Friday, July 1, 2011
सोचा कुछ हुआ और !
बेतुकी सलाहें
राजा का बुरा सपना
जल्दबाज़ी
विष्णु, शांता का इकलौता बेटा था। पिता जिस व्यापार को छोड़कर स्वर्गवासी हो गये थे वह उसे बड़ी ही जिम्मेदारी तथा सतर्कता के साथ संभाल रहा था। शांता अपने बेटे को बहुत चाहती थी । एक दिन खाना परोसते हुए उसने बेटे विष्णु से कहा, ‘‘इस दशहरे पर तुम्हारे पिताजी के जिगरी दोस्त रामावतार अपनी बेटी को लेकर यहॉं आनेवाले हैं।’’
‘‘रामावतार ! लगता है, मैंने इनका नाम इसके पहले कभी नहीं सुना।’’ आश्चर्य प्रकट करते हुए विष्णु ने कहा। ‘‘हॉं’’ के भाव में सिर हिलाती हुई शांता ने कहा, ‘‘तुम्हारे जन्म के पहले हम दोनों एक ही घर में रहते थे। अलग होते हुए भी एक परिवार जैसा व्यवहार हम दोनों के बीच था। मेरे लिए वे भाई जैसे थे तो मैं उनके लिए बहन जैसी थी। तुम्हारे पिताजी और उनकी दोस्ती घनी थी। लोग उनकी घनी दोस्ती की वाहवाही करते हुए थकते नहीं थे । फिर कुछ सालों के बाद रामावतार व्यापार करने बहुत दूर चले गये। व्यापार में व्यस्त हो जाने के कारण यहॉं आना उनके लिए संभव नहीं हो पाया। अब हमसे मिलने के लिए वे लालायित हैं। उनके यहॉं आने के पीछे एक और कारण भी है। वे अपनी बेटी की शादी यहीं किसी अच्छे घराने में कराने की प्रबल इच्छा रखते हैं। इसीलिए उन्होंने यहॉं आने की ख़बर भिजवायी।’’
फिर दो-तीन क्षणों तक वह सोच में पड़ गयी और फिर बोली, ‘‘उन्हें मालूम भी हो गया होगा कि तुम अच्छी तरह से व्यापार संभाल रहे हो, योग्य हो। शायद वे अपनी बेटी की शादी तुमसे करना चाहते होंगे। उनके यहॉं आने के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है।’’ विष्णु ने मॉं के बोलने की पद्धति पर आश्चर्य करते हुए कहा, ‘‘तो क्या हुआ? आने दो।’’ ‘‘इस बात की मुझे बड़ी खुशी है कि वे लंबे समय के बाद हमें देखने यहॉं आ रहे हैं। परंतु सुनने में आया है कि रामावतार की पत्नी झगड़ालू और कंजूस है।
कहीं बेटी भी ऐसे ही स्वभाव की हो तो ! पड़ोसिन रुक्मिणी कह रही थी कि सीतापति अपनी बेटी जलजा का विवाह तुमसे करना चाहते हैं। इसलिए रामावतार इस विषय को लेकर तुमसे कोई बात करें तो उनसे कहना कि वे मुझसे बात करें। मुझसे पूछे बिना कोई निर्णय मत लेना।’’ त्योहार आ ही गया। रामावतार अपनी बेटी पद्मा को लेकर आ गये। शांता और विष्णु ने बड़े ही प्यार से उनका स्वागत किया। पद्मा की सुंदता ने शांता को मोह लिया। उसके स्वभाव पर भी वह रीझ गयी। रात को जब विष्णु घर आया, तब उसने उससे कहा, ‘‘बेटे, देखा, लड़की कितनी सुंदर है! स्वभाव से भी बड़ी अच्छी लगती है। बहू हो तो ऐसी हो। दो-तीन दिनों के बाद रामावतार कुछ कहे या न कहे, मैं ही इस रिश्ते का प्रस्ताव रखूँगी।’’
‘‘मॉं, बिना जाने कि उनकी क्या राय है, जल्दबाजी करना अच्छा नहीं है।’’ विष्णु ने यों मॉं को सावधान किया। दो दिनों के बाद शांता ने विष्णु से एकांत में कहा, ‘‘पद्मा मुझे बहुत अच्छी लगी। घर के काम-काजों में भी काफ़ी दिलचस्पी लेती है। मेरी समझ में नहीं आता कि रामावतार शादी को लेकर कोई भी बात क्यों नहीं कर रहे हैं। मैं ही उनके सामने यह प्रस्ताव रखना चाहती हूँ। कहो, तुम्हारी क्या राय है?’’ विष्णु ने ज़रा चिढ़ते हुए कहा, ‘‘वे लोग ह़फ़्ते भर यहीं रहनेवाले हैं। थोड़ी-सी सहनशक्ति से काम लो। तुम इस प्रकार जल्दबाजी करोगी तो उनकी नज़र में हमारी कोई इज्ज़त रह नहीं जायेगी।’’
शांता बिना कुछ बोले वहॉं से चली गयी। विष्णु भी जब वहॉं से जाने लगा तब पीछे से आवाज़ आयी। ‘‘विष्णु!’’ उस आवाज़ में मिठास भरी हुई थी।
विष्णु ने देखा कि पद्मा उसी की तरफ बढ़ी चली आ रही है । ‘‘तुमने अभी सासू से जो बातें कीं, मैंने सुन लीं।’’ विष्णु ने सकपकाते हुए कहा, ‘‘मॉं, हर बात में जल्दबाज़ी दिखाती है। इसलिए...’’ यों कहते हुए वह रुक गया।
पद्मा ने मंद मुस्कान भरते हुए कहा, ‘‘सासू के मन के सभी विचारोें को मैंने भांप लिया है। उन्हें भय है कि पता नहीं, कैसी बहू घर में क़दम रखेगी; इस वृद्धावस्था में उनकी ठीक तरह से देखभाल करेगी या नहीं। ऐसी स्थिति में उनका यह चाहना सही है कि शांत स्वभाव की कोई कन्या दिखायी पड़े तो यथाशीघ्र उसे अपनी बहू बनाने का निर्णय ले लेना चाहिये। और यह कोई जल्दबाजी नहीं कहलाती। आख़िर तुम इकलौते बेटे जो ठहरे।’’
विष्णु ने ‘हॉं’ के भाव में सिर हिलाया।
पद्मा फिर से कहने लगी, ‘‘मानव की मनोवृत्ति को सही तरह से समझने पर उसके व्यवहार के अच्छे और बुरे पक्षोें को भी जान पायेंगे। अन्यथा टूटे शीशे के प्रतिबिंबों की ही तरह टेढ़े-मेढ़े और अटपटेदिखने लगेंगे। मेरे पिताजी ने व्यापार में पर्याप्त सफलता प्राप्त की और कमाई का दुरुपयोग भी नहीं किया। मेरी मॉं तुनकमिजाज है, इसलिए लोग उसे कंजूस और झगड़ालू कहते हैं। यहॉं आने के बाद ही मेरे पिताजी को मालूम हो पाया कि मेरी मॉं के बारे में लोगों की, ख़ासकर हमारे रिश्तेदारों की क्या राय है। इस हालत में हमारे विवाह को लेकर सासजी से बात करने से वे सकुचा रहे हैं। अगर सासजी ही यह प्रस्ताव पेश करतीं तो हमारी दृष्टि में उनके प्रति आदर और बढ़ता।’’ यह कहते हुए उसकी आँखों में आँसू उमड़ आये । उसने तुरंत अपना सर झुका लिया।
विष्णु ने एक क़दम आगे बढ़कर उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, ‘‘जल्दबाज़ी मॉं की नहीं, मेरी है। आगे-पीछे सोचे बिना मैं बक गया। मुझे माफ़ करना। पर अब तो लगता है कि जल्दबाज़ी करनी ही होगी।’’ पद्मा ने चकित होकर पूछा, ‘‘जल्दबाज़ी किस बात में?’’ ‘‘हमारे विवाह कोे लेकर। जिस लड़की ने मेरी मॉं को और मुझे इतना आकर्षित किया है, उससे विवाह रचाने के विषय में जल्दबाज़ी करनी ही होगी न!’’ विष्णु ने हँसते हुए कहा। वहॉं से जाती हुई पद्मा ने सिर झुका लिया।
न्याय निर्णय
शांतिपुर नामक गांव में राम और भीम नामक दो किसान रहा करते थे। दोनों के खेत अगल-बग़ल में थे। राम ग़रीब था पर, गांव के लोग उसे बहुत अच्छा व भला आदमी कहते थे। भीम धनिक था। अव्वल दर्जे का खुदगर्ज़ था। किसी को पनपते हुए देखकर वह ईर्ष्या से जल उठता था।
एक दिन राम अपने खेत में हल चलाते हुए सोचने लगा, ‘‘पता नहीं, कब तक मुझे कष्ट झेलने होंगे। कोई भगवान मुझपर दया करें तो अच्छा होगा।’’ इतने में हल की लकड़ी से कोई पत्थर टकरा गया। वह वहीं रुक गया। राम ने कुदाल से उस पत्थर को हटाया। उस पत्थर के नीचे लोहे की एक पेटी थी। पेटी खोलकर देखी तो उसमें सोने के प्राचीन आभूषण थे। राम ने भगवान को धन्यवाद किया।
उसी व़क्त, बगल के ही खेत का मालिक भीम वहॉं आया। उसने भी गहनों की उस पेटी को देखा। वह सोचने लगा कि कैसे इन गहनों को हड़पूँ? फिर वह राम के पास आकर बोला, ‘‘राम, गहने देना, जरा देखूँ तो सही।’’ उन्हें हाथ में लेकर एक-एक करके देखने लगा और कहता गया, ‘‘अरे, ये सब मेरी मॉं के गहने हैं। बहुत पहले खो गये थे। कई जगहों पर ढूँढ़ा नहीं मिले। अच्छा हुआ, अब यहॉं मिल गये।’’कहता हुआ वह उन्हें अपने साथ लेता जाने लगा।
राम ने तुरंत उससे वे कहने छीन लिये और कहा, ‘‘ये तुम्हारी मॉं के गहने नहीं हैं। तुम झूठ बोल रहे हो। ये मुझे खेत में मिले। भगवान ने दिया है मुझे।’’
भीम ने नाराजगी का नाटक करते हुए कहा, ‘‘सौ फी सदी ये मेरी मॉं के ही गहने हैं। चलो, ग्रामाधिकारी के पास चलते हैं। फैसला हो जायेगा कि ये किसके गहने हैं।’’
ग्रामाधिकारी ने दोनों का बाद-विवाद सुना, पर इस समस्या के परिष्कार का मार्ग उसकी समझ में नहीं आया। ग्रामाधिकारी को भली-भांति मालूम था कि भीम एकदम स्वार्थी है। उसे यह भी मालूम था कि राम ईमानदार है। एक निर्णय पर आ चुकने के बाद उसने उन दोनों से कल आने को कहा।
दूसरे दिन, ग्रामाधिकारी का फ़ैसला सुनने दोनों आये। ग्रामाधिकारी का फैसला सुनने गॉंव के लोग भी बड़ी संख्या में आये। ग्रामाधिकारी ने पेटी को खोलकर ध्यान से देखते हुए कहा, ‘‘आप दोनों के बयानों को सुनने के बाद इस निर्णय पर आया हूँ कि ये गहने किसके हैं । वह और कुछ कहने ही जा रहा था कि इतने में दो घुड़सवार वहॉं आये। वे सिपाहियों की वर्दी पहने हुए थे। ग्रामाधिकारी के पास आकर उन्होंने कहा, ‘‘महाराज शिकार करने आये हैं। पास ही के जंगल में हैं। आपको साथ ले आने का आदेश दिया है।’’
उन सिपाहियों की दृष्टि अचानक उन गहनों पर पड़ी। चकित होकर उन्होंने गहने हाथ में लिये और ध्यान से देखते हुए कहा, ‘‘ये तो महारानी जी के आभूषण हैं। कुछ समय पहले इनकी चोरी हो गयी थी। आपको ये कहॉं से मिले?’’
ग्रामाधिकारी ने पूरा किस्सा सुनाया। ‘‘इसका यह मतलब हुआ कि ये दोनों मिले-जुले चोर हैं। चलिये महाराज के पास।’’ गरजते हुए सिपाहियों ने कहा।
भीम थर-थर कांपता हुआ ग्रामाधिकारी के पैरों पर गिर पड़ा। कहने लगा, ‘‘महाशय, इन गहनों से मेरा कोई संबंध नहीं है। ये राम को उसके खेत में मिले। मुझमें दुर्बुद्धि जगी और मैंने इन्हें हड़प लेना चाहा। मुझे माफ कर दीजिये।’’
‘‘भीम, तुम्हारी दुर्बुद्धि को तुम्हारे ही मुंह से कहलाने के लिए मैंने यह चाल चली। ये सिपाही नहीं हैं। मेरे ही आदमी हैं। तुमने मान लिया कि ये तुम्हारे गहने नहीं हैं, इसलिए राम को ये गहने सौंप रहा हूँ। तुमने राम को धोखा दिया, अच्छा होने का नाटक किया, इसलिए तुम्हें सौ अशर्फियें का जुरमाना भरना होगा। आगे से ही सही, ऐसी ग़लती मत करना।’’ ग्रामाधिकारी ने गंभीर स्वर में अपना फैसला सुनाया।
लोगों ने ग्रामाधिकारी के फैसले की वाहवाही की।
तेरा जैसा
आँसू तथा ये क्या कहते हैं?
‘‘किन्तु यह सम्भव नहीं, मधुरिमा'', राजा ने स्नेह से कहा, ‘‘जीवन प्रकाश-अन्धकार, सुख-दुख और हँसने-रोने का ताना-बाना है। हमें दोनों का सामना करना है। किसी एक को बाहर कर देना बिलकुल सम्भव नहीं है।''