Sunday, July 3, 2011

स्वार्थ में परोपकार

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पड़े के पास गया। पेड़ पर से शव को उतारा और यथावत् श्मशान की ओर बढ़ता गया। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन, इस भयंकर वातावरण की परवाह किये बिना अपने प्रयासों में मग्न हो। क्या कभी तुमने सोचा कि अब तक तुमसे किये गये सारे के सारे प्रयत्न क्यों निष्फल हुए? आश्र्चर्य तो इस बात का है कि एक बुद्धिमान व विवेकी राजा होते हुए भी अपनी असफलता के कारणों की जड़ में नहीं जा रहे हो।

मैं तुम्हारे हठ की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता, पर तुम्हारी मूर्खता पर भी मुझे दया आती है। कभी-कभी मुझे संदेह होने लगता है कि जो लगन तुम दिखा रहे हो, वह अपन स्वार्थ की पूर्ति के लिए है या परोपकार के उद्देश्य से।



हम देखते रहते हैं कि कुछ संदर्भों में स्वार्थ और परोपकार के बीच के अंतर को जानना बहुत ही मुश्किल का काम है, क्योंकि इनके बीच का अंतर इतना महीन होता है कि हम उन्हें अलग नहीं कर पाते। उदाहरणस्वरूप मैं तुम्हें कमल की कहानी सुनाने जा रहा हूँ। ध्यान से सुनो।’’ फिर वेताल कमल की कहानी यों सुनाने लगाः

कोंडापुर नामक एक बड़े गॉंव में पुरुषोत्तम नामक एक गृहस्थ रहता था। उसके दो बेटे थे। बड़े बेटे का नाम शेखर था। वह अपने पिता की ही तरह दूसरों की भलाई करता था। पर पुरुषोत्तम का दूसरा बेटा कमल स्वार्थी था। किसी की मदद करने से वह कतराता था। पुरुषोत्तम ने अपने दूसरे बेटे कमल को अच्छा बनाने का भरसक प्रयत्न किया, पर उसके प्रयत्न सफल नहीं हुए। मरने के पहले कमल को अपने पास बुलाकर पुरुषोत्तम ने उससे कहा, ‘‘बेटे, इस गांव के लोग अच्छे हैं। यहॉं तुम रह नहीं सकते। अगर तुम सुखी जीवन बिताना चाहते हो तो मेरी एक सलाह है। पास ही के जंगल के बीच एक पर्वत है। उस पर्वत पर चढ़ोगे तो बीच में एक पाताल गुफ़ा है । उस गुफ़ा में अनन्त नामक एक साधु रहते हैं। तुम उनसे मिलोगे तो तुम्हारा भला होगा।’’ यों कह चुकने के बाद वह मर गया।

कमल ने मन ही मन सोचा कि अपने बड़े भाई शेखर को पूरी संपत्ति सौंपने के उद्देश्य से ही पिता ने यह कहानी गढ़ी है। पर जब तक पिता का निधन नहीं हुआ तब तक उसे मालूम नहीं था कि अच्छाई ही उसकी एकमात्र संपत्ति है।

शेखर ने कमल से कहा, ‘‘मेरे ही साथ रहो। मैं तुम्हारी अच्छी तरह से देखभाल करूँगा।’’ कमल को लगा कि अब चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि भाई ने उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। कुछ ही दिनों में गांव के लोग कहने लगे कि भाई हो तो ऐसा, जो अपने छोटे भाई का इतना ख्याल रखता है। वे शेखर की तारीफ़ करने लगे और कमल की निंदा।

‘‘तुम्हारे कहने पर ही मैं यहॉं रह रहा हूँ। पर इसके लिए लोग मुझे दोषी ठहरा रहे हैं, मेरा अपमान कर रहे हैं।’’ कमल ने क्रोध-भरे स्वर में स्पष्ट कह डाला । इसपर शेखर ने हँसते हुए कहा, ‘‘तुम किसी की मदद नहीं करते। अगर चाहते हो कि लोग तुम्हारी प्रशंसा करें तो मेरी तरह तुम भी परोपकार करो, अच्छे मार्ग पर चलो।’’


‘‘दूसरों की भलाई करके पिताजी ने और तुमने क्या साध लिया? उस भलाई से मेरा क्या काम, जिससे एक कौड़ी भी जमा नहीं कर पाता। जीवन में बड़ा बनने की मेरी तीव्र इच्छा है। ऐसा कोई उपाय हो तो सुझाना,’’ कमल ने कहा। ‘‘संपत्ति जुटानी हो तो व्यापार करने की दक्षता चाहिये। कृषि अथवा ललित कलाओं में भी प्रवीणता चाहिये। मैं भी स्वयं ये सब नहीं जानता। तुम स्वयं धन कमाने के उपाय सोचो,’’ शेखर ने सलाह दी।

धन कमाने की इच्छा तो भरी पड़ी है, पर उसे कमाने का कोई भी मार्ग कमल नहीं जानता। इसलिए पिता के कहे अनुसार वह पर्वत की पाताल गुफ़ा में गया और साधु अनन्त से मिला। आनंद की बड़ी दाढ़ी थी और घनी मूंछें थीं। मुख मंडल पर तेजस्विता टपक रही थी। कमल ने अनायास ही उसे प्रणाम किया और कहा, ‘‘स्वामी, मेरे पिताजी ने आपसे मिलने को कहा था। मैं समझता हूँ कि आप ही स्वामी अनन्त हैं।’’

अनंत ने, उसके बारे में विवरण जानने के बाद कहा, ‘‘हॉं, मैं ही अनंत हूँ। शीघ्र ही संपन्न बनने के लिए मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ। पर, इस सहायता से, तुम्हें और मुझे कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।’’ फिर अनंत ने अपने बारे में पूरे विवरण दिये। अनंत और कमल के पिता पुरुषोत्तम एक ही गांव में जन्मे और बड़े हुए। परोपकार ही पुरुषोत्तम का एकमात्र लक्ष्य था। पर अनंत में स्वार्थ आवश्यकता से अधिक ही था।

एक बार दोनों जब पास ही के गांव की ओर जा रहे थे तब उन्होंने एक साधु को देखा, जो सड़क के किनारे गिरा पड़ा था। उसके पॉंव पर एक छोटा-सा घाव भी था। पुरुषोतम ने उसकी सहायता करनी चाही, पर अनंत ने मना किया। फिर भी उसकी बात पर ध्यान न देते हुए उसने पास ही के पौधों से कुछ पत्ते तोड़े और उसका रस साधु के घाव पर निचोड़ा।

साधु उठ बैठा और पुरुषोत्तम के कंधे को थपथपाते हुए कहा, ‘‘बेटे, मेरे पास एक महिमावान तावीज़ है। जिसके पास यह हो, वह जो भी चाहता है, उसे मिल जाता है। मैं तो साधु हूँ। इस तावीज़ से भला मेरा क्या काम? मैं इसे किसी योग्य व्यक्ति को सौंपना चाहता हूँ, इसलिए जान-बूझकर मैंने सांप के डंसने का नाटक किया। इस तावीज़ को लो और सुखी जीवन बिता।’’ यह कहते हुए साधु ने उसे तावीज़ दे दिया।


पुरुषोत्तम ने हाथ जोड़कर कहा,‘‘स्वामी, मैं साधु तो नहीं हूँ, पर मुझे इस तावीज़ की ज़रूरत नहीं है। आवश्यकता से अधिक धन दुख लाता है । आप इसे किसी और को दे दीजिये।’’

साधु ने ‘‘न’’ के भाव में सिर हिलाते हुए कहा,‘‘इस पल से तावीज़ तुम्हारा है। किसी योग्य व्यक्ति को चुनकर तुम ही उसे दे देना। अयोग्य को दोगे तो अनर्थ हो जायेगा।’’

बग़ल में ही खड़ा अनंत चाहता था कि तावीज़ को अपना बना लूँ। इसलिए उसने कहा, ‘‘स्वामी, अनर्थ क्या है और अयोग्य कौन होता है?’’

साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘कुछ बातें ऐसी होती हैंै, जिनकी समझ अनुभव के बाद ही होती है। मैंने कहा था न कि किसी अयोग्य के हाथ यह तावीज़ आ जाए तो अनर्थ होगा। इसलिए कोई भी दीर्घकाल तक इस तावीज़ को अपने पास नहीं रख सकता। किसी को भी दो, यह उसी प्रथम अयोग्य के पास पहुँच जाता है। तब उस प्रथम अयोग्य में जीवन-तेजस्विता कम हो जाती है और वह साधु बन जाता है, पर मोक्ष नहीं मिलता ।’’

साधु को सुनने के बाद पुरुषोत्तम ने अनंत से कहा, ‘‘लगता है कि तुम यह तावीज़ अपनाना चाहते हो। तुम्हें इसे मैं सहर्ष देने को सन्नद्ध हूँ, क्योंकि मेरा विश्वास है कि तुम अयोग्य नहीं हो।’’ यह कहते हुए उसने तावीज़ अनंत को दे दिया।

तावीज को अपना बना लेने के बाद अनंत जो भी मांगता था, उसे वह मिल जाता था। उसका हर काम सफल होता था। परंतु इससे जो आनंद मिलता था, उसे किसी के साथ बांटने के लिए वह बिलकुल ही तैयार नहीं होता था। इसीलिए लोग उसे ईर्ष्यालु कहते थे। एक साल के ख़त्म होने के पहले ही उसने वह तावीज़ किसी और को दिया। पर एक साल के अंदर ही वह तावीज़ उसे वापस मिल गया। जब चार बार ऐसा हुआ तो जीवन से वह विरक्त हो गया। क्रमशः उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया। रोशनी को देखने से भी वह डरने लगा। इन परिस्थितियों में उसने संन्यास ले लिया और इस पाताल गुफ़ा में पहुँच गया।


अपने मित्र अनंत की इस दुस्थिति को देखकर पुरुषोत्तम को दुख हुआ। उसे लगने लगा कि उसके इस दुख का कारण मैं ही हूँ। वह एक बार पाताल गुफ़ा में जाकर उससे मिला और कहा, ‘‘मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि वह तावीज़ तुम्हारी ऐसी दशा कर देगा। जब तक तुम्हें मोक्ष नहीं मिलेगा, तब तक मुझे भी मोक्ष प्राप्त नहीं होगा। इसलिए, उस तावीज़ से तुम मुक्त हो जाओ, इस दिशा में मैं भी प्रयत्न करूँगा।’’ उसने वादा तो कर दिया, पर इतने ही में वह मर गया।

अनंत ने, ताबीज़ से संबंधित सभी बातें कमल को बतायीं और कहा, ‘‘पुत्र, जब तक मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक मेरे जिगरी दोस्त और तुम्हारे पिता को भी मुक्ति नहीं मिलेगी। मेरी और अपनी मुक्ति के लिए तुम्हारे पिता ने तुम्हें यहॉं भेजा, पर तावीज़ का राज़ तुमसे छिपा रखा। अपने स्वार्थ के लिए मैं तुम्हें यह तावीज़ नहीं दे सकता इसलिए मैंने तुम्हें सच बता दिया। किसी भी हालत में इस तावीज़ को एक साल से अधिक समय तक अपने पास रख नहीं सकते। मैं नहीं चाहता कि यह तावीज तुम्हें दूँ और तुम परेशानियों से घिर जाओ। फिर इसे लौटाकर मुझे फिर से परेशान कर दोगे।’’

तब कमल ने विनयपूर्वक कहा, ‘‘मेरे पिताजी परोपकारी थे। उन्हें यह भी मालूम था कि मैं बड़ा स्वार्थी हूँ। वे चाहते थे कि मेरे स्वार्थ में भी परोपकार का मिश्रण हो। यह उनका बड़प्पन है। मेरे पिताजी की आत्मा को और आपको मुक्ति मिल जाए, इसके लिए मेरा स्वार्थ उपयोग में आये तो इससे बढ़कर आनंद क्या हो सकता है। आप तावीज़ मुझे दे दीजिये। मैं वादा करता हूँ कि तावीज़ को शाश्वत रूप से अपने ही पास रखूँगा।’’

अनंत ने कमल को आशीर्वाद देते हुए उसे तावीज़ दे दिया। तावीज़ के मिल जाने के बाद कमल ने जो भी काम किया, वह कामयाब हुआ। पर अब कमल की व्यवहार-शैली में परिवर्तन हुआ। जो संपदा इस तावीज़ के कारण उसे मिली, उसका वह भोग करता रहा, पर साथ ही उनकी मदद भी करने लगा, जो कष्टों में फंसे हुए थे।

यों एक साल गुज़र गया। इस एक ही साल के अंदर कमल ने पर्याप्त संपत्ति जुटा ली। वे संक्रांति के दिन थे। प्रातःकाल ही अनंत गुफ़ा से बाहर आया और सीधे कमल के पास गया। उसने कहा, ‘‘कमल, वह तावीज़ एक बार ज़रा मुझे देना।’’


गले में लटकते हुए उस तावीज़ को कमल ने अनंत के हाथ में रख दिया। अनंत ने उसे उलट-पलट कर देखा और कमल से कहा, ‘‘एक ज़रूरी बात तुमसे कहने आया हूँ। तुम्हारे कारण तुम्हारे पिता की आत्मा को मुक्ति मिल गयी है। मुझे भी मुक्ति प्राप्त होनेवाली है। अब तुम्हें इस तावीज़ की कोई ज़रूरत नहीं है। दुर्भाग्यवश यह किसी अयोग्य के हाथ लग जायेगा तो कहानी की शुरुआत फिर से होगी।’’ यह कहते हुए उसने तावीज़ को आग में फेंक दिया और वहॉं से चलता बना।

वेताल ने यह कहानी कह चुकने के बाद राजा विक्रमार्क से कहा, ‘‘राजन, कमल के स्वार्थ ने परोपकार के लिए मार्ग प्रशस्त किया। तो क्या स्वार्थ प्रशंसनीय है? अनंत के आशीर्वाद से तावीज़ के दुष्ट प्रभावों का अंत हो गया न? मेरे संदेहों के उत्तर जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।’’
विक्रमार्क ने कहा, ‘‘स्वार्थ प्रशंसनीय तो नहीं है। पर, उससे किसी को हानि नहीं पहुँचती हो तो स्वार्थ को ग़लत नहीं कह सकते। कमल स्वार्थी है, पर बुरा नहीं है। जो काम किया जाता है उसके प्रतिफल की वह आशा करता है। अब रही तावीज़ की बात। अनंत के आशीर्वाद से तावीज़ का दुष्ट प्रभाव नहींमिटा । कमल के पिता की अच्छाई के कारण कमल में अच्छा परिवर्तन आया और इस परिवर्तन के कारण ही तावीज़ का दुष्ट प्रभाव मिट गया। उसने ताबीज़ के दुष्ट प्रभाव को भी, अच्छा आदमी बनकर मिटा दिया। उसके द्वारा उसने संपत्ति जुटा ली और अपना जीवन-स्तर बढ़ा लिया। साथ ही उसने ज़रूरतमंद लोगों की मदद की और अच्छा नाम भी कमाया। उसने अपने स्वार्थ के लिए किसी को हानि नहीं पहुँचाई, बल्कि उससे परोपकार ही हुआ। यों कमल तावीज़ पाने के योग्य साबित हुआ।’’

राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित ग़ायब हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा। (आधार कमलेश की रचना)

शरनिधि का शतरंज

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास गया, पेड़ पर से शव को उतारा; अपने कंधे पर डाल लिया और यथावत् श्मशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन्, आधी रात का समय है, भयंकर सन्नाटा है, फिर भी मुझे ढोते हुए निधडक चले जा रहे हो। थकावट का नाम ही नहीं ले रहे हो। भला अपना मूल्यवान समय क्यों यों व्यर्थ किये जा रहे हो। मुझे शक होता है कि तुम्हारा परिश्रम आख़िर व्यर्थ होकर रहेगा। कुछ व्यक्ति कुछ क्रीडाओं को विशेष रूप से चाहते हैं। उनके प्रति उनका बड़ा लगाव होता है। शरनिधि शतरंज प्रिय राजा था। एक बार उसने इस क्रीडा में एक गंधर्व पर विजय भी पायी। शर्त के अनुसार जीतने पर उसे फिर से यौवन पाना था। परंतु जीतकर भी उसने यह सुअवसर हाथ से फिसल जाने दिया। उसकी कहानी सुनाऊँगा। ध्यान से सुनो,'' फिर वेताल शरनिधि की कहानी यों सुनाने लगाः

शरनिधि मधुवन का शासक था। शतरंज उसे जान से भी ज़्यादा प्यारा था। राजधानी में हर साल इनकी प्रतियोगिताएँ चलाया करता था। शरनिधि की धर्मपत्नी प्रभावती देवी, उनकी दोनों पुत्रियाँ वैजयंती और मेघना भी शतरंज के प्रति विशेष रुचि दिखाती थीं।
एक पूर्णिमा की रात को वैजयंती और मेघना उद्यानवन में बैठकर शतरंज खेलने में तल्लीन थीं। उस समय आकाश में विचरते हुए समीर नामक गंधर्व ने यह दृश्य देखा। आतुरतावश उसने अपना रथ वहाँ उतारा। जैसे ही वैजयंती जीती, वह प्रत्यक्ष हुआ और कहा, ‘‘बहुत ही अद्भुत खेल खेला है तुमने वैजयंती।''
अकस्मात् ही सामने खडे गंधर्व को देखकर दोनों बहनें घबरा गयीं।
अपने को संभालते हुए पहले वैजयंती ने कहा, ‘‘इस उद्यानवन में किसी पराये का आना मना है। यहाँ ख़ास पहरा भी है। फिर यहाँ आपका आना कैसे संभव हो पाया?''
‘‘मेरा नाम समीर है, मैं गंधर्व हूँ; शतरंज प्रिय हूँ। चांदनी में गगन बिहार करते हुए आप लोगों को देखा और भूमि पर उतरे बिना मुझसे रहा नहीं गया। आप दोनों को आपत्ति न हो तो आपमें से किसी एक के साथ शतरंज खेलना चाहूँगा।''
सिर हिलाते हुए वैजयंती ने अपनी सहमति दे दी। तुरंत खेल शुरू हो गया। देखते-देखते गंधर्व ने वैजयंती को हरा दिया और मेघना से कहा, ‘‘क्या तुम भी खेलना चाहोगी?''
मेघना जानती थी कि उसकी हार निश्चित है, फिर भी उसने गंधर्व से खेलने की इच्छा प्रकट की, क्योंकि वह समझती थी कि यह एक सुवर्ण मौक़ा है और जो अविस्मरणीय होगा।
खेल शुरू हुआ। मेघना बड़ी ही सावधानी से चाल चलती रही। परंतु, दस ही चालों में गंधर्व ने मेघना को हरा दिया और ठठाकर हँसने लगा, मानों वह यह बताना चाहता हो कि मेरे सामने तुम जैसे नौसिखियों की क्या गिनती।

‘‘अगली पूर्णिमा को ठीक इसी समय पर फिर से आऊँगा। एक और बार खेल खेलेंगे,'' कहकर वह रथ की ओर बढ़ा।
दोनों युवरानियों को अंतःपुर में देरी से आते हुए देखकर महारानी ने पूछा, ‘‘लौटने में इतनी देरी क्यों हुई? मतलब यह हुआ कि अब तक उद्यानवन में क्या शतरंज खेलती रहीं?''
मेघना ने कहा, ‘‘हाँ, एक गंधर्व ने हम दोनों के साथ शतरंज खेला।'' आश्चर्य प्रकट करती हुई रानी प्रभावती ने वैजयंती से पूछा, ‘‘क्या यह सच है?''
‘‘हाँ माँ, मेघना ने सच ही बताया। वह यह कहकर गया कि अगली पूर्णिमा के दिन फिर आऊँगा और शतरंज खेलूँगा।'' वैजयंती ने माँ के संदेह को दूर करते हुए कहा।
इतने में, राजा शरनिधि वहाँ आया। रानी ने पूरा किस्सा उसे सुनाया। शरनिधि ने भी आश्र्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ‘‘इसका यह मतलब हुआ कि फिर से गंधर्व का आगमन होनेवाला है।'' यों कहकर वह सोच में पड़ गया।
अगली पूर्णिमा के दिन प्रथम पहर के दौरान वैजयंती, मेघना यथावत् चंद्रशिला पर आसीन थीं। राज दंपति पास ही की चमेली के कुंज के पीछे खड़े थे और बैचैनी से गंधर्व की प्रतीक्षा कर रहे थे।
थोड़ी ही देर में गंधर्व उद्यानवन में रथ से उतरा और लताकुंज की ओर दृष्टि फेरते हुए कहा, ‘‘शरनिधि, महारानी समेत लताकुंज के पीछे छिपने की क्या आवश्यकता है? तुम्हें आपत्ति न हो तो तुम्हारे साथ भी शतरंज खेलना चाहता हूँ। खेलोगे?''
गंधर्व ने स्वयं आमंत्रित किया, इसपर खुश होता हुआ शरनिधि आगे आया। राजा और समीर शिला पर आमने-सामने आसीन थे। प्रभावती देवी, वैजयंती, मेघना बगल ही में बैठी थीं।
‘‘स्पर्धा जो भी हो, बाजी लगाने पर ही उसमें मज़ा आता है। आपका क्या कहना है?'' गोटियों को ठीक करते हुए गंधर्व ने कहा।
शरनिधि ने प्रश्र्न को गंभीरता से न लेते हुए पूछा, ‘‘तो हारना क्या होगा?''
तब गंधर्व ने कहा, ‘‘अगर होड़ में मैं हार गया तो, अपनी गंधर्व महिमा से अधेड़ उम्र के तुम्हें फिर से युवक बना दूँगा। तुम अगर हारे तो, अपनी पुत्रियों में से एक पुत्री के साथ मेरा विवाह करोगे। क्या तुम्हें यह शर्त मंजूर है?''

राजा सोच में पड़ गया। अगर वह हार जाए तो सुयोग्य गंधर्व उसका दामाद बनेगा। वह गंधर्व को हराये तो वृद्धावस्था में क़दम रखनेवाले उसे पुनः यौवन प्राप्त होगा।
हारूँ या जीतूँ, दोनों ओर से मुझे ही लाभ पहुँचनेवाला है। यह सोचते हुए वह मन ही मन खुश हुआ।
उस समय दोनों राजकुमारियाँ भी यही सोचने लगीं कि उनके पिता को गंधर्व के हराने पर वह किससे पाणिग्रहण करेगा। रानी तो कुछ और ही गंभीरतापूर्वक सोच रही थी। उसका पति वृद्धावस्था में क़दम रखनेवाला है, अगर गंधर्व को हराकर वह यौवन प्राप्त करे तो वह उसका तिरस्कार करेगा और हो सकता है, किसी दूसरी स्त्री से विवाह कर ले। वह चिंतित होने लगी।
इतने में एक विचित्र घटना घटी। एक और रथ आकाश से उद्यानवन में उतरा। निश्र्चेष्ट होकर जब सब लोग उस रथ की ओर देख रहे थे तब एक अति सुंदर गंधर्व कन्या उनके पास आयी।
राजा शरनिधि ने नख से शिख तक उसे ग़ौर से देखा और आश्चर्य-भरे स्वर में उससे पूछा, ‘‘जान सकता हूँ, आप कौन हैं?''
‘‘मैं इस गंधर्व की पत्नी हूँ। यह देखने आयी हूँ कि जिस सुंदरी से विवाह रचाने के लिए ये तत्पर हैं, वह आखिर है कौन?'' व्यंग्य-भरे स्वर में उसने कहा।
राजा एक निर्णय पर आया और गंधर्व को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘ठीक है, खेल शुरू करेंगे। परंतु एक शर्त है। शतरंज के इस खेल में हार-जीत किसी की भी हो, उससे मुझे या मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को हानि पहुँचनी नहीं चाहिये। क्या आपको यह स्वीकार है?''
गंधर्व ने एक बार अपनी पत्नी को देखा और शरनिधि से कहा, ‘‘मैं समझ गया हूँ कि आप क्या सोच रहे हैं। वचन देता हूँ, आपको कोई हानि नहीं पहुँचाऊँगा।''
जैसे ही खेल शुरू हुआ, गंधर्व बीच-बीच में अपनी पत्नी को तिरछी नज़र से देखता रहा। गंधर्व की पत्नी ने परोक्ष रूप से खेल में शरनिधि की सहायता की। गंधर्व की हार हुई।

खिन्न गंधर्व जब शरनिधि को यौवन प्रदान करने के उद्देश्य से मंत्रोच्चारण करने ही जा रहा था, तब राजा ने कहा, ‘‘मुझे किसी भी प्रकार का यौवन नहीं चाहिये।''
वेताल ने कहानी सुनायी और कहा, ‘‘राजन् शरनिधि के व्यवहार में कोई अनजानी संदिग्धता, चपलता दिखायी देती है। राजा शतरंज में हारे या जीते, उसे ही लाभ पहुँचे, ऐसा आश्वासन गंधर्व ने उसे दिया और यह शरनिधि का भाग्य ही कहा जा सकता है। परंतु जब बाजी जीत गया, उसने यौवन अपनाने से इनकार कर दिया। क्या यह उसकी मूर्खता नहीं? अगर राजा खेल में हार जाता तो उसे अपनी पुत्रियों में से किसी एक से गंधर्व का विवाह करना पड़ता। मेरे इन संदेहों के उत्तर जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े को जायेंगे।''
विक्रमार्क ने वेताल के संदेहों को दूर करने के उद्देश्य से कहा, ‘‘यह सच है कि राजा शरनिधि मानव सहज दुर्बलता का शिकार था। उसे इस बात की खुशी थी कि हारने पर या जीतने पर उसी का लाभ होगा। परंतु, खेल को शुरू करने के पहले ही गंधर्व समीर की पत्नी ने अपने पति की मनोकामना के रहस्य को खोल दिया। अब शरनिधि ताड़ गया कि अगर वह बाजी हार जाता और अपनी पुत्रियों में से किसी एक से गंधर्व का विवाह करना पड़ता तो कितना बड़ा अनर्थ हो जाता। उसी प्रकार वह यह भी जान गया कि गंधर्व के वरदान के बल पर उसे यौवन प्राप्त हो जाता तो भविष्य में कितनी बड़ी-बड़ी समस्याओं का सामना उसे करना पड़ता। वह कुशाग्र बुद्धि का था, इसलिए आनेवाले संकट को वह भांप पाया। अगर वह अपनी पुत्रियों की उम्र का हो जाए तो वे भला उसे अपना पिता कैसे मानेंगीं? उसी प्रकार उसकी महारानी अधेड उम्र की हो और वह युवा तो क्या जगहँसाई नहीं होगी? अतः शरनिधि ने जो निर्णय लिया, उसमें न कोई संदिग्धता है, न ही कोई मूर्खता। इसमें तो उसकी बुद्धिमानी ही दृष्टिगोचर होती है।
राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित गायब हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा।
(शांतकुमार की रचना के आधार पर)






पहरेदार भूत

धुन का पक्का विक्रमार्क फिर से पेड़ के पास गया। पेड़ पर से शव को उतारा और उसे अपने कंधे पर डाल लिया। फिर यथावत् वह श्मशान की ओर बढ़ता गया। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन्, तुम्हारा हठ बहुत प्रशंसनीय है। अपने लक्ष्य में अब तक तुम्हें सफलता नहीं मिली, फिर भी डटे हुए हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि साधु-संन्यासियों को दिये गये अपने बचन को निभाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हो। उनके बोलने की पद्धति बड़ी ही निगूढ़ और मर्मगर्भित होती है। उदाहरणस्वरूप मैं तुम्हें विदय की कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जो पहरेदार भूत के रूप में परिवर्तित हो गया। थकावट दूर करते हुए ध्यान से उसकी कहानी सुनो।'' फिर वेताल विदय की कहानी यों सुनाने लगाः

बहुत पहले की बात है। सुधन एक व्यापारी था और देश-विदेश में घूमकर उसने अपार धन कमाया था। उसका अपना एक छोटा-सा धनागार था। उसकी पत्नी के रिश्तेदार विदय को उसके पहरे की जिम्मेदारी सौंपी गयी।
सुधन, विदय की गतिविधियों को जानने के लिए उसके काम-काजों पर नज़र रखता था। पर विदय को इसकी बिल्कुल जानकारी नहीं थी, इसलिए वह हर दिन कुछ सोना और अशर्फियाँ घर ले जाया करता था।
सुधन ने यह बात पत्नी सुमति से बतायी। उसने तुरंत विदय को बुलाना चाहा और खरी-खोटी सुनाना चाहा। पर, ऐसा करने से रोकते हुए सुधन ने पत्नी से कहा, ‘‘मुझे तो इस बात का दुख है कि जिसका हमने विश्वास किया, उसी ने हमें धोखा दिया। उसकी चोरी से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। सही समय पर मैं उसे पकड़ कर पाठ सिखाऊँगा।''
सुमति ने इसपर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ‘‘पहरेदार पर पहरा देने से अच्छा यह होगा कि हम खुद अपने धनागार पर पहरा दें।''
सुधन ने हँसते हुए कहा, ‘‘पूरे धनागार पर पहरा देना बहुत बड़ा काम है। वह काम विदय संभाल रहा है। पर एक विदय पर ही पहरा देना छोटा काम है। वह काम मैं कर रहा हूँ। हमें नुक़सान बहुत ही कम मात्रा में पहुँच रहा है, पर वह जो काम कर रहा है, वह अवश्य ही ग़लत है। विदय को यह समझने में थोड़ा समय लगेगा।''
देखते-देखते विदय ने जो संपत्ति लूटी, वह दो गागर भर की हो गयी। उसने उन गागरों को पिछवाडे में जमीन के अंदर गाड़ दिया। कुछ दिनों के बाद सुधन ने, विदय को बुलवाया और उससे कहा, ‘‘मैं तुमपर नज़र रखता आ रहा हूँ। धनागार पर पहरा देने के लिए मैंने तुम्हें नियुक्त किया। पर तुमने विश्वासधात किया और तुमने खुद चोरी की। मेरी संपदा को गागरों में भरकर उन्हें अपने घर के पिछवाड़े में ज़मीन के अंदर छिपाया। कहो, तुम्हारी क्या क़ैफियत है?''
विदय घबरा गया। वह सुधन के पैरों पर गिर कर गिड़गिडाते हुए कहने लगा, ‘‘हाँ, मुझसे बड़ी भूल हो गयी। आगे से ऐसी ग़लती नहीं करूँगा। मुझे माफ़ कर दीजिये।'' उसने कसम खाते हुए कहा।

सुधन ने कहा, ‘‘तुम मेरी पत्नी के रिश्तेदार हो, इसलिए तुम्हें माफ़ कर देता हूँ। साथ ही, वह संपत्ति तुम्हें दे भी देता हूँ। बशर्ते कि तुम अपनी क़ाबिलियत साबित करो। अन्यथा मैं तुम्हें पुलिस के सुपुर्द कर दूँगा।''
विदय ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘आप महान हैं। बताइये कि अपनी काबिलियत साबित करने के लिए मुझे क्या करना होगा।''
सुधन ने फ़ौरन कहा, ‘‘तुमने मेरी जिस संपदा की चोरी की, एक हफ़्ते के अंदर तुम्हारी जानकारी के बिना उस संपदा की चोरी मैं स्वयं करूँगा। पहरेदार होने के नाते मुझे रोको और अपनी काबिलियत साबित करो।''
विदय ने अपनी पत्नी से यह विषय सविस्तार बताया। वह खुश होती हुई बोली, ‘‘इसके लिए हमें भगवान की सहायता चाहिये। हमारे गाँव की सरहदों पर जो पहाड़ी गुफ़ाएँ हैं, उनमें से आख़िरी गुफा में एक महिमावान साधु रहते हैं। आप उनसे मिलिये और सहायता मांगिये।''
विदय साधु से मिला और पूरा विषय बताया। साधु ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें अभिमंत्रित भस्म देता हूँ। इस भस्म को जहाँ छिड़कोगे, वहाँ छिपाकर रखी गयी संपदा को एक सप्ताह तक कोई छू भी नहीं सकता। सुधन से भी यह काम नहीं हो सकता। लेकिन, वह संपदा सुधन की अपनी है, जिसे लेने से तुम उसे रोक रहे हो। यह पाप है। इस से तुम्हारा अनिष्ट हो सकता है। फिर भी क्या यह काम करना चाहते हो?''
विदय पाप का भार अपने ऊपर लेने को तैयार हो गया और वैसा ही किया, जैसा साधु ने कहा था। भस्म के प्रभाव के कारण सुधन उस संपदा को अपना नहीं पाया। एक सप्ताह के बाद अपने दिये वचन के अनुसार उसे मानना ही पड़ा कि यह संपदा विदय की है। इसपर विदय को बेहद खुशी हुई। पर दूसरे ही क्षण उसका बदन जलने लगा। भयभीत होकर वह दौड़ा-दौड़ा साधु के पास गया।

साधु ने कहा, ‘‘सुधन अच्छा आदमी है। उसे धोखा देकर तुमने उसकी संपत्ति की चोरी की । अपनी संपत्ति को लेने से उसे रोकने के लिए मेरा दिया भस्म छिडका। यह पाप है और वही पाप तुम्हारे शरीर को जला रहा है। इस पीडा को जीवन भर तुम्हें सहना ही पड़ेगा। अथवा, तुम्हें भूत बनना पडेगा और उस संपत्ति पर पहरा देना होगा, जिससे वह किसी दूसरे के हाथ न लगे। किसी भी हालत में यह राज़ अपनी पत्नी से भी छिपाकर रखना होगा।''
शारीरिक पीडा को सह न सकने के कारण विदय साधु की सहायता से भूत में बदल गया। अपने विकृत रूप से दुखी होकर उसने साधु से पूछा, ‘‘स्वामी, कब तक मुझे इसी रूप में रहना होगा?''
‘‘सुधन ने जो संपदा तुम्हें दी, उसे तुम वेतन मानते हो तो जितने साल तुम्हें काम करना होगा, उतने सालों तक तुम भूत बनकर ही रहोगे।'' साधु ने कहा।
विदय ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘इसका मतलब यह हुआ कि सौ सालों तक मुझे काम करना होगा। इसके पहले ही मुक्त होने का क्या कोई उपाय नहीं?''
‘‘अगर तुम्हारा भाग्य चमका और कोई एक और पहरेदार भूत तुम्हें ढूँढ़ता हुआ आये तो तुम्हें मुक्ति मिलेगी।'' यह कहकर साधु ने विदय को वहाँ से भेज दिया।
यों, विदय सुधन की दी हुई सम्पत्ति का पहरेदार बना। उसकी पत्नी और संतान को मालूम नहीं हो पाया कि विदय पर क्या गुज़रा । जब उन्होंने जमीन के अंदर गाड़ी गगरियों को बाहर निकालने की कोशिश की, तब भूत प्रकट हुआ और उन्हें डराया-धमकाया। उन्हें मालूम नहीं था कि यह भूत, स्वयं विदय ही है । डर के मारे उन्होंने गाँव छोड़ दिया और कहीं चले गये। सुधन ने सोचा कि विदय पत्नी समेत संपत्ति लेकर कहीं चला गया।
यों कुछ साल बीत गये। अब विदय के घर में देवनाथ नामक एक व्यक्ति परिवार सहित रहने लगा। वह अव्वल दर्जे का कंजूस था। उसकी एक बेटी और एक बेटा थे। वह बेटी की शादी के पक्ष में नहीं था, क्योंकि उसका धन खर्च हो जायेगा। उसकी बेटी की शादी उसके मामाओं ने करवायी। पिता के स्वभाव से नाराज़ होकर उसका बेटा घर छोड़कर चला गया। बेटे के दुख में और उसकी बीमारी का इलाज न कराने के कारण उसकी पत्नी भी मर गयी।

पर, देवनाथ को इसका कोई दुख नहीं था। एक दिन पडोसियों ने सत्यनारायण पूजा कराने के बाद देवनाथ को भी आम के दो फल दिये। आम के वे फल बड़े ही स्वादिष्ट थे। उसमें आशा जगी कि इन फलों की गुठलियों को ज़मीन में गाड़ दूँ तो वे देखते-देखते बड़े पेड़ हो जायेंगे और उनके मीठे फल मैं खा सकूँगा। पिछवाडे में जाकर कुदाल से ज़मीन को वह खोदने लगा तो खन्-खन् की आवाज़ हुई। उसने और गहरा खोदा तो वहाँ दो गगरियाँ मिलीं । वह उन गगरियों को बाहर निकालने ही वाला था कि उस गड्ढे से धुआँ निकला जो एक बड़े भूत के रूप में परिवर्तित होकर कहने लगा, ‘‘अरे नीच, इन गगरियों में जो भी संपदा है, उसका मैं पहरेदार हूँ। एक क्षण भी यहाँ रुके तो तुम्हें मार डालूँगा।''
देवनाथ भूत को देखकर पहले तो डर गया, पर जब उसने सुना कि उन गगरियों में संपदा है तो धीरज बाँध कर उसने कहा, ‘‘यह घर मेरा है। यह पिछवाडा मेरा है। यहाँ जो भी निधियाँ हैं, मेरी हैं। मुझे रोकनेवाले तुम कौन होते हो?''
भूत ठठाकर हँस पड़ा और मौन रह गया। देवनाथ ने कुदाल अपने हाथ में लेकर ऊपर उठाया तो वह उसके हाथों से फिसल गया। इतने में देखते-देखते वह गढ्ढा भी भर गया। देवनाथ को अपनी असहायता का एहसास हुआ और उसने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘ऐ भूतनाथ, मेरी तीव्र इच्छा इन गगरियों का मालिक बनने की है। इसके लिए मुझे क्या करना होगा?''
भूत ने, देवनाथ से अपनी कहानी बतायी और कहा, ‘‘यहाँ की संपत्ति किसी और पहरेदार भूत को ही मिल सकती है।'' फिर उसने गुफ़ा में रहनेवाले साधु के बारे में बताया। देवनाथ दौड़ा-दौड़ा साधु के पास गया और अपनी इच्छा जाहिर की। उसकी ओर आश्चर्य-भरे नेत्रों से देखते हुए साधु ने शांत स्वर में कहा, ‘‘बेटे, अब तक मुझमें यह संदेह बना हुआ था कि तुम जैसे कंजूसों से दुनिया को क्या कोई लाभ है? पर अब उस संदेह की निवृत्ति हो गयी। ग़लती करनेवाले विदय जैसों को मुक्ति दिलानेवाले मानव रूप में आये तुम अवतार हो। तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी।''

साधु की बातों से बहुत ही संतुष्ट देवनाथ ने उन्हें साष्टांग नमस्कार किया। फिर लौटकर पूरा विषय भूत बने विदय से बताया। विदय मौन था, इसलिए इस मौक़े का फायदा उठाने के लिए बडे ही उत्साह से उसने कुदाल से खोदना शुरू किया। दोनों गगरियों को उसने बाहर निकाला। उनमें भरे रत्नों और अशर्फियाँ को देखकर वह पागल हो उठा और कहने लगा ‘‘ये सब मेरे हैं, मेरे ही हैं।'' वह कूदने लगा, नाचने लगा। देखते-देखते उसके प्राण-पखेरु उड़ गये।
दूसरे ही क्षण विदय को उसका रूप मिल गया और वह सामान्य मनुष्य बन गया। भूत बनकर गड्ढे के चारों ओर घूमते हुए देवनाथ को उसने एक बार देखा और वहाँ से चलता बना।
वेताल ने इस कहानी को सुनाने के बाद राजा विक्रमार्क से कहा, ‘‘राजन्, साधु की बातें क्या परस्पर विरोधी नहीं लगतीं? उन्होंने देवनाथ से कहा था कि तुम मानव रूप में जन्मे ‘‘अवतार'' हो। यह भी कहा था कि तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी। तो फिर देवनाथ क्यों मर गया? क्या साधु की बातों में कोई गूढ़ार्थ है? मेरे इन संदेहों के समाधान जानते हुए भी तुम चुप रहोगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे।''
विक्रमार्क ने उसके संदेहों को दूर करने के उद्देश्य से कहा, ‘‘देवनाथ ने अपनी पुत्री के विवाह के विषय में और पत्नी के विषय में जो व्यवहार किया, वह बड़ा ही निकृष्ट था। उससे उसकी कंजूसी स्पष्ट गोचर होती है। संपत्ति से भरी गगरियों को देखते ही उन्हें अपना बना लेने की तीव्र इच्छा उसमें जगी। स्वार्थ ने उसे अंधा बना डाला। वह समझ नहीं पाया कि पराये का धन विष के समान है। ऐसा लोभी व स्वार्थी भूत के समान है। उसके लोभ ने ही उसके प्राण हर लिये। उसकी कंजूसी तथा अमित स्वार्थ ने ही उसे पहरेदार भूत बनाया। चूँकि साधु की दृष्टि में लोभी मानव मरे आदमी के बराबर है, इसलिए पिछवाडे में छिपायी गयी संपत्ति का वही योग्य रक्षक है। इसी कारण उन्होंने कहा भी था कि तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी। साधु की बातों में कोई वैविध्य है ही नहीं।''
राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित अदृश्य हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा।
(आधारः सुभद्रा देवी की रचना)





दो सुंदरियाँ

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास गया; पेड़ पर से शव को उतारा और उसे अपने कंधे पर डाल लिया। फिर यथावत् वह निधड़क श्मशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘आधी रात का समय है। बादल गरज रहे हैं। बिजली कड़क रही है। भूत-प्रेत अट्टहास कर रहे हैं। फिर भी बिना डरे आगे बढ़े जा रहे हो। लक्ष्यहीन होकर तुम्हारा यह जाना मेरी दृष्टि में अनुचित है। तुम्हें मैं सदा सावधान करता आ रहा हूँ। तुमसे कहता आ रहा हूँ कि तुम एक महान राजा हो। राजा के कुछ निश्चित कर्तव्य भी होते हैं। पर इन कर्तव्यों को भुलाकर तुम भटक रहे हो। यह कदापि तुम्हें शोभा नहीं देता। समझ लो, तुमने कार्य साध भी लिया हो तो इसका क्या भरोसा कि इसका फल तुम चखोगे। मेरी आशंका है कि वह फल तुम किसी के सुपुर्द कर दोगे और फिर से खाली हाथ लौटोगे। तुम्हें सावधान करने के लिए मैं तुम्हें युवराज जयंत की कहानी सुनाऊँगा, जिसने फल तो पाया, पर उसे मानसिक चंचलता के वश होकर खो दिया, हाथ से फिसल जाने दिया। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे साथ भी ऐसा हो।'' फिर वेताल जयंत की कहानी यों सुनाने लगाः

चंद्रगिरि का महाराज बालिग़ हो गया। उसके विवाह की उम्र हो गयी। उसकी तीव्र इच्छा थी कि वह ऐसी कन्या से शादी करे, जिसे वह चाहता है। उसके माता-पिता ने कितने ही रिश्ते सुझाये, पर उसने सबसे इनकार कर किया। जयंत एक दिन शाम को टहलने के बाद जब घर लौटा, तब उसकी माँ ने उसे एक सुंदर कन्या का चित्र दिखाते हुए कहा, ‘‘यह प्रतापगढ़ की राजकुमारी है। वह राजा की इकलौती पुत्री है। मेरी भाभी के मायके के लोगों को यह कन्या बहुत अच्छी लगी है। उनका मानना है कि यह सब प्रकार से तुम्हारे लिए योग्य पत्नी है।''
जयंत ने उस चित्र को ठीक तरह से बिना देखे ही कह दिया, ‘‘यह कन्या मुझे बिलकुल अच्छी नहीं लगी।'' यों कहकर वह वहाँ से चलता बना।
उस रात को जयंत बहुत देर तक सो नहीं पाया। उसे लगा कि राजभवन में ही रहूँ तो मनपसंद कन्या को चुनना असंभव है। अच्छा यही होगा कि राज्य भर में घूमूँ और सुंदर व योग्य कन्या को चुनूँ। यह सोचकर बनकर वह उसी समय घोड़े पर सवार होकर निकल पड़ा।
सूर्योदय होते-होते, वह एक घने जंगल के पहाड़ी क्षेत्र में पहुँचा। वहाँ पर्वत पर से एक मनोहर प्रपात नीचे के पत्थरों पर गिर रहा था। उस प्रपात से थोड़ी दूरी पर एक सुंदर कुटीर था। घोड़े से उतरकर वह उसी कुटीर की ओर गया।
उस कुटीर के आगे तरह-तरह के रंगबिरंगे पुष्पों के बीच में दो सुंदर कन्याएँ घूम रही थीं और पुष्प तोड़ रही थीं । जयंत ने आज तक ऐसी अपूर्व सुंदरियों को देखा नहींथा । उसने सोचा भी नहीं था कि ऐसी सुंदर कन्याएँ धरती पर हो भी सकती हैं।

जयंत उनके पास गया और बोला, ‘‘आप दोनों अपूर्व सुंदरियाँ हैं। परंतु, मैं क्या जान सकता हूँ, आप इस जंगल में क्यों रहती हैं?''
जयंत को देखकर पहले वे दोनों थोड़ी घबरायीं, पर अपने को संभालते हुए उन्होंने कहा, ‘‘कोई यह बता नहीं सकता कि सौंदर्य का क्या अर्थ होता है। सौंदर्य देखनेवालों के नयनों में होता है। हमारे पिताश्री महान ज्योतिषी हैं। उनका मानना है और उनका विश्वास भी है कि ऐसे सुंदर कुटीर में, ऐसे मनोहर वातावरण में, एक साल भर के लिए रह जाएँ तो हमारा भविष्य उज्ज्वल और सुनहरा होगा। इसीलिए उन्होंने हमारे निवास के लिए यह स्थान चुना। एक सामंत राजा के निमंत्रण पर वे कल उनके राज्य में गयेहैं ।''
वे सुंदरियाँ पूछें कि आप कौन हैं, इसके पहले ही जयंत ने कहा, ‘‘अपनी मनपसंद कन्या से विवाह रचने के लिए राजप्रासाद से चुपचाप चला आया हूँ। मैं नहीं चाहता कि इस विषय में मेरे माता-पिता हस्तक्षेप करें। तुम दोनों में से किसी से भी विवाह करने के लिए मैं तैयार हूँ। आपके पिताश्री के लौटते ही मैं उनसे बात करूँगा।''
जयंत को जो कहना था, उसने साफ़-साफ़ कह दिया। इसपर वे दोनों युवतियाँ चकित रह गयीं। उन दोनों ने आपस में बातें कर लीं और कहा, ‘‘हम दोनों जुड़वीं बहनें हैं। हमारे पिताश्री ने बहुत पहले ही कहा था कि हमारा विवाह किसी एक ही पुरुष से होगा।''
‘‘बिना किसी संकोच के मैं तुम दोनों से विवाह करने को तैयार हूँ। समझता हूँ कि यद्यपि तुम दोनों का रूप एक जैसा है, पर तुम्हारे गुण भिन्न-भिन्न होंगे। आप अब तक जान गयी होंगी कि मैं कौन हूँ। अपनी मनोदशाओं पर कृपया थोड़ा प्रकाश डालिये।'' बग़ल के पत्थर पर आसीन होते हुए जयंत ने कहा।
उसके इस प्रश्न पर दोनों युवतियों ने हँसते हुए कहा, ‘‘हम दोनों जिद्दी हैं, हठी हैं। हम दोनों अपने को एक-दूसरे से अधिक मानती हैं। यही नहीं, जो साधना चाहती हैं, साधकर ही शांत होती हैं। इसके लिए हम कुछ भी करने के लिए सन्नद्ध रहती हैं। कोई भी त्याग करने को तैयार हो जाती हैं।''

‘‘अच्छा, यह बात है!'' फिर जयंत ने एक क्षण के बाद पूछा, ‘‘साफ़-साफ़ बता दीजिये कि मेरे बारे में आप दोनों की क्या राय है?''
दोनों युवतियों ने आपस में बातें कर लीं और कहा, ‘‘पिताश्री बहुत पहले ही हमसे कह चुके हैं कि बड़ा ही बुद्धिशाली और विवेकी ही तुम दोनों का पति बनेगा। हमारे नाम हैं, मंदार और चंपा। क्या आप बता सकते हैं कि हममें से कौन मंदार है और कौन चंपा?''
थोड़ी देर तक सोचने के बाद जयंत बता सका कि उनमें से कौन मंदार है और कौन चम्पा। दोनों युवतियाँ यह सुनकर आश्चर्य में डूब गयीं और पूछा, ‘‘आप यह कैसे बता सके?''
जयंत ने कहा, ‘‘आप दोनों जुड़वी हैं। एक ही प्रकार की रूपरेखाएँ हैं। एक के शरीर का रंग गुलाबी है और दूसरे का हरा। मैं समझता हूँ कि शरीर के रंग के आधार पर आसानी से पहचानने के लिए एक का नाम मंदार और दूसरे का नाम चंपा रखा गया है। यह मेरी कल्पना मात्र भीहो सकती है ।''
‘‘हमारी उम्र में भी कुछ क्षणों का फर्क है। क्या आप बता सकते हैं, हममें से कौन बड़ी और कौन छोटी है?'' सुंदरियों ने पूछा।
जयंत ने एक क्षण रुक कर कहा, ‘‘इसके लिए मुझे शाम तक समय दीजिये।'' दोनों ने स्वीकृति दे दी।
शाम को मंदार और चंपा ने केले के पत्तों में दो सब्जियाँ, दो चटनियाँ और खीर सहित जयंत को स्वादिष्ट खाना खिलाया। भोजन कर चुकने के बाद जयंत ने उनसे बताया, ‘‘तुममें से मंदार बड़ी है और चंपा छोटी।''
‘‘वाह, आपने बिलकुल ठीक कहा। इस निर्णय पर कैसे आ पाये?'' मंदार ने पूछा।
‘‘साधारणतया उम्र में बड़ी ही रसोई व घर का काम संभालती हैं। छोटी घर के इधर-उधर का काम संभालती हैं। मंदार ने रसोई बनायी, चंपा ने पत्ता डालकर भोजन परोसा। मैंने इसपर ध्यान दिया और आसानी से जान गया कि तुममें कौन बड़ी हो और कौन छोटी।'' जयंत ने कहा।
मंदार और चंपा थोड़ी दूर हटकर आपस में बातें कीं और पास आकर जयंत से कहा, ‘‘हम मानती हैं कि तुम बुद्धिमान हो और तुममें तार्किक विश्लेषण की अद्भुत शक्ति है। क्या तुममें हम दोनों के पालन-पोषण की आर्थिक शक्ति है?''

जयंत इसपर ठठाकर हँस पड़ा और बताया कि वह कौन है। फिर पूछा, ‘‘कोई और शंका हो तो पूछ लीजिये।''
इसपर मंदार ने फ़ौरन कहा, ‘‘जन्म-पत्री के अनुसार हमारा विवाह एक ही व्यक्ति से होगा और हम दोनों एक ही दिन पुत्र को जन्म देंगी। परंतु छोटी चंपा के बेटे का जन्म कुछ क्षणों के पहले होगा और मेरा बेटा कुछ क्षणों के बाद। ऐसी स्थिति में, हममें से किसके पुत्र को आप राजा घोषित करेंगे?''
जयंत ने कहा, ‘‘इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए मुझे थोड़ा सा समय चाहिये।'' ‘‘ठीक है। रात को सोच लीजियेगा और सवेरे अपना निर्णय सुनाइयेगा।'' दोनों बहनों ने एक साथ कहा।
उस रात को जयंत के सोने के लिए एक कमरे का प्रबंध किया गया। दूसरे दिन प्रातःकाल मंदार और चंपा के पिता लौट आये। मंदार ने, पिता को सविस्तार पूरा विषय बताया तो चंपा ने जयंत के कमरे में झांककर देखा। वहाँ जयंत नहीं था।
वह लौटी और उनसे कहा, ‘‘कमरे में वे नहीं हैं। होनेवाले राजा को हमने एक दिन का आतिथ्य दिया, यही संतृप्ति हमारे लिए बच गयी।''
इस घटना के कुछ दिनों के बाद जयंत का विवाह उसके माता-पिता द्वारा चयनित कन्या से संपन्न हुआ।
वेताल ने यह कहानी सुनायी और कहा, ‘‘राजन्, सुंदरियाँ मंदार और चंपा के साथ जयंत की व्यवहार शैली अमर्यादित और अशोभनीय लगती है। वह भावी पत्नी को चुनने के लिए दृढ़ निश्चय के साथ निकला। उससे विवाह करने के लिए दो सुंदरियाँ सन्नद्ध भी हुईं। फिर भी, उसने उनका तिरस्कार किया और माता-पिता से चयनित कन्या से विवाह रचाया। उसका यह निर्णय क्या अनुचित नहीं था? उसकी आशा फलीभूत हुई, पर मानसिक चंचलता के वश में आकर उसने कुछ और ही किया। उसकी यह भूल और मानसिक चंचलता नहीं तो और क्या है?"

‘‘मेरे इन संदेहों के समाधान जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।''
विक्रमार्क ने कहा, ‘‘मंदार और चंपा ने, जयंत के सामर्थ्य तथा उसके तार्किक ज्ञान को जानने के लिए ही कुछ जटिल सवाल पूछे। उन दोनों ने जो प्रश्न पूछे और अपने बारे में उन्होंने जो-जो बढ़ा-चढ़ाकर कहा, उनसे जयंत जान गया कि उनमें अहंभाव, हठ, जिद, आवश्यकता से अधिक हैं। साथ ही उनकी बातों से उसे यह भी मालूम हो गया कि वे अपनी इच्छा को किसी भी हालत में पूरी करनेवालियों में से हैं।
‘‘उनका वह स्वभाव स्त्रियों के लिए कदापि उचित नहीं। इस सत्य को जयंत जान गया। अगर ऐसी स्त्रियाँ उसकी रानियाँ बनेंगी तो अवश्य ही अपने पुत्र को ही राजा बनाने के लिए जिद करेंगी और गंभीर समस्या खड़ी कर देंगी। इससे न ही अंतःपुर में शांति होगी और न ही राज्य सुरक्षित रहेगा। राजा के लिए अपनी इच्छाओं की पूर्ति से भी अधिक आवश्यक व महत्वपूर्ण हैं, देश की सुरक्षा, प्रजा का सुख-संतोष। इनपर बखूबी सोचने के बाद माता-पिता से चयनित कन्या से विवाह करना ही उसने उचित और न्याय- संगत समझा।
‘‘इससे उसकी विवेचन शक्ति व परिशीलन ज्ञान स्पष्ट गोचर होते हैं। इसमें मानसिक चंचलता का कोई सवाल ही नहीं उठता।''
राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित गायब हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा।
- के. सुचित्रा देवी की रचना के आधार पर





राजा-चोर

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः उस प्राचीन वृक्ष के पास गया। वृक्ष पर से शव को उतारा। उसे अपने कंधे पर डाल लिया और यथावत् श्मशान की ओर अग्रसर होने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन्, तुम्हारा कठोर परिश्रम देखते हुए अत्यंत आश्चर्य होता है। मुझे लगता है कि किसी के हाथों तुम्हारा अप्रत्याशित अपमान हुआ है और उस अपमान से अपने को बचाने या उसे छिपाने की कोशिश में लगे हुए हो। हम देखते आ रहे हैं कि मनुष्य अच्छा करने के उद्देश्य से कोई काम हाथ में लेता है। पर परिस्थितियाँ उसे साथ नहीं देतीं। उल्टे उस काम से उसे हानि पहुँचती है। वह यह नहीं चाहता कि किसी दूसरों का यह मालूम हो, क्योंकि वह जगहँसाई से बहुत डरता है। इसके लिए वह आवश्यकता से अधिक सावधानी बरतता है। सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा यह प्रवृत्ति समाज में बड़े माने जानेवाले लोगों में अधिकाधिक पायी जाती है। उदाहरणस्वरूप राजा सुनील की कहानी तुम्हें सुनाने जा रहा हूँ, जो एक चोर से ठगा गया। वह यह नहीं चाहता था कि यह विषय किसी और को मालूम हो। इसलिए जब चोर पकड़ा गया तब उसने उसे दंड नहीं दिया, उल्टे उसे माफ़ कर दिया। राजा होकर उसे ऐसा करना नहीं चाहिये था। उस राजा सुनील की कहानी अपनी थकावट दूर करते हुए ध्यानपूर्वक सुनो।'' फिर वेताल राजा सुनील की कहानी यों सुनाने लगाः

राजा सुधीरवर्मा का पुत्र सुनील, दयानंद मुनि के गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त कर रहा था। उसने बहुत ही जल्दी सभी विद्याओं में भरपूर ज्ञान प्राप्त किया। एक दिन सुनील को बुलवाकर दयानंद मुनि ने उससे कहा, ‘‘तुमने विद्यार्जन के प्रति पर्याप्त आसक्ति दर्शायी और निरंतर परिश्रम किया। इसके कारण कम समय में ही सब विद्याओं में पारंगत हो पाये। अब तुम्हें गुरुकुल में रहकर और शिक्षा प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। हर मानव के लिए विद्या नयनद्वय की तरह है। शासनकाल में यह तुम्हारे लिए इतोधिक उपयोगी सिद्ध होगी। अधिकारीगण विवेकपूर्ण निर्णय लेते हैं, जिनसे लोग बहुत बड़ी संख्या में लाभ उठाते हैं। अतः शासकों के लिए विद्या बहुत आवश्यक व उपयोगी है। समस्त विद्याओं का ही परमार्थ नहीं बल्कि मानव जन्म का भी परमार्थ है, परोपकार। इस परम सत्य को सपने में भी न भुलाना। वही मेरे लिए सच्ची गुरुदक्षिणा होगी।'' कहते हुए मुनि ने सुनील को आशीर्वाद दिया।
सुनील ने भक्तिपूर्वक गुरु को प्रणाम किया। गुरुकुल की समग्र वृद्धि के लिए पिता ने जो भेंट भेजी उसे गुरु समर्पित किया और राजधानी निकल पड़ा।
विद्या शोभा से सुशोभित पूर्णचंद्र की तरह लौटे अपने पुत्र को देखकर राजा सुधीर वर्मा बहुत आनंदित हुए। मंत्रियों व राजगुरु से परामर्श करने के बाद उन्होंने अपने पुत्र का राज्याभिषेक वैभवपूर्वक किया।
पिता के सुयोग्य पुत्र की तरह सुनील ने बड़ी ही दक्षता के साथ शासन चलाया। गुरुकुल से निकलते समय गुरु ने जो बातें कहीं, वे सदा उसके कानों में गूँजती रहीं। इसलिए वह अक्सर बहुरूपिया बनकर देश में घूमता रहता था और प्रजा की समस्याओं से स्वयं परिचित होता था। वह इन समस्याओं के समाधान भी ढूँढ़ निकालता था। विपत्तियों में फंसे लोगों की सहायता करने में उसे अपार आनंद मिलता था।

एक दिन वह वस्त्र व्यापारी के वेष में देश में घूमने निकला। राजधानी से थोड़ी ही दूरी पर प्रवाहित हो रही नदी के उस पार के अरण्य प्रदेश में जब वह एक गाँव के निकट पहुँच रहा था तब उसे अकस्मात् एक आर्तनाद सुनायी पड़ा, ‘‘मेरे बच्चे को बचाइये, मेरे बच्चे को बचाइये''। उस आर्तनाद को सुनकर वह मुड़ा।
मुड़ने पर उसने देखा कि एक आदमी एक उजड़े कुएँ के बाहर खड़ा है और गिडगिडा रहा है, ‘‘महाशय, मेरा बेटा कुएँ में गिर गया। मैं अपाहिज हूँ। कुएँ में उतर नहीं सकता। मेरे बेटे को बचाइये। कृपया बचा लीजिये।'' दीन स्वर में गिडगिडाने लगा।
बहुरूपये सुनील ने कपडों की गठरी ज़मीन पर रख दी और कुएँ के अंदर झांकते हुए उसमें कूद पड़ा। उसने पूरा कुआँ ढूँढ़ डाला, बहुत देर तक। पर बच्चा दिखायी नहीं पड़ा। जब वह कुएँ से बाहर आया तो वहाँ न ही वह अपाहिज था और न ही उसके कपड़ों की गठरी थी। राजा को अब यह समझने में देर नहीं लगी कि उसके साथ धोखा हुआ है। वह उदास होकर राजधानी लौटा।
दस दिन बीत गये। ग्यारहवें दिन जब राजा सुनील दरबार में सिंहासन पर आसीन था तब सैनिक एक चोर को वहाँ ले आये, जिसके हाथों में हथकड़ियॉं लगी थीं।
राजा ने उसे ग़ौर से देखा। सैनिकों से उसने पूछा कि इसने क्या अपराध किया?
‘‘प्रभु, आभूषणों के व्यापारी पुण्यगुप्त के घर में सेंघ लगाते समय यह पकड़ा गया।'' सैनिकों ने कहा।
थोड़ी देर तक सोचने के बाद राजा ने कहा, ‘‘ठीक है, आज रात तक उसे जेल में ही रखना। कल सज़ा सुनाऊँगा।''
सैनिक उसे खींचते हुए ले गये और जेल में बंद कर दिया।
उस दिन आधी रात को राजा वस्त्र व्यापारी के वेष में जेल के अंदर गये। और सोते हुए चोर को जगाया।
चोर घबराता हुआ जागा और व्यापारी को देखकर आश्र्चर्य भरे स्वर में पूछा, ‘‘तुम यहाँ कैसे आये? क्या तुम भी चोर हो?''

राजा ने अपनी दाढ़ी निकाली, पगड़ी उतारी तो चोर उसे देखकर हक्का-बक्का रह गया। वह भय के मारे थरथर कांपते हुए कहने लगा, ‘‘क्षमा कीजिये, प्रभु! आपको चकमा देकर आपके कपड़ों की गठरी चुरा ली। भविष्य में कभी भी ऐसा काम नहीं करूँगा। मेरी रक्षा कीजिये।'' कहता हुआ वह राजा के पैरों पर गिर पड़ा।
‘‘अपराधी को दंड भुगतना ही पड़ेगा। व्यापारी के घर में सेंघ लगाकर तुमने अपराध किया और इस अपराध के लिए तुम्हें दंड भुगतना ही होगा। मुझे धोखा दिया है, इस अपराध के लिए मैं तुम्हें कोई सजा नहीं दूँगा। परंतु हाँ, वादा करो कि कुएँ के बाहर जो घटना घटी, उसके बारे में तुम किसी से कुछ नहीं कहोगे। मेरी शर्त तुम्हें मंजूर है?'' राजा ने पूछा।
‘‘हाँ, ऐसा ही करूँगा प्रभु।'' कहते हुए चोर ने राजा के पैरों का स्पर्श किया। राजा जेल के बाहर आया।
दूसरे दिन, सैनिक चोर को राजा के सामने ले आये। सभासद् राजा का फैसला सुनने के लिए उत्कंठित थे।
राजा ने चोर से पूछा, ‘‘आभूषणों के व्यापारी पुण्यगुप्त के घर में तुमने सेंघ लगायी?''
‘‘हाँ प्रभु'', चोर ने सिर झुकाकर कहा।
‘‘क्या यह तुम्हारी पहली चोरी है या चोरी करना ही तुम्हारा पेशा है? राजा ने पूछा।
‘‘चोरी करना मेरा पेशा नहीं है प्रभु। जैसे ही पढ़ाई पूरी हुई, दुर्भाग्यवश मुझपर चोरी का इलजाम मढा गया। जिसे मैंने नहीं कीथी । मुझे सज़ा भी दी गयी। मुझपर चोर की छाप लग गयी। जीविका के लिए बहुत घूमा-फिरा। मुझे चोर समझकर कोई भी मुझे काम देने के लिए तैयार नहीं था। मैं जीना नहीं चाहता था। जीवन से मुझे विरक्ति हो गयी। मरने के लिए जंगल गया। पर मरने का साहस मुझमें नहीं था। भूख से तडपता हुआ एक कुएँ के किनारे बैठा रहा। तभी वहाँ आये एक पुण्यात्मा के कपडों की और आहार पदार्थों से भरी गठरी की चोरी चालाकी से की। उन आहार पदार्थों को खाकर पेट भर लिया। तब से मुझे लगने लगा कि चोरी करके आराम से जिन्दगी काट सकूँगा। मुझे लगा कि यह कोई ज़रूरी नहीं है कि ज़िन्दगी गुजारने के लिए काम किया जाए। उस दिन ले लेकर मैं छोटी-मोटी चोरियाँ करने लगा। कल व्यापारी के घर में सेंघ लगाते हुए पकड़ा गया।'' आंसू बहाते हुए चोर ने बताया।

‘‘अगर तुम्हें जीने का कोई रास्ता मिल जाए तो क्या चोरियाँ करना छोड़ दोगे?'' राजा ने पूछा।
‘‘जन्म भर चोरियाँ करूँगा ही नहीं प्रभु'', आंसू पोंछते हुए चोर ने कहा। ‘‘इन दस दिनों में तुमने जिन-जिन लोगों की भी जो चोरी की, उन्हें उनको लौटा दो और उनसे माफ़ी मांगो। तब तक सैनिक तुम्हारे ही साथ रहेंगे। इसके बाद किसी रोज़गार का इंतज़ाम मैं कर दूँगा।'' राजा ने आश्वासन दिया।
उस फैसले को सुनकर सभी सभासदों ने तालियाँ बजायीं।
‘‘आपकी आज्ञा शिरोधार्य है प्रभु,'' कहता हुआ चोर सैनिकों के पीछे-पीछे गया।
राजा सुनील ने गुरु की बातों का स्मरण करते हुए तृप्ति के साथ सिर हिलाया।
वेताल ने कहानी समाप्त की और राजा से पूछा, ‘‘राजन्, एक तरफ़ राजा कहते रहे कि अपराधी को अवश्य दंड मिलना चाहिये और दूसरी तरफ़ चोर के अपराध को माफ़ कर दिया। यह क्या आपको अस्वाभाविक व विचित्र नहीं लगता? क्या इससे यह साफ़ नहीं हो जाता कि अगर चोर असली राज़ खोल दे तो अपमानित होने के भय से राजा ने उस धोखेबाज़ चोर को माफ़ कर दिया और उसे रोज़गार दिलाने का आश्वासन भी दिया।
‘‘जिस चोर के हाथों राजा खुद ठगा गया, उसे माफ़ करना क्या न्यायसंगत है? क्या यह न्याय व धर्म कहलायेगा? इससे क्या देश में अपराधों की संख्या में तीव्र वृद्धि नहीं होगी? मेरे इन संदेहों के समाधान जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े -टुकड़े हो जायेंगे।''

राजा विक्रमार्क ने कहा, ‘‘जो अपराधी है, उसे निस्संदेह दंड भुगतना ही पड़ेगा। परंतु हमें इस तथ्य को भुलाना नहीं चाहिये कि दंड का उद्देश्य अपराधी में परिवर्तन ले आना है। हमें मालूम हो जाता है कि जेल में चोर ने राजा को पहचाना, उसमें परिवर्तन का क्रम शुरू हो गया। चोर होते हुए भी उसने जो भी कहा, राजा ने उसका विश्वास किया, क्योंकि चोर को अपनी ग़लतियों पर पछतावा होने लगा। उसमें अपने को सुधारने की तीव्र इच्छा जगने लगी। राजा का यह कर्तव्य बनता है कि चोरी के मूल कारणों को वह जाने और उन कारणों को मिटा दे,जिससे चोर को चोरी करने का अवसर ही नहीं मिले। इसी सत्य को दृष्टि में रखते हुए आदर्श शासक सुनील ने चोर को सुधरने का मौक़ा दिया। अब रही, राजा के चोर से ठगे जाने की बात को राज़ ही रखने की बात। उन्होंने इस डर से चोर से यह नहीं कहा कि इससे उसकी जगहँसाई होगी या उसका अपमान होगा, निरादर होगा। वे चाहते थे कि परोपकार के बारे में गुरु ने जो कहा, उसका पूरा-पूरा पालन वे केवल स्वयं ही न करें बल्कि उनके देश के नागरिक भी करें। इसके पीछे उनका आशय यही था। ऐसी स्थिति में राजा का स्वयं परोपकार करते हुए ठगे जाने की बात लोगों को मालूम हो जाए तो जनता में परोपकार के प्रति विश्वास नहीं रह जायेगा। ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो, इसी उदात्त आशय से प्रेरित होकर राजा ने चोर के सामने शर्त रखी कि वह उस विषय को गुप्त ही रखे।''
राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित ग़ायब होकर फिर से पेड़ पर जा बैठा ।
(आधार ‘मंजु भारती' की रचना)





अपराध रहित नगर

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास गया; पेड़ पर से शव को उतारा, उसे अपने कंधे पर डाल लिया और यथावत् श्मशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन्, मैं नहीं जानता कि तुम किस संकल्प को पूरा करने के लिए आधी रात को इस प्रकार कष्ट झेलते जा रहे हो। एक विषय अच्छी तरह से याद रखना, जब समय साथ नहीं देता तब बड़े संयम के साथ लिये जानेवाले निर्णय भी निरर्थक साबित होते हैं। उस दौरान विवेक संपन्न व्यक्ति भी जो निर्णय लेते हैं, वे अपने साथ-साथ अपनों को भी कष्ट में डाल देते हैं। मैं नहीं चाहता कि तुम ऐसी ग़लती कर बैठो। इसीलिए तुम्हें सावधान करने के लिए मनोहरी नामक एक युवती की कहानी सुनाऊँगा। ध्यानपूर्वक सुनना।'' फिर वेताल मनोहरी की कहानी यों सुनाने लगा:

मातंग देश के जयपुर नामक एक छोटे से नगर में शमनक नामक एक ईमानदार व्यापारी रहता था। सुशीला उसकी पत्नी थी, मनोहरी उसकी पुत्री और कौशिक व चैतन्य उसके पुत्र थे।
मणिपुर नामक एक बड़ा नगर इस नगर से थोड़ी दूरी पर ही था। उस नगर का पालक था, सुमंत। वह संतानहीन था, इसलिए दूर के रिश्तेदार शमनक के बेटे चैतन्य को गोद लेना चाहताथा । शमनक और सुशीला अपनी संतान को बेहद चाहते थे । इसलिए उन्होंने सुमंत के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। सुमंत उनके इस निर्णय पर नाराज़ तो हुआ, पर अपनी नाराज़ी को प्रकट होने नहीं दिया।
एक बार मणिपुर के मंदिर में श्रीरामनवमी के उत्सव बहुत बड़े पैमाने पर संपन्न हुए। शमनक पत्नी और संतान सहित उन्हें देखने वहाँ आये। सुमंत ने उनका आदर सत्कार किया और उन्हें अपने ही घर में ठहराकर सभी सुविधाओं का प्रबंध किया। इसे सही मौक़ा समझकर सुमंत ने फिर से चैतन्य को गोद लेने की बात उठायी। पर शमनक ने फिर इनकार कर दिया। इस पर सुमंत नाराज़ हो उठा और उनपर चोरी का अपराध थोपकर उन्हें राज्य-बहिष्कार की सज़ा दी।
शमनक पत्नी और संतान सहित बदरिकारण्य पहुँचा और वहीं एक आश्रम का निर्माण करके रहने लगा। कंद, मूल, फल खाते हुए वे अपना जीवन यापन करने लगे। वे उसके आदी भी हो गये। बच्चों को यह जीवन बिलकुल अच्छा नहीं लगा और कभी-कभी शिकायत भी करने लगे। तब शमनक ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘‘शकुनि ने पांडवों को द्यूत में हराया। पांडव जानते थे कि उनके साथ अन्याय हुआ फिर भी शर्त्त के मुताबिक वे जंगल गये और अज्ञातवास का भी पालन किया। इसके बाद उन्होंने युद्ध में कौरवों को हराया और राज्य हस्तगत किया। किसी भी विषय में समय का प्रमुख स्थान है। जब तक हमारे लिए अच्छे दिन नहीं आते, तब तक हम लोगों को यहीं रहना होगा।''
नौ साल बीत गये। शमनक के बच्चे बड़े हुए। बालिग मनोहरी के सौंदर्य को देख उसके माता-पिता उसके विवाह की चिन्ता करने लगे।

ऐसी स्थिति में मातंग देश का नया राजा माणिक्यवर्मा शिकार करने जंगल आया। वह एक हिरण का पीछा करते हुए भटक गया। प्यास के मारे वह एक सरोवर ढूँढ़ रहा था तो उसने अचानक मनोहरी को देखा। उसके अद्भुत सौंदर्य को वह देखता ही रह गया। अपनी प्यास को भी भुलाकर उसने मनोहरी से कहा, ‘‘सुंदरी, मैं मातंग का राजा माणिक्यवर्मा हूँ। शिकार करने आया और भटक गया। तुम्हारे अद्भुत सौंदर्य को देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया हूँ। तुम्हें स्वीकार हो तो मैं तुमसे विवाह करने को तैयार हूँ।''
मनोहरी ने लज्जा के मारे सिर झुकाते हुए कहा, ‘‘राजन्, मेरे पिता ही मेरे लिए सब कुछ हैं। उनकी अनुमति के बिना मैं कोई निर्णय नहीं लेती। मेरा नाम मनोहरी है। पास ही हमारा आश्रम है। वहाँ आकर मेरे पिता से बात कीजिये।'' वह राजा को अपने आश्रम में ले आयी।
माणिक्यवर्मा ने, शमनक से अपने मन की बात बताई और उन सबको अपने राज्य में आने का निमंत्रण दिया।
शमनक घर के अंदर गया और यह विषय पत्नी और अपनी संतान से बताया। उसने उनसे कहा, ‘‘अगर उन्हें मालूम हो जाए कि हम राज्य बहिष्कार की सज़ा भुगत रहे हैं तो पता नहीं, ये उस नगरपालक के अन्याय का विरोध करेंगे या नहीं। उस स्थिति में हो सकता है, ये मनोहरी से विवाह नहीं करें। मनोहरी से विवाह हो जाए तो यह हमारा भाग्य होगा। मनोहरी राजा से विवाह करे और महारानी बने, यह मेरी तीव्र इच्छा है। इसलिए अभी बहिष्कार की बात उनसे छिपायेंगे। समय आने पर सुमंत की पोल खोलेंगे और इस अरण्यवास से बाहर निकलेंगे।''
मनोहरी ने इसपर आपत्ति उठायी और कहा, ‘‘यहाँ आप सब कष्ट सहते रहें और वहाँ मैं रानी बनकर सुख भोगूँ, यह नहीं हो सकता।''
माँ सुशीला ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम अपनी जिद पर डटी रहोगी तो हम जंगल में ही रह जायेंगे और कष्ट झेलते रहेंगे। जहाँ तक अरण्यवास की बात है, केवल तुम्हारे भाई ही असंतुष्ट हैं, हमें यहाँ रहने में कोई आपत्ति नहीं। अतः तुम अपने भाइयों को भी अपने साथ ले जाना और मौक़ा मिलने पर इस समस्या का परिष्कार करना।''

मनोहरी को माँ की बात सही लगी।
शमनक घर से बाहर आया और माणिक्यवर्मा से कहा, ‘‘राजन्, इस विवाह के लिए हम अपनी सहमति देते हैं। पर, अभी मैं और मेरी पत्नी आपके साथ नहीं आ सकते । हम इस अरण्य को छोड़ नहीं सकते। कुछ समय तक हम यहीं रहेंगे। मेरे पुत्र कौशिक, चैतन्य मेरी पुत्री मनोहरी के साथ जायेंगे।''
राजा ने अपनी सहमति दी। कौशिक, चैतन्य तुरंत फूल तोड़कर ले आये और सुशीला ने उनसे मालाएँ बनायीं। वर-वधू ने एक-दूसरे को मालाएँ पहनाईं । पत्नी और सालों को लेकर राजा राजधानी के लिए निकल पड़े।
अंतःपुर पहुँचने के बाद माणिक्यवर्मा ने मनोहरी से कहा, ‘‘अब से तुम्हारी बात मेरे लिए शिलासन के समान है । जो भी तुम माँगोगी, तुम्हें दूँगा। असाध्य को भी साध्य बनाकर अपने प्रेम को प्रमाणित करूँगा ।'' ‘न' के भाव में सिर हिलाते हुए मनोहरी ने कहा, ‘‘मैं गरीब हूँ। पढ़ा भी बहुत ही कम है। शिलासन जैसी इच्छा प्रकट करने की योग्यता मैं नहीं रखती।''
माणिक्यवर्मा ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे माता-पिता ने राज सुखों का त्याग किया। तुमने मेरे वरदान का त्याग किया। तुम सबके व्यक्तित्व महान हैं, इसलिए तुम लोग दरिद्र हो ही नहीं सकते। अब रही पढ़ाई की बात। वह कभी भी सीखी जा सकती है।'' उसने तुरंत सालों को राजोचित विद्याएँ सिखाने के लिए समर्थ गुरुओं को नियुक्त किया। मनोहरी को राजनीति तथा राज मर्यादाएँ सिखाने के लिए श्रीवाणी नामक विदुषी की नियुक्ति की।
बहन और भाई गुरुओं के प्रति श्रद्धा-भक्ति दिखाते हुए और शिक्षा के प्रति रुचि दर्शाते हुए छे ही महीनों में कितने ही विषयों में निष्णात बने। यह सुनकर माणिक्यवर्मा ने हर्ष विभोर हो मनोहरी से कहा, ‘‘अब ही सही, अपनी इच्छा बताना। मेरे प्रेम को साबित करने के लिए एक मौक़ा दो।''
‘‘मेरे भाई नगरपालक बनें, यह मेरी इच्छा है। परंतु, इसके पहले वे किसी उत्तम नगरपालक से आवश्यक शिक्षा पायें और तभी उन्हें वे पद मिलें।'' मनोहरी ने यों अपनी इच्छा प्रकट की।


माणिक्यवर्मा ने खूब सोच-विचार कर कहा, ‘‘नगरपालक समर्थ हो तो नगर में अपराध कम होंगे। इसका यह मतलब हुआ कि जिस नगर में अपराधों की संख्या कम होती है, उसका नगर पालक उत्तम है।''
मनोहरी ने फ़ौरन कहा, ‘‘यह बात सच है, परंतु किसी नगर में छोटे-मोटे अपराध ज़्यादा हो सकते हैं। किसी और नगर में बहुत ही खतरनाक एक ही हत्या हो सकती है। अतः अपराधी की संख्या की तुलना में, उनका स्तर प्रधान है। इसकी जानकारी पाने के लिए दंड ही सूचक हैं। जिस नगर में आजीवन कारावास, राज्य बहिष्कार, मौत की सज़ा कम अमल में लाये जाते हैं, उसी नगर का नगरपालक उत्तम माना जा सकता है। इसके लिए, पिछले दस सालों से जो दंड अमल में लाये गये, उनकी जानकारी पानी होगी।''
माणिक्यवर्मा को मनोहरी का सुझाया उपाय सही लगा। उसने सब नगरों को समाचार भिजवाया कि पिछले दस सालों में जिस-जिस नगर में जो-जो दंड अमल में लाये गये हैं, उनका विवरण उसे भेजा जाए। यह जानकर हर नगर पालक में यह आशा जगी कि माणिक्यवर्मा इन विवरणों पर पूरा ध्यान देंगे और उसे उत्तम पालक घोषित करेंगे। इसके लिए उन्होंने कारावास जैसे कई दंड रद्द किये। अपराधों से संबंधित पुराने चिट्टों में परिवर्तन किये और नये चिट्टे लिखवाये।
मणिपुर के नगरपालक सुमंत ने तो गुप्तचरों के द्वारा अन्य नगरों के विवरण मँगवाये। अपने चिट्टे में दर्ज करवाया कि अन्य नगरों की तुलना में उसके नगर में कम अपराध हुए हैं। दर्ज हुए विवरणों के अनुसार पिछले दस सालों में आजीवन कारावास, राज्य बहिष्कार, मृत्यु दंड एक भी बार हुए नहीं।
सभी नगरों से माणिक्यवर्मा को चिट्टे मिले। उनके परिशीलन के बाद उसने कहा, ‘‘इन्हें पढ़ने के बाद मालूम हुआ कि सब नगरपालकों में से नरेंद्र अधम है और सुमंत उत्तम है। तुम्हारे भाइयों को आवश्यक शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हें सुमंत के पास भेजूँगा।''
‘‘ऐसा मत कीजिये प्रभु। मेरे भाइयों को नरेंद्र के पास भेजिये। मेरे माता-पिता जो अब जंगल में हैं उन्हें सादर राजधानी ले आने का गौरव सुमंत को दीजिये।'' मनोहरी की विनती माणिक्यवर्मा ने मान ली।

वेताल ने मनोहरी की कहानी सुनायी और अपने संदेह व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘राजन, जब कि सभी नगरपालकों में से नरेंद्र अधम नगरपालक है, तो अपने भाइयों को प्रशिक्षण प्राप्त करने उसी के पास भेजने का मनोहरी का निर्णय कहाँ तक समुचित है? उसके माँ-बाप को राज्य बहिष्कार का दंड दिया है सुमंत ने। ऐसी स्थिति में इससे क्या रहस्य खुल नहीं जायेगा? इससे मनोहरी के परिवार को हानि नहीं होगी? जान-बूझकर विपत्ति मोल लेनी नहीं होगी? मेरे इन संदेहों के उत्तर जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।''
विक्रमार्क ने कहा, ‘‘अपने नगर में जो अपराध हो रहे हैं, या हुए हैं, उनका पूरा व सही विवरण प्रस्तुत किया है नरेंद्र ने। वही एकमात्र ईमानदार नगरपालक है। शेष सभी धोखेबाज हैं। सुमंत के चिट्टे को पढ़ते ही अक्लमंद मनोहरी को सच मालूम हो गया। नगरपालन के लिए ईमानदार नगरपालकों से शिक्षा प्राप्त करने में ही अच्छाई होगी। इसीलिए उसने अपने भाइयों को नरेंद्र के पास भेजने के लिए ही इच्छा प्रकट की। सुमंत ने जो चिट्टा भेजा, उसमें उसके माता-पिता के राज्य बहिष्कार का दण्ड दर्ज नहीं हुआ था । इसका यह मतलब हुआ कि उसने उसके माता-पिता के साथ अन्याय किया। या यह साबित हो जाता है कि उसने चिट्टा बदल दिया। यह रहस्य खुल जाए तो उसका अपराध भी आप ही आप साबित हो जायेगा। बदनामी होगी तो सुमंत की। तद्वारा उसने माता-पिता को जंगल से सादर ले आने का भार सुमंत पर ड़ाला। एक अहंकारी अधिकारी को इससे बड़ा दंड व अपमान क्या हो सकता है? साथ ही यह निस्संदेह अन्य अधिकारियों के लिए चेतावनी भी होगी। ऐसा निर्णय लेकर उसने अपने अधिकार का दुरुपयोग नहीं किया पर साथ ही प्रतिकार भी लिया। तद्वारा उसने माँ-बाप को मुक्ति दिलायी और देश का कल्याण भी किया। मनोहरी सच्चे अर्थों में विवेकवती है।''
राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित ग़ायब हो गया और फिर से पेड पर जा बैठा।
(आधार सुभद्रा की रचना)




छोटापन

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास गया; पेड़ पर से शव को उतारा; उसे कंधे पर डाल लिया और यथावत् श्मशान की ओर जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कि किससे बदला लेने के लिए आधी रात को इस भयानक श्मशान में घूम-फिर रहे हो और यों परिश्रम कर रहे हो। परंतु देखा गया है कि कुछ लोग आवेश में आकर बदला लेने पर तुल जाते हैं और जब आवेश ठंडा पड़ जाता है, तब वे उसे भुला देते हैं। मैं जानता हूँ कि तुम उस व्यक्ति की तरह नहीं हो लोगों ने जिसका मज़ाक उड़ाया, जिसकी अवहेलना की, उनके बीच रहना जिसे पसंद नहीं, इसलिए उसने गाँव छोड़ दिया, पर फिर कुछ समय के बाद उन्हीं के बीच रहने का उसने निर्णय किया। एक ऐसे ही व्यक्ति अकाल की कहानी सुनाने जा रहा हूँ। थकावट दूर करते हुए उसकी कहानी सुनो।'' फिर वेताल उसकी कहानी यों सुनाने लगाः

सभ्य समाज से दूर अन्नवर नामक एक सुदूर गाँव में अकाल रहता था। कृषि ही उस गाँव के निवासियों का जीवनाधार था। वे अलग ही प्रकार की विचित्र फसलें उगाते थे। सवेरे से लेकर शाम तक वे कड़ी मेहनत करते थे। पास ही के पहाड़ों से वे कंद मूल फल इकठ्ठा करते थे और खाते थे।
उनका मानना था कि उनके स्वस्थ होने का यही कारण है। उनका यह दावा भी था कि इन्हीं फसलों के कारण उनकी शारीरिक स्थिति इतनी अच्छी है। इस गाँव भर में अकाल ही एक ऐसा व्यक्ति था, जिसे ये फसलें और ये खाद्य पदार्थ बिलकुल पसंद नहींथे ।
अकाल को बचपन से ही पढ़ना-लिखना बहुत पसंद था। इनमें उसकी पर्याप्त अभिरुचि थी। मंदिर के पुजारी से श्लोक आदि सीखता था। मंदिर में सुरक्षित ताल पत्रों को पढ़ते हुए समय बिताता था। अकाल ऐसा तो नाटा नहीं था, पर अन्य ग्रमीणों के सामने वह बिलकुल छोटा दिखता था।
हमेशा किसी सोच में पड़ा रहता था और उसके संदेह बड़े ही विचित्र होते थे। कोई अगर पूछे कि क्यों यों बेकार बैठे रहते हो तो वह कहता रहता था कि अगर आदमी खाने के लिए ही ज़िन्दा रहे तो मनुष्य में और पशु में फर्क ही क्या है।
ऐसी कई विद्याएँ हैं, जिन्हें मनुष्य को सीखना चाहिये। कुछ लोग उसे देखते ही हँस पड़ते थे। कुछ और लोग उसका मज़ाक उड़ाते थे। अकाल कुछ समय तक चुपचाप यह सहता रहा, पर जब वह अठारह साल का हो गया, तब उसने पिता से साफ़-साफ़ कह दिया कि मुझे इस गाँव में नहीं रहना है।
तब पिता ने हँसते हुए कहा, ‘‘गाँव बदलकर कहीं और जाने से कोई फायदा नहीं, बदलना है तुम्हें अपने आपको ।''
‘‘यहाँ के सब लोग साधारण जीवन बिता रहे हैं। अगर मैं इनके समान बन जाऊँ तो मैं सामान्य मनुष्य में बदल जाऊँगा, जो मुझे पसंद नहीं। मैं दंडकारण्य के गुरु भुजंग के गुरुकुल में विद्याभ्यास करूँगा और लौटकर गाँव को ही बदल डालूँगा। तब जाकर ग्रमीणों की प्रशंसा पाऊँगा।''

यों कहकर अकाल गाँव छोड़कर चला गया। चार दिनों के बाद जब वह दंडकारण्य के समीप पहुँचा, तब उसे एक रथ पीछे से आता दिखाई पड़ा ।
रथसारथी ने अकाल से बातें कीं और विषय जानकर कहा, ‘‘महाराज ने गुरुवर भुजंग को तुरंत ले आने का हुक्म दिया है। उन्हीं के यहाँ जा रहा हूँ, रथ में चढ़ जाओ, मैं तुम्हें वहाँ पहुँचा दूँगा।''
गुरुकुल पहुँचने के बाद अकाल भुजंग से मिला और उसने अपना आशय बताया। उन्होंने कहा, ‘‘तुम जंबकारण्य जाओ और विनय के गुरुकुल में विद्याभ्यास करो। मेरा शिष्य बनना हो तो कम से कम दो सालों तक वहाँ तुम्हें शिक्षा पानी होगी।''
‘‘गुरुवर, लगता है कि मेरी योग्यता पर आपको शक है। आप किसी भी प्रकार की परीक्षा ले लीजिये, मैं अपनी योग्यता साबित करने के लिए सन्नद्ध हूँ। बिना परीक्षा लिये मुझे जंबकारण्य जाने की आज्ञा मत दीजिये।'' अकाल ने विनती की।
भुजंग ने कहा, ‘‘मुझे अभी राजधानी जाने के लिए निकलना है। लौटने में एक सप्ताह लग जायेगा। इतने में इन दोनों ग्रंथों को अच्छी तरह से पढ़ना, उनके सार को बखूबी समझना और मेरे लौटने के बाद मुझे बताना। तुमसे अगर यह नहीं हो सकता तो विनय के पास चले जाना।'' कहते हुए उन्होंने उसे वे दोनों ग्रंथ दिये और राजधानी जाने के लिए निकल पड़े।
भुजंग के जाते ही गुरुकुल के शिष्य उसके पास आ गये और कहने लगे, ‘‘दो सालों से हम इन ग्रंथों का पठन करते आ रहे हैं। पूछने पर गुरुजी हमारे संदेहों को दूर करते आ रहे हैं, पर अब तक हम इनका सार समझ नहीं पाये। एक हफ्ते भर में इनका सार जान लेना तुम्हारे लिए असंभव है।''
‘‘ठीक है। मैं इसे एक चुनौती मानकर स्वीकार करता हूँ और अपनी योग्यता साबित करके दिखाऊँगा,'' अकाल ने कहा। इसके बाद अकाल ने उन ग्रंथों को ध्यान से पढ़ा और चार ही दिनों के अंदर उनके सार को लिख लिया।
फिर शिष्यों को उसे दिखाया। पर, बिना पढ़े ही उन्होंने उसके आत्मविश्वास को अहंभाव समझा और उसकी खिल्ली उड़ायी। अकाल ने उनकी बातों की परवाह नहीं की और दृढ़ स्वर में कहा, अपना मज़ाक उड़ाया जाना और उसे सह लेना मेरे लिए कोई नयी बात नहीं है।


मुझे समझने में तुम लोग और मेरे गाँव के लोग एक समान लगते हैं। परंतु हाँ, तुम दोनों में फर्क इतना ही है कि वे अनपढ़ हैं और तुम महापंडित भुजंग के शिष्य हो।'' भुजंग राजधानी से लौट आये और अकाल को अपने ही गुरुकुल में पाकर चकित हुए।
ग्रंथों के उससे लिखित सार को पढ़ा और कहा, ‘‘पुत्र, तुम सचमुच ही महान हो। महापंडित भी जिन ग्रंथों के सार को समझने में असमर्थ साबित हुए, तुमने उन ग्रंथों के सार को बड़ी ही आसानी से समझ लिया। तुम्हें अपना शिष्य कहते हुए मुझे गर्व हो रहा है। यह मेरे पूर्व जन्म का पुण्य फल है।'' बहुत ही प्रसन्न होते हुए भुजंग ने कहा।
अकाल ने पूछा, ‘‘गुरुवर, क्या आप सच कह रहे हैं या मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं।'' संदेह-भरे स्वर में उसने पूछा। ‘‘सच ही कह रहा हूँ। सही समय पर तुम मेरे पास आये।'' कहते हुए उन्होंने वह सब बताया, जो राजधानी में हुआ। राजमाता अचानक बीमार पड़ गयीं।
रोग के लक्षण राजवैद्यों की भी समझ में नहीं आये। तब राजस्थान के एक कवि ने अपने पास सुरक्षित एक प्राचीन काव्य का जिक्र किया। उसकी नायिका भी उसी रोग से पीड़ित थी, जिस रोग से राजमाता पीड़ित हैं। वैद्यों ने उस रोग की दवा बतायी, जिसे तीन महीनों के अंदर ले आना था ।
धीरोदत्त नायक अथक परिश्रम के बाद उस दवा को ले आने में सफल हुआ और नायिका की रक्षा की। कवि, पंडित व वैद्यों ने उस ग्रंथ को खूब पढ़ा, पर वे उस काव्य में निर्दिष्ट दवा से संबंधित विवरणों को समझ नहीं पाये। राजा ने गुरु को ख़बर भेजी।
तत्संबंधी विवरण उनकी समझ में नहीं आये। यह कहकर वे गुरुकुल लौट आये कि वहाँ जाकर इस ग्रंथ का अध्ययन करूँगा और फिर इस विषय में प्रयत्न करूँगा। वे अपने साथ उस ग्रंथ को भी ले आये। अब अकाल की प्रतिभा को देखने के बाद उनमें विश्वास जगा।
अकाल ने उस काव्य को पढ़ा और कहा, ‘‘गुरुवर, इसमें हर पद का संबंध संगीत, साहित्य, नृत्य व वैद्य शास्त्र से है। और इनके अर्थ अलग-अलग हैं। इसी कारण आप शायद घबरा गये होंगे। दवा से संबंधित पद में बताये गये जिंसों से कषाय को तैयार करना है और राजमाता को पिलाना है।


साथ ही, पद में बताये गये राग तालों से गाते हुए उसके यथायोग्य नृत्य का प्रदर्शन राजमाता को देखना है,'' उत्साह-भरे स्वर में अकाल ने कहा। भुजंग ने भी एक और बार उस पद को पढ़ा और समझ लिया कि उसका कहा सच है।
उसने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। अकाल ने एक और बार उस पद को पढ़ने के बाद कहा, ‘‘ये सारे जिंस हमारे गाँववाले उपजाते हैं।'' आश्चर्य-भरे स्वर में अकाल ने कहा। दूसरे ही दिन भुजंग और अकाल राजधानी गये। राजा ने सिपाहियों को भेजकर अन्नवर गाँव से दवा के लिए आवश्यक जिंस मंगाया।
अकाल के कहे अनुसार इलाज किया गया। अब राजमाता बिलकुल स्वस्थ हो गयीं। राजा ने अकाल का सत्कार किया। इसके बाद अकाल ने भुजंग के गुरुकुल में और दो सालों तक रहकर सभी शास्त्रों का गहरा अध्ययन किया। फिर देश भर में घूमते हुए उसने संगीत, साहित्य में प्रदर्शिनियाँ चलायीं, जिनका बड़े पैमाने पर जनता ने स्वागत किया।
इसके दो साल बाद वह स्वस्थल अन्नवर पहुँचा। वहाँ की प्रदर्शिनियों के बाद जब गाँववालों को मालूम हुआ कि अकाल अपने ही गाँव का है तो वे उससे मिले और बोले, ‘‘जैसे थे, वैसे ही हो। तुममें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इतना नाम कमाया, यह तुम्हारा भाग्य है।'' अकाल ने कहा, ‘‘आपका कहना है कि मुझमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ, जिसका यह मतलब हुआ कि आप अब भी बदले नहीं। आप लोगों को बदलने के लिए ही मैं यहाँ रह जाऊँगा।''


अकाल ने फिर से वही पुराना जीवन शुरू किया। उसके कामों, चेष्टाओं पर ग्रमीण अब भी पहले की ही तरह मज़ाक उड़ाते रहते हैं। पर वह उनकी परवाह नहीं करता। उनकी टिप्पणियों पर ध्यान नहीं देता। रोचक बातों व सुंदर कहानियों से वह बच्चों को आकर्षित करने लगा और उन्हें सुशिक्षित करने लगा।
उसने जो सीखा, जाना, उन्हें पढ़ाने लगा। वेताल ने अकाल की कहानी बतायी और फिर राजा विक्रमार्क से कहा, ‘‘राजन्, अकाल गाँववालों की अवहेलना और भर्त्सना सह नहीं पाया, इसलिए पिता के मना करने पर भी गाँव छोड़कर चला गया।
फिर उसी गाँव में लौटकर अवहेलनाओं के बीच रहने का निश्चय उसने क्यों किया? उसके मन की कोमलता देश भ्रमण के कारण क्या कठोर बन गयी? गाँववालों में परिवर्तन लाने के लिए वह गाँव से चला गया तो फिर खुद क्यों बदल गया?
मेरे इन संदेहों के समाधान जानते हुए भी नहीं बताओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।'' विक्रमार्क ने कहा, ‘‘अपने सामर्थ्य पर जब किसी को विश्वास नहीं होता तब वे दूसरों की प्रशंसा पाने के लिए लालायित होते हैं। अवहेलना और भर्त्सनाओं से डरते हैं।
दूसरे जब उनका मज़ाक उड़ाते हैं तब वे अपने को छोटा समझते हैं। जब उसकी प्रतिभा पहचानी जाती है तब वे दूसरों के अभिप्रायों की परवाह नहीं करते। जब अकाल की प्रतिभा पहचानी नहीं गयी तब वह मज़ाक उड़ानेवालों के सामने अपने को छोटा समझने लगा।
जब बड़ों ने उसकी प्रतिभा पहचानी तब वह उस स्थिति के पार हो गया। अब मज़ाक उड़ानेवालों पर उसे दया आने लगी, नाराज़ी नहीं। ग्रमीणों में परिवर्तन ले आने का लक्ष्य जैसा का तैसा बना रहा। उसे लगा कि बड़ों को परिवर्तित करने के बदले छोटों को उत्तम नागरिक बनाना सुलभ है।
इसीलिए उसने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और यों उसने अपने को योग्य और समर्थ साबित किया।'' राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित ग़ायब हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा।
(आधारः ‘‘वसुंधरा'' की रचना)