश्रेय ने उससे कहा, ‘‘तुम्हारी शिक्षा पूरी हो गयी है। जो भी तुम्हें सिखाना था, मैंने सिखा दिया। मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि अपनी शक्तियों से दूसरों की भलाई करना। पर, माँ गुरु से भी महान होती है। मेरे आदेश का पालन तभी संभव होगा, जब तुम्हारी माँ तुम्हें इसकी अनुमति देगी। इसलिए तुरंत शैलवर जाना, अपना घर संभालना और अपनी जिम्मेदारी निभाना। माँ की अनुमति लेने के बाद ही तुम गाँव छोड़कर जा सकते हो। अपने परिवार में से किसी एक को जब तक अपनी शक्तियाँ नहीं सौंपोगे, तब तक तुम उन्हें छोड़ नहीं सकते।''

गुरु के कहे अनुसार धर्मदास शैलवर गया, पूरे परिवार को उसने धैर्य बंधाया और यों सबके दिलों में आशा भर दी। उसने खेती के बारे में रामदास को यथोचित सलाहें दीं। कृष्णदास से अनाज की एक दुकान खुलवायी। फलस्वरूप फसल भी अच्छी हुई और अनाज के व्यापार में अच्छा लाभ भी हुआ। यह देखते हुए, गाँव के लोग कहने लगे कि धर्मदास के पास अमोघ शक्तियाँ हैं। क्रमशः धर्मदास की माँ को भी गांवों के लोगों की बातों में विश्वास होने लगा। एक दिन उसने अपने बेटे से कहा, ‘‘बेटे, घर छोड़कर गये और शक्तिपूरित होकर लौट आये। अब अपने पिता की बीमारी का इलाज तुम्हें करना होगा। फिर से उन्हें वाक् शक्ति देनी होगी। यह तुमसे ही संभव है, क्योंकि तुम्हारे पास अचूक शक्तियाँ हैं।''
‘‘माँ, पिताजी को अगर स्वस्थ होना हो तो इसके लिए विद्युत द्वीप के तुलसी पौधे की जड़ चाहिये। गुरु की आज्ञा है कि एक बार अगर मैं गाँव छोड़कर निकल जाता हूँ तो किसी भी हालत में गांव लौटना नहीं चाहिये। इसलिए भाई कृष्णदास को अपने साथ ले जाऊँगा। मार्ग मध्य में उसे अपने समान शक्तिवान बनाऊँगा। उसके द्वारा तुलसी पौधे की जड़ भेजूँगा। तुम्हारी अनुमति हो तो निकलता हूँ।'' धर्मदास ने कहा।
तब उसकी माँ ने कहा, ‘‘ठीक है, विद्युत द्वीप जाने के लिए निकलो। गुरु की कोई भी आज्ञा माँ के प्रेम से महान नहीं है, उसे जीत नहीं सकती।''
धर्मदास, कृष्णदास को अपने साथ लेकर निकल पड़ा। गांव के बाहर आते ही कृष्णदास ने अपने बड़े भाई से कहा, ‘‘भैय्या, तुममें अद्भुत शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। ऐसा कुछ करना, जिससे वे शक्तियाँ मुझे भी प्राप्त हों।''
‘‘विद्युत द्वीप पहुँचते -पहुँचते अगर तुम्हें विश्वास हो जाए कि मुझमें अद्भुत शक्तियाँ हैं, तो तुम उन्हें पा सकते हो।''
इतने में एक बैलगाडी वहाँ आयी। गाडीवाले जनक ने गाड़ी रोकी। धर्मदास ने अपने भाई से कहा, ‘‘विद्युत द्वीप पहुँचने तक तुम्हें गाड़ी में यात्रा करनी नहीं चाहिये। तुम पैदल चलकर आना।'' कहता हुआ वह गाड़ी में बैठ गया।

कृष्णदास आधे दिन तक चलता रहा। अपने भाई को देखकर रुक गया, जो एक पेड के नीचे बैठा हुआ था। वह बहुत ही थक गया था। उसे भूख लग रही थी। इतने में शैलबर लौट रहा बापट वहाँ आया और कहने लगा ‘‘मैं बहुत भूखा हूँ। पर किसी के साथ मिलकर खाने की मेरी आदत है और मेरा नियम भी।'' कहते हुए उसने गठरी खोली जिसमें स्वादिष्ट आहार-पदार्थ थे।
धर्मदास ने तुरंत कहा, ‘‘भाई को एक महान और पुण्य कार्य पर अपने साथ ले जा रहा हूँ। जब तक वह कार्य पूरा नहीं होता तब तक उसे उपवास रखना होगा।'' यों कहकर उसने बापट के साथ खाना खा लिया।
थोडी देर बाद जब बापट चला गया तब धर्मदास ने कृष्णदास से कहा, ‘‘अंधेरा छाने जा रहा है। भरपेट खाने के कारण मुझे नींद आ रही है। नियम के अनुसार तुम्हें सोना नहीं चाहिये। तुम जागे रहो और अच्छी तरह से रखवाली करना। इसमें दोनों की भलाई है।'' कहते हुए वह निद्रा की गोद में चला गया।
कृष्णदास रात भर जागा रहा और प्रातःकाल दोनों भाई फिर से निकल पड़े। वे एक नदी तट के पास पहुँचे। नदी में नाव तो थी, पर मल्लाह नहीं था। नदी के बीच में अचानक एक टीले पर बिजली कौंधी।
उस टीले को दिखाते हुए धर्मदास ने कृष्णदास से बताया, ‘‘वही विद्युत द्वीप है। हर दिन वह चमकता रहता है, इसीलिए उसका नाम विद्युत द्वीप पड़ा। इतने में मल्लाह वहाँ आया। और कहने लगा,'' मैं विद्युत द्वीप जा रहा हूँ। चाहो तो तुम दोनों भी आ सकते हो।''
धर्मदास ने भाई से कहा, ‘‘पिता के नाम का स्मरण करते हुए नदी में कूद पड़ो। तैरते हुए वहाँ पहुँच जाना। वहाँ मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा।''
कुछ और सोचे बिना बड़े भाई के कहे मुताबिक कृष्णदास नदी में कूद पड़ा। वह बिल्कुल थक गया। वह कुछ बोल भी नहीं पा रहा था। तब तक धर्मदास वहाँ पहुँच चुका था।
जब कृष्णदास थोड़ा-बहुत ठीक हो गया, दोनों तुलसी पौधे की जड की खोज में निकल पड़े। एक जगह पर, उन्होंने अपने ही गांव के गोपी को देखा, जो किसी पौधे के लिए कुदाल से ज़मीन खोद रहा था। वहाँ उनके आने की वजह जानकर उसने कुदाल उन्हें देनी चाही।
कृष्णदास उससे कुदाल लेने ही जा रहा था तब धर्मदास ने उसे रोकते हुए कहा, ‘‘तुलसी के पौधे की जड़ हाथों से ही उखाड़नी चाहिये। यह नियम है और उसका उल्लंघन मत करना।''


थोड़ी देर और आगे जाने के बाद उन्हें तुलसी के बड़े-बड़े पौधे दिखायी पड़े। हाथों में दर्द हो रहा था, फिर भी कृष्णदास ने अपने ही हाथों से जड़ उखाड़ी।
बड़े भाई ने छोटे भाई की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी पितृ भक्ति प्रशंसा योग्य है। मुझमें अगर शक्तियाँ हों तो अब से उनमें से आधी शक्तियाँ तुम्हारी हो गयीं। अब तुम हवा में उड़कर घर पहुँच सकते हो।''
परंतु, ऐसा नहीं हुआ। कृष्णदास ने उड़ने की बहुत कोशिश की, पर उड़ नहीं पाया। धर्मदास ने लंबी सांस खींचते हुए कहा, ‘‘लगता है कि तुम्हें मेरी शक्तियों पर विश्वास नहीं है। कर भी क्या सकते हैं? पिताजी को स्वस्थ करने के लिए तुमने तुलसी की जड़ पा ली, यही गर्व की बात है। घर लौटो और इस जड़ के बल पर पिताजी को फिर से बोलने की शक्ति प्रदान करो। मैं गुरु की आज्ञा का पालन करने जा रहा हूँ।''
नदी तट पर पहुँच चुकने के बाद दोनों भाई अलग-अलग रास्तों पर चले गये। उत्साह भरा कृष्णदास घर पहुँचा। तुलसी की जड़ का सेवन करते ही उसका पिता बोलने लगा।
कृष्णदास ने सोचा कि तुलसी की जड को पाने के लिए उसने जो-जो कष्ट उठाये, जो-जो मुसीबतें झेलीं, अगर इसका ब्योरा जनक, बापट और गोपी खुद देंगे तो अच्छा होगा। उसने दूसरे दिन उन तीनों को बुलवाया। जनक ने पहले वीरदास से कहा, ‘‘तुम्हारा बड़ा बेटा धर्मदास कोई साधारण मनुष्य नहीं है। मैंने अपनी आँखों से देखा कि वह हवा में उड़ रहा है। और हमारे पहुँचने के पहले ही पहुँच चुका है।''
कृष्णदास यह सुनकर हक्का-बक्का रह गया । बापट ने आकर कहा, ‘‘गॉंव लौटते हुए पेड़ के नीचे बैठे धर्मदास को देखा। गठरी खोलता हूँ तो देखता हूँ कि उसमें स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ हैं।
इतने में गोपी भी कहने लगा,'' भाई कृष्णदास की नाव के पीछे-पीछे पानी पर चलते हुए धर्मदास चले आ रहे थे। मैंने यह दृश्य अपनी आँखों देखा।''
यह सब सुनते हुए कृष्णदास का सिर चकरा गया। बडे भाई ने उसकी इतनी भलाई की, पर उसकी समझ में नहीं आया कि उसे वह क्यों पहचान नहीं पाया। उसे लगा कि यह सब हुआ, उसके स्वार्थ व अहंकार के कारण ही। उसमें पश्चाताप की भावना घर करने लगी। इसके दूसरे ही क्षण उसमें कुछ नवीन शक्तियाँ प्रवेश करने लगीं।

वेताल ने यह कहानी सुनाने के बाद राजा विक्रमार्क से पूछा, ‘‘राजन्, कृष्णदास अपने बडे भाई की अपूर्व शक्तियों को प्रारंभ में पहचान नहीं पाया, इसका कारण उसमें भरा स्वार्थ और अहंकार ही है या कोई और कारण है? विद्युत द्वीप जाने के पहले उसकी माँ ने उससे कहा था कि वहाँ से लौटने के बाद यहीं मिल-जुलकर रहेंगे और यह भी कहा था कि किसी भी गुरु की आज्ञा माँ के प्यार को जीत नहीं सकती। परंतु धर्मदास घर नहीं लौटा। क्या यह माँ के आदेश का अतिक्रमण नहीं है? मेरे इन संदेहों के समाधान जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।''
विक्रमार्क ने कहा, ‘‘धर्मदास ने, अपने छोटे भाई कृष्णदास को अपनी शक्तियाँ सौंपनी चाहीं। पर कृष्णदास को अपने बड़े भाई की शक्तियों में विश्वास नहीं था । तुलसी के पौधे की जड़ को ले आने के लिए जिस क्षण धर्मदास ने कृष्णदास को चुना, उसी क्षण से उसमें अहंकार भर गया। और वह समझने लगा कि मैं महान हूँ। इसी वजह से वह बड़े भाई की शक्तियों को पहचान नहीं पाया।
कोई भी शक्तिमान अपनी शक्तियाँ अयोग्य को चाहे भी तो सौंप नहीं सकता। अब रही माँ की बात। कोई भी माँ यह नहीं चाहती कि उसका बेटा कर छोड़कर जाए, कहीं और रहे। यही तो मातृप्रेम है।
किन्तु धर्मदास लोक क्षेम के लिए घर छोड़कर चला गया। वह भी, अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद। यद्यपि धर्मदास ने माँ की इच्छी पूरी नहीं की, फिर भी यह उसका अपराध माना नहीं जा सकता, क्योंकि उसका लक्ष्य महान था।
राजा का मौन-भंग करने में सफल वेताल शव सहित ग़ायब हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा।
आधार ‘‘वसुंधरा'' की रचना।




निराश स्वर्णरेखा

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः उस पुराने पेड़ के पास गया; पेड़ पर से शव को उतारा और यथावत् उसे अपने कंधे पर डाल लिया। फिर श्मशान की ओर जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन्, रुकावटों की परवाह किये बिना अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिए तुम जो अथक परिश्रम कर रहे हो, वह बहुत ही प्रशंसनीय है। जब एक लक्ष्य की सिद्धि के लिए प्रयत्न किये जाते हैं, तब रुकावटों का सामना करना सहज है।

परंतु ऐसे भी प्रबुद्ध मौजूद हैं, जो लक्ष्य की सिद्धि के समय उसे अपने हाथ से फिसल जाने देते हैं। कितने ही कष्ट झेलकर मयूरध्वज की प्रेयसी उसके पास पहुँच पायी, पर उसने बडी ही अनुदारता से उसका तिरस्कार किया। अपनी थकावट दूर करते हुए उसकी कहानी सुनो ।’’ फिर वेताल मयूरध्वज की कहानी यों सुनाने लगाः मयूरध्वज अवंती राज्य का राजा था। मनोविनोद के लिए एक बार वह आखेट करने जंगल गया।

साथियों को छोड़कर वह अकेले ही जंगल में बहुत दूर चला गया। दुपहर तक वह बहुत थक गया और आराम करने एक वृक्ष के नीचे बैठ गया। अकस्मात् झाडियों में से एक बाघ उसपर कूद पड़ा। बग़ल में ही रखे गये धनुष-बाणों तक पहुँचने के लिए भी उसके पास समय नहीं था। फिर भी रिक्त हाथों से उसने बाघ का सामना किया और अपनी पूरी शक्ति लगाकर उसे मार डाला। इस दौरान वह बुरी तरह से घायल हो गया, और फलस्वरूप बेहोश हो गया।


उस समय स्वर्णरेखा नामक एक गंधर्व कन्या अपनी सहेलियों के साथ वहॉं आयी। मयूरध्वज का साहस देखकर वह मंत्रमुग्ध रह गयी। उसकी वीरता व भुजबल ने उसे आश्र्चर्य में डाल दिया। वह बेहोश राजा के पास आयी और बडी ही मृदुता के साथ उसका स्पर्श किया। देखते-देखते राजा के सारे घाव भर गये और वह उठकर बैठ गया। स्वर्णरेखा उसके नवमन्मथ रूप को देखकर उसपर रीझ गयी और उसे एकटक देखने लगी। तब उसने देखा कि राजा भी पलक मारे बिना उसे ही देखता जा रहा है।

लज्जा के मारे उसने सिर झुका लिया। राजा भी उसके अद्भुत सौंदर्य पर मुग्ध हो गया। दोनों ने आपस में बातें कीं, एक-दूसरे के बारे में विवरण जाने। ‘‘राजन्, मैं हृदयपूर्वक आपसे प्रेम करती हूँ। अगर आप सहमत हों तो गांधर्व विवाह करने के लिए मैं सन्नद्ध हूँ।’’ मुस्कुराते हुए स्वर्ण रेखा ने मधुर वाणी में कहा। राजा ने उसके प्रस्ताव पर खुश होते हुए कहा, ‘‘मैं भी तुम्हें बेहद चाहता हूँ।

परंतु मुझे लगता है कि तुम इस विषय में गंभीरता के साथ सोचे बिना कह रही हो । भूलोक में जीवन बिताना कोई आसान काम नहीं है। तुम गंधर्व लोक की सुकुमारी हो। भूलोक में तुम सुखी नहीं रह सकती हो।’’ ‘‘पति का साहचर्य ही पत्नी के लिए स्वर्ग धाम है। क्या आप जानते नहीं कि स्वर्ग धाम दिव्य लोकों से भी उत्तम है?’’ स्वर्णरेखा ने पूछा।

‘‘मैं समझता हूँ कि क्षणिक आकर्षणों में आकर तुम ऐसी बातें कर रही हो।’’ राजा ने कहा। ‘‘नहीं, मेरा प्रेम सत्य है, शाश्वत है,’’ स्वर्ण रेखा ने बल देते हुए कहा। ‘‘तुम्हारा प्रेम कितना सच्चा है, इसे जानने के लिए एक छोटी-सी परीक्षा...’’ राजा अपनी बात पूरी करे, इसके पहले ही स्वर्ण रेखा ने पूछा, ‘‘कहिये, वह परीक्षा क्या है?’’


‘‘अब तुम अपना लोक लौट जाओ। छे महीनों तक इसपर गंभीरता के साथ सोचो-विचारो। तब भी मुझसे विवाह रचाने की तुम्हारी इच्छा प्रबल रही तो अगले भाद्रपद बहुल द्वादशी के दिन यहाँ आना। देखो, उस शांभवि वृक्ष के तले तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा। तभी हमारा विवाह संपन्न होगा। क्या यह तुम्हें स्वीकार है?’’ ‘‘हाँ, हाँ, अवश्य स्वीकार है। हर हालत में आऊँगी।’’ कहती हुई वह सहेलियों के साथ वहाँ से चली गयी।


अपने लोक में पहुँचने के बाद भी, स्वर्ण रेखा, राजा मयूरध्वज को ही लेकर सोचती रही और यों छे महीने बीत गये। अपने निर्णय पर दृढ़ वह भाद्रपद बहुल द्वादशी के दिन अकेले ही भूलोक पहुँचने निकल पड़ी। मयूरध्वज के बताये शांभवि वृक्ष के समीप उसने एक मनोहर सरोवर देखा। उसमें स्नान करने के उद्देश्य से उसने अपने कंठ के महिमावान हार को निकाला और उसे पास ही की फूलों की झाड़ी में लटका दिया। फिर वह सरोवर में उतर पड़ी। वह शीतल पानी का आनंद लेती हुई अपने आप को भूल गयी। अचानक उसे लगा कि उसका शरीर रंगहीन हो गया। वह चौंक उठी और अशुभ की शंका करती हुई तुरंत सरोवर के बाहर आ गयी।


उसने सरोवर के बाहर आकर देखा कि उसके महिमावान हार को एक युवती पहनी हुई है। उसने क्रोध-भरे स्वर में उस युवती से पूछा, ‘‘तुम कौन हो? मेरे हार की क्यों चोरी की? इसे मुझे वापस दे दो।’’ ‘‘मेरा नाम कादंबरी है। शशांकपुर गॉंव की हूँ। मैंने तुम्हारे हार की चोरी नहीं की। मुझे यह दिखायी पड़ा तो मैंने ले लिया और पहन लिया। यह तो मुझे बेहद सुंदर लगा।’’ उस नादान युवती ने कहा। ‘‘कादंबरी, ऐसे आभूषणों का स्पर्श करने तक की भी तुम्हारी योग्यता नहीं है। यह गन्धर्व कन्याओं का अद्भुत शक्तियों से भरा हार है।’’ स्वर्णरेखा ने गुस्से में आकर कहा।

‘‘मुझे किसी प्रकार की अद्भुत शक्तियों की आवश्यकता नहीं है। यह आभूषण मेरे गले में शोभायमान हो तो राजा मयूरध्वज मुझसे विवाह करने से इनकार नहीं करेंगे।’’ कादंबरी ने कहा। उसकी इस बात पर स्वर्णरेखा ठठाकर हँस पड़ी और कहा, ‘‘क्या कहा तुमने? राजा मयूरध्वज तुमसे विवाह करेंगे?’’
‘‘क्यों नहीं करेंगे? इसी काम पर तो मैं राजधानी जा रही हूँ। मैंने साफ़-साफ़ कह दिया कि विवाह करूँगी तो महाराज से ही करूँगी। पर मेरे माँ-बाप और गाँव के लोग भी मेरी बात का विश्वास नहीं करते । मैं तो यह प्रतिज्ञा करके आयी हूँ कि महाराज से विवाह करके रानी बनूँगी। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण होगी।’’


‘‘तुम्हारी प्रतिज्ञा कभी भी पूर्ण नहीं होगी। राजा और मैंने एक-दूसरे से प्रेम किया। उन्होंने मुझसे विवाह करने का वचन भी दिया। उस शांभवि वृक्ष के तले थोड़ी ही देर में हमारा विवाह संपन्न होनेवाला है।’’ स्वर्णरेखा ने कहा। यह सुनते ही कादंबरी के मन में तरह-तरह के विचार उभर आये। उसने ठान लिया कि स्वर्णरेखा उसके मार्ग में एक रुकावट है और उसका अंत ही समस्या का एकमात्र हल है। उसने कहा, ‘‘जिस हार को मैंने पहन रखा है, अगर सचमुच ही वह महिमावान हो तो इसी क्षण तुम तोती के रूप में बदल जाओगी।’’ हार का स्पर्श करते हुए उसने कहा।


बस, देखते-देखते स्वर्णरेखा तोती में बदल गयी। तदुपरांत कादंबरी ने स्वर्णरेखा का रूप धारण कर लिया और शांभवि वृक्ष के पास गयी। उसे ही सच्ची स्वर्णरेखा मानकर मयूरध्वज बहुत आनंदित हुआ और उससे विवाह रचाने उसे राजधानी ले गया। कादंबरी का विवाह मयूरध्वज से बड़े ही वैभव के साथ संपन्न हुआ। वह अवंती राज्य की रानी बनी और यों असाधारण परिस्थितियों में उसकी प्रतिज्ञा पूर्ण हुई।


तोती में बदली स्वर्णरेखा अपनी दुस्थिति पर विलाप करने लगी। एक भील ने उसे पकड़ लिया। और उसे एक कलाबाज़ को बेच दिया। कलाबाज़ ने उसे क्रीड़ाओं में प्रशिक्षित दिया। बातें सखायीं। तोती ने अपनी दुख भरी कहानी एक दिन कलाबाज़ को सुनाई। कलाबाज़ के उसे ढाढ़स दिया।

एक राजकर्मचारी की सहायता लेकर कलाबाज़ ने राजा के दर्शन किये। उसने अपने खेल देखने के लिए राजा से अभ्यर्थना की। राजा ने इसकी अनुमति दी। कलाबाज़ के खेल देखने राजदंपति सहित, राजा के रिश्तेदार, राजकर्मचारी और नगर प्रमुख इकठ्ठे हुए।

कलाबाज़ के खेलों ने उन सबको बहुत ही आकर्षित किया। विशेषकर तोती के खेल-जिस गेंद पर वह खडी थी, उसे ठकेलना, आग के चक्रों से होते हुए दूसरी ओर जाना, कलाबाज़ के बाणों से बचकर निकलना आदिबहुत प्रभावशाली थे। तोती ने साथ ही बड़ी ही मीठी-मीठी बातें सुनायीं, चुटकुले सुनाये। राजा ने उसकी मीठी बातों पर मुग्ध होते हुए कहा, ‘‘ओ तोती, तुम्हारा प्रदर्शन अद्भुत है। माँगो, तुम्हें क्या चाहिये?’’


‘‘जो चाहूँगी, महाराज अवश्य देंगे? अपने वचन से पलट नहीं जायेंगे न?’’ तोती ने कहा। ‘‘अपना वचन अवश्य निभाऊँगा। निस्संकोच माँगो,’’ राजा ने आश्वासन दिया । ‘‘रानीजी का कंठहार चंद क्षणों तक पहनने का भाग्य मुझे प्रसादिये।’’ तोती ने कहा। राजा ने संकेत द्वारा रानी से बताया कि वह अपना कंठहार तोती को दे। परंतु स्वर्णरेखा बनी कादंबरी के दिल में भय पैदा हो गया। उसने कंठहार निकालकर तोती के गले में डाल दिया। दूसरे ही क्षण तोती स्वर्णरेखा के रूप में बदल गयी और कादंबरी अपने असली रूप में प्रकट हुई। आश्र्चर्य में डूबे राजा को स्वर्णरेखा ने पूरा वृत्तांत सविस्तार बताया। इतने में कादंबरी दौडती हुई राजभवन के ऊपर गयी और वहॉं से नीचे कूद कर मर गयी।


‘‘उस धोखेबाज को सही दंड मिला महाराज। अब मुझे अपनी रानी के रूप में स्वीकार कीजिये।’’ स्वर्णरेखा ने कहा। राजा थोड़ी देर तक सोच में पड़ गया और फिर लंबी सांस खींचते हुए कहा, ‘‘मुझे माफ़ करना। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर सकता। कादंबरी के धोखे का शिकार मैं ही नहीं, तुम भी बनी। हम दोनों इसके ज़िम्मेदार हैं। भूलोक में आकर तुमने बहुत कष्ट सहे। जो हुआ, भूल जाआ और अपने लोक में चली जाओ, जहाँ तुम आराम से जिन्दगी गुज़ार सकती हो।’’

राजा की बातों पर स्वर्णरेखा घबरा गयी, पर अपने को संभालती हुई उसने कहा, ‘‘जैसा आप चाहते हैं, वैसा ही करूँगी।’’ यह कहती हुई वह गायब हो गयी और गंधर्व लोक लौट आई। वेताल ने यह कहानी सुनाने के बाद कहा, ‘‘राजन्, राजा ने सुंदरी स्वर्णरेखा का तिरस्कार क्यों किया? राजा स्वर्णरेखा से प्रेम करते हैं या नहीं? वे उससे प्रेम नहीं करते, क्या इसीलिए उससे छुटकारा पाने के लिए ही उन्होंने छे महीनों की अवधि मॉंगी? पहले ही वह उसका तिरस्कार करते तो बेचारी स्वर्णरेखा को इतने कष्ट सहने नहीं पड़ते।

मेरे इन संदेहों के समाधान को जानते हुए भी मौन रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।’’ विक्रमार्क ने वेताल के संदेहों को दूर करने के उद्देश्य से कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि राजा मयूरध्वज ने, स्वर्णरेखा से गाढ़ा प्रेम किया। छे महीनों की जो अवधि तय की, वह केवल स्वर्णरेखा के प्रेम की परीक्षा मात्र के लिए ही नहीं बल्कि अपने लिये भी थी।


इस अवधि में वे स्वयं अपने प्रेम की भी परीक्षा करना चाहते थे। इसपर निर्णय लेने के बाद ही वे स्वर्णरेखा से विवाह रचाने शांभवि वृक्ष के पास गये। परंतु, उसके बाद कादंबरी के रूप में दुर्भाग्य ने उनका पीछा किया। असली स्वर्णरेखा को देखने के बाद, उन्हें मालूम हुआ कि उनके साथ धोखा हुआ है। राजा को यह भी मालूम हो गया कि बाह्य सौंदर्य से आकर्षित होने के कारण ही उनकी यह दुर्गति हुई है।

यह तो विवाह बंधन का उपहास करना हुआ। वे नहीं चाहते थे कि ऐसी ग़लती फिर से दुहरायी जाए। इसी वजह से उन्होंने स्वर्णरेखा की विनती को अस्वीकार किया। यह उनकी बौद्धिक परिपक्वता व अच्छे संस्कारों का परिचायक है। इस विषय में राजा निष्कपट हैं। स्वर्णरेखा ने राजा के इन मनोभावों को जाना और गंधर्वलोक लौट गई।’’ राजा के मौन भंग में सफल वेताल शव सहित गायब हो गया और पुनः पेड़ पर जा बैठा।


(आधारः मनोहर शास्त्री की रचना)

जीवन में उतार-चढ़ाव

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास गया, पेड़ पर से शव को उतारा; उसे कंधे पर डाल लिया और यथावत् श्मशान की ओर जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, "राजन्, मैं तो यह नहीं जानता कि तुम किस की सहायता करने के लिए, किस की बातों का विश्वास करके इतना कठोर परिश्रम कर रहे हो। परंतु, मेरा अनुभव कहता है कि जिन्हें हम विज्ञ मानते हैं, वे अपनी ही बातों में बारंबार हेर-फेर कहते रहते हैं और उन्हीं बातों के विरुद्ध सलाह देते रहते हैं और मेधावियों को भी भ्रम में डाल देते हैं। इस प्रकार वे उन्हें ग़लत रास्ते पर ले जाते हैं। मैं तुम्हें एक ऐसे गुरु की कहानी सुनाऊँगा, जिन्होंने पारस्परिक विरोधी सलाहें देते हुए अपने एक विवेकी शिष्य को गुमराह किया। थकावट दूर करते हुए उस गुरु की कहानी सुनो।" फिर वेताल उस गुरु की कहानी यों सुनाने लगाः

अरावली पर्वत श्रेणी के पाद तल में गुरु ज्ञान भास्कर एक गुरुकुल चला रहे थे। पाँच सालों में एक बार वे देश में पर्यटन करते थे और अपने पुराने शिष्यों से मिला करते थे। उनके कुशल-मंगल के बारे में जानकारी प्राप्त करते थे और साथ ही देश की स्थिति को प्रत्यक्ष देखते थे। यह उनकी आदत थी। एक बार जब वे लौट रहे थे, तब मार्गमध्य में उन्होंने बारह साल की उम्र के एक गड़रिये को देखा, जो अकेले बैठे ताल पत्रों को ध्यान से पढ़ रहा था। पशु हरे-भरे मैदान में चर रहे थे। उस बालक को देखकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। वे वहीं रुककर यह दृश्य देख रहे थे।
इतने में एक आवाज़ आयी, "अरे काली चरण, आ जाना। तेरी माँ का भेजा मांड पी लेना," यह सुनते ही वह बालक ताल को पत्थर के नीचे रख उस दिशा की ओर भागता हुआ गया, जहाँ से यह आवाज़ आयी थी। गुरु भी उसके पीछे-पीछे गये।
कुएँ के बग़ल में बैठकर बाप-बेटे ने मांड पी लिया। इतने में पिता की दृष्टि गुरु पर पड़ी तो उसने कहा, "हमने तो पूरा मांड पी लिया। थोड़ा बचा लेते तो अच्छा होता। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा।" कहते हुए वह ताल के पेड़ पर चढ़ गया और फल तोड़कर ले आया। फिर फलों से गूदा निकाला और खड़े गुरु को दिया।
गुरु ने गूदा खाते हुए कहा, "तुम्हारे बेटे पर सरस्वती की कृपा है। पर तुमने तो उसे गड़रिये का काम सौंप दिया। ऐसा क्यों किया?"

"उसे पढ़ाने की मेरी तीव्र इच्छा है स्वामी। किंतु हमारे कुल में लोग तो भेड़-बकरियाँ चराने का काम करते हैं; कोई गुरु इसे अपना शिष्य बनाकर ले जाए तो कितना अच्छा होता। ऐसे गुरु थोड़े ही मिलेंगे।" पिता ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा।
गुरु ने अपने गुरुकुल के बारे में उसे बताया और कहा, "अपने बेटे को मेरे साथ भेजो। निःशुल्क उसे पढ़ाऊँगा।"

"इससे बढ़कर मुझे और क्या चाहिये गुरुजी। अवश्य भेजूँगा।" कहते हुए उसने अपने बेटे की ओर देखा।
कालीचरण के मुख पर आनंद ही आनंद था। दूसरे दिन प्रातःकाल ही उसने अपने बेटे को गुरु के साथ भेज दिया।
गुरुकुल पहुँचने के बाद कालीचरण ने जी लगाकर शिक्षा प्राप्त की और युवा होते-होते उसने सभी विद्याएँ सीख लीं। उसने गणित शास्त्र और व्यापार संबंधी विषयों में विशेष रुचि दिखायी।
विद्याभ्यास पूरा करके वहाँ से जाने के पहले गुरु ने कालीचरण से कहा, "देखो कालीचरण, तुम्हारा जन्म किसी कुग्रम में हुआ और आज विद्वान बनकर जा रहे हो। इसका मूल कारण है, तुम्हारी बौद्धिक शक्ति । कभी भी यह नहीं भूलना कि निरंतर श्रम के कारण ही यह संभव हो पाया है। हर मनुष्य की प्रगति और पतन के कारण होते हैं, उसके विचार और उसके काम। दुनिया में जो भी जन्म लेते हैं, उनके पंचभूत और परिसर एक ही समान होते हैं। उनका सदुपयोग करना चाहिये और प्रगति के शिखरों पर आरोहण करना चाहिए। जानते हो, यह कैसे संभव होता है? उनका परिश्रम, और संकल्प। इस सत्य को पहचानो और स्वयं परिश्रम करो, शोध करो और प्रकाश पथ पर जाते हुए दूसरों को भी राह दिखाओ। कभी-कभी आते रहना और परिणाम मुझे बताते रहना।" फिर उन्होंने आशीर्वाद देकर उसे विदा किया।

स्वग्रम पहुँचने के बाद कालीचरण ने जान लिया कि उसकी विद्या के उपयोग की गुंजाइश यहाँ नहीं है। पिता को समझाकर खेत का एक हिस्सा बेच दिया और वह रक़म लेकर शहर पहुँचा। उसे वहाँ मालूम हुआ कि वहाँ कपड़ों की बड़ी माँग है। उसने कपड़ों की एक दुकान खोली। तीन साल गुज़र गये। व्यापार ऐसे तो चल रहा है, पर लाभ नहीं के बराबर है।
गुरु से मिलकर उसने उनसे यह बात बतायी तो उन्होंने कहा, "धनार्जन के लिए व्यापार राजमार्ग है। उसके लिए आवश्यक पूंजी और काम करनेवालों की बड़ी ज़रूरत पड़ती है न। यह किसी एक आदमी से संभव नहीं है। एक-दो विश्वसनीय मित्रों को भागीदार बनाओ तो तुम्हारा व्यापार फलेगा- फूलेगा।"
शहर लौटने के बाद कालीचरण ने गुरु की सलाह को लेकर खूब सोचा-विचारा। दो मित्रों से बातें कीं और उन्हें अपने व्यापार में भागीदार भी बनाया। शहर में दो और नयी दुकानें खुल गयीं। उसके व्यापार ने खूब जोर पकड़ा। शहर के सुप्रसिद्ध जौहरी ने अपनी बेटी का विवाह उससे रचाया। विवाह के अवसर पर पधारे गुरु ज्ञान भास्कर ने नूतन दंपति को आशीर्वाद दिया।
दिन बीतने लगे। कालीचरण की एक पुत्री जन्मी। शिशु का नाम रखा, अन्नपूर्णा और उसे बड़े ही लाड़-प्यार से पालने-पोसने लगा।
व्यापार की और वृद्धि के लिए कालीचरण ने भागीदारों से गहरी चर्चा की। खूब सोचने-विचारने के बाद उसने निर्णय किया कि अपने देश के श्रेष्ठ वस्त्रों को विदेशों में बेचने भेजा जाए तो अधिकाधिक लाभ कमाया जा सकता है। दूसरे महीने से ही उसने विदेशों में वस्त्रों को भेजने का काम शुरू कर दिया।
तीन महीनों के बाद, उसे मालूम हुआ कि सुवर्णद्वीप में इन कपड़ों की बड़ी माँग है तो उसने मूल्यवान वस्त्र एक जहाज में भेजा। साथ ही एक विश्वासपात्र गुमास्ते को भी भेजा। जब जहाज सुवर्णद्वीप के निकट पहुँच रहा था तब बहुत बड़ा भूकंप आया। भूकंप के कारण सुनामी आया और जहाज उलट गया। मालूम भी नहीं हो पाया कि आख़िर जहाज है कहाँ।
इस समाचार ने कालीचरण को हिला डाला। जिन भागीदारों ने उस समय तक उसके साथ घनी मैत्री निभायी, इस घटना के बाद वे उससे शत्रु की तरह व्यवहार करने लगे। इस दुःस्थिति कारण उसने मन की शांति भी खो दी। और वह हमेशा उदास रहने लगा।
उस समय गुरु ज्ञान भास्कर देशाटन पर थे। उस दौरान वे कालीचरण को देखने आये। उसकी दुःस्थिति पर उन्होंने दया दिखायी। उसे तसल्ली देते हुए उन्होंने कहा, "कालीचरण, ऐसे समय में धैर्य रखना चाहिये। जीवन में जीत-हार स्वाभाविक हैं। एक बार एक भील युवक बरगद की शाखा पर बैठकर कबूतरों की जोड़ी को अपने बाण का निशाना बनाने के लिए तैयार बैठा था। मादा कबूतर ने यह देख लिया और उड़ जाने के लिए नर कबूतर को संकेत किया । पर, नर कबूतर ने उसे उस बाज़ को दिखाया, जो उन्हें उड़ा ले जाने के लिए आकाश में घूम रहा था। उसने मादा कबूतर से कहा, "घबराओ मत। इस विपत्ति से बचने के लिए केवल भगवान से प्रार्थना कर सकते हैं। सिवा इसके कोई दूसरा मार्ग नहीं है। इतने में भील युवक ने बाण छोड़ते हुए एक सांप पर अनजाने में पैर रखा, जिसने उसे डस लिया। वह ज़मीन पर गिर गया। वह बाण कबूतरों के ऊपर से होते हुए सीधे बाज़ को लगा, जिसके कारण वह मरकर ज़मीन पर गिर गया। यों कबूतर बच गये। देख लिया न, मरण की विपत्ति में फंस जाने के बाद भी नर कबूतर के धैर्य ने उसे बचाया। इसलिए तुम भी धैर्य रखो, सहनशील बने रहो। समय करवट लेगा। ऐसी कोई काली रात नहीं जिसके अन्त में भोर की किरण नई आशा लेकर नहीं आती। हर बदली के बाद चाँदनी छिटकती है। तुम्हारी स्थिति में भी अवश्य सुधार आयेगा। प्रतिकूल हवा जब चलती है तब मोथे की तरह सर झुकाना ही पड़ता है। सब कुछ काल के अधीन है। हम केवल निमित्त मात्र हैं।"


कहानी कह चुकने के बाद वेताल ने विक्रमार्क से पूछा "राजन्, गुरु ज्ञान भास्कर ने कालीचरण को उपदेश दिया था," जीवन में सफलता के लिए चाहिये परिश्रम और संकल्प। परन्तु अंत में एक चिड़िये की कहानी सुनाकर बताया कि सब कुछ समय के अधीन है। विधि बलवान है, यह कहते हुए उन्होंने शुष्क वेदांत का सहारा लिया। क्या यह विचित्र और एक-दूसरे के विरोधी नहीं लगते? क्या अनुभव ने उन्हें यही पाठ सिखाया? अथवा वृद्ध होने कारण उनमें उत्पन्न निराशा या उदासीनता इसके कारण हैं? उनके दो अभिप्रायों में से कौन-सा अभिप्राय सच्चा है। कौन-सा असत्य है? मेरे इन संदेहों के समाधान जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे।"
विक्रमार्क ने कहा, "गुरु ज्ञान भास्कर की बातों में किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है, उन्होंने कालीचरण को पहले और अंत में जो बताया, वे दोनों ही संपूर्ण सत्य हैं। मनुष्य के प्रयत्न व परिश्रम के बिना, किसी भी प्रकार की प्रगति साध्य नहीं। विधि लिखित मानकर चुप बैठ जायेंगे तो कुछ भी नहीं होगा। ऐसा करने पर दरिद्रता और बढ़ेगी। उन्होंने अपने प्रथम उपदेश में कहा था कि युवा हृदयों के लिए प्रयत्न और परिश्रम प्राण शक्ति समान हैं। उसी प्रकार जीवन की यात्रा में ऐसी बाधाएँ उपस्थित होंगी, जिनका सामना साहस के साथ करना चाहिये। पहले इनकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते।"
"परिस्थितियाँ हमेशा मनुष्य के अधीन नहीं होतीं । ऐसी स्थिति में, हमें सहनशील होना चाहिए और भगवान पर विश्वास रखना चाहिये। यही विषय उन्होंने अंत में बताया। दोनों ही परामर्श सत्य हैं, परंतु कब किस प्रकार से इनका उपयोग करना चाहिये, यह मनुष्य की विज्ञता और विवेक पर निर्भर करता है।"
राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित ग़ायब हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा।
(आधार-मंजु भारती की रचना)





Sunday, July 3, 2011

खड्ग महिमा

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास गया; पेड़ पर से शव को उतारा और यथावत् श्मशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘विषैले सर्पों, भूत-प्रेतों से भरे श्मशान में तुम निर्भय बढ़े जा रहे हो। मुझे तो लगता है कि भय भी तुमसे डरता है। किसी महान कार्य को साधने के लिए डटे हुए हो। तुम्हें अपने प्राण पर रत्ती भर भी मोह नहीं रहा। स्पष्ट है कि तुममें अटल आत्मविश्वास भरा हुआ है। तुम अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए, चाहे कोई भी मूल्य चुकाना क्यों न पड़े, चुकाने के लिए तैयार हो। आज तक मैं यह समझ नहीं पाया कि आख़िर वह लक्ष्य तुम्हारा है क्या? मुझे तुम्हारे श्रम को देखते हुए शशिकांत नामक एक ग्रामीण युवक की याद आती है, जिसने अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए अनेक कष्ट सहे, कठोर परिश्रम किया। उसकी कहानी थकावट दूर करते हुए मुझसे सुनो।'' फिर वेताल यों कहने लगाः

बहुत पहले की बात है। कनकवर नामक गाँव में शशिकांत नामक एक युवक रहा करता था। वह कितनी ही विद्याओं में प्रवीण था। विशेषकर खड्ग विद्या में उसकी बराबरी का कोई था ही नहीं। उसका पिता प्रसिद्ध व्यापारी था। दुर्भाग्यवश वह और उसकी पत्नी जहाज की एक दुर्घटना में मर गये। पिता ने जो धन छोड़ा, उससे उसने अन्य व्यापारियों के साथ व्यापार किया। परंतु अनुभवहीन उस युवक को व्यापारियों ने धोखा दिया। अब उसके पास कुछ नहीं रहा।
इस दुस्थिति में जयानंद नामक पड़ोस के गाँव का एक मित्र उससे मिलने आया। दुखी शशिकांत को सांत्वना देते हुए उसने कहा, ‘‘शशिकांत, खड्ग विद्या में तुम्हारी दक्षता अद्भुत है । तुम्हारी शक्ति अपार है। अगर इसी गाँव तक अपने को सीमित रखोगे तो यह विद्या तुम्हारे काम नहीं आयेगी। हमारी राजधानी करिवीरपुर जाना । वहाँ अभी विजयदशमी के अवसर पर स्पर्धाएँ होने जा रही हैं। उनमें भाग लेना और अपनी दक्षता का प्रदर्शन करना। तुम्हें अवश्य ही राजा के आस्थान में काम मिलेगा। तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल होगा।''
मित्र जयानंद की सलाह शशिकांत को सही और उचित लगी। दूसरे ही दिन वह राजधानी पहुँचने निकल पड़ा। मार्गमध्य में जब वह एक घने जंगल से गुज़र रहा था, तब थकावट दूर करने के लिए एक पेड़ के तले बैठते समय किसी की चिल्लाहट सुनायी पड़ी। कोई ‘‘बाघ, बाघ, बचाओ, बचाओ'' कहकर चिल्ला रहा था।
शशिकांत फौरन म्यान से तलवार निकाल कर उस तरफ गया, जहाँ से आवाज़ आयी। बाघ, एक मुनि पर टूट पड़ने ही वाला था, तभी शशिकांत ने मुनि और बाघ के बीच में कूद कर तलवार से बाघ पर वार किया। उस वार से बाघ घायल होकर गिर गया, पर उस समय तलवार शशिकांत के हाथ से फिसल गयी।

इतने में बाघ गुर्राता हुआ उठा। शशिकांत ने मौक़ा देखकर बाघ के पेट में ज़ोर से लात मारी। बाघ अपने को संभाल कर फिर से शशिकांत पर आक्रमण करने के लिए उठा । शशिकांत ने बाघ के पिछले पैरों को पकड़ कर उसे दूर फेंक दिया। बाघ ज़मीन पर गिरकर छटपटाने लगा।
मुनि यह सब कुछ ध्यान से देख रहा था। उसने शशिकांत से कहा, ‘‘वीर युवक, तुम बड़े साहसी हो। तुम्हारे जैसे निस्वार्थ वीर विरले ही होते हैं। अपनी जान पर खेलकर तुमने मेरी रक्षा की। मैं इस प्रदेश को छोड़कर हिमालय जाना चाहता हूँ।'' कहते हुए उसने पास ही की एक झाड़ी से तलवार निकाली और कहा, ‘‘यह बहुत ही महिमावान खड्ग है। परंतु, इसका यह मतलब नहीं कि कोई दुस्साहस करने पर उतारू हो जाओ। तुममें जब धैर्य-साहस भरा हुआ हो, खड्ग चलाने में नैपुण्य हो, तभी यह तुम्हारी सहायता करेगा।'' कहकर मुनि ने उसे खड्ग सौंप दिया।
शशिकांत ने मुनि के चरण छुए और अपनी यात्रा फिर शुरू कर दी। राजधानी पहुँचते-पहुँचते अंधेरा छा चुका था। उसने एक सराय में रहने के लिए व्यवस्था कर ली। उस सराय की मालकिन एक बूढ़ी औरत थी। दूसरे ही दिन विजयदशमी उत्सव शुरू हुए। राजा के निकट के एक रिश्तेदार ने खड्ग युद्ध में सबको हरा दिया। उसका नाम था चक्रधर। उसके शौर्य से राजा बहुत ही प्रसन्न हुए। वे उसे खड्गवीर की उपाधि देने ही वाले थे कि शशिकांत ने प्रवेश करते हुए कहा, ‘‘महाराज, क्षमा चाहता हूँ। मेरे आने में थोड़ी देरी हो गयी।'' कहते हुए उसने म्यान से खड्ग निकाला।
यह देखते ही चक्रधर क्रोधित होकर बोला, ‘‘कौन है यह? देखने में ग्रमीण लगता है। खड्ग युद्ध में मुझ जैसे शूर से लड़ने का साहस! अगर मैं हार जाऊँगा तो राज्य छोड़कर चला जाऊँगा,'' कहते हुए उसने म्यान से खड्ग निकाला। उपस्थित लोग आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे। राजा के पास बैठी उनकी इकलौती पुत्री मणिकर्णिका मुस्कुराने लगी।
खड्ग युद्ध शुरू हो गया। शशिकांत ने आसानी से चक्रधर के वारों का मुक़ाबला किया। पंद्रह मिनटों के अंदर ही उसने उसे हरा दिया। फिर उसने खड्ग को अपनी आँखों से लगाया।


किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि चक्रधर की यों हार होगी। दर्शकों सहित महाराज और राजकुमारी आश्चर्य में डूब गये। वचन के अनुसार चक्रधर उसी समय वहाँ से चला गया।
चक्रधर अद्वितीय खड्गवीर माना जाता था। उसकी हार ने सबको आश्चर्य में डाल दिया, साथ ही सबने बड़े ही उत्साह के साथ शशिकांत का तालियाँ बजाते हुए स्वागत किया।
राजा ने, तुरन्त खड्ग वीर की उपाधि शशिकांत को प्रदान किया और शाम को उद्यानवन में उससे मिलने के लिए उसे निमंत्रित किया।
राजा, युवरानी मणिकर्णिका, प्रधान मंत्री व आस्थान पंडित जब राजभवन पहुँचे तब राजा ने उन सबसे कहा, ‘‘देखने में बड़ा ही सुंदर और सुशील लगता है। हट्टा-कट्टा है। कहता है कि किसी गाँव से आया हूँ। पर, मुझे लगता है कि यह शिक्षित नहीं है।''
मंत्री ने कहा, ‘‘महाराज, यह युवक एक सराय में रहता है। हमारे गुप्तचरों ने इसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त की। यह शशिकांत कभी संपन्न परिवार का था, पर परिस्थितियों ने उसे अनाथ बना दिया। अपना खड्ग कौशल प्रदर्शित करके हमारे आस्थान में नौकरी पाने के उद्देश्य से यहाँ आया है। जानकारी मिली है कि अन्य विद्याओं में भी यह प्रवीण है।''
राजकुमारी यह सब कुछ ध्यान से सुन रही थी। मुस्कुराती हुई उसने मंत्री को देखा।
प्रतियोगिताओं को शुरू करने के पहले ही राजा ने घोषणा की थी कि जो सबको हरायेगा, उसका विवाह राजकुमारी से होगा। उनका पूरा-पूरा विश्वास था कि चक्रधर ही जीतेगा। परंतु जो हुआ, उसकी कल्पना उसने की ही नहीं थी।
शाम को, जब राजा, युवरानी, मंत्री, शशिकांत और आस्थान पंडित उद्यानवन में उपस्थित थे, तब गुप्तचरों का सरदार वहाँ आया और बोला, ‘‘महाराज, चक्रधर अभी राज्य की सरहदों पर विद्रोह करने के लिए लोगों को इकठ्ठा कर रहा है। उसका कहना है कि मांत्रिक के दिये महिमावान खड्ग के कारण ही उसकी हार हुई है। यह कहते हुए वह लोगों को इकठ्ठा कर रहा है कि मैं राजा के विरुद्ध विद्रोह करूँगा, खुद राजा बनूँगा और मणिकर्णिका से विवाह करके ही रहूँगा।''
यह सुनकर राजा चकित रह गया। आश्चर्य प्रकट करते हुए उसने कहा, ‘‘मेरे ही सगे आदमी ने मेरे विरुद्ध विद्रोह करने की ठान ली!''

आस्थान पंडित ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘महाराज, आप बिल्कुल निश्र्चिंत रहिये। हमारे विरुद्ध वह जो दुष्प्रचार कर रहा है, उससे हमें कोई हानि नहीं पहुँचेगी, उल्टे हमें लाभ होगा। जब अड़ोस-पड़ोस के शत्रु राजाओं को मालूम हो जायेगा कि होनेवाली महारानी के पति के पास एक महिमावान खड्ग है, तब वे हमारी ओर आँख उठाकर देखने की भी जुर्रत नहीं करेंगे।'' फिर राजकुमारी और शशिकांत को देखते हुए कहा, ‘‘मैंने जो कहा, समझ गये न?''
दोनों ने खुश होते हुए सिर हिलाया।
वेताल ने कहानी बता चुकने के बाद विक्रमार्क से कहा, ‘‘आस्थान पंडित ने जो कहा, उसमें युक्ति व वाक् चातुर्य मात्र दिखते हैं। वास्तविकता नहीं। चक्रधर को कैसे मालूम पड़ा कि शशिकान्त का खड्ग महिमावान है। मेरे इन संदेहों के उत्तर जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।''
विक्रमार्क ने कहा, ‘‘आस्थान पंडित की बातों में युक्ति और चमत्कार से बढ़कर वास्तविकता है। चक्रधर ने घोषणा की थी कि हारने पर राज्य छोड़कर चला जाऊँगा पर वह हार सह नहीं सका। इसीलिए वह प्रचार करने लगा कि शशिकांत की जीत का कारण उसकी वीरता नहीं, उसका महिमावान खड्ग है। यह एक सच्चे वीर के लक्षण नहीं हैं। उल्टे वह, स्वार्थवश राजा के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए लोगों को इकठ्ठा करने लगा। इससे स्पष्ट होता है कि उसकी बुद्धि कुटिल है। आस्थान पंडित ने ठीक ही कहा कि उसके प्रचार से राज्य को हानि नहीं पहुँचेगी, उल्टे लाभ ही होगा। मुनि ने स्पष्ट रूप से शशिकांत से बताया था कि यह महिमावान खड्ग तभी तुम्हारी सहायता करेगा, जब तुममें स्वयं धैर्य और साहस हों और खड्ग चलाने में प्रावीण्य हो। शशिकांत में ये गुण कूटकूटकर भरे हुए हैं। उसके हारने का सवाल ही नहीं उठता। राज्य पर कोई भी आपदा नहीं आयेगी।''
राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित ग़ायब हो गया और पुनः पेड़ पर जा बैठा।
(आधार : सुचित्रा की रचना)



स्वार्थ में परोपकार

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पड़े के पास गया। पेड़ पर से शव को उतारा और यथावत् श्मशान की ओर बढ़ता गया। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन, इस भयंकर वातावरण की परवाह किये बिना अपने प्रयासों में मग्न हो। क्या कभी तुमने सोचा कि अब तक तुमसे किये गये सारे के सारे प्रयत्न क्यों निष्फल हुए? आश्र्चर्य तो इस बात का है कि एक बुद्धिमान व विवेकी राजा होते हुए भी अपनी असफलता के कारणों की जड़ में नहीं जा रहे हो।

मैं तुम्हारे हठ की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता, पर तुम्हारी मूर्खता पर भी मुझे दया आती है। कभी-कभी मुझे संदेह होने लगता है कि जो लगन तुम दिखा रहे हो, वह अपन स्वार्थ की पूर्ति के लिए है या परोपकार के उद्देश्य से।



हम देखते रहते हैं कि कुछ संदर्भों में स्वार्थ और परोपकार के बीच के अंतर को जानना बहुत ही मुश्किल का काम है, क्योंकि इनके बीच का अंतर इतना महीन होता है कि हम उन्हें अलग नहीं कर पाते। उदाहरणस्वरूप मैं तुम्हें कमल की कहानी सुनाने जा रहा हूँ। ध्यान से सुनो।’’ फिर वेताल कमल की कहानी यों सुनाने लगाः

कोंडापुर नामक एक बड़े गॉंव में पुरुषोत्तम नामक एक गृहस्थ रहता था। उसके दो बेटे थे। बड़े बेटे का नाम शेखर था। वह अपने पिता की ही तरह दूसरों की भलाई करता था। पर पुरुषोत्तम का दूसरा बेटा कमल स्वार्थी था। किसी की मदद करने से वह कतराता था। पुरुषोत्तम ने अपने दूसरे बेटे कमल को अच्छा बनाने का भरसक प्रयत्न किया, पर उसके प्रयत्न सफल नहीं हुए। मरने के पहले कमल को अपने पास बुलाकर पुरुषोत्तम ने उससे कहा, ‘‘बेटे, इस गांव के लोग अच्छे हैं। यहॉं तुम रह नहीं सकते। अगर तुम सुखी जीवन बिताना चाहते हो तो मेरी एक सलाह है। पास ही के जंगल के बीच एक पर्वत है। उस पर्वत पर चढ़ोगे तो बीच में एक पाताल गुफ़ा है । उस गुफ़ा में अनन्त नामक एक साधु रहते हैं। तुम उनसे मिलोगे तो तुम्हारा भला होगा।’’ यों कह चुकने के बाद वह मर गया।

कमल ने मन ही मन सोचा कि अपने बड़े भाई शेखर को पूरी संपत्ति सौंपने के उद्देश्य से ही पिता ने यह कहानी गढ़ी है। पर जब तक पिता का निधन नहीं हुआ तब तक उसे मालूम नहीं था कि अच्छाई ही उसकी एकमात्र संपत्ति है।

शेखर ने कमल से कहा, ‘‘मेरे ही साथ रहो। मैं तुम्हारी अच्छी तरह से देखभाल करूँगा।’’ कमल को लगा कि अब चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि भाई ने उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। कुछ ही दिनों में गांव के लोग कहने लगे कि भाई हो तो ऐसा, जो अपने छोटे भाई का इतना ख्याल रखता है। वे शेखर की तारीफ़ करने लगे और कमल की निंदा।

‘‘तुम्हारे कहने पर ही मैं यहॉं रह रहा हूँ। पर इसके लिए लोग मुझे दोषी ठहरा रहे हैं, मेरा अपमान कर रहे हैं।’’ कमल ने क्रोध-भरे स्वर में स्पष्ट कह डाला । इसपर शेखर ने हँसते हुए कहा, ‘‘तुम किसी की मदद नहीं करते। अगर चाहते हो कि लोग तुम्हारी प्रशंसा करें तो मेरी तरह तुम भी परोपकार करो, अच्छे मार्ग पर चलो।’’


‘‘दूसरों की भलाई करके पिताजी ने और तुमने क्या साध लिया? उस भलाई से मेरा क्या काम, जिससे एक कौड़ी भी जमा नहीं कर पाता। जीवन में बड़ा बनने की मेरी तीव्र इच्छा है। ऐसा कोई उपाय हो तो सुझाना,’’ कमल ने कहा। ‘‘संपत्ति जुटानी हो तो व्यापार करने की दक्षता चाहिये। कृषि अथवा ललित कलाओं में भी प्रवीणता चाहिये। मैं भी स्वयं ये सब नहीं जानता। तुम स्वयं धन कमाने के उपाय सोचो,’’ शेखर ने सलाह दी।

धन कमाने की इच्छा तो भरी पड़ी है, पर उसे कमाने का कोई भी मार्ग कमल नहीं जानता। इसलिए पिता के कहे अनुसार वह पर्वत की पाताल गुफ़ा में गया और साधु अनन्त से मिला। आनंद की बड़ी दाढ़ी थी और घनी मूंछें थीं। मुख मंडल पर तेजस्विता टपक रही थी। कमल ने अनायास ही उसे प्रणाम किया और कहा, ‘‘स्वामी, मेरे पिताजी ने आपसे मिलने को कहा था। मैं समझता हूँ कि आप ही स्वामी अनन्त हैं।’’

अनंत ने, उसके बारे में विवरण जानने के बाद कहा, ‘‘हॉं, मैं ही अनंत हूँ। शीघ्र ही संपन्न बनने के लिए मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ। पर, इस सहायता से, तुम्हें और मुझे कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।’’ फिर अनंत ने अपने बारे में पूरे विवरण दिये। अनंत और कमल के पिता पुरुषोत्तम एक ही गांव में जन्मे और बड़े हुए। परोपकार ही पुरुषोत्तम का एकमात्र लक्ष्य था। पर अनंत में स्वार्थ आवश्यकता से अधिक ही था।

एक बार दोनों जब पास ही के गांव की ओर जा रहे थे तब उन्होंने एक साधु को देखा, जो सड़क के किनारे गिरा पड़ा था। उसके पॉंव पर एक छोटा-सा घाव भी था। पुरुषोतम ने उसकी सहायता करनी चाही, पर अनंत ने मना किया। फिर भी उसकी बात पर ध्यान न देते हुए उसने पास ही के पौधों से कुछ पत्ते तोड़े और उसका रस साधु के घाव पर निचोड़ा।

साधु उठ बैठा और पुरुषोत्तम के कंधे को थपथपाते हुए कहा, ‘‘बेटे, मेरे पास एक महिमावान तावीज़ है। जिसके पास यह हो, वह जो भी चाहता है, उसे मिल जाता है। मैं तो साधु हूँ। इस तावीज़ से भला मेरा क्या काम? मैं इसे किसी योग्य व्यक्ति को सौंपना चाहता हूँ, इसलिए जान-बूझकर मैंने सांप के डंसने का नाटक किया। इस तावीज़ को लो और सुखी जीवन बिता।’’ यह कहते हुए साधु ने उसे तावीज़ दे दिया।


पुरुषोत्तम ने हाथ जोड़कर कहा,‘‘स्वामी, मैं साधु तो नहीं हूँ, पर मुझे इस तावीज़ की ज़रूरत नहीं है। आवश्यकता से अधिक धन दुख लाता है । आप इसे किसी और को दे दीजिये।’’

साधु ने ‘‘न’’ के भाव में सिर हिलाते हुए कहा,‘‘इस पल से तावीज़ तुम्हारा है। किसी योग्य व्यक्ति को चुनकर तुम ही उसे दे देना। अयोग्य को दोगे तो अनर्थ हो जायेगा।’’

बग़ल में ही खड़ा अनंत चाहता था कि तावीज़ को अपना बना लूँ। इसलिए उसने कहा, ‘‘स्वामी, अनर्थ क्या है और अयोग्य कौन होता है?’’

साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘कुछ बातें ऐसी होती हैंै, जिनकी समझ अनुभव के बाद ही होती है। मैंने कहा था न कि किसी अयोग्य के हाथ यह तावीज़ आ जाए तो अनर्थ होगा। इसलिए कोई भी दीर्घकाल तक इस तावीज़ को अपने पास नहीं रख सकता। किसी को भी दो, यह उसी प्रथम अयोग्य के पास पहुँच जाता है। तब उस प्रथम अयोग्य में जीवन-तेजस्विता कम हो जाती है और वह साधु बन जाता है, पर मोक्ष नहीं मिलता ।’’

साधु को सुनने के बाद पुरुषोत्तम ने अनंत से कहा, ‘‘लगता है कि तुम यह तावीज़ अपनाना चाहते हो। तुम्हें इसे मैं सहर्ष देने को सन्नद्ध हूँ, क्योंकि मेरा विश्वास है कि तुम अयोग्य नहीं हो।’’ यह कहते हुए उसने तावीज़ अनंत को दे दिया।

तावीज को अपना बना लेने के बाद अनंत जो भी मांगता था, उसे वह मिल जाता था। उसका हर काम सफल होता था। परंतु इससे जो आनंद मिलता था, उसे किसी के साथ बांटने के लिए वह बिलकुल ही तैयार नहीं होता था। इसीलिए लोग उसे ईर्ष्यालु कहते थे। एक साल के ख़त्म होने के पहले ही उसने वह तावीज़ किसी और को दिया। पर एक साल के अंदर ही वह तावीज़ उसे वापस मिल गया। जब चार बार ऐसा हुआ तो जीवन से वह विरक्त हो गया। क्रमशः उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया। रोशनी को देखने से भी वह डरने लगा। इन परिस्थितियों में उसने संन्यास ले लिया और इस पाताल गुफ़ा में पहुँच गया।


अपने मित्र अनंत की इस दुस्थिति को देखकर पुरुषोत्तम को दुख हुआ। उसे लगने लगा कि उसके इस दुख का कारण मैं ही हूँ। वह एक बार पाताल गुफ़ा में जाकर उससे मिला और कहा, ‘‘मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि वह तावीज़ तुम्हारी ऐसी दशा कर देगा। जब तक तुम्हें मोक्ष नहीं मिलेगा, तब तक मुझे भी मोक्ष प्राप्त नहीं होगा। इसलिए, उस तावीज़ से तुम मुक्त हो जाओ, इस दिशा में मैं भी प्रयत्न करूँगा।’’ उसने वादा तो कर दिया, पर इतने ही में वह मर गया।

अनंत ने, ताबीज़ से संबंधित सभी बातें कमल को बतायीं और कहा, ‘‘पुत्र, जब तक मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक मेरे जिगरी दोस्त और तुम्हारे पिता को भी मुक्ति नहीं मिलेगी। मेरी और अपनी मुक्ति के लिए तुम्हारे पिता ने तुम्हें यहॉं भेजा, पर तावीज़ का राज़ तुमसे छिपा रखा। अपने स्वार्थ के लिए मैं तुम्हें यह तावीज़ नहीं दे सकता इसलिए मैंने तुम्हें सच बता दिया। किसी भी हालत में इस तावीज़ को एक साल से अधिक समय तक अपने पास रख नहीं सकते। मैं नहीं चाहता कि यह तावीज तुम्हें दूँ और तुम परेशानियों से घिर जाओ। फिर इसे लौटाकर मुझे फिर से परेशान कर दोगे।’’

तब कमल ने विनयपूर्वक कहा, ‘‘मेरे पिताजी परोपकारी थे। उन्हें यह भी मालूम था कि मैं बड़ा स्वार्थी हूँ। वे चाहते थे कि मेरे स्वार्थ में भी परोपकार का मिश्रण हो। यह उनका बड़प्पन है। मेरे पिताजी की आत्मा को और आपको मुक्ति मिल जाए, इसके लिए मेरा स्वार्थ उपयोग में आये तो इससे बढ़कर आनंद क्या हो सकता है। आप तावीज़ मुझे दे दीजिये। मैं वादा करता हूँ कि तावीज़ को शाश्वत रूप से अपने ही पास रखूँगा।’’

अनंत ने कमल को आशीर्वाद देते हुए उसे तावीज़ दे दिया। तावीज़ के मिल जाने के बाद कमल ने जो भी काम किया, वह कामयाब हुआ। पर अब कमल की व्यवहार-शैली में परिवर्तन हुआ। जो संपदा इस तावीज़ के कारण उसे मिली, उसका वह भोग करता रहा, पर साथ ही उनकी मदद भी करने लगा, जो कष्टों में फंसे हुए थे।

यों एक साल गुज़र गया। इस एक ही साल के अंदर कमल ने पर्याप्त संपत्ति जुटा ली। वे संक्रांति के दिन थे। प्रातःकाल ही अनंत गुफ़ा से बाहर आया और सीधे कमल के पास गया। उसने कहा, ‘‘कमल, वह तावीज़ एक बार ज़रा मुझे देना।’’


गले में लटकते हुए उस तावीज़ को कमल ने अनंत के हाथ में रख दिया। अनंत ने उसे उलट-पलट कर देखा और कमल से कहा, ‘‘एक ज़रूरी बात तुमसे कहने आया हूँ। तुम्हारे कारण तुम्हारे पिता की आत्मा को मुक्ति मिल गयी है। मुझे भी मुक्ति प्राप्त होनेवाली है। अब तुम्हें इस तावीज़ की कोई ज़रूरत नहीं है। दुर्भाग्यवश यह किसी अयोग्य के हाथ लग जायेगा तो कहानी की शुरुआत फिर से होगी।’’ यह कहते हुए उसने तावीज़ को आग में फेंक दिया और वहॉं से चलता बना।

वेताल ने यह कहानी कह चुकने के बाद राजा विक्रमार्क से कहा, ‘‘राजन, कमल के स्वार्थ ने परोपकार के लिए मार्ग प्रशस्त किया। तो क्या स्वार्थ प्रशंसनीय है? अनंत के आशीर्वाद से तावीज़ के दुष्ट प्रभावों का अंत हो गया न? मेरे संदेहों के उत्तर जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।’’
विक्रमार्क ने कहा, ‘‘स्वार्थ प्रशंसनीय तो नहीं है। पर, उससे किसी को हानि नहीं पहुँचती हो तो स्वार्थ को ग़लत नहीं कह सकते। कमल स्वार्थी है, पर बुरा नहीं है। जो काम किया जाता है उसके प्रतिफल की वह आशा करता है। अब रही तावीज़ की बात। अनंत के आशीर्वाद से तावीज़ का दुष्ट प्रभाव नहींमिटा । कमल के पिता की अच्छाई के कारण कमल में अच्छा परिवर्तन आया और इस परिवर्तन के कारण ही तावीज़ का दुष्ट प्रभाव मिट गया। उसने ताबीज़ के दुष्ट प्रभाव को भी, अच्छा आदमी बनकर मिटा दिया। उसके द्वारा उसने संपत्ति जुटा ली और अपना जीवन-स्तर बढ़ा लिया। साथ ही उसने ज़रूरतमंद लोगों की मदद की और अच्छा नाम भी कमाया। उसने अपने स्वार्थ के लिए किसी को हानि नहीं पहुँचाई, बल्कि उससे परोपकार ही हुआ। यों कमल तावीज़ पाने के योग्य साबित हुआ।’’

राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित ग़ायब हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा। (आधार कमलेश की रचना)

शरनिधि का शतरंज

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास गया, पेड़ पर से शव को उतारा; अपने कंधे पर डाल लिया और यथावत् श्मशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन्, आधी रात का समय है, भयंकर सन्नाटा है, फिर भी मुझे ढोते हुए निधडक चले जा रहे हो। थकावट का नाम ही नहीं ले रहे हो। भला अपना मूल्यवान समय क्यों यों व्यर्थ किये जा रहे हो। मुझे शक होता है कि तुम्हारा परिश्रम आख़िर व्यर्थ होकर रहेगा। कुछ व्यक्ति कुछ क्रीडाओं को विशेष रूप से चाहते हैं। उनके प्रति उनका बड़ा लगाव होता है। शरनिधि शतरंज प्रिय राजा था। एक बार उसने इस क्रीडा में एक गंधर्व पर विजय भी पायी। शर्त के अनुसार जीतने पर उसे फिर से यौवन पाना था। परंतु जीतकर भी उसने यह सुअवसर हाथ से फिसल जाने दिया। उसकी कहानी सुनाऊँगा। ध्यान से सुनो,'' फिर वेताल शरनिधि की कहानी यों सुनाने लगाः

शरनिधि मधुवन का शासक था। शतरंज उसे जान से भी ज़्यादा प्यारा था। राजधानी में हर साल इनकी प्रतियोगिताएँ चलाया करता था। शरनिधि की धर्मपत्नी प्रभावती देवी, उनकी दोनों पुत्रियाँ वैजयंती और मेघना भी शतरंज के प्रति विशेष रुचि दिखाती थीं।
एक पूर्णिमा की रात को वैजयंती और मेघना उद्यानवन में बैठकर शतरंज खेलने में तल्लीन थीं। उस समय आकाश में विचरते हुए समीर नामक गंधर्व ने यह दृश्य देखा। आतुरतावश उसने अपना रथ वहाँ उतारा। जैसे ही वैजयंती जीती, वह प्रत्यक्ष हुआ और कहा, ‘‘बहुत ही अद्भुत खेल खेला है तुमने वैजयंती।''
अकस्मात् ही सामने खडे गंधर्व को देखकर दोनों बहनें घबरा गयीं।
अपने को संभालते हुए पहले वैजयंती ने कहा, ‘‘इस उद्यानवन में किसी पराये का आना मना है। यहाँ ख़ास पहरा भी है। फिर यहाँ आपका आना कैसे संभव हो पाया?''
‘‘मेरा नाम समीर है, मैं गंधर्व हूँ; शतरंज प्रिय हूँ। चांदनी में गगन बिहार करते हुए आप लोगों को देखा और भूमि पर उतरे बिना मुझसे रहा नहीं गया। आप दोनों को आपत्ति न हो तो आपमें से किसी एक के साथ शतरंज खेलना चाहूँगा।''
सिर हिलाते हुए वैजयंती ने अपनी सहमति दे दी। तुरंत खेल शुरू हो गया। देखते-देखते गंधर्व ने वैजयंती को हरा दिया और मेघना से कहा, ‘‘क्या तुम भी खेलना चाहोगी?''
मेघना जानती थी कि उसकी हार निश्चित है, फिर भी उसने गंधर्व से खेलने की इच्छा प्रकट की, क्योंकि वह समझती थी कि यह एक सुवर्ण मौक़ा है और जो अविस्मरणीय होगा।
खेल शुरू हुआ। मेघना बड़ी ही सावधानी से चाल चलती रही। परंतु, दस ही चालों में गंधर्व ने मेघना को हरा दिया और ठठाकर हँसने लगा, मानों वह यह बताना चाहता हो कि मेरे सामने तुम जैसे नौसिखियों की क्या गिनती।

‘‘अगली पूर्णिमा को ठीक इसी समय पर फिर से आऊँगा। एक और बार खेल खेलेंगे,'' कहकर वह रथ की ओर बढ़ा।
दोनों युवरानियों को अंतःपुर में देरी से आते हुए देखकर महारानी ने पूछा, ‘‘लौटने में इतनी देरी क्यों हुई? मतलब यह हुआ कि अब तक उद्यानवन में क्या शतरंज खेलती रहीं?''
मेघना ने कहा, ‘‘हाँ, एक गंधर्व ने हम दोनों के साथ शतरंज खेला।'' आश्चर्य प्रकट करती हुई रानी प्रभावती ने वैजयंती से पूछा, ‘‘क्या यह सच है?''
‘‘हाँ माँ, मेघना ने सच ही बताया। वह यह कहकर गया कि अगली पूर्णिमा के दिन फिर आऊँगा और शतरंज खेलूँगा।'' वैजयंती ने माँ के संदेह को दूर करते हुए कहा।
इतने में, राजा शरनिधि वहाँ आया। रानी ने पूरा किस्सा उसे सुनाया। शरनिधि ने भी आश्र्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ‘‘इसका यह मतलब हुआ कि फिर से गंधर्व का आगमन होनेवाला है।'' यों कहकर वह सोच में पड़ गया।
अगली पूर्णिमा के दिन प्रथम पहर के दौरान वैजयंती, मेघना यथावत् चंद्रशिला पर आसीन थीं। राज दंपति पास ही की चमेली के कुंज के पीछे खड़े थे और बैचैनी से गंधर्व की प्रतीक्षा कर रहे थे।
थोड़ी ही देर में गंधर्व उद्यानवन में रथ से उतरा और लताकुंज की ओर दृष्टि फेरते हुए कहा, ‘‘शरनिधि, महारानी समेत लताकुंज के पीछे छिपने की क्या आवश्यकता है? तुम्हें आपत्ति न हो तो तुम्हारे साथ भी शतरंज खेलना चाहता हूँ। खेलोगे?''
गंधर्व ने स्वयं आमंत्रित किया, इसपर खुश होता हुआ शरनिधि आगे आया। राजा और समीर शिला पर आमने-सामने आसीन थे। प्रभावती देवी, वैजयंती, मेघना बगल ही में बैठी थीं।
‘‘स्पर्धा जो भी हो, बाजी लगाने पर ही उसमें मज़ा आता है। आपका क्या कहना है?'' गोटियों को ठीक करते हुए गंधर्व ने कहा।
शरनिधि ने प्रश्र्न को गंभीरता से न लेते हुए पूछा, ‘‘तो हारना क्या होगा?''
तब गंधर्व ने कहा, ‘‘अगर होड़ में मैं हार गया तो, अपनी गंधर्व महिमा से अधेड़ उम्र के तुम्हें फिर से युवक बना दूँगा। तुम अगर हारे तो, अपनी पुत्रियों में से एक पुत्री के साथ मेरा विवाह करोगे। क्या तुम्हें यह शर्त मंजूर है?''

राजा सोच में पड़ गया। अगर वह हार जाए तो सुयोग्य गंधर्व उसका दामाद बनेगा। वह गंधर्व को हराये तो वृद्धावस्था में क़दम रखनेवाले उसे पुनः यौवन प्राप्त होगा।
हारूँ या जीतूँ, दोनों ओर से मुझे ही लाभ पहुँचनेवाला है। यह सोचते हुए वह मन ही मन खुश हुआ।
उस समय दोनों राजकुमारियाँ भी यही सोचने लगीं कि उनके पिता को गंधर्व के हराने पर वह किससे पाणिग्रहण करेगा। रानी तो कुछ और ही गंभीरतापूर्वक सोच रही थी। उसका पति वृद्धावस्था में क़दम रखनेवाला है, अगर गंधर्व को हराकर वह यौवन प्राप्त करे तो वह उसका तिरस्कार करेगा और हो सकता है, किसी दूसरी स्त्री से विवाह कर ले। वह चिंतित होने लगी।
इतने में एक विचित्र घटना घटी। एक और रथ आकाश से उद्यानवन में उतरा। निश्र्चेष्ट होकर जब सब लोग उस रथ की ओर देख रहे थे तब एक अति सुंदर गंधर्व कन्या उनके पास आयी।
राजा शरनिधि ने नख से शिख तक उसे ग़ौर से देखा और आश्चर्य-भरे स्वर में उससे पूछा, ‘‘जान सकता हूँ, आप कौन हैं?''
‘‘मैं इस गंधर्व की पत्नी हूँ। यह देखने आयी हूँ कि जिस सुंदरी से विवाह रचाने के लिए ये तत्पर हैं, वह आखिर है कौन?'' व्यंग्य-भरे स्वर में उसने कहा।
राजा एक निर्णय पर आया और गंधर्व को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘ठीक है, खेल शुरू करेंगे। परंतु एक शर्त है। शतरंज के इस खेल में हार-जीत किसी की भी हो, उससे मुझे या मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को हानि पहुँचनी नहीं चाहिये। क्या आपको यह स्वीकार है?''
गंधर्व ने एक बार अपनी पत्नी को देखा और शरनिधि से कहा, ‘‘मैं समझ गया हूँ कि आप क्या सोच रहे हैं। वचन देता हूँ, आपको कोई हानि नहीं पहुँचाऊँगा।''
जैसे ही खेल शुरू हुआ, गंधर्व बीच-बीच में अपनी पत्नी को तिरछी नज़र से देखता रहा। गंधर्व की पत्नी ने परोक्ष रूप से खेल में शरनिधि की सहायता की। गंधर्व की हार हुई।

खिन्न गंधर्व जब शरनिधि को यौवन प्रदान करने के उद्देश्य से मंत्रोच्चारण करने ही जा रहा था, तब राजा ने कहा, ‘‘मुझे किसी भी प्रकार का यौवन नहीं चाहिये।''
वेताल ने कहानी सुनायी और कहा, ‘‘राजन् शरनिधि के व्यवहार में कोई अनजानी संदिग्धता, चपलता दिखायी देती है। राजा शतरंज में हारे या जीते, उसे ही लाभ पहुँचे, ऐसा आश्वासन गंधर्व ने उसे दिया और यह शरनिधि का भाग्य ही कहा जा सकता है। परंतु जब बाजी जीत गया, उसने यौवन अपनाने से इनकार कर दिया। क्या यह उसकी मूर्खता नहीं? अगर राजा खेल में हार जाता तो उसे अपनी पुत्रियों में से किसी एक से गंधर्व का विवाह करना पड़ता। मेरे इन संदेहों के उत्तर जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े को जायेंगे।''
विक्रमार्क ने वेताल के संदेहों को दूर करने के उद्देश्य से कहा, ‘‘यह सच है कि राजा शरनिधि मानव सहज दुर्बलता का शिकार था। उसे इस बात की खुशी थी कि हारने पर या जीतने पर उसी का लाभ होगा। परंतु, खेल को शुरू करने के पहले ही गंधर्व समीर की पत्नी ने अपने पति की मनोकामना के रहस्य को खोल दिया। अब शरनिधि ताड़ गया कि अगर वह बाजी हार जाता और अपनी पुत्रियों में से किसी एक से गंधर्व का विवाह करना पड़ता तो कितना बड़ा अनर्थ हो जाता। उसी प्रकार वह यह भी जान गया कि गंधर्व के वरदान के बल पर उसे यौवन प्राप्त हो जाता तो भविष्य में कितनी बड़ी-बड़ी समस्याओं का सामना उसे करना पड़ता। वह कुशाग्र बुद्धि का था, इसलिए आनेवाले संकट को वह भांप पाया। अगर वह अपनी पुत्रियों की उम्र का हो जाए तो वे भला उसे अपना पिता कैसे मानेंगीं? उसी प्रकार उसकी महारानी अधेड उम्र की हो और वह युवा तो क्या जगहँसाई नहीं होगी? अतः शरनिधि ने जो निर्णय लिया, उसमें न कोई संदिग्धता है, न ही कोई मूर्खता। इसमें तो उसकी बुद्धिमानी ही दृष्टिगोचर होती है।
राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित गायब हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा।
(शांतकुमार की रचना के आधार पर)






पहरेदार भूत

धुन का पक्का विक्रमार्क फिर से पेड़ के पास गया। पेड़ पर से शव को उतारा और उसे अपने कंधे पर डाल लिया। फिर यथावत् वह श्मशान की ओर बढ़ता गया। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन्, तुम्हारा हठ बहुत प्रशंसनीय है। अपने लक्ष्य में अब तक तुम्हें सफलता नहीं मिली, फिर भी डटे हुए हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि साधु-संन्यासियों को दिये गये अपने बचन को निभाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हो। उनके बोलने की पद्धति बड़ी ही निगूढ़ और मर्मगर्भित होती है। उदाहरणस्वरूप मैं तुम्हें विदय की कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जो पहरेदार भूत के रूप में परिवर्तित हो गया। थकावट दूर करते हुए ध्यान से उसकी कहानी सुनो।'' फिर वेताल विदय की कहानी यों सुनाने लगाः

बहुत पहले की बात है। सुधन एक व्यापारी था और देश-विदेश में घूमकर उसने अपार धन कमाया था। उसका अपना एक छोटा-सा धनागार था। उसकी पत्नी के रिश्तेदार विदय को उसके पहरे की जिम्मेदारी सौंपी गयी।
सुधन, विदय की गतिविधियों को जानने के लिए उसके काम-काजों पर नज़र रखता था। पर विदय को इसकी बिल्कुल जानकारी नहीं थी, इसलिए वह हर दिन कुछ सोना और अशर्फियाँ घर ले जाया करता था।
सुधन ने यह बात पत्नी सुमति से बतायी। उसने तुरंत विदय को बुलाना चाहा और खरी-खोटी सुनाना चाहा। पर, ऐसा करने से रोकते हुए सुधन ने पत्नी से कहा, ‘‘मुझे तो इस बात का दुख है कि जिसका हमने विश्वास किया, उसी ने हमें धोखा दिया। उसकी चोरी से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। सही समय पर मैं उसे पकड़ कर पाठ सिखाऊँगा।''
सुमति ने इसपर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ‘‘पहरेदार पर पहरा देने से अच्छा यह होगा कि हम खुद अपने धनागार पर पहरा दें।''
सुधन ने हँसते हुए कहा, ‘‘पूरे धनागार पर पहरा देना बहुत बड़ा काम है। वह काम विदय संभाल रहा है। पर एक विदय पर ही पहरा देना छोटा काम है। वह काम मैं कर रहा हूँ। हमें नुक़सान बहुत ही कम मात्रा में पहुँच रहा है, पर वह जो काम कर रहा है, वह अवश्य ही ग़लत है। विदय को यह समझने में थोड़ा समय लगेगा।''
देखते-देखते विदय ने जो संपत्ति लूटी, वह दो गागर भर की हो गयी। उसने उन गागरों को पिछवाडे में जमीन के अंदर गाड़ दिया। कुछ दिनों के बाद सुधन ने, विदय को बुलवाया और उससे कहा, ‘‘मैं तुमपर नज़र रखता आ रहा हूँ। धनागार पर पहरा देने के लिए मैंने तुम्हें नियुक्त किया। पर तुमने विश्वासधात किया और तुमने खुद चोरी की। मेरी संपदा को गागरों में भरकर उन्हें अपने घर के पिछवाड़े में ज़मीन के अंदर छिपाया। कहो, तुम्हारी क्या क़ैफियत है?''
विदय घबरा गया। वह सुधन के पैरों पर गिर कर गिड़गिडाते हुए कहने लगा, ‘‘हाँ, मुझसे बड़ी भूल हो गयी। आगे से ऐसी ग़लती नहीं करूँगा। मुझे माफ़ कर दीजिये।'' उसने कसम खाते हुए कहा।

सुधन ने कहा, ‘‘तुम मेरी पत्नी के रिश्तेदार हो, इसलिए तुम्हें माफ़ कर देता हूँ। साथ ही, वह संपत्ति तुम्हें दे भी देता हूँ। बशर्ते कि तुम अपनी क़ाबिलियत साबित करो। अन्यथा मैं तुम्हें पुलिस के सुपुर्द कर दूँगा।''
विदय ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘आप महान हैं। बताइये कि अपनी काबिलियत साबित करने के लिए मुझे क्या करना होगा।''
सुधन ने फ़ौरन कहा, ‘‘तुमने मेरी जिस संपदा की चोरी की, एक हफ़्ते के अंदर तुम्हारी जानकारी के बिना उस संपदा की चोरी मैं स्वयं करूँगा। पहरेदार होने के नाते मुझे रोको और अपनी काबिलियत साबित करो।''
विदय ने अपनी पत्नी से यह विषय सविस्तार बताया। वह खुश होती हुई बोली, ‘‘इसके लिए हमें भगवान की सहायता चाहिये। हमारे गाँव की सरहदों पर जो पहाड़ी गुफ़ाएँ हैं, उनमें से आख़िरी गुफा में एक महिमावान साधु रहते हैं। आप उनसे मिलिये और सहायता मांगिये।''
विदय साधु से मिला और पूरा विषय बताया। साधु ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें अभिमंत्रित भस्म देता हूँ। इस भस्म को जहाँ छिड़कोगे, वहाँ छिपाकर रखी गयी संपदा को एक सप्ताह तक कोई छू भी नहीं सकता। सुधन से भी यह काम नहीं हो सकता। लेकिन, वह संपदा सुधन की अपनी है, जिसे लेने से तुम उसे रोक रहे हो। यह पाप है। इस से तुम्हारा अनिष्ट हो सकता है। फिर भी क्या यह काम करना चाहते हो?''
विदय पाप का भार अपने ऊपर लेने को तैयार हो गया और वैसा ही किया, जैसा साधु ने कहा था। भस्म के प्रभाव के कारण सुधन उस संपदा को अपना नहीं पाया। एक सप्ताह के बाद अपने दिये वचन के अनुसार उसे मानना ही पड़ा कि यह संपदा विदय की है। इसपर विदय को बेहद खुशी हुई। पर दूसरे ही क्षण उसका बदन जलने लगा। भयभीत होकर वह दौड़ा-दौड़ा साधु के पास गया।

साधु ने कहा, ‘‘सुधन अच्छा आदमी है। उसे धोखा देकर तुमने उसकी संपत्ति की चोरी की । अपनी संपत्ति को लेने से उसे रोकने के लिए मेरा दिया भस्म छिडका। यह पाप है और वही पाप तुम्हारे शरीर को जला रहा है। इस पीडा को जीवन भर तुम्हें सहना ही पड़ेगा। अथवा, तुम्हें भूत बनना पडेगा और उस संपत्ति पर पहरा देना होगा, जिससे वह किसी दूसरे के हाथ न लगे। किसी भी हालत में यह राज़ अपनी पत्नी से भी छिपाकर रखना होगा।''
शारीरिक पीडा को सह न सकने के कारण विदय साधु की सहायता से भूत में बदल गया। अपने विकृत रूप से दुखी होकर उसने साधु से पूछा, ‘‘स्वामी, कब तक मुझे इसी रूप में रहना होगा?''
‘‘सुधन ने जो संपदा तुम्हें दी, उसे तुम वेतन मानते हो तो जितने साल तुम्हें काम करना होगा, उतने सालों तक तुम भूत बनकर ही रहोगे।'' साधु ने कहा।
विदय ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘इसका मतलब यह हुआ कि सौ सालों तक मुझे काम करना होगा। इसके पहले ही मुक्त होने का क्या कोई उपाय नहीं?''
‘‘अगर तुम्हारा भाग्य चमका और कोई एक और पहरेदार भूत तुम्हें ढूँढ़ता हुआ आये तो तुम्हें मुक्ति मिलेगी।'' यह कहकर साधु ने विदय को वहाँ से भेज दिया।
यों, विदय सुधन की दी हुई सम्पत्ति का पहरेदार बना। उसकी पत्नी और संतान को मालूम नहीं हो पाया कि विदय पर क्या गुज़रा । जब उन्होंने जमीन के अंदर गाड़ी गगरियों को बाहर निकालने की कोशिश की, तब भूत प्रकट हुआ और उन्हें डराया-धमकाया। उन्हें मालूम नहीं था कि यह भूत, स्वयं विदय ही है । डर के मारे उन्होंने गाँव छोड़ दिया और कहीं चले गये। सुधन ने सोचा कि विदय पत्नी समेत संपत्ति लेकर कहीं चला गया।
यों कुछ साल बीत गये। अब विदय के घर में देवनाथ नामक एक व्यक्ति परिवार सहित रहने लगा। वह अव्वल दर्जे का कंजूस था। उसकी एक बेटी और एक बेटा थे। वह बेटी की शादी के पक्ष में नहीं था, क्योंकि उसका धन खर्च हो जायेगा। उसकी बेटी की शादी उसके मामाओं ने करवायी। पिता के स्वभाव से नाराज़ होकर उसका बेटा घर छोड़कर चला गया। बेटे के दुख में और उसकी बीमारी का इलाज न कराने के कारण उसकी पत्नी भी मर गयी।

पर, देवनाथ को इसका कोई दुख नहीं था। एक दिन पडोसियों ने सत्यनारायण पूजा कराने के बाद देवनाथ को भी आम के दो फल दिये। आम के वे फल बड़े ही स्वादिष्ट थे। उसमें आशा जगी कि इन फलों की गुठलियों को ज़मीन में गाड़ दूँ तो वे देखते-देखते बड़े पेड़ हो जायेंगे और उनके मीठे फल मैं खा सकूँगा। पिछवाडे में जाकर कुदाल से ज़मीन को वह खोदने लगा तो खन्-खन् की आवाज़ हुई। उसने और गहरा खोदा तो वहाँ दो गगरियाँ मिलीं । वह उन गगरियों को बाहर निकालने ही वाला था कि उस गड्ढे से धुआँ निकला जो एक बड़े भूत के रूप में परिवर्तित होकर कहने लगा, ‘‘अरे नीच, इन गगरियों में जो भी संपदा है, उसका मैं पहरेदार हूँ। एक क्षण भी यहाँ रुके तो तुम्हें मार डालूँगा।''
देवनाथ भूत को देखकर पहले तो डर गया, पर जब उसने सुना कि उन गगरियों में संपदा है तो धीरज बाँध कर उसने कहा, ‘‘यह घर मेरा है। यह पिछवाडा मेरा है। यहाँ जो भी निधियाँ हैं, मेरी हैं। मुझे रोकनेवाले तुम कौन होते हो?''
भूत ठठाकर हँस पड़ा और मौन रह गया। देवनाथ ने कुदाल अपने हाथ में लेकर ऊपर उठाया तो वह उसके हाथों से फिसल गया। इतने में देखते-देखते वह गढ्ढा भी भर गया। देवनाथ को अपनी असहायता का एहसास हुआ और उसने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘ऐ भूतनाथ, मेरी तीव्र इच्छा इन गगरियों का मालिक बनने की है। इसके लिए मुझे क्या करना होगा?''
भूत ने, देवनाथ से अपनी कहानी बतायी और कहा, ‘‘यहाँ की संपत्ति किसी और पहरेदार भूत को ही मिल सकती है।'' फिर उसने गुफ़ा में रहनेवाले साधु के बारे में बताया। देवनाथ दौड़ा-दौड़ा साधु के पास गया और अपनी इच्छा जाहिर की। उसकी ओर आश्चर्य-भरे नेत्रों से देखते हुए साधु ने शांत स्वर में कहा, ‘‘बेटे, अब तक मुझमें यह संदेह बना हुआ था कि तुम जैसे कंजूसों से दुनिया को क्या कोई लाभ है? पर अब उस संदेह की निवृत्ति हो गयी। ग़लती करनेवाले विदय जैसों को मुक्ति दिलानेवाले मानव रूप में आये तुम अवतार हो। तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी।''

साधु की बातों से बहुत ही संतुष्ट देवनाथ ने उन्हें साष्टांग नमस्कार किया। फिर लौटकर पूरा विषय भूत बने विदय से बताया। विदय मौन था, इसलिए इस मौक़े का फायदा उठाने के लिए बडे ही उत्साह से उसने कुदाल से खोदना शुरू किया। दोनों गगरियों को उसने बाहर निकाला। उनमें भरे रत्नों और अशर्फियाँ को देखकर वह पागल हो उठा और कहने लगा ‘‘ये सब मेरे हैं, मेरे ही हैं।'' वह कूदने लगा, नाचने लगा। देखते-देखते उसके प्राण-पखेरु उड़ गये।
दूसरे ही क्षण विदय को उसका रूप मिल गया और वह सामान्य मनुष्य बन गया। भूत बनकर गड्ढे के चारों ओर घूमते हुए देवनाथ को उसने एक बार देखा और वहाँ से चलता बना।
वेताल ने इस कहानी को सुनाने के बाद राजा विक्रमार्क से कहा, ‘‘राजन्, साधु की बातें क्या परस्पर विरोधी नहीं लगतीं? उन्होंने देवनाथ से कहा था कि तुम मानव रूप में जन्मे ‘‘अवतार'' हो। यह भी कहा था कि तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी। तो फिर देवनाथ क्यों मर गया? क्या साधु की बातों में कोई गूढ़ार्थ है? मेरे इन संदेहों के समाधान जानते हुए भी तुम चुप रहोगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे।''
विक्रमार्क ने उसके संदेहों को दूर करने के उद्देश्य से कहा, ‘‘देवनाथ ने अपनी पुत्री के विवाह के विषय में और पत्नी के विषय में जो व्यवहार किया, वह बड़ा ही निकृष्ट था। उससे उसकी कंजूसी स्पष्ट गोचर होती है। संपत्ति से भरी गगरियों को देखते ही उन्हें अपना बना लेने की तीव्र इच्छा उसमें जगी। स्वार्थ ने उसे अंधा बना डाला। वह समझ नहीं पाया कि पराये का धन विष के समान है। ऐसा लोभी व स्वार्थी भूत के समान है। उसके लोभ ने ही उसके प्राण हर लिये। उसकी कंजूसी तथा अमित स्वार्थ ने ही उसे पहरेदार भूत बनाया। चूँकि साधु की दृष्टि में लोभी मानव मरे आदमी के बराबर है, इसलिए पिछवाडे में छिपायी गयी संपत्ति का वही योग्य रक्षक है। इसी कारण उन्होंने कहा भी था कि तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी। साधु की बातों में कोई वैविध्य है ही नहीं।''
राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित अदृश्य हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा।
(आधारः सुभद्रा देवी की रचना)