Saturday, July 2, 2011

गर्माहट का स्रोत दूरी

सर्दियों की दोपहर थी। बादशाह अकबर नदी के किनारे टहल रहे थे। उनके साथ उनके कुछ दरबारी तथा बीरबल भी थे । बादशाह नदी के बहते हुए पानी की ओर देखते रहे।


‘‘यह हवा पानी को ठंडा किए जा रही है। पर्वतों की ठंडक लाती है और पानी में मिला देती है।’’ बादशाह ने कहा।


‘‘कौन इस कड़कती ठंड में नदी में उतरेगा?’’ एक दरबारी ने कहा।


‘‘यदि सही इनाम दिया जाए तो हम एक ऐसे आदमी को ढूँढेंगे जो सारी रात नदी में, छाती तक गहरे पानी में खड़ा रहे।’’ बीरबल ने कहा।


‘‘असंभव, जो भी ऐसा करेगा वह ठंड से जकड़ कर मर जाएगा।’’ बादशाह ने कहा।


‘‘शहंशाह, असंभव क्या होता है जिसका प्रयास न किया गया हो।’’ बीरबल अपनी बात पर अड़ा रहा। ‘‘तुम कैसे दृढ़ता से कह सकते हो?’’ बादशाह ने चुनौती देते हुए कहा।


‘‘प्रस्ताव रखकर देखें कि मैं सही हूँ या गलत।’’ बीरबल ने धीमे स्वर में कहा।


दूसरे दिन नगाड़े बजाने वाले नगाड़े बजाते हुए चारों तरफ गए और राजा के आदेश की घोषणा की। ‘‘जो ठंड में सारी रात यमुना नदी में छाती तक गहरे पानी में खड़ा होकर दिखाएगा उसे सौ मोहरें इनाम में दी जाएंगी।’’


एक धोबी ने यह घोषणा सुनी। उसे पैसों की बहुत जरूरत थी। ‘‘एक सौ मुहरें! उनसे मैं अपने सारे कर्ज उतार लूँगा और मेरे पास भी थोड़ा बच जाएगा।’’ उसने अपनी पत्नी से कहा।


‘‘तुम ठंड में जकड़ मृत्यु को भी प्राप्त हो सकते हो।’’ पत्नी ने सावधान करते हुए कहा।


‘‘नहीं, मैं नहीं मरूँगा। मैं बचपन में सर्दियों में रात को नदी में तैरा करता था।’’


उसने अपनी पत्नी की हथेली को बड़े प्यार से दबाकर आश्वासन दिया। ‘‘सोचो एक सौ मोहरें।’’ वह हँसा। दूसरे दिन वह राजदरबार में उपस्थित हुआ। और दरबार के कर्मचारी से कहा कि वह घोषणा सुनकर उपस्थित हुआ है। कर्मचारी उसे बादशाह के समक्ष ले गया।


धोबी ने झुककर धरती को छूकर अदब से सलाम किया, और बादशाह को कहा, ‘‘शहंशाह, मैंने राज दरबार की घोषणा सुनी है। मैं पूरी रात नदी में छाती तक गहरे पानी में खड़ा रहने के लिए तयार हूँ।’’ उसने स्पष्ट स्वर में कहा।


‘‘बहुत खूब’’, बादशाह ने दरबारी कर्मचारी से कहा, ‘‘आवश्यकता अनुसार सारी तैयारी कर दी जाए। दो पहरेदारों की नियुक्ति कर दी जाए जो नदी तट पर रहेंगे और उस पर पूरी नज़र रखेंगे।’’ पहरेदारों को यह तैनाती अच्छी नहीं लगी क्योंकि वे ठंड के इस मौसम में बाहर रहना नहीं चाहते थे। परंतु उनके पास कोई चारा न था। आदेश तो आदेश होता है।


अंधेरा होते ही पहरेदारों ने धोबी को पानी में उतरने का संकेत दिया। उन्होंने स्वयं कई स्वेटर एक के ऊपर एक पहन रखे थे। उन्होंने अपनी तैनाती छप्पर के नीचे ले ली। धोबी ने अपने कपड़े उतारे। उसका शरीर ऐसे कांपा जैसे तूफान में पत्ता कांपता है। थोड़ी देर के लिए उसने सोचा कि वह अपनी जान को जोखिम में डाल रहा है। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। ‘‘सौ मोहरें!’’ उसने अपने आप से कहा।


‘‘एक रात का दुख और सौ मोहरें !’’ यह विचार आते ही उसे बल मिला। वह पानी में चलता रहा जब तक उसे छाती की गहराई तक पानी नहीं मिला।
चौकसी प्रारंभ हुई। यह चॉंदनी रात थी। करोड़ों तारे आकाश में चमक रहे थे। तारों के बीच हंसिए-सा चॉंद चमक रहा था। कड़कती ठंड देह को चीर रही थी। ज्यों-ज्यों रात बढ़ती गई त्यों-त्यों असहनीय ठंड होती गई। धोबी को ऐसा लगा कि रात का अंत ही नहीं हो रहा है।


‘‘ओह! बस सुबह हो जाए!’’ वह बार-बार यही इच्छा करता रहा।


उसने महसूस किया कि यह इच्छा उसे कहीं का नहीं रहने देगी। इस अग्नि परीक्षा का सामना करने के लिए उसे कोई न कोई रास्ता निकालना होगा जो उसे शक्ति दे सके ।उसे अपने मस्तिष्क को कहीं न कहीं लगाना होगा। उसकी नज़र दूर रखी लैंप की लौ पर पड़ी। यह लैंप महल के ऊपर छत पर लगी थी। ‘‘आह!’’ इतनी दूर से भी मानो सचमुच उसे थोड़ी गर्माहट महसूस हुई। लैंप और गर्माहट ने उसके डर को दूर किया और प्रेरणा दी।


वह भूल गया कि पानी कितना ठंडा है। उसे कड़कती ठंड का एहसास तब तक नहीं हुआ जब तक मुर्गे ने बॉंग देकर सुबह होने की सूचना नहीं दी। धोबी ने यह महसूस किया कि अंधकार खत्म हो गया है। उसकी अग्नि परीक्षा खत्म हुई। नदी के किनारे खड़े पहरेदारों ने जोर से चिल्ला कर कहा, ‘‘बाहर आ जाओ, तुम एक सौ मोहरों से धनी हो गए हो।’’ धोबी किनारे पर आ गया, तौलिये से अपना गीला शरीर पोंछा, शीघ्र गर्म कपड़े पहने और पहरेदारों के साथ शाही दरबार में गया।


बादशाह अपने दरबारियों तथा बीरबल के साथ दरबार में आए। ‘‘शहंशाह, यह आदमी सारी रात नदी में छाती तक गहरे पानी में खड़ा रहा।’’ उन्होंने घोषणा की। बादशाह को विश्वास न हुआ। उन्होंने सोचा जरूर इसने कोई चाल चली होगी जिससे ठंड को दूर रखा जा सके। वे आगे की ओर झुके और अपनी गरजती आवाज में बोले, ‘‘मुझे बताओ कि तुमने ठंड को कैसे दूर रखा?’’


‘‘शहंशाह, महल की छत पर लगी लैंप की लौ ने मुझे गर्मी दी।’’ धोबी ने भोले-भाले अंदाज में कहा। ‘‘आह ! लैंप ने तुम्हें गर्माहट दी, देखा जाए तो, तुमने बाहर से मदद ली। यह व्यवहार तुम्हें इनाम लेने का हकदार नहीं बनाता।’’ धोबी का चेहरा मुरझा गया। और बीरबल का भी लेकिन बीरबल ने कुछ नहीं कहा। वह बड़े दुख के साथ देखता रहा। धोबी सर नीचा कर शाही महल से बाहर आ गया। बीरबल ने देखा उस आदमी का चेहरा निराशा में डूब गया। उसे ठंड सहनी पड़ी इस आशा से कि उसे इनाम मिलेगा। क्रूर विधि ने उसकी आशाओं पर पानी फेर दिया।


बीरबल ने महसूस किया कि धोबी के साथ अन्याय हुआ है। उसने उसी समय प्रतिज्ञा की, वह उसे उसका हक दिलाकर रहेगा। दूसरे दिन, बीरबल ने शाही दरबार को संदेश भेजा, यह कहकर कि घर में कोई जरूरी काम है, इसलिए आज वह दरबार में उपस्थित नहीं हो पाएगा। ‘‘जरूरी काम! बादशाह की सेवा से बढ़कर जरूरी काम क्या हो सकता है?’’ बादशाह अकबर बड़बड़ाया।


कुछेक दरबारी, जो बीरबल से ईर्ष्या करते थे, बड़े खुश हुए।


‘‘उसी समय, बादशाह ने बीरबल को बुलाने के लिए पहरेदार भेजा। पहरेदार दौड़ता हुआ बीरबल के घर आया और उसने बादशाह का संदेश दिया।
‘‘आह!’’ बीरबल ने कहा। ‘‘जाओ और बादशाह से कहो कि मैं खिचड़ी बनाने में व्यस्त हूँ। जैसे ही यह बन जाती है, मैं उनकी सेवा में हाजिर हो जाऊँगा।’’ पहरेदार ने खबर बादशाह अकबर को पहुँचा दी।

‘‘बड़ा मूर्ख है!’’ बादशाह ने गुस्से में जोर से कहा। फिर उन्हें मन-ही-मन थोड़ी बेचैनी हुई।


‘‘वह आदमी जरूर कोई शरारत कर रहा है। चलो, उसे पकड़ा जाए,’’ बादशाह ने भौंहें सिकोड़ कर कहा।


बादशाह शाही घोड़े पर सवार हुए। उनके पीछे उनके दरबारी भी घोड़ों पर सवार हो चल पड़े। शाही कारवॉं जल्दी ही बीरबल के घर पहुँच गया। बीरबल अपने घर के आँगन में ही था। वह सूखी लकड़ियों से आग जला रहा था। उसने काफी ऊँचाई पर लकड़ियॉं बॉंध कर उस पर मिट्टी की हांडी रखी थी। आग तीन फीट परे जल रही थी।


बीरबल ने अपने हाथ में पकड़ी छड़ी फेंक दी और बादशाह की ओर दौड़ा। उसने अपने स्वामी का आदर बादशाह के सामने झुककर तथा धरती को छूकर प्रकट किया? फिर बादशाह के आदेश का इंतजार करने लगा।


‘‘बीरबल, तुम क्या कर रहे हो?’’


‘‘शहंशाह, मैं खिचड़ी बना रहा हूँ। दाल और चावल ऊपर रखी हांडी में है।’’


‘‘लेकिन’’, बादशाह ने ऊँची आवाज में कहा, ‘‘बर्तन के नीचे कोई आग नहीं है?’’


‘‘आग वहॉं है’’, बीरबल ने इशारे से थोड़ी-सी जलती आग को दिखाया, जो तीन फीट दूर थी।


‘‘दाल-चावल कैसे पकेंगे जब तक बर्तन के नीचे आग की गर्मी न हो?’’ बादशाह ने पूछा। बीरबल थोड़ा मुस्कुराया।


‘‘मुस्कुराना कोई उत्तर नहीं है।’’ बादशाह उत्तेजित हो पूछने लगे, ‘‘बताओ खिचड़ी कैसे पकेगी जब आग बर्तन से दूर हो?’’


‘‘शहंशाह, आपने मुझे बताया है कि दूर से भी गर्मी पहुँच सकती है।’’ बीरबल ने अपनी दाढ़ी को खुजलाते हुए कहा। ‘‘तुमने मुझसे सीखा है?’’ बादशाह ने भौचक्के होकर देखा।


‘‘आपने ही मुझे दिखाया है, शहंशाह! आपने कहा कि ठंडे पानी में खड़े धोबी को महल की छत पर जलते हुए लैंप की लौ से गर्मी प्राप्त हुई है।’’ बीरबल ने साफ किंतु धीमी आवाज में कहा।


‘‘अहा’’, बादशाह को अब ख्याल आया कि बीरबल के मन में क्या चल रहा था। बादशाह पहरेदार की ओर मुड़े और कहा, ‘‘जाओ और उस धोबी को पकड़ लाओ। उसे घोषणा के अनुसार इनाम मिलना चाहिए।’’


‘‘शहंशाह, अब न्याय पूरी तरह हो गया है।’’ फिर उसने हांडी के साथ वह सब उस ओर सरका दिया जहॉं आग थी। बीरबल हँसने लगा, बादशाह हँसने लगे, और समस्त दरबारी हँसने लगे। वे भी हँसने लगे जिन्हें बीरबल से ईर्ष्या थी, यह सोचकर कहीं बादशाह उन्हें सजा न दे दें।

Friday, July 1, 2011

छोकरा मांत्रिक

प्रज्वल अवंती राज्य के नंदिवर में रहता था। बचपन से ही वह परोपकारी था। ज़रूरतमंदों की सहायता करने में वह हमेशा आगे रहता था। बड़ा होते-होते अन्याय के विरुद्ध लड़ने की प्रवृत्ति भी उसमें दृढ़ होती गयी। केशव एक ग़रीब किसान था, जो उसी गाँव में रहता था। अपनी पत्नी के इलाज के लिए उसने अपने खेत का एक टुकड़ा फणिराज नामक एक धनवान को बेचा।
फणिराज ने उसे आधी रक़म दी और शेष रक़म बाद में देने का वादा किया। एक हफ्ते के बाद केशव बाक़ी रक़म माँगने फणिराज के घर गया। फणिराज ने रक़म देने से साफ़-साफ़ इनकार कर दिया, और उसे चोर ठहराते हुए कोतवाल के सुपुर्द कर दिया।
बेचारा केशव बहुत गिड़गिड़ाया पर कोतवाल ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी और उसे जेल में डाल दिया। गाँव के लोग जानते थे कि यह सरासर अन्याय है, पर किसी भी ग्रमीण ने कोतवाल के ख़िलाफ एक शब्द भी कहने का साहस नहीं किया। प्रज्वल से यह अन्याय सहा नहीं गया और वह सीधे कोतवाल के पास गया।
चूँकि कोतवाल, फणिराज से मिला-जुला था, इसलिए उसने प्रज्वल की एक न सुनी। बहुत कुछ कहने के बाद भी केशव को छोड़ने से कोतवाल ने जब इनकार किया, तब प्रज्वल ने डटकर उसका विरोध किया।
कोतवाल ने सिपाहियों को उसे गिरफ्तार करने का हुक्म दिया। पर, प्रज्वल उनसे बचकर भाग निकला और पहाड़ी प्रदेश की एक गुफ़ा में जाकर छिप गया। गुफ़ा की दूसरी तरफ़ घना जंगल था।
प्रज्वल गुफ़ा से बाहर आ गया और जंगल से होते हुए गुज़रने लगा। उसे बोड़ी भूख लगी। आगे और जाना उससे संभव नहीं हो पाया।

वह एक पेड़ की छाया में बैठ गया और थोड़ी ही देर में निद्रा की गोद में चला गया। थोड़ी देर बाद जब पानी की छीटें मुँह पर पड़ीं तो प्रज्वल ने आँखें खोलीं। उसने देखा कि सामने एक दिव्य तेजस्वी वृद्ध मुनि दंड कमंडल लिये मुस्कुराते हुए खड़े हैं।
उन्होंने बड़े ही मृदु स्वर में पूछा, ‘‘हिंसक जंतुओं से भरे इस जंगल में क्यों आये हो?'' ‘‘इनसे भी भयंकर अधिकारियों से बचने के लिए यहाँ आया महात्मा।'' कहते हुए वह उठ खड़ा हुआ और जो हुआ, उसने सविस्तार मुनि को बताया।
पूरा विषय जानने के बाद मुनि ने कहा, ‘‘हाँ, मैंने भी सुना कि अवंती राजा हेमांगद की असावधानी व लापरवाही के कारण ही अधिकारी प्रजा को सता रहे हैं।'' ‘‘ऐसे दुष्टों को दंड देने का क्या कोई मार्ग नहीं है?'' प्रज्वल ने बड़े ही आवेश-भरे स्वर में पूछा। ‘‘इतने दिनों तक तुम जैसे साहसी और समर्थ युवक की खोज में ही था पुत्र,'' मुनि ने कहा।
इसके बाद मुनि ने पास ही के पेड़ से, एक अजीब आकार की लकड़ी तोड़ी, आँखें बंद कर लीं और थोड़ी देर तक मंत्र जपते रहे। फिर डंडे के आकार की उस लकड़ी को प्रज्वल को सुपुर्द करते हुए कहा, ‘‘पुत्र, इस मंत्रदंड की सहायता से तुम अदृश्य होकर विचर सकते हो।
वायुवेग से तुम यात्रा कर सकते हो। शत्रुओं को शक्तिहीन बना सकते हो और उन्हें अंगुष्ठ भर के मानव बना सकते हो। फिर जब चाहो, उन्हें साधारण मनुष्यों में बदल सकते हो। इसके उपयोग का अधिकार केवल तुम्हें ही है और वह भी दुष्टों को दंड देने और शिष्टों की रक्षा करने के कामों में ही यह उपयोग में आयेगा। विजयोस्तु,'' कहते हुए उन्होंने आशीर्वाद दिया।
प्रज्वल ने, बड़े ही आनंद के साथ उस मंत्रदंड को स्वीकार किया, भक्तिपूर्वक उसे आँखों से स्पर्श किया और मुनि को साष्टांग नमस्कार करने के बाद वहाँ से चल पड़ा। दूसरे उसे न पहचानें, इसके लिए उसने अपना वेष बदल लिया।
अब उसके केश तांबे के रंग के थे, उसकी नाक अब बहुत लंबी थी, आँखें आग की तरह लाल-लाल थीं और उसके दाँत ओंठों के बाहर थे।


उसका पूरा शरीर काले कपड़े से ढका था। जब वह स्वग्रम लौट रहा था तब मार्ग मध्य में एक गाँव के बीचों बीच एक युवती ‘‘रक्षा करो, रक्षा करो'' कहती हुई दौड़ी जा रही थी। प्रज्वल उसे देखकर रुक गया। मस्त हाथी जैसा एक मध्य वयस्क, दस बलवानों को लिये, उस स्त्री का पीछा कर रहा था।
गाँव के लोग डर के मारे चुप थे। उन्हें रोकने की कोशिश कोई नहीं कर रहा था। ‘‘रुक जाओ'' कहते हुए प्रज्वल उस बदमाश के सामने खड़ा हो गया। बहुत ही नाराज़ होता हुआ वह मध्य वयस्क चिल्ला पड़ा, ‘‘मुझे रोकने का साहस करनेवाले तुम हो कौन?'' ‘‘कानून हूँ,'' प्रज्वल ने कहा। ‘‘इतने दिनों तक कहाँ रहे? कोई भी कानून मेरा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता। मैं ग्रमाधिकारी नागस्वर हूँ।
जिस युवती से शादी करना चाहूँगा, करके रहूँगा। मुझे रोकनेवाला वीर अब तक कोई पैदा ही नहीं हुआ,'' हुँकारते हुए ग्रमाधिकारी ने कहा। ‘‘अब तक ज़बरदस्ती शादी करने के अपराध में पाँच साल, अब इस युवती के बलात्कार के अपराध में एक साल की कठोर सज़ा इस देश के कानून के अनुसार सुना रहा हूँ'', प्रज्वल ने बड़े ही गंभीर स्वर में यह सज़ा सुनायी।
नागस्वर और क्रोधित हो उठा और चिल्ला पड़ा, ‘‘आख़िर तुम एक छोकरे हो। मुझे सज़ा सुनाने की तुम्हारी यह जुर्रत! देखते क्या हो, उसे पकड़ लो और पेड़ से बांध दो।'' उसने अपने आदमियों को हुक्म दिया।
कपड़ों में छिपाये मंत्रदंड को प्रज्वल ने निकाला और देखते-देखते नागस्वर और उसके अनुचर अंगूठे भर के आदमी हो गये। प्रज्वल ने उन्हें पकड़ लिया और एक छोटी टोकरी में डाल लिया। फिर अदृश्य हो गया। यह दृश्य देखकर लोग निश्र्चेष्ट रह गये। इसके कुछ क्षणों के बाद, प्रज्वल नंदिबर के कोतवाल के सामने प्रत्यक्ष हो गया।
फणिराज भी उस समय वहीं था। ‘‘केशव को जो रकम मिलनी थी, उसे दी नहीं गयी, उल्टे उसे क़ैद करना अन्याय है। फ़ौरन उसे छोड़ दो और जो रक़म उसे मिलनी है, उसे देकर भेज दो।'' प्रज्वल ने कहा।

‘‘हमें न्याय और अन्याय के बारे में बतानेवाले तुम कौन हो? चुपचाप यहाँ से चलते बनो। अनावश्यक ही हस्तक्षेप किया तो तुम्हें भी जेल में ठूँस दूँगा'', कोतवाल ने क्रोध-भरे स्वर में कहा। प्रज्वल ने फ़ौरन कोतवाल और फणिराज को अंगूठे भर के आदमियों में परिवर्तित कर
टोकरी में डाल लिया। फिर केशव को जेल से छुड़ाया और देखते-देखते सबकी आँखों से ओझल हो गया। उस दिन से लेकर प्रज्वल अदृश्य संचार करता रहा। मासूमों, कमज़ोरों व निरपराधियों को जब-जब, जहाँ-जहाँ ज़रूरत पड़े, सहायता करता रहा और दुष्टों को दंड देता रहा।
प्रज्वल को लेकर राज्य भर में तरह-तरह की अफ़वाहें फैलने लगीं। कुछ लोग कहने लगे कि छोकरा मांत्रिक अपराधियों को पकड़कर ले जाता है, उन्हें अंधेरी गुफ़ा में बंद करता है और उन्हें खूब सताता है। कुछ लोगों का यह भी कहना था कि कोई विचित्र शक्ति छोकरे मांत्रिक के रूप में कानूनन दंडों को अमल में लाती है।
पर, सब मानने लगे कि इससे सामान्य प्रजा के कष्ट दूर हो गये। उन अधिकारियों व निरंकुशों की नींद उड़ गयी, जो कमज़ोरों को सताते रहे। उन सबने राजा से इसकी शिकायत की। राजा ने महामंत्री को बुलाकर इसके बारे में दीर्घ चर्चाएँ कीं।
दूसरे दिन राजा ने सभा बुलायी। सभी मंत्री, अधिकारीगण उपस्थित हुए। राजा ने छोकरे मांत्रिक के क्रियाकलापों पर प्रकाश डाला और कहा, ‘‘अब इसपर यह चर्चा करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि छोकरा मांत्रिक अच्छा कर रहा है या बुरा। यह तो स्पष्ट है कि उसने हमारे अधिकारों को अपने हाथ में ले लिया।
एक राज्य में दो अधिकार केंद्रों का होना ख़तरनाक है। शीघ्र ही उसके निर्मूलन का मार्ग ढूँढ़ना होगा।'' यह सुनते ही महामंत्री भय के मारे कांपते हुए कहने लगा, ‘‘महाप्रभु, पहले मुझे जेल में डाल दीजिये।'' राजा ने आश्चर्य-भरे स्वर में पूछा, ‘‘आपको क्यों जेल में डालें?'' ‘‘आपकी जानकारी के बिना प्रजा को सतानेवाले कुछ अपराध मैंने किये।

उस छोकरे मांत्रिक के हाथ आ जाऊँगा तो वह मुझे खूब सतायेगा। उससे अच्छा यही होगा कि मैं जेल में रहूँ और वहाँ यातनाएँ सहूँ।'' महामंत्री ने दीन स्वर में कहा। राजा चाहते नहीं थे, पर उन्होंने उसके अपराधों की जांच-पड़ताल करवायी और कानूनन् उसे जेल की सज़ा सुनायी। इसके बाद राजा के आस्थान के कुछ और अधिकारियों ने भी स्वच्छा से अपनी-अपनी ग़लतियाँ स्वीकार कीं और कानून के सामने झुक गये।
राज्य भर में ख़बर फैल गयी कि सब अपराधियों ने अपने-अपने अपराध स्वीकार किये और कानूनन् उन्हें सज़ा दी गयी। क्रमशः राज्य में अपराधियों की संख्या बहुत बड़ी मात्रा में कम हो गयी। अब ऐसी अच्छी परिस्थिति उत्पन्न हो गयी कि प्रज्वल को अपनी तरफ़ से किसी पर कोई कार्रवाई करनी नहीं पड़ी।
इस वजह से भी प्रज्वल के बारे में लोगों ने बोलना बन्द कर दिया। एक दिन शाम को महाराज महामंत्री के साथ उद्यानवन में टहलने लगे तो उन्होंने कहा, ‘‘मंत्रिवर, आपकी सलाह का परिणाम बहुत ही अच्छा निकला। प्रजा अब शांति से जीवन बिता रही है।'' ‘‘अभिनंदन मेरा नहीं महाराज, उस छोकरे मांत्रिक का कीजिये, जिसकी वजह से यह आमूल परिवर्तन संभव हो पाया है'', मंत्री ने कहा।
‘‘वह कैसे?'' राजा ने पूछा। ‘‘हाँ, महाराज, वह मांत्रिक एक दिन मेरे पास आया था और उसने अपने कामों का पूरा विवरण दिया। उन अपराधियों को भी दिखाया, जिन्हें उसने पिंजड़ों में बंद रखा था। पहले तो मुझे इस बात पर खुशी हुई कि जो काम हम नहीं कर सके, उसने वह करके दिखाया।
फिर बाद मुझे लगा कि अपराधियों के प्रति दया दिखानी नहीं चाहिये, उन्हें उनके बुरे कामों के लिए दंड मिलना ही चाहिये। साथ ही, मैंने यह भी महसूस किया कि भय होने पर ही बुरे कामों से लोग दूर रहेंगे। इसीलिए मैंने यह उपाय सोचा, जिससे अपराधी स्वेच्छा से कानून के सामने झुक जाएँ। इसीलिए मैंने दोषी होने का नाटक किया।'' राजा मंत्री की तीक्ष्ण बुद्धि पर बेहद खुश हुए।





जुड़वीं राजकुमारियाँ

कर्मपुर के राजा बोपदेव के केवल दो पुत्रियाँ थीं, दोनों जुड़वीं राजकुमारियाँ थीं। उनमें से एक गोरी थी जिसका नाम श्वेता था। दूसरी लड़की काली थी, उसका नाम कृष्णा था। रंग में अंतर होने पर भी दोनों की रूप-रेखाएँ समान थीं। दोनों लाड़-प्यार में पलीं, धीरे-धीरे दस वर्ष की हो गईं।
एक दिन श्वेता उद्यान में टहल रही थी, तब एक पेड़ पर से पक्षियों का एक घोंसला नीचे आ गिरा। दोनों कन्याएँ डर कर ज़ोर-शोर से रोने लगीं। उनका रोना सुनकर परिचारिकाएँ दौड़ी दौड़ी आ गईं । उन लोगों ने पक्षियों का घोंसला देखा। उसमें दो अण्डे थे। परिचारिकाओं ने अण्डों सहित उस घोंसले को चमेली के पौधों की झाड़ी में फेंक दिया और राजकुमारियों को साथ लेकर राजमहल के भीतर चली गईं। मगर डरने की वजह से राजकुमारियाँ बुखार का शिकार हो गईं। इलाज कराने पर भी बुखार नहीं उतरा।
एक दिन रात को राजा ने एक विचित्र सपना देखा। उस सपने में राजा ने पाँच रंगोंवाले एक पक्षी को देखा। उस पक्षी ने मानव की बोली में राजा से यों कहाः
‘‘राजन! मैं देव पक्षी हूँ। मैंने आप के बगीचे में एक पेड़ पर घोंसला बनाकर उसमें दो अण्डे दिये। उन्हें सेंककर उन पक्षियों को मैंने आप की राजकुमारियों को भेंट करना चाहा। मगर आप की मूर्ख परिचारिकाओं ने उन अण्डों को चमेली की झाड़ियों में फेंक दिया है।''
‘‘मैं अभी उन अण्डों को ढूँढवाकर मँगवा देता हूँ।'' राजा ने जवाब दिया।
‘‘अब यह संभव नहीं है। उन अण्डों का फूटना तथा उनमें से बच्चों का उड़ जाना एक साथ हो गया है। वे दोनों छोटे पक्षी इस व़क्त आप के राज्य के पश्चिमी पहाड़ की चोटी पर हैं। तुम खुद उस चोटी पर चढ़ जाओ, उन पक्षियों को लाकर उन्हें स्वादिष्ट खाना खिलाओ। यदि वे प्रसन्न हो गये तो तुम्हें दो अण्डे देंगे। पाँच साल बाद वे अण्डे रत्नों में बदल जायेंगे। उन पक्षियों को वापस लाते ही तुम्हारी लड़कियों का बुखार जाता रहेगा।'' पक्षी ने कहा।

‘‘उस पहाड़ की चोटी सीधा है। उस पर चढ़ना असंभव है। आज तक कोई भी उस चोटी पर चढ़ा न होगा।'' राजा ने उत्तर दिया।
‘‘मैं यह नहीं जानता कि तुम उस पर कैसे चढ़ पाओगे? मगर यह बात सच है कि तुम जब तक उन पक्षियों को न लाओगे, तब तक तुम्हारी लड़कियों का बुखार नहीं उतरेगा! सुनो, एक बात और है। अण्डे जब रत्नों में बदल जायेंगे, तब उनमें से एक सफ़ेद होगा, दूसरा गुलाबी रंग का होगा। श्वेता नामक लड़की को गुलाबी रंग के रत्न को हाथ में लेना होगा। कृष्णा सफ़ेद हीरे को ले। ऐसा न हो तो दोनों के लिए ख़तरा पैदा होगा।'' यों समझाकर पक्षी गायब हो गया।
राजा बोपदेव नींद से जाग पड़ा। रानी को अपने सपने का वृत्तांत बताया।
दूसरे दिन प्रातःकाल राजा ने अपने मंत्रियों को बुला भेजा, उनके सामने सपने का वृत्तांत रखा। पर मंत्री कोई सलाह दे न पाये। इस पर राजा ने मंदिर में जाकर भगवान से प्रार्थना की।
अचानक भगवान की मूर्ति के नीचे से एक गोह बाहर आयी, दीवार पर रेंगकर, पुनः उतर आयी और राजा के निकट आकर खड़ी हो गयी।
इस पर राज पुरोहित ने कहा, ‘‘महाराज, भगवान ने आप के प्रति अनुग्रह करके आप की सहायता के लिए गोह को भेज दिया है।''
‘‘यह मेरी सहायता कैसे कर सकेगी?'' राजा ने पूछा।
‘‘उसी ने स्वयं मार्ग दिखाया! दुर्ग की दीवारों को पार करने में गोह से बढ़कर कोई दूसरा प्राणी काम नहीं दे सकता। उसकी पकड़ अनुपम होती है। उसकी कमर में रस्सी बांधकर पहाड़ की चोटी पर भेज दें, तो आप उस रस्सी को पकड़ कर निर्भय ऊपर चढ़ सकते हैं।''
राज पुरोहित ने युक्ति बताई। फिर भी सुरक्षा की दृष्टि से चोटी के नीचे मज़बूत जाल बिछाये गये ताकि राजा के गिरने पर चोट न आवे। गोह को शक्तिशाली भोजन खिलाया गया। एक दिन सवेरे राजा अपनी तलवार, खाना तथा पानी लेकर पहाड़ की ओर चल पड़ा। गोह की कमर में हल्की व मजबूत रस्सी बांध दी गई और उसको पहाड़ की चोटी पर भेज दिया गया।

उसके ऊपर पहुँचते ही दो सैनिकों ने रस्से को खींचकर पकड़ा, झट गोह चट्टान से चिपक गई, दो व्यक्तियों ने रस्सी पकड़ कर खींचा, फिर भी गोह ने अपनी पकड़ ढीली नहीं की। इसके बाद राजा भगवान का स्मरण कर उस रस्सी को पकड़ ऊपर चढ़ गया।
नीचे राजा का परिवार और रानी डरते हुए खड़े रहे ।
राजा जब चोटी पर पहुँचा तब सूर्यास्त हो रहा था, फिर चन्द्रमा निकल आया। राजा ने रस्सी को गोह की कमर से खोल दिया और उसकी एक छोर को एक मजबूत चट्टान से बांध दिया। चांदनी में राजा को एक नाटा पेड़ दिखाई दिया। उसके निकट जाने पर पेड़ पर दो पक्षी दिखाई दिये। उस पेड़ के तने से दो सिरोंवाला एक सर्प लिपटा हुआ था। राजा को देखते ही अपने दोनों फणों को फैलाये मुँह खोले वह सर्प आगे बढ़ा। राजा ने एक ही वार से साँप को मार डाला। साँप नीचे गिर गया।
बोपदेव जब पक्षियों तथा गोह को लेकर चोटी से उतर कर नीचे आया, तब तक सवेरा होने को था। गोह को नीचे उतारते ही विचित्र ढंग से उसने अपने पंख फैलाये और आसमान में उड़ गया।
पक्षियों के साथ राजा के महल में प्रवेश करते ही राजकुमारियों का बुखार उतर गया। दूसरे दिन पक्षियों ने दो अण्डे दिये और गायब हो गये।
राजा ने उन अण्डों को एक चांदी की टोकरी में रखवाकर लोहे की पेटी में बंद किया।
क्रमशः पाँच साल बीत गये। श्वेता और कृष्णा पंद्रह साल की हो गईं। राजा ने लोहे की पेटी खोलकर देखा तो उसमें से कांति की किरणें फूट पड़ीं। अण्डों की जगह दो रत्न चमक रहे थे। एक सफ़ेद था और दूसरा गुलाबी रंग का रत्न था।
राजा ने जिस व़क्त उन्हें बाहर निकलवाया, उस वक्त राजकुमारियाँ भी वहाँ पर उपस्थित थीं।
राजा ने अपनी पुत्रियों से कहा, ‘‘बेटियो, ये रत्न तुम्हीं लोगों के लिए हैं। इनसे तुम्हारी क़िस्मत खुल जाएगी। तुम यह चिंता न करो कि कौन-सा रत्न किसका है। आज शाम को तुम दोनों को सफ़ेद चंपा के फूल सुराही में रखकर दूँगा। तुम रोज उन फूलों का परिशीलन करते जाओगी तो तुम्हें ख़ुद मालूम हो जाएगा कि उन में से कौन सा रत्न किसका है?''

उसी दिन राजा ने दरबारी जादूगर मायापाल को गुप्त रूप से अपने रहस्य कक्ष में बुला भेजा और कहा, ‘‘मायापाल! रत्न आ गये हैं, अब तुम्हें अपने जादू का प्रयोग करना होगा।''
‘‘महाराज!'' यह कार्य भी आप ही कर सकते हैं न? यह कोई कठिन कार्य थोड़े ही है? श्वेता को दिये जानेवाले सफ़ेद चंपा के पुष्प-पात्र में थोड़ी लाल स्याही मिलाकर इस तरह बिठाइए जिससे फूल की नली उसमें डूबी रहे।
धीरे-धीरे पुष्प की पंखुड़ियाँ अपने आप गुलाबी रंग में बदल जायेंगी। प्रयोग की यह विधि मैंने आप को पहले ही बता दी है।'' मायापाल ने समझाया।
‘‘तुमने तो बताया है, फिर भी यह कार्य तुम्हारे हाथों द्वारा हो जाये तो अच्छा होगा।'' राजा ने कहा। इस पर दोनों हँस पड़े।
उस दिन रात को श्वेता तथा कृष्णा को दो गुच्छे सफ़ेद चंपा के फूल पात्रों के साथ प्राप्त हुए। पात्रों पर दोनों के नाम स्पष्ट रूप से अंकित थे। दोनों ने उन पात्रों को अपने-अपने कमरों में रख लिया और पुष्पों की निगरानी करती रहीं। कृष्णा को जो फूल दिये गये, वे पहले ही जैसे सफ़ेद रह गये, लेकिन श्वेता को दिये गये फूल दूसरे दिन से अपने रंग बदलने लगे। और अन्त में गुलाबी हो गये।
यह ख़बर मालूम होते ही राजा बोपदेव बहुत प्रसन्न हुआ और बड़ी शीघ्रता से अपनी पुत्रियों के यहाँ गया और पूछा, ‘‘बेटियो, अब तुम्हें मालूम हो गया है न कि कौन-सा रत्न किसका है?'' इन शब्दों के साथ राजा ने थाली में स्थित रत्न दिखाये। श्वेता ने गुलाबी रंग के रत्न को अपने हाथ में लिया तो कृष्णा ने सफ़ेद रत्न को।
अब मायापाल की बात रही। राजा से उसको बढ़िया पुरस्कार प्राप्त हुआ।

बादलों तक बढ़ गई नाक

जापान के मुख्य क्षेत्र के चारों ओर फैले द्वीपों में से एक द्वीप में एक झील है। दरअसल झील में कोई विशेषता नहीं है; विशेषता है इसमें रहनेवाली मछलियों के एक झुण्ड में। वैसी मछलियाँ कहीं नहीं दिखाई देतीं। इनकी नाकें असाधारण रूप से लम्बी होती हैं।


जनश्रुति के अनुसार कथा इस प्रकार हैः एक समय उस झील के पास एक ढोलकिया रहता था जिसे गाँवों के लोग शादी-व्याहों और त्योहारों पर पैसे देकर ढोल बजाने के लिए बुलाया करते थे। वह इतना गरीब था कि एक बार जब भूकम्प से उसकी झोंपड़ी गिर पड़ी तो दूसरी झोंपड़ी बनाने के लिए उसके पास साधन नहीं था। वह चुपचाप झील के निकट पहाड़ी के नीचे एक गुफा में रहने लगा। धीरे-धीरे वह बूढ़ा हो चला। ढोल बजाने में असमर्थ होने के कारण उसकी कमाई बन्द हो गई। इसलिए उसके पास खाने के लिए कुछ न रहा। कुछ ग्रामीणों को उस पर दया आ गई। इसलिए वे कभी-कभी उसके लिए गुफा में कुछ खाना रख जाते थे।


वह एक दिन जब मरणासन्न हो रहा था, तब गाँव का एक लड़का कुछ खाना लेकर उसके पास आया। वही उसका अन्तिम भोजन साबित हुआ। उसने लड़के को कहा, ‘‘बेटे, तुम्हारी सेवा के लिए मुझे कुछ इनाम अवश्य देना चाहिये। यह मेरा ढोल है। क्योंकि मैं बड़े प्यार से इसकी देखभाल करता था, इसने हाल में मुझे एक वरदान दिया है। जब मैं किसी की नाक की ओर देखकर इसे बजाता हूँ और ‘ऊपर, ऊपर’ बोलता हूँ, तब उसकी नाक बड़ी होने लगती है। जब कहता हूँ ‘नीचे-नीचे’ तब नाक छोटी होने लगती है।

आस-पास बहुत से ऐसे मर्द और औरत हैं जो अपने चेहरे के हिसाब से अपनी नाक को छोटी या बड़ी करना चाहते हैं। इसे मेरी ओर से भेंट के रूप में रख लो और पैसे कमाने के लिए इसका इस्तेमाल करो। लेकिन याद रखो, कभी भी अपनी या किसी अन्य की उत्सुकता के लिए ढोल की शक्ति का प्रयोग न करो। अच्छ बेटे, उम्मीद है, मेरे मर जाने पर मेरे मृत शरीर की अन्तिम क्रिया का इन्तज़ाम कर दोगे।’’


उस वृद्ध व्यक्ति ने उसके बाद तुरन्त देहत्याग कर दिया। लड़के ने गाँववालों की मदद से अच्छी तरह उसका अंतिम संस्कार कर दिया। तब वह उस विचित्र ढोल का प्रयोग करने लगा। जमीन्दार की बेटी की नाक बहुत छोटी थी। लड़का उसके पास गया और ढोल बजाते हुए ‘ऊपर, ऊपर’ बोलने लगा। और लड़की की नाक उसके चेहरे के अनुसार बिलकुल ठीक कर दी। इससे रातो रात वह प्रसिद्ध हो गया। बहुत लोग अपनी नाक को घटाने या बढ़ाने के लिए उसके पास आने लगे। लोग उसे चमत्कारी ढोलकिया कहने लगे और उसके काम के बदले काफी पैसे देने लगे।


यों एक-दो साल गुजर गये और वह अब अमीर आदमी बन गया। एक दिन वह जब झील के पास अकेला था, उसके मन में यह जानने की प्रेरणा जगी कि ढोल कितना अधिक कर सकता है। वह पीठ के बल लेट गया और अपनी नाक पर नज़र रखते हुए ‘ऊपर, ऊपर’ बोलने लगा। उसकी नाक बढ़ने लगी। कितना मज़ेदार था! वह और तेज़ी से ‘ऊपर, ऊपर’ बोलता गया और उसकी नाक भी बॉंस के लट्ठे की तरह तेज़ी से बढ़ती लम्बी होती चली गई।


इस अनोखे दृश्य की ओर दो गरुड़ों की नज़र गई। वे इसके चारों ओर चक्कर लगाने लगे। लड़के को यह देखकर बड़ा मज़ा आया। लेकिन एक गरुड़ ने उसकी मुलायम नाक को अपनी चोंच से पकड़ किया और पीड़ा की एक लहर उसकी मीनार जैसी नाक के निचले हिस्से तक फैल गई।


अब वह यथासम्भव तेज़ी से ‘नीचे-नीचे’ जपने लगा। लेकिन गरुड़ ने अपनी पकड़ को नहीं छोड़ा। वास्तव में वह ऊपर की ओर उड़ने की कोशिश करने लगा।
फलस्वरूप ढोलकिया ऊपर उठ गया। जैसे-जैसे उसकी नाक छोटी होती गई, वह और ऊपर उठता गया। जब वह गरुड़ से बिलकुल छू गया, वह विशाल पक्षी चीख पड़ा। उसकी चोंच खुलते ही, ढोलकिया उसके मुँह से छूट कर झील में गिर पड़ा। आह ! वह लम्बी नाकवाली मछली में बदल गया था ! उसे यह भी याद न रहा कि बूढ़े ढोलकिये ने उसे यह चेतावनी दी थी कि अपनी उत्सुकता को शान्त करने के लिए ढोल का प्रयोग कभी न करना। (एम.डी)


नरक जो दिखाये

कामेश की हमेशा यही इच्छा रहती थी कि कैसे भी हो, रामेश से अधिक अक्लमंद कहलाऊँ, और लोगों के सामने उसे नीचा दिखाऊँ। इसलिए पास ही के गाँव में जाकर उसने चित्रकला सीखी और अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने के मौक़े की प्रतीक्षा करने लगा।
उस साल गाँव में चोरियाँ बहुत बढ़ गयीं। जो चोर पकड़े गये उनके हाथों में हथकड़ियाँ लगायी गईं, जेल में ठूंसकर उन्हें तरह-तरह से सताया गया, पर चोरों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
ग्रामाधिकारी ने गाँव के प्रमुख लोगों से इसके बारे में बातें कीं। उन्होंने कहा, ‘‘गाँव में सती सावित्री की कथा का आयोजन करेंगे? जिसे क़ैदी चोर भी सुनेंगे। उस कथा में सावित्री सत्यवान के प्राण ले जानेवाले यमराज का पीछा करती है, उस महा पतिव्रता को यमराज ने डरा कर लौट जाने का आदेश दिया। यह भी बताया कि नरकलोक कितना भयंकर होता है। अतः चोर नरक की यातनाओं के भय से शायद चोरियाँ न करें, उनसे दूर रहें।''
कामेश ने तुरंत कहा, ‘‘नरकलोक का चित्र दिखायेंगे तो उनमें डर और बढ़ जायेगा। इसलिए घोषणा करेंगे कि जो नरकलोक का चित्र प्रदर्शित करेंगे, उन्हें पुरस्कार दिया जायेगा।''
‘‘उपाय तो सही लगता है, परंतु पुरस्कार का मैं विरोध करता हूँ,'' रामेश ने कहा।
‘‘यह विरोध अच्छा संस्कार नहीं कहलाता,'' कामेश ने कड़े स्वर में कहा।
रामेश इसपर हँस पड़ा और बोला, ‘‘जो ज़िन्दा हैं, उन्हें नरकलोक का चित्र दिखाना और उस कलाकार को पुरस्कार देना, संस्कार नहीं कहलाता। यह निर्णय गाँव के प्रमुखों पर छोड़ता हूँ।''
सब हँस पड़े। कामेश, रामेश के हाथों एक बार और हार गया।


चतुर पत्नी

कोमन एक गरीब हज्जाम था। वह कडालुण्डी नाम के गाँव का रहनेवाला था जो जैमरिन राजा की राजधानी कोळिकोड के पास ही था। वह घुमन्तु हज्जाम था जो सुबह-सुबह अपने ग्रहकों के घर हजामत बनाने के लिए पहुँच जाता था। आजकल के सैलूनों के विपरीत जिसमें हज्जाम की कैंची और छूरा ग्रहकों के सिर पर या चेहरे पर चलते हुए देखने के लिए चारों ओर दर्पण लगे रहते हैं, कोमन या तो अपने ग्रहकों से ही शीशा माँग लेता था या अपने थैले में से एक छोटा-सा आइना निकालकर उन्हें दे देता था जिसमें वे देख कर तसल्ली कर लेते थे अथवा अन्तिम रूप देने के लिए कुछ निर्देश दे दिया करते थे।
वह किसी के द्वारा बुलाये जाने का इन्तजार नहीं करता था। उसके रास्ते निश्चित थे और उन रास्तों पर रहनेवाले अपने सभी ग्रहकों के काम करता हुआ इस उम्मीद से आगे बढ़ता चला जाता कि वे सब उसकी सेवा लेने के लिए तैयार बैठे होंगे। कभी-कभी वे घर से बाहर गये हुए होते या बीमार होते तब उसे उनके पास किसी और दिन जाना पड़ता। यदि वह उनकी सुविधा के मुताबिक नहीं जा पाता तो वे सब नाराज हो जाते और अगली बार उसके जाने पर उससे हजामत बनाने से इनकार कर देते। जब वह निराश हो वापस जाने के लिए फाटक की ओर मुड़ने लगता, उसके कानों में उनकी बड़बड़ाहट सुनाई पड़ती, ‘‘निकम्मा कहीं का।'' यहाँ तक कि उसके ग्रहक घटने लगे और उसकी जेब में सिक्कों की खनखनाहट मन्द पड़ने लगी।

कोमन और उसकी पत्नी गोमती को धीरे-धीरे भूखों मरने की नौबत आ गई। एक दिन गोमती के मुँह से यह कहते सुनकर वह अवाक् रह गया- ‘‘काहिल कहीं का। अब कैसे निर्वाह होगा?''
वह उस दिन चुपचाप रह गया। उसने सोचा कि जब वह दो जून खाने भर काफी पैसे कमाकर लौटेगा तब उसकी राय बदल जायेगी। वह अपना थैला उठाकर दोपहर की रोटी लिये बिना चलता बना। उसने कुछ पैसे जरूर कमाये, लेकिन उसे मालूम था कि वे पैसे दो व्यक्तियों के अच्छे भोजन के लिए काफी नहीं होंगे। वह घर लौट गया और कमाई के थोड़े पैसे जो मिले थे उसके हाथ पर रखते हुए मानो बोला कि शाम और कल सुबह तक काम चला लो। गोमती थोड़े-से पैसों को देखकर झल्ला पड़ी, ‘‘गोबर गणेश!''
दिन बीतते गये। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब उसे अपनी पत्नी से कुछ न कुछ ताना सुनना नहीं पड़ता। एक दिन और पत्नी को देने के लिए उसके पास अधिक पैसे नहीं थे। ‘‘बेकार आदमी! हम कैसे जिन्दा बचेंगे, सोचा कभी?'' पत्नी ने फिर खरी-खोटी सुना दी।
उस दिन उससे जवाब दिये बिना रहा नहीं गया। ‘‘मैं कर भी क्या सकता हूँ? तुम मुझे हमेशा बेकार कहा करती हो जैसे मैंने कभी ठीक काम कभी किया ही नहीं या कभी कर भी नहीं सूकंगा।'' उसने अपना थैला एक कोने में फेंक दिया और हाथ-पाँव धोने चला गया।
जब कोमन हाथ-पाँव धोकर कुएं पर से वापस आया, गोमती वहीं खड़ी थी। वह बोली, ‘‘तुम भूखा मरना चाहो तो मरो, लेकिन मेरा इरादा ऐसा नहीं है।''
‘‘यदि तुम अपने को ज़्यादा होशियार समझती हो'', कोमन ने थोड़ा दुखी होकर कहा, ‘‘तब तुम्हीं क्यों नहीं कुछ सोचती?''
‘‘जाकर भीख माँगो'', गोमती ने कहा।
‘‘भीख?'' कोमन ने पूछा। नाई के थैले की बजाय हाथ में भीख का कटोरा लेकर घूमने के विचार मात्र से वह घबरा गया। ‘‘भीख? कहाँ जाकर माँगू?''
‘‘जैमॅरिन के महल में जाओ'', उसने कहा, मानो वह चुनौती दे रही हो। ‘‘उसकी बेटी की जल्दी ही शादी होनेवाली है और मुझे पूरा विश्वास है कि वह हरेक के साथ मेहरबान रहेगा। तुम उससे कुछ माँग लेना।''

अगली सुबह वह चल पड़ा लेकिन अपने थैले के बिना ही। उसे बहुत दूर पैदल जाना पड़ा। वह सीधे जैमरिन के महल में पहुँचा और राजा से मिलनेवालों की पंक्ति में खड़ा हो गया। जब राजा से मिलने की उसकी बारी आई, तब तक उसने ‘‘कुछ'' माँग लेने का निश्चय कर लिया था, जैसाकि उसकी पत्नी ने उसे सलाह दी थी।
‘‘हज्जाम कोमन!'' महल के परिचर ने आवाज लगाई और उसे राजा के सामने उपस्थित किया गया।
कोमन ने हाथ जोड़कर और झुककर सलाम किया। जब उसने सिर उठाकर राजा की ओर देखा, राजा ने पूछा, ‘‘क्या चाहते हो, कोमन?''
‘‘कुछ भी, महाराज!'' कोमन के मुँह से निकल पड़ा।
‘‘कुछ भी?'' जैमॅरिन ने हैरान होकर पूछा, ‘‘तुम्हारा क्या मतलब है? ठीक-ठीक बताओ।''
‘‘कुछ भी, महाराज!'' कोमन ने हाथ जोड़ कर फिर निवेदन किया।
जैमॅरिन ने क्षण भर सोचा और फिर मंत्री की ओर देखा। मंत्री ने राजा के पास जाकर पूछा, ‘‘क्या आज्ञा है, महाराज?''
राजा ने मंत्री के कान में धीमे से कुछ कहा, ‘‘वह हज्जाम है, राज्य के लोगों की सेवा कर रहा होगा। पाँच एकड़ की वह बंजर भूमि उसे दे दो। देखें, उस पर वह कोई फसल उगाता है या नहीं?''
मंत्री ने राजा की बुद्धि की तारीफ की। जो सिर पर की फसलें काटता है, अब उसे फसल उगानी पड़ेगी! उसने एक परिचर को बुलाकर कहा, ‘‘इस आदमी को महल के पूर्वी भाग में पड़ी उस बंजर भूमि पर ले जाओ।'' फिर वह कोमन से बोला, ‘‘यह आदमी तुम्हें पाँच एकड़ भूमि दिखायेगा। यह राजकुमारी के विवाह के अवसर पर राजा की ओर से भेंट है। वापस आकर बताना कि तुम क्या उगाने जा रहे हो और कितना? अब जाओ और सुखी रहो।''
कोमन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसने तो राजा से ‘‘कुछ भी'' माँगा था और क्या से क्या मिल गया। उसे एक ऐसी चीज मिल गई थी जिसे मापा और देखा जा सकता था। उसकी खुशी थोड़ी-सी तब मुरझा गई जब उसे वह बंजर ज़मीन दिखाई गई। फिर भी वह ‘कुछ' तो था जिससे अपनी पत्नी का कड़वा मुँह बन्द कर सकता था।


लेकिन गोमती, आशा के विपरीत, बिलकुल खुश नहीं थी। ‘‘जमीन! और वह भी बंजर !'' वह चिल्लाई। ‘‘हम इसका क्या करेंगे? हमारे पास न हल है, न बैल हैं! फिर हम खेत को कैसे जोतेंगे, कैसे बीज बोयेंगे और फसल कैसे काटेंगे? और तब तक खायेंगे क्या? जैमरिन के पास वापस जाओ और इसके बदले कुछ पैसे माँग लाओ। अभी तो इसी की जरूरत है!''
लेकिन कोमन ने जैमॅरिन के पास दुबारा जाने से मना कर दिया। ‘‘तुम्हें कुछ करने के लिए सोचना होगा'', उसने अपनी पत्नी से कहा।
गोमती ने क्षण भर सोचने के बाद कहा, ‘‘मेरे साथ उस भूमि पर चलो और वहाँ पहुँचने पर ठीक वैसा ही करो जैसा मैं करूँगी'', ऐसा कह कर वह अपने पति के साथ राजा द्वारा भेंट में दी गई बंजर भूमि पर गई।
जब वे खेत पर पहुँच गये तब गोमती खेत पर चारों ओर चक्कर लगाने लगी। कभी कोई पत्थर को उलटकर देखती, कभी जमीन पर पाँव पटकती और कभी निराश हो जाती। जब गोमती किसी को पास में आते हुए देखती तब वह भूमि पर बैठ जाती और समय काटने का बहाना करती। कोमन भी वैसा ही करता हालांकि उसे मालूम नहीं था कि ऐसा करने से क्या होगा। जब गोमती ने एक पत्थर उठाकर जमीन में झांका, कोमन ने एक दूसरा पत्थर उठाकर वैसा ही किया। उसने भी कई स्थानों पर पैर पटका और जब गोमती बैठी तब वह भी अपने माथे का पसीना पोंछता हुआ बैठ गया। राहगीर उत्सुकता से यह देखने के लिए कुछ देर रुक जाते और फिर अपनी राह चल पड़ते।
चार व्यक्तियों के एक गिरोह ने, इन दोनों को बहुत देर तक देखा। उनमें से एक गोमती के पास जाकर बोला, ‘‘इस तपती दुपहरिया में आप क्या कर रही हैं श्रीमती जी? और आप चिन्तित दिखाई पड़ती हैं!''

गोमती ने नजर उठाकर उस आदमी के चेहरे को थोड़ी देर तक गौर से घूरा। उसने ऐसा अभिनय किया मानो उसे सचाई बताने में संकोच हो रहा है। उसने धीमी आवाज में कहा, ‘‘धन्यवाद कि आपने यह सवाल किया। लेकिन यह मैं तभी कहूँगी जब आप वादा करेंगे कि आप इस बात को किसी से नहीं कहेंगे।'' वह थोड़ी देर रुकी। जब उस आदमी ने सिर हिलाया और उसकी धीमी आवाज को सुनने के लिए उसकी ओर कान बढ़ाया, तब वह बोली, ‘‘हमलोग गरीब आदमी हैं; लेकिन हमारे पूर्वज काफी मालदार थे। हमारे परदादा को सोने के घड़ों को इस खेत में गाड़ने की आदत थी, किन्तु वे अब नहीं मिल रहे हैं। खेत काफी बड़ा है और हमें पता नहीं चल रहा कि कहाँ खोदें।''
‘‘यह तो बड़ी दिलचस्प बात है।'' उस आदमी ने अपनी मूँछ ऐंठता हुआ कहा। वह वास्तव में चोर था। ‘‘तुम्हें और तुम्हारे पति को शुभकामनाएँ। मुझे आशा है कि तुम्हें शीघ्र ही खजाना मिल जायेगा।'' वह वापस अपने गिरोह में शामिल हो गया। कुछ दूर जाकर उस पति-पत्नी का राज़ उसने अपने दोस्तों से बताया जो कड़ी धूप में अपनी किस्मत खोज रहे थे।
गोमती तब तक खेत पर ही बैठी रही, जब तक वह आदमी आँखों से ओझल नहीं हो गया। ‘‘चलो, घर लौट चलते हैं। कल फिर आयेंगे।''
जब दूसरे दिन सुबह पति-पत्नी खेत पर आये तब पूरा खेत खोदा हुआ था। शायद उन चोरों ने सोने के घड़ों को पाने की आशा में खेत पर लौट कर यह कठिन श्रम किया होगा।
‘‘देखो, मैंने कैसे पूरे खेत को खुदवाने की तरकीब सोची'', गोमती ने कहा। ‘‘अब हमें बाजार जाकर कुछ बीज खरीदने हैं और उन्हें खेत में बोना है। मैं अब उन दिनों की आशा करने लगी हूँ जब दिन में एक बार नहीं, बल्कि तीनों बार भोजन मिलेगा। तुम्हारा क्या ख्याल है, मेरे बेकार पतिदेव महाराज!''
‘‘शाबाश! मेरी चतुर श्रीमती!'' मुस्कुराता हुआ कोमन बोला।



लालची भठियारा

यह मदुराई की घटना है। पांडयन-शासकों के समय यह एक समृद्ध नगर था। चामी एक मेहतर था। उसे अपना काम शुरू करने के लिए बहुत सवेरे उठना पड़ता था। राजा घोड़े पर सवार होकर पूजा के लिए मन्दिर जाया करता था। इसलिए मार्ग को साफ-सुथरा रखना पड़ता था। राजा दो घोड़ों के सुनहले रथ पर जाता था। दो घुड़सवार अंगरक्षक राजा की सवारी निकलने से पहले आकर मार्ग का मुआयना करते थे। इसलिए उसे अपना काम परिश्रमपूर्वक करना पड़ता था।


उस दिन जब अंगरक्षक उसके आगे से निकले, उसने उन्हें ध्यान से देखा। वे कीमती लाल ज़री की पोशाक और बैंगनी रंग की रेशमी पगड़ी पहने थे। राजा का अंगरक्षक होना कैसा लगता होगा ! उसके मन में सोचा।


चामी ने शीघ्र ही अपना काम पूरा कर लिया और घर वापस चला गया। चामी ने जल्दी-जल्दी आंगन के कुएं पर स्नान लिया। नहा-धोकर जैसे ही वह चारपाई पर बैठा कि उसकी पत्नी एक गिलास ताजा दूध ले आई।


‘‘तुम क्या जानती हो मीना, मैंने इतने ख़ूबसूरत घोड़े कभी नहीं देखे। उन पर सवारी करना, आह! कितना अच्छा लगता होगा।’’ उसकी आँखों में देखते हुए चामी ने कहा।


‘‘तुम्हारा तात्पर्य अंगरक्षकों के घोड़ों से है?’’ मीनाक्षी ने पूछा, ‘‘फिर भी, तुम तो इतने डरते हो कि उन पर सवारी नहीं कर पाओगे!’’ वह गिलास उठा कर अन्दर चली गई।


चामी रसोई घर तक उसके पीछे-पीछे गया। ‘‘मैं नहीं डरूँगा और यह मैं एक दिन साबित करके तुम्हें दिखा दूँगा’’, उसने कहा मानों वह चुनौती दे रहा हो।



मीनाक्षी शायद चिढ़-सी गई। ‘‘हमलोगों के अगले निवाले का तो ठिकाना नहीं है और चले हैं घुड़सवारी का सपना देखने। बारिश के पहले घर पर नया छप्पर डालना पड़ेगा। तुम पहाड़ों पर जाकर घर की मरम्मत भर धन के लिए प्रार्थना क्यों नहीं करते? मुझे अब ज़मीन्दार के घर जाना है। आज उसके पोते का जन्मदिन है। शायद कुछ ज्यादा पैसे मिलें और अधिक भोजन भी जो दोनों के लिए काफी हो।’’
‘‘यदि तुम ऐसा कहती हो, मीनाक्षी, तो मैं पहाड़ों पर जाऊँगा,’’ चामी ने सब्रता के साथ कहा, ‘‘और तुम कुछ खाना लाने की कोशिश करो। मैं तब तक लौट आऊँगा।’’


‘‘उसे मेरी बातों पर यकीन नहीं है, लेकिन कुछ भी हो जाये, मैं पहाड़ों पर जाऊँगा, चाहे वहाँ कोई देवता हो या न हो’’, वह तेज़ी से चलते-चलते धीरे से बोला।


वह एक बार पीछे मुड़ा; उसकी पत्नी के बाहर निकलते और दूसरी दिशा में जाते समय उसकी साड़ी के एक किनारे पर उसकी नजर पड़ी। उसने घर की दीवार से लगे लम्बे हत्थे वाला अपना झाड़ू भी देखा। उसने इसे स्मरण दिलाया, राजा के मार्ग की सफाई के लिए अगली सुबह तक उसे लौट आना होगा।


चामी तेज़ी से चलने लगा और शीघ्र ही उसे सामने काले पहाड़ दिखाई पड़े। पादगिरि पहुँच कर दुरारोही चट्टानों के ढाल पर वह चढ़ने लगा। कुछ ऊँचाई तक जाने पर चामी ने एक गुफा देखी, जहाँ उसने कुछ देर आराम करने का निश्चय किया। अपनी पगड़ी को सिरहाने रख कर वह लेट गया और तुरन्त उसे नीन्द आ गई।


‘‘चामी, उठो!’’ उसने सोचा कि वह सपना देख रहा है। लेकिन नहीं, उसने सचमुच महसूस किया कि कोई उसे जगा रहा है। उसने झकझोर को अनुभव किया। वह उठ बैठा। आँखें मल कर उसने चारों ओर देखा। वहाँ कोई नहीं था।


आवाज़ फिर आई । ‘‘चामी! तुम पर्वतों के देवता से मिलने के लिए यहाँ आये। मैं मलयवनन हूँ। तुम्हें अपने पीछे एक शंख मिलेगा। जब भी तुम इसे बजाओ, मन में कोई इच्छा रख लो भोजन, धन, नया छप्पर, घोड़े....जो भी अभिलाषा करोगे, तुम्हें प्राप्त हो जायेगा।’’



मीनाक्षी ने मुस्कुराते हुए पति का स्वागत किया। और उसे ताजे दूध का गिलास देते हुए कहा, ‘‘तो भेंट हो गई पर्वत के देवता से?’’

‘‘तुम अपने पति को क्या समझती हो?’’ इस भूमिका के साथ उसने अपनी दास्तान शुरू की,और पगड़ी खोल कर शंख निकाला।

मीनाक्षी खुशी से उछल पड़ी। ‘‘मुझे देखने दो! मुझे आजमाने दो।’’ शंख को अपने हाथ में लेकर उसने सत्य भाव से कहा, ‘‘हे जादू के शंख! क्या आप सोने का एक सिक्का देंगे?’’ उसने शंख बजाया, किन्तु कुछ फल नहीं निकला।

‘‘इसने मुझे कुछ नहीं दिया’’, मीनाक्षी ने कहा। ‘‘तुम कोशिश करो!’’ उसने चामी को शंख लौटा दिया। चामी ने बिना किसी चीज़ की इच्छा किये शंख को फूँका। पर कोई आवाज़ नहीं आई। उसने कई प्रकार से बजाने की कोशिश की। फिर भी आवाज़ नहीं आई।

‘‘लेकिन पिछली रात उसने ठीक काम किया और चाँदी के दस सिक्के दिये। भठियारे ने सिक्के नहीं लिये, इसलिए दस के दस सिक्के ये पड़े हैं।’’ उसने सिक्कों को गिना- एक, दो, तीन....

‘‘क्या तुम निश्चयपूर्वक कह सकते हो कि इसी शंख को तुमने बजाया था? ध्यान से देखो। मुझे सन्देह है कि भठियारे ने तुम्हें धोखा दिया है। उसने निश्चय ही जादू का शंख लेकर दूसरा शंख रख दिया है।’’ मीनाक्षी ने कहा।

चामी ने शंख पर नज़र दौड़ाई। ‘‘अब क्योंकि तुमने सन्देह व्यक्त किया है, मुझे भी लगता है कि यह जादू का शंख नहीं है। वह बहुत श्वेत था। यह गन्दा दिखाई देता है।’’

‘‘तुम एक काम करो।’’ मीनाक्षी ने कहा, ‘‘अभी अपने काम पर चले जाओ और शाम को सराय में एक कमरा ले लो। बातचीत के सिलसिले में सराय के मालिक से कहो कि यह शंख किसी महात्मा ने आशीर्वाद के रूप में दिया है। अब यह चाँदी की बजाय सोने के सिक्के देगा। फिर तुम गौर से देखना, वह क्या करता है।’’

चामी जल्दी-जल्दी मार्ग की सफाई करने चला गया । फिर घर लौट कर कुछ देर आराम करने के बाद सराय जाने के लिए रवाना हो गया।


चामी खड़ा हो गया और पीछे मुड़ कर देखा। गुफा के फर्श पर एक चमकता हुआ श्वेत शंख था। उसने उसे उठाकर अपनी पगड़ी के एक किनारे से बाँध लिया और घर की ओर चल पड़ा। सूर्यास्त होनेवाला था। शीघ्र ही अन्धेरा इतना बढ़ गया कि रास्ता दिखाई नहीं पड़ता था। वह सावधानी से आगे बढ़ता गया।

आखिर उसे एक रोशनी दिखाई पड़ी। वह मार्ग के किनारे एक सराय थी। उसने वहीं रात बिताने का निश्चय किया। सराय के मालिक ने उसे एक कमरा दिखा दिया और वह अतिथि के लिए भोजन लाने चला गया। क्या उसने शंख बजने की ध्वनि सुनी? कौन हो सकता है? और यह ध्वनि आई कहाँ से?

भठियारा खाना लाकर जब अतिथि को परोस रहा था, तब यों ही पूछ बैठा, ‘‘संयोग से, क्या आपने ही शंख बजाया था?’’

‘‘हाँ, मैंने ही बजाया था’’, चामी ने कहा। उसने देखा कि भठियारा चारों ओर ताक-झांक कर रहा है। उसने भठियारे को शंख दिखा दिया और शंख के बारे में सब कुछ बता दिया । उसने कहा कि अभी उसने कमरे का किराया और भोजन की कीमत के पैसे मांगने के लिए शंख बजाया था।

भठियारा लालची इनसान था। चामी के सो जाने पर वह चुपचाप उसके कमरे में घुसा और पगड़ी खोल कर जादू का शंख निकाल उसमें उसी आकार का सामान्य शंख बाँध दिया। सुबह में जब चामी कमरे और खाने का पैसा देने लगा तब भठियारे ने उसके हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘आप जैसे व्यक्ति से मिल कर मैं धन्य हो गया हूँ। मैं आप को अपना अतिथि मानता हूँ। जब भी आप इधर से गुजरें तो मेरा आतिथ्य स्वीकार करने की कृपा अवश्य करें।’’

चामी उसे धन्यवाद देकर जल्दी ही घर लौट आया। रास्ते में उसने सोचा, ‘‘मैं अब मेहतर का काम क्यों करूँ। अब मैं अपनी इच्छा के अनुसार हर चीज़ का आनन्द ले सकता हूँ।’’


मीनाक्षी ने मुस्कुराते हुए पति का स्वागत किया। और उसे ताजे दूध का गिलास देते हुए कहा, ‘‘तो भेंट हो गई पर्वत के देवता से?’’

‘‘तुम अपने पति को क्या समझती हो?’’ इस भूमिका के साथ उसने अपनी दास्तान शुरू की,और पगड़ी खोल कर शंख निकाला।

मीनाक्षी खुशी से उछल पड़ी। ‘‘मुझे देखने दो! मुझे आजमाने दो।’’ शंख को अपने हाथ में लेकर उसने सत्य भाव से कहा, ‘‘हे जादू के शंख! क्या आप सोने का एक सिक्का देंगे?’’ उसने शंख बजाया, किन्तु कुछ फल नहीं निकला।

‘‘इसने मुझे कुछ नहीं दिया’’, मीनाक्षी ने कहा। ‘‘तुम कोशिश करो!’’ उसने चामी को शंख लौटा दिया। चामी ने बिना किसी चीज़ की इच्छा किये शंख को फूँका। पर कोई आवाज़ नहीं आई। उसने कई प्रकार से बजाने की कोशिश की। फिर भी आवाज़ नहीं आई।

‘‘लेकिन पिछली रात उसने ठीक काम किया और चाँदी के दस सिक्के दिये। भठियारे ने सिक्के नहीं लिये, इसलिए दस के दस सिक्के ये पड़े हैं।’’ उसने सिक्कों को गिना- एक, दो, तीन....

‘‘क्या तुम निश्चयपूर्वक कह सकते हो कि इसी शंख को तुमने बजाया था? ध्यान से देखो। मुझे सन्देह है कि भठियारे ने तुम्हें धोखा दिया है। उसने निश्चय ही जादू का शंख लेकर दूसरा शंख रख दिया है।’’ मीनाक्षी ने कहा।

चामी ने शंख पर नज़र दौड़ाई। ‘‘अब क्योंकि तुमने सन्देह व्यक्त किया है, मुझे भी लगता है कि यह जादू का शंख नहीं है। वह बहुत श्वेत था। यह गन्दा दिखाई देता है।’’

‘‘तुम एक काम करो।’’ मीनाक्षी ने कहा, ‘‘अभी अपने काम पर चले जाओ और शाम को सराय में एक कमरा ले लो। बातचीत के सिलसिले में सराय के मालिक से कहो कि यह शंख किसी महात्मा ने आशीर्वाद के रूप में दिया है। अब यह चाँदी की बजाय सोने के सिक्के देगा। फिर तुम गौर से देखना, वह क्या करता है।’’

चामी जल्दी-जल्दी मार्ग की सफाई करने चला गया । फिर घर लौट कर कुछ देर आराम करने के बाद सराय जाने के लिए रवाना हो गया।


सराय के मालिक को आश्चर्य हुआ। खाना खाते समय सराय के मालिक के साथ गप्प करते हुए चामी ने बताया कि एक योगी से प्रसाद के रूप में उसे एक शंख मिला है। शंख पगड़ी के एक सिरे से बँधा हुआ था जिस पर भठियारा बार-बार नज़र डाल रहा था। ‘‘मैं थक गया हूँ, इसलिए जल्दी ही सो जाऊँगा’’, चामी भठियारे को सुनाते हुए बोला।


चामी ने आँखें बन्द कर सो जाने का बहाना किया। वह सावधान था। तभी भठियारे ने चोरी से कमरे में घुस कर पगड़ी खोली और शंख बदल दिया।


जादू का शंख वापस आ जाने पर वह भोर तक सोया रहा। उसने भठियारे को जगाया पर उसने पैसे लेने से फिर इनकार कर दिया।


चामी घर लौट आया और अगले कुछ ही दिनों में उसकी और मीनाक्षी की सभी इच्छाएँ पूरी हो गईं- नया छप्पर और अंगरक्षक की नौकरी।


इधर सराय के मालिक ने अपने आप को इस बात के लिए ख़ूब कोसा कि सोने के सिक्के के लालच में पड़ कर उसने जादू का शंख गंवा दिया और चॉंदी के सिक्कों को इनकार कर दो-दो बार मूर्खता कर दी। योगी और जादू के शंख की कोई और कहानी लेकर अब शायद वह कभी नहीं आयेगा।


लेकिन चामी फिर एक बार सराय पर गया, इस बार एक ख़ूबसूरत काले घोड़े पर सवार होकर। वह एक कीमती लाल वर्दी की पोशाक में था। सराय का मालिक चकित रह गया। राजा का अंगरक्षक मेरी सराय का मेहमान?


‘‘मैं सिर्फ यह जानने के लिए आया हूँ कि अब तक तुमने सोने के कितने सिक्के इकठ्ठे कर लिये!’’ चामी ने उसकी हँसी उड़ाते हुए पूछा।


भठियारा ने अब आवाज़ पहचान ली, ‘‘ओह! महानुभाव, तो आप हैं।’’ वह सिर नीचे झुका कर बोला, ‘‘मेहरबानी करके माफ कर दीजिये!’’


चामी ने सिर्फ हाथ हिलाया और वह घोड़े पर सवार होकर चलता बना।