Thursday, June 30, 2011

दुख-दर्द अपने-अपने

सुकुमार और मनोहर मिर्जापुर के दिवान में काम करते थे। दोनों क्रमशः घने मित्र बन गये। हर शाम वे गोविंद की मिठाइयों की दुकान में आते रहते। कई कर्मचारी भी वहॉं खाते रहते थे। सुकुमार कुछ नहीं खाता था। किन्तु मनोहर कोई न कोई पकवान खरीद कर जरूर खाता था।
मनोहर, सुकुमार से अ़क्सर पूछा करता था, ‘‘तुम क्यों कभी भी कुछ नहीं खाते?'' सुकुमार कहता था, ‘‘सवेरे पेट भर खाके आता हूँ। दुपहर को भोजन कर लेता हूँ। भला, क्या खाऊँगा?''
‘‘तुम तो खुशनसीब हो। तुम्हारी पत्नी सवेरे ही रसोई बनाकर खिलाती है। मेरी पत्नी देरी से उठती है। इस बात पर अ़क्सर हममें विवाद होते रहते हैं,'' मनोहर ने कहा। सुकुमार कहता, ‘‘दुख-दर्द अपने-अपने।'' जब-जब सुकुमार यों कहता, तब-तब मनोहर को बहुत ताज्ज्ाुब होता था।
सुकुमार ने एक दिन मनोहर से कहा, ‘‘कल मेरा जन्म-दिन है। दिवान जाने के पहले मेरे घर आ जाना। एक साथ नाश्ता करेंगे और फिर वहॉं से दिवान जायेंगे।''
दूसरे दिन मनोहर, सुकुमार के घर आया। सुकुमार की पत्नी ने प्यार से उसका स्वागत किया और कहा, ‘‘बैठिये, नाश्ता ले आती हूँ। उसने वड़ा, पूरन पूड़ी दोनों को परोसा।
एक वड़ा को मुँह में रखते ही मनोहर भयभीत हो गया। वह कंकड़ की तरह सख्त था। उससे चबाया नहीं जा रहा था। पर, सुकुमार उन्हें आराम से खा रहा था।
खाने के बाद दोनों दिवान जाने निकल पड़े। रास्ते में सुकुमार ने मनोहर से पूछा, ‘‘नाश्ता कैसा रहा?'' मनोहर ने लंबी सांस खींचते हुए कहा, ‘‘अब समझ में आया कि तुम क्यों अ़क्सर कहते रहते हो - दुख-दर्द अपने-अपने।''


Buddhimati bahu

रामनाथपुरम के एक धनी व्यापारी ने अपने बेटे का नाम भाग्यनाथन इस आशा से रखा कि वह एक दिन उसके धन का वारिस बनेगा । लेकिन वह गोबर गणेश निकल गया। वह लड़का अपने दोस्तों के साथ बाहर जाकर हमेशा खेलता रहता, जो मुँह पर तो चिकनी-चुपड़ी बातें बनाते और पीठ पीछे उसे मूर्ख कहते।
व्यापारी का उदास और दुखी होना स्वाभाविक था। ‘‘यह आशा करना बेकार है कि भाग्य हमारे वृद्ध हो जाने तक कुछ बन पायेगा'', उसने एक दिन अपनी पत्नी से कहा।
‘‘लेकिन आपने भी तो व्यापार में उसकी रुचि पैदा करने का कोई कष्ट नहीं उठाया'', उसकी पत्नी ने जवाब दिया। रात्रि भोजन के समय व्यापारी ने अपने बेटे से कड़े शब्दों में कहा, ‘‘देख भाग्य, कल से तुम मेरे साथ दुकान पर जाओगे। मेर जीते जी व्यापार सीख लो ताके मेरे जाने के बाद इसे संभाल सको।''
दूसरे दिन भाग्य अपने पिता के साथ दुकान पर आ तो गया लेकिन अधिकांश समय नौकरों अथवा ग्रहकों से गप्प करने में लगा रहा। उसके अगले दिन दुकान पर बहुत भीड़ थी। भाग्य किसी के साथ चला गया और कुछ देर के बाद लौटा। तीसरे दिन भी वह बाहर चला गया और दिन भर वापस नहीं आया।
कुछ दिनों के बाद भाग्य की माँ एक प्रस्ताव लेकर आई, ‘‘हमलोग उसका विवाह कर देते हैं, तब वह दिन भर घर ही पर रहेगा और जिम्मेदार भी बन जायेगा।''
व्यापारी को आश्चर्य हुआ, लेकिन उसने यह मान लेने का निश्चय किया। ‘‘लेकिन उसे एक और मौका मिलना चाहिये, पर साथ में उसके लिए बहू भी ढूँढ़ते रहो,'' उसने कहा, ‘‘कल उसे तीन रुपये दे दो और कहो कि एक रुपये का कुछ लेकर खा ले, एक रुपया नदी में फेंक दे और बाकी एक रुपये से कुछ खाने, पीने, बोने और उपजाने तथा गाय के लिए खरीद ले।''

भाग्य को माँ से यह सुन कर आश्चर्य हुआ। फिर भी खाने के नाम पर वह खुश हो गया और तुरन्त सीधा बाजार चला गया। उसने एक रुपये का पकौड़ा लेकर खाया। अब उसे माँ के दूसरे आदेश का पालन करना था। वह पकौड़ा खाते-खाते नदी की ओर चल पड़ा। नदी किनारे पहुँच कर जेब से उसने एक रुपये का सिक्का निकाला और नदी की धारा में फेंकने के लिए हाथ उठाया। अचानक उसके हाथ रुक गये। क्या यह मूर्खता नहीं है? उसने सोचा। लेकिन यह माँ के आदेश के विपरीत होगा। वह एक शिला पर बैठ कर सोचने लगा।
अचानक उसे महसूस हुआ कि उसके निकट कोई खड़ा है। वह स्थानीय मन्दिर के पुजारी की बेटी भागीरथी थी। उसने देखा कि भाग्य किसी बात से चिन्तित है। ‘‘तुम नदी में छलांग लगाने के लिए तो नहीं सोच रहे हो न!'' उसने थोड़ी परेशानी से और थोड़ा मज़ाक से भाग्य से पूछा।
भागीरथी उसके दोस्त हरि की बहन थी। ‘‘नहीं भागीरथी, मैं यह सोच रहा हूँ कि इस सिक्के को नदी में फेंकू या नहीं!''
‘‘क्या तुम गंभीरतापूर्वक कह रहे हो?'' भागीरथी ने मुस्काते हुए कहा।
भाग्यनाथ ने तब उसे पूरी कहानी सुना दी। उसे ध्यानपूर्वक सुनने के बाद लड़की हँसी, ‘‘नहीं, सिक्का फेंको नहीं। माँ के कहने का तात्पर्य समझो। माँ चाहती हैं कि यह पैसा अपने ऊपर खर्च न करो और उन्हें वापस कर दो।''
‘‘और एक रुपये से पाँच-पाँच वस्तुएं कैसे खरीदूँ?'' भाग्य ने हास्यास्पद ढंग से भागीरथी से पूछा। भागीरथी जोर से हँस पड़ी, ‘‘तुम सचमुच भोंदू हो। तुम्हारी माँ के कहने का मतलब तरबूज से है; इसमें खाने और पीने के लिए भी है, इसका बीज बोने और उगाने के लिए है और छिलका गाय के लिए भोजन है!''
‘‘मैं तो यह नहीं समझ पाया था, भागीरथी'', भाग्य ने शिला पर से उठते हुए कहा।
‘‘आ जाओ, मैं तुम्हारे लिए एक अच्छा रसीला तरबूज खरीद दूँगी'', लड़की ने कहा।

बाद में जब भाग्य ने अपनी मॉं के हाथ में तरबूज लाकर दिया, तब वह खुशी से दौड़ी हुई पति के पास जाकर बोली, ‘‘देखो, देखो! हमारा भाग्य भोंदू नहीं है, अब वह चतुर हो गया है!''
‘‘उसे यहाँ बुलाओ'', व्यापारी ने आदेश दिया। उसने पूछा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि तुमने स्वयं तरबूज के बारे में कभी नहीं सोचा होगा। किसने तुम्हें यह सलाह दी?''
भाग्य ने सोचा कि मुझे ईमानदारी से पिता को सच बता देना चाहिये। ‘‘हरि की बहन भागीरथी ने'', उसने कहा।
‘‘ओह! हमारे पुजारी की बेटी! सचमुच उसकी बुद्धि प्रखर है। उसने और क्या सलाह दी?'' व्यापारी ने पूछा।
‘‘उसने नदी में एक रुपया फेंकने नहीं दिया। यह रहा एक रुपया!'' भाग्य ने जेब से सिक्का निकाल कर पिता को दे दिया।
भाग्य के जाने के बाद व्यापारी ने पत्नी से कहा, ‘‘भाग्य के लिए बहू मिल गई है।''
‘‘क्या पुजारी की बेटी?'' पत्नी ने पूछा मानो पति से अपनी बात की पुष्टि चाहती हो।
‘‘और कौन?'' व्यापारी ने कहा, ‘‘वह काफी चतुर और तीक्ष्ण-बुद्धि है। वह हमारे भाग्य की देखभाल कर लेगी।''
भाग्य के माता-पिता पुजारी और उसकी पत्नी से मिले जिन्होंने प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
विवाह के एक दिन बाद भाग्य दुकान पर जाना नहीं चाहता था। लेकिन भागीरथी ने जोर देकर उसे दुकान पर भेज दिया। लेकिन दुकान पर भाग्य का मन नहीं लगा। इसलिए उसके पिता ने उसे घर वापस जाने की स्वीकृति दे दी।
एक सप्ताह के बाद प्रथा के अनुसार भाग्य भागीरथी को अपने माता-पिता के घर छोड़ आया। दूसरे दिन वह पूरा दिन दुकान पर काम करता रहा। उसका पिता सन्तुष्ट था। उसने निश्चय किया कि भाग्य को अपनी योग्यता को प्रमाणित करने के लिए अवसर देना चाहिये।
दूसरे दिन व्यापारी ने दुकान में भाग्य को सलाह दी कि वह पड़ोसी शहर में जाकर गाँव में विक्रय के लिए सौदा खरीद लाये। साथ में रुपये और एक नौकर को भी ले जाये। वह रात को शहर में ठहर जाये और दूसरे दिन सुबह वापस आ जाये।

तदनुसार, दूसरे दिन भाग्य पैसे और एक नौकर को साथ लेकर घोड़ागाड़ी में शहर चल पड़ा। वे दोपहर के बाद देर से शहर पहुँचे। घोड़ागाड़ी को उन्होंने वापस भेज दिया। दोनों ने बाजार में घूम कर कुछ सौदा तय किया और दूसरे दिन मूल्य की अदायगी का वादा कर रात में ठहरने के लिए सराय ढूँढ़ने लगे। उन्हें एक सराय मिल गई जिसकी मालकिन एक युवा स्त्री थी।
भाग्य और उसके नौकर को खाना खिलाते समय सराय की मालकिन ने जूए का प्रस्ताव रखा। आखिर एक होनहार व्यापारी होने के नाते भाग्य कुछ अतिरिक्त धन प्राप्त करने की आकांक्षा रखे। एक मद्धिम प्रकाश में द्युत आरम्भ हुआ। महिला ने भाग्य को पहले दो खेलों में जीत जाने दिया और उसके अन्दर आत्म-विश्वास जगा दिया। अगला खेल महिला ले गई। चौथा खेल भाग्य जीत लेगा, ऐसा वह समझ रहा था कि तभी महिला की बिल्ली ने बत्ती को उलट दिया। महिला को बत्ती जलाने में कुछ समय लगा। किस्मत ने पल्टा खाया और महिला जीत गई। भाग्य के उतार-चढ़ाव के मध्य बिल्ली बार-बार दीपक को उलटती रही, हर बार बत्ती गुल होती रही और खेल महिला के पक्ष में खत्म होता रहा। भाग्य इस बात को याद न रख सका कि बिल्ली महिला के संकेत पर बत्ती को उलट देने के लिए प्रशिक्षित की गई है । भाग्य सर्वस्व हार जाने तक खेलता रहा।
दूसरे दिन सुबह महिला ने इस बात पर दबाव डाला कि नौकर गाँव जाकर उसका बकाया भरने भर पैसे ले आये और उसके लौटने तक भाग्य सराय के बाग और रसोई में उसकी मदद करे।
जब भाग्य दो दिनों तक गाँव नहीं लौटा तो उसके माता-पिता चिन्तित हो गये। नौकर तीसरे दिन भूखा-मरियल होकर घर पहुँचा।
तब तक भागीरथी भाग्य की प्रतीक्षा करने के बाद स्वयं ही ससुराल आ गई। उसने भी नौकर से भाग्य की कहानी सुनी और उसके साथ भाग्य को लाने के लिए शहर जाने को तैयार हो गई। उसने पुरुष वेश बना लिया।

शहर पहुँचने पर नौकर भागीरथी को सराय पर ले गया। भागीरथी ने नौकर को सराय से दूर हट कर गाड़ी में ही रहने को कहा।
भाग्य ने जैसा कि नौकर को बताया था कि कैसे महिला और उसकी पालतू बिल्ली ने उसे धोखा देकर हरा दिया, भागीरथी सावधानी बरतने के लिए अपने साथ एक चूहा ले आई थी। उसने सराय में एक कमरा लिया और महिला को सूचित किया कि वह द्युत में रुचि रखती है। सराय की मालकिन गुप्त रूप से धन कमाने की आशा से बहुत प्रसन्न हो गई।
खेल आरम्भ हुआ। और आगन्तुक (छद्मवेश में भागीरथी) महिला के लिए अधिक चतुर साबित होने लगा। पर भागीरथी सावधान थी। और जैसे ही महिला ने बिल्ली को संकेत भेजा, भागीरथी ने अपने वस्त्रों से चूहे को बाहर निकाल दिया।
बिल्ली चूहे के पीछे दौड़ी और महिला दावं हार गई। क्योंकि बिल्ली सहायता के लिए मौजूद न थी, महिला उसके बाद के सबी दावं हारती चली गई। भागीरथी ने शीघ्र ही दक्षतापूर्वक सिक्कों का एक छोटा-सा ढेर एकत्र कर लिया। भाग्यनाथन ने जो कुछ हारा था, इस प्रकार वापस आ गया।
दूसरे दिन प्रातः भागीरथी किसी बहाने गाड़ी के पास गई और नौकर को पैसे देकर महिला से भाग्य को मुक्त करा कर लाने के लिए कहा। सराय की मालकिन ने नौकर से पैसे लेकर भाग्य को छोड़ दिया और आगन्तुक से पैसे लेने के लिए प्रतीक्षा करने का निश्चय किया। भाग्य को गाड़ी में अपनी पत्नी को देख कर आश्चर्य हुआ। नौकर ने उसे बताया कि कैसे उसे मुक्त करने के लिए दोनों ने योजना बनाई। वे सब बाजार में गये और तय किये गये सौदों का मूल्य चुकाया। फिर वापस अपने गाँव के लिए चल पड़े।
उन्हें देख कर व्यापारी और उसकी पत्नी अति प्रसन्न हुए। भागीरथी से सारा विवरण सुनने के बाद व्यापारी ने एक ही टीका की, ‘‘भाग्य कभी नहीं बदलेगा, किन्तु हमारी सम्पति हमारी बहू के हाथों में सुरक्षित रहेगी।''


उन्निद्र पिशाचिनी

शिवपुर गाँव से थोड़ी दूरी पर एक जंगल हुआ करता था। उस जंगल के आरंभ में घने वृक्षों के बीच कुछ पिशाचिनियाँ वक्त गुज़ारती रहती थीं। किचकिच नामक पिशाचिनी वहाँ नयी-नयी आयी थी। उसे नींद ही नहीं आती थी। शेष पिशाचिनियाँ रात भर जाग करती थीं और दिन में घोड़े बेचकर सो जाती थीं। उसने अपना दुखड़ा किंकिणी पिशाचिनी को सुनाया।
तब किंकिणी ने उसे सलाह दी, ‘‘परेशान होने की कोई बात नहीं। सोने के लिए मेरे पास कई गुर हैं।'' फिर उसने एक गुर सुझाया। उसके मुताबिक किचकिच उल्टे लटकती रही और सोने की कोशिश की, पर कोई फायदा नहीं हुआ।
किचकिच उसके बताये अनेक उपायों को अमल में लाती रही। उसने पेड़ों के ऊपर आसमान में चक्कर लगाये। पेड़ की डालों पर झूलती रही। श्मशान घाटों पर जा-जाकर जलते मुर्दों के धुएं पीती रही। पर फिर भी उसे नींद नहीं आई। किंकिणी ने एक और गुर सुझाते हुए कहा, ‘‘दुखी मत होना। शिवपुर में रंगाचारी नामक बहुत बड़ा वैद्य है। मानव के रूप में जाओ और अपनी शिकायत उसे सुनाओ। पल भर में तुम्हारा रोग दूर हो जायेगा।''
किचकिच किसान का वेष धारण करके वैद्य के पास गयी। उसे देखते ही वैद्य ने कहा, ‘‘तुम्हारा चेहरा एकदम फीका है। बताना, तुम्हारी बीमारी आख़िर है क्या?'' किचकिच ने अपनी शिकायत सुनायी। उसने कहा, ‘‘बहुत कोशिश करने पर भी मैं सो नहीं पाती। आँखों में बहुत दर्द होता है और चक्कर आता रहता है।'' वैद्य ने दवा देकर उसे भेज दिया। पर इससे भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ। फिर उसने किंकिणी को अपना दुखड़ा सुनाया।

फिर उसने किंकिणी को अपना दुखड़ा सुनाया। किंकिणी पिशाचिनी ने कहा, ‘‘लगता है, तुम्हारी बीमारी बहुत ही अजीब है। और उपाय बताना मेरे बस की बात नहीं है।'' उसने कई अन्य पिशाचिनियों से अपना दुख बताया और उनकी सलाह माँगी। पर किसी का उपाय काम न आया।
किचकिच बहुत व्याकुल हो गयी। जब वह अपने पेड़ के पास आयी तब उसने देखा कि अधेड़ उम्र का एक आदमी मस्त सो रहा है। उसका मन ईर्ष्या से जल उठा और उसने एक सींक उसपर फेंक दी। उस आदमी ने आँखें खोलीं तो देखा कि एक पिशाचिनी उसके सामने खड़ी है। वह चौंककर उठ बैठा। वह एक क्षण भर के लिए डर गया। इसके बाद उसके हाव-भाव को देखकर संभल गया और बड़े ही प्यार से कहा, ‘‘ऐ दोस्त पिशाचिनी, मेरा नाम कन्हैया है। शिवपुर का निवासी हूँ। तुम बहुत ही दुखी लग रही हो। बताना, तुम्हारे कष्टों की क्या वजह है?'' हो सके तो मैं दूर करूँगा।''
किचकिच को लगा कि इस आदमी में उसके कष्टों को दूर करने की शक्ति है। तब उसने अपना कष्ट बताया। कन्हैया ने कहा, ‘‘कुछ दिनों के पहले मैं भी इसी प्रकार के कष्ट से गुज़रा। इस कष्ट से छुटकारा पाने के लिए मैं बहुत समय तक घूमता-फिरता रहा। कितने ही वैद्यों को अपना कष्ट बताया। उन्होंने जो भी दवाएँ दीं, खाता रहा। परंतु कोई फायदा नहीं हुआ। किन्तु अंत में एक संन्यासी के बताये उपाय ने कमाल कर दिखाया।


‘‘कहो कहो, वह उपाय क्या था?'' आतुरता-भरे स्वर में उसने पूछा। ‘‘दिन भर मैं गाता रहता था, रात में गाढ़ी नींद आती थी। पर गाँववाले मेरा गाना सह नहीं सके और मुझे उस गाँव से बाहर भेज दिया। आज रात को ज़ोर-ज़ोर से गाते रहना। फिर कल दिन भर मस्त सो सकती हो। तेरी क़सम, मैं सच कहता हूँ। जब तक तुम्हारा कष्ट दूर नहीं होगा, तब तक मैं यहीं रहूँगा।'' कन्हैया ने ज़ोर देते हुए कहा।
‘‘वैसा ही करूँगी, जैसा तुमने कहा।'' किचकिच ने खुश होते हुए कहा। जैसे ही सूर्यास्त हुआ और अंधेरा छा गया, किचकिच ज़ोर-ज़ोर से गाने लगी। वह गाना इतना कर्णकटु था कि कन्हैया से सहा नहीं गया। उससे बचकर जाने का मार्ग उसे दिखायी नहीं पड़ा तो वह घबरा गया। उसे उन ग्रमीणों की याद आयी, जिन्होंने उसका गाना न सहन कर सकने के कारण उसे गाँव से निकाल दियाथा । उसे लगा कि बदला लेने का यह अच्छा मौक़ा है। फिर उसने किचकिच से कहा, ‘‘तुम्हारा स्वर कितना मधुर है। अपने इस मधुर स्वर को शिवपुर के ग्रमीणों को सुनाना। पेड़ पत्तों को गाना सुनाने के बदले मनुष्यों को सुनाओगी तो फल दुगुना होगा।''
दूसरे ही क्षण, किचकिच हवा में उड़ती हुई शिवपुर पहुँची। अपना गला साफ़ करती हुई गाने लगी। उस आवाज़ को सुनकर ग्रमीणों को लगा कि कहीं बिजली गिरी है। वे तुरंत बाहर आये तो उन्होंने देखा कि एक पिशाचिनी हवा में उड़ती हुई गा रही है। भय के मारे वे घर के अंदर भागे और दरवाज़ा बंद कर लिया।

रात भर किचकिच गाती रही और गाँव भर में चक्कर काटती रही। सवेरे वह जंगल लौटी और मस्त सो गयी। शाम को जब वह जागी तो पेड़ के ही नीचे बैठे कन्हैया के पास आयी। उसने कहा, ‘‘बहुत दिनों के बाद मैं खूब सोयी। तुम्हारा ऋण चुकाकर ही रहूँगी।'' यों कहकर वह ग़ायब हो गयी और क्षण भर में एक गठरी ले आयी।
गठरी को खोलकर कन्हैया ने देखा तो उसमें सोने की अशर्फियाँ, सोने के आभूषण भरे हुए थे। उसने वह गठरी ले ली और पिशाचिन को प्रणाम करके वहाँ से निकल पड़ा।
दिन भर किचकिच सोती रही, इसलिए रात भर उसने बड़े आनंद से समय बिताया। फिर सवेरा होते ही वह निद्रा की गोद में चली गयी। दूसरे दिन रात को उसे पता नहीं क्यों, गाने के लिए उसकी इच्छा नहीं हुई। पिशाचिनियों के साथ वह खेलती-कूदती रही।
पिशाचिनी के दिये धन को लेकर कन्हैया घर पहुँचा। उस क्षण से वह सो नहीं पाया। उसके मन में किसी व्याकुलता ने घर कर लिया। साथ ही, लगातार दो रातों तक किचकिच के न आने पर, उसे ढूँढ़ते हुए जंगल गया। उस समय पेड़ पर बैठकर किचकिच जंभाई ले रही थी। उसने उसे जगाया और पूछा, ‘‘दो रातों तक तुम गाने गाँव में क्यों नहीं आयी?''
‘‘आने की ज़रूरत नहीं पड़ी। अब मेरी समझ में आ गया है कि नींद मुझ से क्यों दूर भागती रही। मैं आज तक अपने पेड़ के कोटर में जो धन था, उसकी रखवाली करती रही। दुर्घटना के कारण मेरी आकस्मिक मृत्यु हुई और पिशाचिनी बन गयी। अपना धन अपने साथ ले आयी और उसे कोटर में छिपाकर उसकी रक्षा करती रही। जब तक पाप से भरी यह संपत्ति मेरे पास थी, तब तक मैं सो नहीं पायी। तुम्हें इसे सौंपने के बाद अब आराम से, पैर फैलाकर सो रही हूँ।'' कहते हुए जोर की जंभाई लेते हुए वह लेट गयी।
कन्हैया की समझ में अब आया कि उसकी अशांति और व्याकुलता का क्या कारण है। पिशाचिनी के दिये धन को उसने दान में दे दिया। अब दिन भर वह मेहनत करने लगा और रात भर निश्चिंत होकर चैन की नींद सोने लगा।


प्रवाल चोरों की धर-पकड़

प्रातःकाल का समय था और अली स्कूल जाने की तैयारी में अपना बैग पैक कर रहा था, और जल्दी-जल्दी नाश्ता खा रहा था। उसका स्कूल अंडमान के एक द्वीप में उसके घर से करीब दो कि.मी.दूर था। लेकिन वह पिछले दस सालों से यह दूरी आराम से हर रोज तय करता आ रहा था। जिस रास्ते से वह जाता था वह इसके गाँव से होकर लगभग उसके स्कूल के पास तक समुद्र तट को छूता था। वह अक्सर पानी के किनारे तक घूमता हुआ चला जाता, खास कर घर लौटते समय, और एकान्तवासी केकड़्रों का उनके बिल तक पीछा करता अथवा किनारे तक शायद बहकर आये हुए तारामीन को खोजता-फिरता।
अली को, कुछ सप्ताह पूर्व पर्यावरण सम्बन्धी कुछ लोगों द्वारा समुद्र तट पर क्लास लिये जाने तक, प्रकृति के संसार के बारे में बहुत कम जानकारी थी। वहाँ उसे और उसके सहपाठियों को उनके चारों और फैले असंख्य समुद्री प्राणियों को दिखाया गया। उन सब ने स्नोकल्स की मदद से प्रवाल भीत्तियों तथा उनके सहारे जीनेवाले प्राणियों को देखा। उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि प्रवाल वास्तव में जीवित प्राणी होता है। जो उन्हें निर्जीव कड़े चट्टानों के समान उपनिवेश मालूम पड़ते थे वे वास्तव में कछुए की खोपड़ी की तरह जीवों की रक्षा करनेवाले कंकाल थे। उन्हें भि-भि प्रकार के प्रवाल और प्रवाल उपनिवेशों के चारों ओर फैले शुकमीन, अनिल पुष्प, तारामीन, सर्पमीन आदि दिखाये गये। वे यह सब देखकर भय-चकित थे। अली को ‘क्रिसमस ट्रीज' नाम के छोटे-छोटे प्राणी विशेष रूप से पसन्द आये जो उसे उतने ही रंग-बिरंगे और विविध लगे जैसा उसने चित्र की पुस्तकों में अलंकृत और उपहारों से लदे वृक्षों को देखा था। ये जीव प्रवालों से चिपके हुए थे और अली ने उन्हें छूने के लिए जब अपना हाथ रखा, वे तुरन्त पीछे हट गये मानों उन्हें खतरे का भान हो गया हो!


अली को पर्यावरण के शिक्षकों से यह सुनकर कि हमलोगों के पास कितनी प्राकृतिक सम्पदा है, गर्व महसूस हुआ। प्रवाल भीत्तियाँ मुख्य रूप से लाक्षाद्वीप, कच्छ की खाड़ी तथा मार और अंडमन निकोबर द्वीपों में पाई जाती हैं। लेकिन उनके व्याख्यानों से जब अली को यह पता चला कि कैसे पर्यटक अपने ड़ाड़ंग रूम को सजाने के लिए प्रदर्शन पदार्थ के रूप में लापरवाही से इसे तोड़्रकर घर ले जाते हैं, कैसे गन्दी नालियों के पानी तथा औद्योगिक रसायन और तेल-उत्प्लवन प्रवाल भीत्तियों को नष्ट कर रहे हैं, तब उसे यह जानकर बहुत दुःख हुआ।
‘‘यदि हमारे द्वीपों को बचाना है तो इन्हें बचाना होगा, क्योंकि ये समुद्री भूक्षरण से हमारे द्वीपों की रक्षा करते हैं,'' एक पर्यावरण शिक्षक ने कहा।
धूप निकल आई थी और दिन गरम था। अली स्कूल के लिए निकल पड़ा। जब वह कुछ दूर गया, उसे एक सफेद कार दिखाई पड़ी। उस द्वीप पर बहुत गाड़्रियाँ नहीं थीं। वह कार अनजानी सी लगी। उस कार के पास तीन आदमी थे जो कार के पिछले हिस्से में कुछ लादने में व्यस्त थे। जब अली कार के पास आया तो वह यह देख कर हैरान रह गया कि कार की सामान धानी सब तरह के प्रवालों से ठसाठस भरी है। जब अली ने उनसे पूछताछ की कि वे कौन हैं और वे क्या कर रहे हैं, तब उनमें से एक ने उसे घूंसा मारा और धकेल दिया। फिर वे तीनों जल्दी से कार में कूद कर रफ्फू चक्कर हो गये।
अली ने तुरन्त अपने पैरों पर खड़ा होकर भागती हुई कार को देखा। उसे अपने आप को संभालने में कुछ मिनट लग गये। उसे आज तक किसी ने धक्का नहीं दिया था पर इससे भी अधिक प्रवाल की चोरी का दृश्य देखकर उसे क्रोध आ गया।
‘‘मुझे इसकी रिपोर्ट अवश्य करनी चाहिये। अवश्य!'' उसने निश्चय किया और वह गाँव की ओर वापस लौट गया।

उसने अपने गाँव की पंसारी-दुकान से सायकिल माँगी और अपना बस्ता हैन्डिल में डालकर वह पड़ोसी गाँव की ओर चल पड़ा। वह चार कि.मी. की दूरी यथा सम्भव तेजी से तय करते समय सिर्फ एक ही विचार को अपने मन में दुहराता रहा, ‘‘यदि हमारे द्वीपों को सुरक्षित रखना है तो इन प्रवालों को सुरक्षित रखना होगा।'' उसे पर्यावरण शिक्षक के ये शब्द याद थे।
पड़ोसी गाँव में अली सीधा उस दुकान पर पहुँचा जहाँ एक मात्र फोन बूथ था। उसने पर्यावरण शिक्षकों को, जो उसके स्कूल में आये थे, फोन पर (संयोग से उनके फोन न.उसके बैग में थे) बताया कि उसने एक सफेद कार में लदे हुए ढेर सारे प्रवाल देखे हैं। फिर वह अपने गाँव लौट कर उसने सायकिल वापस दे दी।
अगले दिन उसके स्कूल में बहुत से आगन्तुक आये। हेडमास्टर ने पर्यावरण शिक्षकों के अतिरिक्त एक स्थानीय सरकारी अधिकारी को और स्थानीय समाचार पत्र के दो पत्रकारों को बुलाया था। एक पर्यावरण शिक्षक ने जिसने अली का फोन सुना था, पिछले दिन की घटना का विवरण क्लास को सुनाया। कार का विवरण पुलिस को दे दिया गया जिसने तुरंत अपने सभी चेक पोस्टों पर यह खबर भिजवा दी। प्रवाल के साथ कार पकड़्र ली गई और यह रहस्य खुला कि वे इसे बेचने के लिए कोलकाता भेजने की योजना बना रहे थे।
पूरा क्लास अली की साहसिक करामात पर उसकी वाह वाह करने लगा। और उसकी वाह-वाह तब और गूँजने लगी जब पत्रकारों ने उसके साथ भेंट वार्ता की और उसके फोटो लिये।
‘यह मेरे लिए एक महान दिवस है, पर इससे भी महान दिवस है प्रवाल भीत्तियों के लिए।' अली ने सोचा।


मोह का हठीला बन्धन

‘क्या तुमने कहा कि इस गॉंव का नाम वदनपुर है? इससे सुमेर का नाम याद आ गया; पता नहीं क्या हुआ उसका?’’ गुरु पद्मानन्द ने अपने आश्रम लौटते समय, जो अभी भी 20 कि.मी.दूर था, अपने शिष्यों से पूछा। वे अपने दो शिष्यों के साथ तीर्थयात्रा से लौट रहे थे।


सुमेर योग सीखने के लिए आश्रम में रहता था। वह एक भला युवक था जिसमें जिज्ञासु के सभी अच्छे गुण थे। लेकिन एक दिन उसे यह समाचार मिला कि उसके पिता गंभीर रूप से बीमार हैं। वह गुरु को यह वचन देकर कि वह एक महीने में लौट आयेगा, अपने पिता को देखने चला गया।
लेकिन यह दस वर्ष पहले की बात है। गुरु को उस गॉंव से गुजरते समय उसके बारे में जानने की जिज्ञासा हुई।


उनके शिष्यों ने एक राहगीर को रोक कर पूछा, ‘‘इस गॉंव का निवासी सुमेर नाम का एक युवक आश्रम में रहता था। क्या उसके बारे में आप को कुछ जानकारी है?’’
‘‘आप सुमेर सेठ के बारे में तो नहीं पूछ रहे हैं? वह गुरु पद्मानन्द का शिष्य था। वह अपने रुग्ण पिता को देखने आया था। मृत्यु के पूर्व उसके पिता ने उसका विवाह कर दिया और महाजनी का अपना व्यापार उसे सुपुर्द कर दिया। वह अपने गुरु के आशीर्वाद से बहुत समृद्ध हो गया है। वह रही उसकी कोठी-गॉंव का सबसे विशाल भवन।’’ ग्रमीण ने एक शानदार हवेली की ओर इशारा करते हुए कहा।



गुरु और शिष्य उस भवन के उद्यान में प्रवेश कर गये। सुमेर ने अपने घर की छत से उन्हें देख लिया। वह दौड़ कर नीचे आया और गुरु के चरणों पर गिर पड़ा। ‘‘स्नध्या हो चुकी है। कृपया मेरा आतिथ्य स्वीकार करें। यदि कुछ दिन मेरे घर में बिताना चाहें तो बड़ी कृपा होगी। अन्यथा कल चले जाइयेगा।’’


गुरु ने वहॉं रात्रि में विश्राम करना स्वीकार कर लिया। सुमेर ने उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया। जब वह गुरु के साथ अकेला था, वह रो पड़ा, ‘‘गुरुजी, मैं एक कठिन बन्धन में जकड़ गया हूँ। लेकिन जैसे ही मेरे दोनों बच्चे बड़े हो जायेंगे, मैं उन्हें सब कुछ सौंप कर शेष जीवन आप की सेवा में आश्रम में बिताऊँगा।’’


‘‘यदि मैं नहीं भी रहूँ तो मैं अपने उत्तराधिकारी को, जो तुम्हारा कोई गुरु भाई ही होगा, बता जाऊँगा कि वह तुम्हारा ध्यान रखे। क्योंकि तुम योग में दीक्षित हो चुके हो, इसलिए तुम्हारे लिए अध्यात्ममार्ग को एकदम छोड़ देना अच्छा न होगा।’’ गुरु ने कहा।


दूसरे दिन प्रातः सुमेर को उदास छोड़ कर गुरु आश्रम में लौट गये।


दस वर्ष और गुजर गये। एक बार फिर गुरु वदनपुर से गुजरते समय अपने शिष्य के घर गये। फिर एक बार सुमेर अपने गुरु के चरणों में गिर कर रोने लगा और कहने लगा, ‘‘मेरा पोता मुझे छोड़ता ही नहीं है। जैसे ही वह स्कूल जाने लगेगा मैं गृहस्थ जीवन का त्याग कर दूँगा।’’ उसने गुरु को वचन देते हुए कहा।


‘‘बहुत अच्छा।’’ गुरु ने कहा।


अगले वर्ष गुरु ने देह त्याग दिया। लेकिन अपने उत्तराधिकारी को हिदायत दे दी कि वह सुमेर का ध्यान रखे और उसे एकदम सदा के लिए गया समझ कर भूल न जाये। ‘‘उसमें सम्भावनाएँ हैं। लेकिन वह मोह माया के दल-दल में फँस गया है। उसे बचाया जाना चाहिये।’’


और भी अनेक वर्ष बीत गये। एक दिन नये गुरु गंगानन्द को सुमेर के बारे में जानने की उत्कंठा हुई। उन्हें याद आया कि गुरु ने उसे कहा था कि उसे भूला समझ कर त्याग मत देना! वह तुरन्त वदनपुर चले गये और यह जान कर उन्हें दुख हुआ कि सुमेर का देहान्त हो चुका है। लेकिन फिर भी उसके बच्चों ने उनका बड़ सम्मान के साथ स्वागत किया और अपने घर में एक रात विश्राम करने का अनुरोध किया।


घर में घुसने के बाद से ही उसके घर का कुत्ता गुरु गंगानन्द का पॉंव चाटने लगा और निरन्तर पूँछ हिलाने लगा। रात में उसे जबर्दस्ती गुरु के कमरे से बाहर निकाला गया। गंगानन्द को कुतूहल हुआ। उन्होंने ध्यान में बैठकर कुत्ते की आत्मा से सम्पर्क स्थापित की और यह जान वे चकित रह गये कि सुमेर की आत्मा कुत्ते में प्रवेश कर घर की रखवाली कर रही है जिससे उसके बेटे-पोते सुरक्षित रह सकें।


गुरु गंगानन्द ने कुत्ते की आत्मा को बताया कि वह पशु-जीवन से मुक्ति के लिए निरन्तर प्रार्थना करता रहे। दूसरे दिन प्रातः गुरु गंगानन्द आश्रम लौट गये।
पॉंच वर्ष बाद गंगानन्द, सुमेर के घर पुनः गये। कुत्ते की मृत्यु हो चुकी थी। लेकिन सुमेर की आत्मा का क्या हुआ? मोह-माया के गहरे अज्ञान में डूब जाने के बाद उसकी आत्मा को क्या मुक्ति मिल पाई होगी? रात्रि में ध्यान में उन्होंने देखा कि उसकी आत्मा एक नाग में प्रवेश कर गई है जो लकड़ी के एक विशाल बक्से में छिपा हुआ है । उस बक्स में परिवार का सारा खजाना रखा हुआ था जिसकी उसकी आत्मा रक्षा कर रही थी।


गंगानन्द ने इस बार कठोर कदम उठाने का निश्चय किया। सुबह होते ही उसने परिवार को सूचित कर दिया कि उनके घर के अन्दर एक विशाल पेटी में एक नाग छिपा हुआ है। परिवार ने भयभीत होकर संपेरे को बुलाया और पेटी खोल कर उसमें अगरबत्ती जलाई। धुएं से नाग जब अचेत हो गया तब संपेरे ने उसे बाहर निकाल लिया। नौकर उसे मारने जा रहा था, लेकिन गंगानन्द ने उसे मारने से मना कर दिया और एक पात्र में रख कर उसे वे आश्रम में ले गये। वहॉं उन्होंने मरते हुए नाग के चारों ओर कुछ अनुष्ठान किया, जिससे सुमेर की आत्मा, जो नाग में निवास कर रही थी, शान्तिपूर्वक उसे छोड़ सके।
‘‘जब हम साथ-साथ पढ़ते थे, तब सुमेर कितना ज्ञानवान था। कितना घोर पतन!


आह ! मोहमाया का बल कितना हठीला हो सकता है !’’ गंगानन्द ने आह भरते हुए मन ही मन कहा।


ऊँचे घर का दामाद

मनोहर देखने में बहुत सुंदर था। थोड़ी-बहुत शिक्षा भी पायी। उसके माता-पिता ने माधवी से उसका विवाह करना चाहा। मनोहर, माधवी को बचपन से जानता था, इसलिए वह भी उससे शादी करने के पक्ष में था। उसने यह बात माधवी से कई बार बतायी भी।
एक दिन एक ज्योतिषी ने उसके हाथ की रेखाएँ देखकर कहा, ‘‘शीघ्र ही तुम एक ऊँचे घर का दामाद बनोगे''। मनोहर में धनवान बनने की तीव्र इच्छा थी। ज्योतिषी की भविष्यवाणी ने उसपर बहुत प्रभाव डाला। माधवी के पिता धनी नहीं थे। इस वजह से मनोहर पशोपेश में पड़ गया कि माधवी से शादी करूँ या नहीं। तब उसके माता-पिता ने उसे समझाया, ‘‘ऊँचे घर का दामाद बनने की इतनी इच्छा है तो तुम्हें पहले बड़ा बनना होगा। माधवी से शादी करोगे तो तुम सुखी रह सकते हो। ज्योतिषी की अंटसंट बातों में आकर जीवन बरबाद मत करो।''
इसके दूसरे ही दिन उस गाँव का भूस्वामी रत्नाकर उनके घर आया। गाँव भर में वही सबसे बड़ा धनवान था। उसने प्रस्ताव रखा कि मनोहर की शादी उसकी बेटी कल्पना से की जाए तो तीन एकड़ भेंट में दूँगा। मनोहर को ज्योतिषी की बातों पर विश्वास हुआ और उसने कल्पना से विवाह करने का निश्चय किया।
माधवी को यह बात जानकर बहुत दुख हुआ। उस दिन उसने ग्रामदेवी के मंदिर के पास मनोहर को देखा तब उससे कहा, ‘‘बचपन से तुम मुझे चाहते हो, पर अब शादी से इनकार कर रहे हो, क्योंकि कहीं और शादी करने से तुम्हें दहेज मिलेगा। पर क्या यह उचित है?''

‘‘बचपन से क्या मैंने तुम्हें चाहा? तुम्हारी आँखें बिल्ली की आँखें जैसी हैं। कल्पना की सुन्दरता मुझे बहुत अच्छी लगी। इसीलिए मैं उससे शादी करने जा रहा हूँ'', मनोहर ने कहा।
माधवी में रोष भर आया। उसने क्रोध-भरे स्वर में कहा, ‘‘कल्पना के पिता ने दहेज में तीन एकड़ देने का क्या प्रस्ताव रखा, मेरी आँखें बिल्ली जैसी हो गयीं। अगले जन्म में तुम बिल्ली बनकर जन्म लोगे।'' कहकर वह तेज़ी से चली गयी।
मनोहर ने, जो हुआ, माता-पिता से बताया। जब उसके माता-पिता को मालूम हुआ कि माधवी खुद मनोहर के जीवन से हट गयी तो उन्होंने पुरोहित को बुलवाकर मुहूर्त निश्चित किया।
इसके दूसरे ही दिन उनके दूर का रिश्तेदार माधव परिवार सहित उनके घर आया। वह लंबे अर्से से राजधानी में राजा के आस्थान में काम कर रहा था। उसे और उसकी पत्नी को मनोहर बहुत पसंद आया। उन्होंने अपनी बेटी वंदना की शादी उससे करना चाहा और यह बात उसके माता-पिता से कही।
मनोहर के पिता ने जब उनसे कहा कि कल ही उसकी मंगनी है तो माधव ने कहा, ‘‘हमें सब कुछ मालूम है । मनोहर की शादी माधवी से होनेवाली थी। जब उसी से शादी नहीं हुई है, तब कल्पना के बारे में सोचने की क्या ज़रूरत है, जिसके साथ मंगनी भी नहीं हुई। रत्नाकर ने तुम्हें तीन एकड़ देने का वचन दिया है न? खेत में काम करना और फ़सल उगाना कोई आसान काम नहीं है। उसके लिए समय पर वर्षा होनी चाहिए, बाढ़ आनी नहीं चाहिये। मैं मनोहर को राजा के आस्थान में नौकरी दिलवाऊँगा। चाहे बारिश हो या बाढ़, उसका वेतन तो हर महीने बराबर मिलता रहेगा। मेहनत ज़्यादा करनी नहीं होगी। इसके अलावा इसकी, बड़े-बड़े लोगों से दोस्ती होगी। खुद सोचिये।''
मनोहर के माता-पिता निश्चय कर नहीं पाये कि क्या किया जाए। किन्तु ज्योतिषी की बातों पर अटल विश्वास रखनेवाले मनोहर ने वंदना से शादी करने का निर्णय किया। जब कल्पना को यह बात मालूम हुई तब वह मनोहर के घर आकर वंदना से मिली और कहा, ‘‘बचपन में ही यह तय हुआ था कि मनोहर की शादी माधवी से होगी, पर मनोहर ने मुझे चाहा। नौकरी का लालच दिखाकर हमें अलग करना सही नहीं।''

वंदना ने मनोहर से पूछा, ‘‘क्या नौकरी पाने के लिए ही तुम मुझसे शादी करनेवाले हो?''
‘‘ऐसी कोई बात नहीं। कल्पना देखने में सुंदर है पर तुमने सुन लिया न कितनी घमंडी है। घायल कुत्ते की तरह भौंकती रहती है। तुम मुझे बहुत अच्छी लगी इसीलिए मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ।'' मनोहर ने कहा।
उस समय कल्पना भी वहाँ मौजूद थी। वह भड़क गयी और बोली, ‘‘वंदना के पिता ने राजा के आस्थान में नौकरी दिलवाने का क्या वादा किया, मेरी बातें कुत्ते के भौंकने के समान हो गयीं। तुमने मेरा घोर अपमान किया। याद रखो, अगले जन्म में तुम कुत्ता होकर जन्म लोगे।'' यों कहकर वह चली गयी।
जो हुआ, मनोहर की माँ को मालूम हो गया। उसने बेटे को सावधान करते हुए कहा, ‘‘तुम जिससे शादी करना चाहते हो, करो, पर कन्याओं के शापों का शिकार बन रहे हो। यह सही नहीं है ।''
मनोहर ने इसपर हँसते हुए कहा, ‘‘वहाँ राजा जैसा जीवन मेरी प्रतीक्षा में है तो इनके शापों की परवाह क्यों करूँ । उन्हें बकने दो, भूँकने दो, मुझे जो करना है, करके रहूँगा।''
इसके बाद माधव ने प्रस्ताव रखा कि मंगनी की तारीख निश्चित की जाए। परंतु, मनोहर के माता-पिता ने कहा, ‘‘मंगनी की कोई ज़रूरत नहीं है। बेटे को राजा के आस्थान में नौकरी मिलते ही सीधे शादी करा देंगे।'' माधव ‘हाँ' कहकर मनोहर को साथ ले गया।
राजा के आस्थान में माधव छोटा कर्मचारी ही था, पर बड़े-बड़े लोगों से उसका परिचय थाजिनमें से एक था, प्रमुख व्यापारी सतीश सक्सेना। माधव मनोहर को लेकर उसके पास गया और पूरा विषय बताकर कहा, ‘‘आप राजा को इसकी सिफारिश करके आस्थान में नौकरी दिलवाइयेगा। मेरी बेटी की शादी हो जाए तो मैं सदा आपका कृतज्ञ बना रहूँगा।''
मनोहर को देखकर सक्सेना को लगा कि क्यों न मनोहर को अपना दामाद बना लूँ। उसकी बेटी जलजा भी मनोहर की सुंदरता पर रीझ गयी।
सक्सेना ने जब मनोहर से शादी की बात की तब उसे लगा कि ज्योतिषी की भविष्यवाणी अचूक है। इसलिए मनोहर, जलजा से शादी करने को तैयार हो गया।
इस विषय को जानकर वंदना जलजा के पास गयी और उससे कहा, ‘‘बचपन के दोस्त माधवी को इसने ठुकराया, कल्पना से शादी करने से इनकार कर दिया और मुझसे शादी करने के लिए तैयार हो गया। अब वह तुमसे शादी करने पर आमादा है । ऐश्वर्य का लोभ दिखाकर हम दोनों को अलग करने पर तुल गयी हो तुम।''
जलजा ने तुरंत मनोहर को बुलवाया और उससे पूछा, ‘‘तुमने पहले ही दो कन्याओं से शादी करने की सहमति दी। फिर इस वंदना पर लट्टू होकर शादी करने का निश्चय किया। क्या मेरे वैभव को देखकर ही मुझसे शादी करना चाहते हो?''
‘‘नहीं, नहीं, मुझे संगीत से बड़ा प्रेम है। वंदना का गाना गधे का स्वर-सा लगता है। तुम बहुत अच्छा गाती हो, इसलिए तुमसे शादी करना चाहता हूँ'', मनोहर ने कहा।
वंदना एकदम क्रोधित हो उठी। ‘‘जलजा का ऐश्वर्य देखते ही मेरा स्वर तुम्हें क्या गधे का स्वर हो गया? तुम अगले जन्म में गधा होकर जन्म लोगे'', कहती हुई वन्दना क्रोधित होकर वहाँ से चली गयी।
इसके बाद अच्छे मुहूर्त पर जलजा और मनोहर की शादी वैभवपूर्वक संपन्न हुई। शादी के बाद रत्नाकर के एक साथी व्यापारी ने पूछा, ‘‘तुमने अपनी बेटी की शादी ऐसे कंगाल से क्यों कर दी?'' रत्नाकर ने इसपर हँसते हुए कहा, ‘‘मेरी बेटी बात-बात पर नाराज़ होती रहती है। उसका स्वभाव ही ऐसा है। कंगाल से शादी हो जाए तो बिल्ली की तरह पड़ा रहेगा। मेरे पास अपार संपदा है। कंगाल से शादी हो जाने पर कुत्ते की तरह भौंकते और घर की रखवाली करेगा। मेरे घर में ज़्यादा काम करना पड़ता है। कंगाल हो तो गधे की तरह काम करेगा। यही है रहस्य। अब जान गये मनोहर से मैंने बेटी की शादी क्यों की?''
उनकी बातों को मनोहर ने भी सुन लिया। वह जान गया कि इस घर में उसका क्या स्थान है। तीन कन्याओं के तीन तरह के शाप सच निकले। अब वह पछताने लगा। पर अब पछताने से क्या लाभ!



लालू सेठ ने चुना वरदान

वाराणसी की पावन नगरी में लालू सेठ नाम का एक महाजन रहता था। उसने अपने जीवन में कभी एक पैसे का भी दान नहीं किया। उसकी पत्नी मंगू बाई उसे बार-बार निकटस्थ स्थानों की तीर्थ यात्रा करने के लिए कहती रहती, किन्तु लालू उसे मुँहतोड़ जवाब देता, ‘‘भगवान शिव का अपमान करने का साहस कैसे तुम करती हो? क्या वे वाराणसी के अधिष्ठाता प्रभु नहीं हैं? यहॉं हजारों व्यक्ति तीर्थ यात्रा के लिए आते हैं; फिर हम तो यहॉं के निवासी हैं, हम क्यों बाहर जायें?’’

बेचारी औरत अच्छी तरह जानती थी कि उसका पति अपने आराम पर भी कभी पैसा खर्च नहीं कर सकता। भगवान शिव को निवेदित पावन रात शिवरात्रि की सुबह थी। सैकड़ों नर-नारी गंगा में डुबकी लगाने गये। ‘‘आओ, इस शुभ मुहूर्त में हमलोग भी गंगा-स्नान करते हैं!’’ मंगू बाई ने उसे उत्साहित करते हुए कहा।
‘‘क्या मूर्खता की बात करती हो! क्या नहीं जानती कि घाट पर पहुँचते ही कोई न कोई ब्राह्मण टपक पड़ेगा और हमारे लिए प्रार्थना करने के बहाने पैसे मांगेगा।’’ लालू ने कहा।

पत्नी के हठ करने पर लालू इस शर्त पर राजी हुआ कि वे किसी ऐसे एकान्त स्थान पर जायेंगे जहॉं उन्हें कोई पुजारी न देखे। क्योंकि सुबह-सुबह कोहरा छाया हुआ था, इसलिए उन्हें आसानी से एक ऐसा स्थान मिल गया जहॉं कोई अन्य व्यक्ति न था। जो भी हो, भगवान शिव और दुर्गा मॉं सबसे अगोचर हो अपने भक्तों को निहार रहे थे। लोगों की भक्ति से प्रभावित होकर दुर्गा मॉं ने पूछा, ‘‘इन भक्तों की भगवान को पाने की अभीप्सा आप पूरी क्यों नहीं कर देते?’’ भगवान ने समझाया कि इनमें वास्तव में ऐसी कोई अभीप्सा नहीं है। ये केवल बाह्य कर्मकाण्ड का पालन कर रहे हैं!

तभी भगवती माता की दृष्टि लालू और उसकी पत्नी पर पड़ गई। ‘‘देखिये, यहॉं एक पावन व्यक्ति अपनी पत्नी को एक ऐसे शान्त स्थल पर ले जा रहा है जहॉं उनके ध्यान को कोई भंग न करे। क्या ये लोग भी दूसरों के समान हैं?’’ शिव मुस्कुराये। फिर एक दीन पुजारी का भेष बदल कर लालू की ओर चल पड़े। लालू पीछे घटते हुए बोला, ‘‘मुझे तुम्हारी सहायता नहीं चाहिये। तुम मेरे लिए कोई मंत्र न पढ़ो। कृपया मुझे शान्ति से रहने दो।’’

‘‘घबराओ नहीं वत्स! तुम मुझे कम दे देना, केवल परम्परा के पालन के लिए। मेरी कोई मॉंग नहीं है।’’ भगवान ने उसे विश्वास दिलाते हुए कहा। मंगूबाई ने भी अपने पति से पुजारी की बात मान जाने के लिए अनुनय-विनय किया। ‘‘अच्छा, ठीक है! लेकिन मैं सिर्फ़ एक पैसा दूँगा। ज्यादा नहीं मॉंगना।’’ लालू जोर देकर कहा। ‘‘यह काफी है।’’ भगवान ने कहा।

लालू और उसकी पत्नी ने स्नान किया और पुजारी ने उनके सिर पर हाथ रख कर उस अवसर के लिए उपयुक्त मंत्र का उच्चारण किया। फिर पुजारी ने दक्षिणा लेने के लिए अपना हाथ फैलाया। ‘‘क्या मैंने ऐसा वचन दिया था कि मैं पैसा तुरन्त दे दूँगा? मैं अपने साथ पैसा नहीं लाया।’’ लालू ने कहा। ‘‘बहुत अच्छा! मैं तुम्हारे साथ घर तक चलता हूँ।’’ भगवान ने कहा। भगवती दुर्गा भी अगोचर होकर उनके पीछे-पीछे चलीं। लालू घर के अन्दर गया और कपड़े बदल कर बाहर सिर्फ यह कहने के लिए निकला कि अभी घर पर पैसा नहीं है, इसलिए कभी बाद में दे देगा।

शिव चले गये और दूसरे दिन अपना पैसा लेने के लिए फिर आ गये। लालू ने कुछ बहाना बना कर फिर टालमटोल कर दिया। शिव हर रोज आते रहे और लालू हर रोज कुछ न कुछ बहाना बनाता रहा। लालू को आशा थी कि पुजारी तंग आकर अपने आप ही आना बन्द कर देगा। लेकिन शिव अपनी दिनचर्या के कर्तव्य का पालन करते रहे। लालू ने पुजारी के दृढ़ संकल्प को तोड़ने के लिए एक योजना बनाई। उसने अपने घर के निकट पुजारी को आते देख कर पत्नी को पुजारी से यह कहने का आदेश दिया कि उसके पति का अभी-अभी देहान्त हो गया है। मंगू बाई यद्यपि इस बात पर बहुत दुखी हो गई, फिर भी उसने लालू के निर्देश का पालन किया।


‘‘आह! कितने दुख की बात है!’’ पुजारी ने शोक प्रकट करते हुए कहा। ‘‘पुत्री! स्वर्गवासी दयनीय पति अपने दाह-संस्कार पर पैसे खर्च करना नहीं चाहेगा। इसलिए उसके शरीर विसर्जन का कार्य मुझे करने दो, जिससे तुम पर कोई भार न पड़े। एक पुजारी के रूप में जहॉं एक ओर इस कार्य के लिए मैं सर्वथा उपयुक्त हूँ, दुसरी ओर उसकी आत्मा को यह देख कर शान्ति मिलेगी कि उसके दाह-संस्कार पर कोई पैसा खर्च नहीं हुआ।’’


शिव यह कह कर घर के अन्दर घुस गये। लालू ने जमीन पर लेट कर मृत होने का बहाना किया। शिव ने उसे कन्धे पर उठाया और नदी तट की ओर चल पड़े। अभागिन मंगूबाई भी पीछे-पीछे चल पड़ी। लालू ने अब महसूस किया कि अब उसे रणनीति बदलनी होगी अन्यथा पुजारी उसे नदी में फेंक देगा। वह पुजारी के कन्धे से सरक कर नीचे आ गया और एक लम्बी मुस्कान के साथ बोला, ‘‘मैं वास्तव में मर गया था, लेकिन आप निश्चय ही सच्चे निष्पाप ब्राह्मण हैं जिसके स्पर्श ने मुझे पुनर्जीवित कर दिया है। आप को बहुत-बहुत धन्यवाद।’’

भगवान शिव, जो करुणा के लिए प्रसिद्ध हैं, अपने सच्चे रूप में प्रकट होकर बोले, ‘‘वत्स, मैं तुम्हारी, धन को सुरक्षित रखने की दुराग्रही बुद्धि और अध्यवसाय से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें इस दुराग्रह के गुण को आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर मोड़ देना चाहिये। अब तुम मुझसे एक वरदान मॉंग सकते हो।’’ लालू ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘कृपया आप को जो एक पैसा मुझे दान में देना है, उसे माफ कर दीजिये।’’

एक विचित्र मुस्कान शिव के मुखमण्डल पर फैल गई। उन्होंने अगोचर दुर्गा की ओर एक अर्थ भरी दृष्टि से देखा। फिर लालू की ओर मुड़ कर कहा, ‘‘एवम अस्तु!’’ इतना कहकर वे अन्तर्धान हो गये। दुर्गामाता उदासीन हो गईं। ‘‘हमें प्रतीक्षा करनी होगी’’, भगवान ने कहा, ‘‘जब तक अपनी वास्तविक आवश्यकता का सच्चा ज्ञान मनुष्य की चेतना में नहीं उतरता। हम किसी को कुछ ऐसी चीज नहीं दे सकते जिसके लिए उसमें मॉंग नहीं है।’’