Friday, July 1, 2011

सोचा कुछ हुआ और !

अनंत शास्त्री देर तक दरवाज़े पर दस्तक देता रहा, तब उसकी पत्नी अरुंधती जंभाइयाँ लेती हुई आई, दरवाज़ा खोलकर चबूतरे पर खड़ी हो आसमान की ओर देखती बोली, ‘‘आप इतनी रात बीते क्यों आये?''
उस दिन सवेरे घर से निकलते व़क्त अनंत शास्त्री अपनी औरत को यह कहकर गया था कि वह दूसरे दिन ही लौटेगा।
‘‘मेरा काम जल्दी पूरा हो गया। इसलिए मैं किराये की गाड़ी में चल पड़ा। आधे रास्ते में गाड़ी कीचड़ में धंस गई। वहाँ से पैदल चलकर आया, इसलिए देरी हो गई।'' यों कहते वह खीझकर घर के अन्दर चला गया।
अनंत शास्त्री हाथ-मुँह धो रहा था। तब अरुंधती वहाँ पहुँचकर बोली, ‘‘आज शाम को जानकी राम की पत्नी झगड़ा करके चली गई। कह रही थी कि हमारी बिल्ली ने उनके घर का दूध पी लिया है। इसलिए आपके लौटने के बाद अपने पति से कहकर आपका सर फोड़वा देगी।''
अनंत शास्त्री के पिछवाड़े की तरफ़ जानकी राम का परिवार रहता था। उन दो परिवारों के बीच इधर कई दिनों से दुश्मनी चली आ रही थी।
‘‘अरी जानकी, राम की डींगों की तुम परवाह क्यों करती हो? पहले तुम मुझे खाना तो परोसो।'' अनंत शास्त्री ने समझाया।
अरुंधती चौंक पड़ी। जो रसोई बनी थी, सारी वह सफाचट कर गई थी। घर में तरकारियाँ भी बची न थीं।
यह ख़बर सुनाकर बोली, ‘‘मैंने नहीं सोचा था कि आप आज ही रात को घर लौट आयेंगे, पर अब आप ही बताइये कि क्या किया जाये?'' ये बातें सुन अनंत शास्त्री झल्ला उठा। वह बड़ी दूर पैदल चलकर आया था, इस वज़ह से उसे जोर की भूख लगी थी।

‘‘अरी, पाव भर चावल जल्दी बना दो, अचार के साथ खा लूँगा।'' अनंत शास्त्री खीझकर बोला।
अरुंधती संकोच करती बोली, ‘‘छोटी झारी में जो अचार था, वह चुक गया है, बड़ी झारी तो अटारी पर है। उसे उतारना हो तो इस अंधेरे में बिच्छू-साँप काट दे तो क्या होगा? पिछवाड़े में तरकारी है, तोड़ लाइये। इस बीच मैं चावल बना दूँगी।''
लाचार होकर अनंत शास्त्री पिछवाड़े में गया, वहाँ पर अंधेरा छाया हुआ था। वह आदत के मुताबिक़ तरकारी की क्यारी में गया। उसके पैर के नीचे कोई मुलायम चीज़ लगी। शास्त्री ने चौंक कर ध्यान से देखा, वह बिल्ली की बच्ची थी।
इधर चार दिन पहले अनंत शास्त्री की बिल्ली ने चार बच्चे दिये थे, उनमें से सफ़ेद रंग की बिल्ली उसके पैरों के नीचे दबकर मर गई है।
तब उसका कलेजा कांप उठा। वह सोचने लगा कि बिल्ली को मारने का पाप लगेगा। पाप का प्रायश्चित करने के पीछे उसका दीवाला पिट जाएगा। ऐसी बातों में अरुंधती बड़ी सख्त रहती है! इसलिए उसने सोचा कि चुपचाप उसे गाड़ दें पर कुछ हद तक तो प्रायश्चित हो जाएगा।
अरुंधती उस व़क्त रसोई घर में थी। इसलिए उसने बिना ज़्यादा आहट किये कुदाल से गड्ढा खोदा, बिल्ली की बच्ची को उसमें दफ़नाकर तरकारी तोड़ करके अनंत शास्त्री चुपचाप घर के भीतर चला गया।
‘‘तरकारी तोड़ने में आप को इतनी देर लगी? मुझसे कहते थे कि मिनटों में रसोई बना देनी है?'' यों ताने देते अरुंधती ने तरकारी बनाई।
पर हुआ क्या, रात के व़क्त पिछवाड़े में कोई आहट होते सुनकर जानकी राम की पत्नी पिछवाड़े में चली आई। शास्त्री को क्यारी में गड्ढा खोदते देख वह अचरज में आ गई। जब शास्त्री अपने घर के अन्दर चला गया, तब जानकी राम की पत्नी अपने कमरे में पहुँची और अपने पति को थपथपा कर जगाया।
‘‘इस आधी रात को तुमने मेरी नींद हराम कर दी। ऐसी कौन सी आफ़त आ पड़ी है?'' यों कहते जानकी राम आँखें मलते उठ बैठा।

‘‘उठ जाओ। हमारा घर भरने वाला है! अनंत शास्त्री ने क्यारी में गड्ढा खोदकर सोना या धन गाड़ दिया है। गाँव में चोरों का बड़ा दबदबा है न! शास्त्री के सोते ही तुम चुपचाप दीवार फांदकर उस धन को खोद लाओ। इस तरह से हम उनको अच्छा सबक़ सिखलायेंगे।'' जानकी राम की पत्नी ने सुझाया।
धन की बात सुनते ही जानकी राम की नींद का नशा उतर गया। अनंत शास्त्री ने जो कुछ गाड़ रखा था, उसे खोद कर ले आने के लिए एक छोटी-सी पेटी के साथ चल पड़ा। दीवार फांदकर उसने गड्ढे के निशान को जल्दी पहचान लिया। वह कुदाल से उस जगह को खोदने जा रहा था, तभी उसके कंठ पर कोई ठंडी चीज़ सी लगी। वह चौंक पड़ा, सर उठाकर देखता क्या है, काले वस्त्रों में भयंकर लगने वाला चोर खड़ा हुआ है!
‘‘मेहनत के साथ गड्ढा खोदकर धन छिपाने के लिए तक़लीफ़ क्यों उठाते हो? वह पेटी मेरे हाथ देकर अपनी मेहनत से बच जाओ!'' चोर ने कड़क कर कहा।
चोर को देखने पर जानकी राम के हाथ-पाँव सुन्न हो गये, मगर उसका दिमाग तेजी के साथ हरकत करने लगा। उसने सोचा कि चोर इस घर को मेरा मानता है और यह सोचता है कि मैं अपना धन छिपाने जा रहा हूँ! इस मौक़े का लाभ उठाकर चोर अनंत शास्त्री से घर लुटवाना है।
जानकी राम खाली पेटी खोलकर चोर को दिखाते हुए बोला, ‘‘मेरी पत्नी ने इस पेटी के अटने लायक़ गड्ढा खोदने को बताया है। वह अपने सारे गहने लाकर इसमें डाल देगी। तुम दरवाज़ा खटखटाकर उसको पुकारो। उसके सारे गहने ले जाओ, लेकिन मेरे साथ सख्ती न करो।''
‘‘क्या मेरी आवाज़ सुनकर तुम्हारी औरत दरवाज़ा खोलेगी? तुम अपनी औरत को पुकारो। उसके बाद बाहर आने पर गहनों की बात मैं सोच लूँगा।'' यों कहते चोर ने जानकी राम की गर्दन थाम ली और उसे शास्त्री के पिछवाड़े के द्वार तक खींच ले गया।
इस पर जानकी राम के मन में चोर का डर जाता रहा, वह ख़ुशी में आकर जोर से चिल्ला उठा, ‘‘अरुंधती, जल्दी यहाँ पर आ जाओ।''
चोर ने सोचा कि दरवाज़ा खुलते ही जानकी राम अपनी पत्नी को कोई इशारा करेगा, इसलिए वह जानकी राम को थोड़ा हटाकर खुद दरवाज़े के समीप खड़ा हो गया। इसके बाद जानकी राम ने एक बार और ऊँची आवाज़ में अरुंधती को पुकारा।

अरुंधती तो जागी नहीं, पर शास्त्री जाग उठा। आधी रात को किसी को पुकारते देख उसे बड़ा गुस्सा आया। तभी उसे याद आया कि जानकी राम की पत्नी अपने पति से उसका सर फोड़वाने की धमकी दे चुकी है।
इस पर शास्त्री दांत पीसते लाठी लेकर चुपचाप किवाड़ के पास पहुँचा, दरवाज़ा खोलकर वहाँ पर खड़े चोर को ही जानकी राम समझकर उसके सर पर लाठी जमा दी।
चोर चकरा कर नीचे गिर पड़ा।
जानकी राम इस घटना को देख डर गया। उसने सोचा कि गुस्से में आने पर शास्त्री कुछ भी कर सकता है, ऐसे व्यक्ति के साथ दुश्मनी बढ़ाने के बदले दोस्ती कर लेना अच्छा होगा।
यों विचार कर अपनी खुशी ज़ाहिर करते हुए जानकी राम बोला, ‘‘शाबाश ! शास्त्रीजी! डाकू को तुमने एक ही मार से गिरा दिया ! अगर इसके बारे में गाँव के मुखिया को बतायें तो तुमको उनसे ज़रूर बहुत सारा इनाम मिल जाएगा।''
इस बार शास्त्री ने जानकी राम की ओर लाठी का निशाना बनाकर धमकी देते हुए गरजकर कहा, ‘‘अरे दुष्ट, तुम अपनी चिकनी-चुपड़ी बातें मुझे मत सुनाओ, बताओ, तुम जिसे डाकू मानते हो, उसके पीछे मेरे पिछवाड़े में क्यों आये हो?''
जानकी राम कांपते हुए सारी बातें सुनाकर बोला, ‘‘शास्त्रीजी, यह मत पूछो कि मैंने ऐसा क्यों किया है। इसी को कहते हैं कि अ़क्ल चरने गई थी। मुझे माफ़ कर दो। आज से हम दोनों पुरानी दुश्मनी को भूल जायेंगे।''
इसके बाद जानकी राम के कहे मुताबिक़ एक नामी डाकू को पकड़वाने के एवज में गाणँव के मुखिया ने शास्त्री को सौ रुपये का इनाम दिया।
ये सारी बातें अपने पति के मुँह से सुनकर अरुंधती हँसकर बोली, ‘‘बिल्ली की वह बच्ची कल शाम को किसी बीमारी से मर गई थी। मैंने सोचा कि सवेरा हो जाने पर नौकर से गड्ढा खुदवा कर उसे गड़वा दूँगी। उसी से आप को इनाम मिला और आपका दुश्मन दोस्त हो गया, क्या मरी बिल्ली को गाड़ने का पुण्य कभी व्यर्थ हो सकता है?''



बेतुकी सलाहें

रामदीन अपने बाप-दादों के ज़माने की एक झोंपड़ी का मालिक था। उससे सटकर एक विशाल पिछवाड़ा था। उसने अपने पिछवाड़े में केले के कल्ले रोप दिये। केले का बगीचा ख़ूब बढ़ा, हरा-भरा तथा देखने में मनमोहक था।
एक दिन सवेरे रामदीन केले के बगीचे में पानी सींच रहा था। तभी गाड़ी में से जमीन्दार की पत्नी उतर पड़ी। रामदीन अपने हाथों को साफ़ कर जमीन्दार की पत्नी के सामने आ खड़ा हुआ।
जमीन्दार की पत्नी ने रामदीन का नाम पूछकर कहा, ‘‘रामदीन, तुम अपने पिछवाड़े के साथ अपनी झोंपड़ी को बेच सकते हो?''
रामदीन विस्मय में आ गया। वह कोई उत्तर न दे पाया। समझ न पाया कि जमीन्दार की पत्नी उसकी पुरानी झोंपड़ी लेकर करेंगी ही क्या?
‘‘पैसे की तुम चिंता न करो। मैं तुम्हें पाँच सौ रुपये दूँगी।''
रामदीन अपने कानों पर यक़ीन नहीं कर पाया, क्योंकि उस झोंपड़ी के लिए कोई दो सौ रुपयों से ज़्यादा न देगा।
रामदीन को मौन देख जमीन्दार की पत्नी बोली, ‘‘अच्छी बात है! साढ़े सात सौ रुपये देती हूँ। अब मोल-भाव मत करो।''
रामदीन को लगा कि वह बेहोश होता जा रहा है। साढ़े सात सौ रुपये! वह इस विचार में खो गया कि इतनी पूँजी लगाकर कोई भी व्यापार कर सकता है।
इस बार भी रामदीन को मौन देख वह ख़ीझकर बोली, ‘‘मैं अंतिम बात कह रही हूँ- एक हज़ार रुपये दूँगी! झोंपड़ी बेचते हो या नहीं?''
रामदीन ने स्वीकृति सूचक सिर हिलाया और कहा, ‘‘शाम के अंदर हम झोंपड़ी ख़ाली कर देंगे। शाम को आप इस पर कब्ज़ा कर सकती हैं।''
‘‘शामको मैं अपने नौकर के द्वारा रुपये भेज दूँगी!'' यों कहकर जमीन्दार की पत्नी बड़ी खुशी के साथ चली गई।

उसके जाते ही रामदीन अपनी औरत से बोला, ‘‘अरी! सुनो! हमारी क़िस्मत खुल गई ।''
इधर जमीन्दार की गाड़ी रामदीन की झोंपड़ी के आगे आकर जब रुकी, तभी से अड़ोस-पड़ोस के लोग उनकी बातचीत बड़ी उत्सुकता के साथ सुन रहे थे। वे अब आकर आश्चर्य से बोले, ‘‘क्या तुम सचमुच इस झोंपड़ी को बेच दोगे?''
‘‘अरे साहब! एक हज़ार रुपये मिल रहे हैं तो क्यों न बेचूँगा?'' रामदीन ने उल्टा सवाल किया।
‘‘अरे, तुम्हारी अ़क्ल चरने गई है! तुमने यह भी सोचा है कि तुम्हारी इस टूटी-फूटी झोंपड़ी के लिए एक हज़ार रुपये क्यों दिये जा रहे हैं? इस झोंपड़ी से बहुत बड़ा लाभ न हो तो जमीन्दारिन इतने रुपये क्यों लुटा देंगी? उन्हें यह मालूम होगा कि तुम्हारी झोंपड़ी के अन्दर कोई खज़ाना है। तुम तो भोले और बुद्धू ठहरे ! इसीलिए झट बेचने को तैयार हो गये हो? हमारी बात सुनो, तुम किसी भी दाम पर झोंपड़ी को मत बेचो, तुम्हीं ख़ुद खोदकर उस खज़ाने को ले लो।'' यों सबने रामदीन को बेतुकी सलाहें दीं और वहाँ से चले गये।
ये बेतुकी सलाहें रामदीन को उचित प्रतीत हुईं। उसकी औरत ने भी पड़ोसियों की बातों में आकर कहा, ‘‘इन लोगों का कहना सच मालूम होता है। हाल ही में जमीन्दारिन अपनी कन्या का विवाह भी करने जा रही है, ऐसी हालत में एक हज़ार रुपये ख़र्च करके यह झोंपड़ी क्यों ख़रीद लेगी? इस झोंपड़ी में अपनी लड़की को थोड़े ही बिठाने वाली है?''
शामको जब जमीन्दार का नौकर एक हज़ार रुपये लेकर पहुँचा, तब पति-पत्नी दोनों ने झोंपड़ी बेचने से इनकार कर दिया।
उस दिन रात को लालटेन की रोशनी में रामदीन ने केले के पौधों को उखाड़कर फेंक दिया, सारे पिछवाड़े को गहराई तक खोदा। झोंपड़ी के भीतर उसे कोई चीज़ दिखाई न दी । इस पर उसने झोंपड़ी की छत को हटाकर ढूँढ़ा, कहीं कोई चीज़ हाथ न लगी।
इतने में सवेरा हो गया। रामदीन रुआँस स्वर में बोला, ‘‘हमने बहुत बढ़िया सौदा हाथ से निकल जाने दिया ।''

‘‘अब भी कुछ बिगड़ा नहीं, तुम तुरंत जाकर जमीन्दारिन से कह दो कि हम झोंपड़ी बेचने के लिए तैयार हैं। पाँच सौ भी दे, मान जाओ।'' रामदीन की पत्नी ने सुझाया।
रामदीन जमीन्दार के घर चला गया, जमीन्दार की औरत से बोला, ‘‘मैंने मूर्खतावश लोगों की बेतुकी सलाहें मानकर झोंपड़ी बेचने से इनकार कर दिया था। अब मैं बेचना चाहता हूँ। आप जो उचित समझें, सो दे दीजिए!''
जमीन्दारिन ने मुस्कुराकर जवाब दिया, ‘‘अब तुम्हारी झोंपड़ी मेरे लिए किस काम की? मैं अपना दाँव तो हार चुकी हूँ!'' इन शब्दों के साथ उसने जमीन्दार तथा उसके बीच जो दाँव लगाया गया था, उसका वृत्तांत सुनाया।
असल में बात यह थी कि जमीन्दार की गाड़ी उसके दादा-परदादाओं के ज़माने की थी। जब से वह ससुराल आई है, तब से वह जमीन्दार द्वारा नई गाड़ी ख़रीदवाने की कोशिश कर रही है। मगर जमीन्दार को अपनी पुरानी गाड़ी ही प्यारी है। उसके दादा-परदादा उसी में घूमते थे।
‘‘पुरखों से चली आनेवाली चीज़ को कोई त्याग नहीं देता। आख़िर हमारे गाँव के छोर पर स्थित केले के पौधोंवाला भी अपने दादा-परदादाओं के ज़माने की झोंपड़ी को छोड़ना नहीं चाहेगा। तुम चाहे, उसके क़द के बराबर धन का ढेर लगा दो, तब भी वह उस झोंपड़ी को नहीं बेचेगा।'' जमीन्दार ने कहा था।
इस पर दोनों ने एक-एक हज़ार रुपयों का दाँव लगाया थाऔर जमीन्दारिन हार चुकी थी।
‘‘मैंने इस आशा से तुम्हें एक हज़ार रुपये देने को मान लिया था कि मैं दाँव में जीत जाऊँगी और जमीन्दार के द्वारा नई गाड़ी ख़रीदवा दूँगी। तुमने लोगों की बेतुकी सलाहें सुनकर मेरी आशा पर पानी फेर दिया। जानते हो? तुम्हें जिन लोगों ने झोंपड़ी न बेचने की सलाह दी, उन्हीं लोगों ने मेरे पास आकर अपनी झोंपड़ियाँ पाँच-पाँच सौ रुपयों में बेचने की इच्छा प्रकट की। दूसरों की बातों में आकर नुक़सान पा चुके हो। अब भी सही, अपनी अ़क्ल ठिकाने पर रखो।''
रामदीन लज्ज़ित हो अपना सिर झुकाये उल्टे पाँव लौट आया।


राजा का बुरा सपना

दुर्भक देश का राजा दुर्मुख गाढ़ी नींद में था। उसे एक विकट अट्टहास सुनायी पड़ा, ‘‘ऐ राजा, हर दिन सूर्योदय देखने की तुम्हारी आदत है। आज शुक्रवार है। परसों इतवार के दिन सूर्योदय के समय तुम्हारी मौत होगी। अगर वह अवधि टल जाए तो तुम्हारी मौत होगी ही नहीं।'' यों एक गंभीर कंठ ध्वनि ने राजा को चेतावनी दी। राजा चौंककर उठ बैठा। उसका सारा शरीर पसीने से सराबोर हो गया। उसने रानी को जगाया और सपने के बारे में बताया। रानी ने राजा को, ढाढ़स बंधाते हुए कहा, ‘‘सपने सपने होते हैं। वे सच नहीं होते। आराम से सो जाइये और सपने को भूल जाइये।''
परंतु, राजा का भय दूर नहीं हुआ। वह चुप नहीं रह सका। उसने तुरंत सेनाधिपति को तथा मंत्री विवेकवर्धन को बुलवाया। उनसे अपने सपने के बारे में बताया। उसने आज्ञा दी कि वे इस विपत्ति से बचने के लिए कोई उपाय ढ़ूँढ़ निकालें।
मंत्री किसी निर्णय पर नहीं आ सका। उसने सोचा कि राजा के सपने में जो बातें सुनाई पड़ीं, अगर वे सच हों तो कुछ भी किया नहीं जा सकता। जो होना है, होकर रहेगा। किन्तु राजा की आज्ञा का उल्लंघन भी किया नहीं जा सकता। कुछ न कुछ अवश्य करना ही होगा। राज पुरोहित और राजवैद्य को बुलवाया। राजा की जन्मकुंडली को फिर से एक और बार ध्यान से देखने के बाद राजपुरोहित ने ग्रहस्थितियों की एक और बार गिनती की और घोषणा की कि राजा सुरक्षित रहेंगे और डरने की कोई बात नहीं है। राजवैद्य ने राजा की नब्ज देखी और विश्वासपूर्वक कहा कि वे बिल्कुल स्वस्थ हैं और उनके मरने का सवाल ही नहीं उठता। इतने में सेनाधिपति ने आकर कहा, ‘‘महाराज, पूरा अंतःपुर ढूंढ़ निकाला। कोई भी दिखायी नहीं पड़ा। नगर की गलियों से गुज़रते हुए कुछ आदमियों को हमने गिरफ्तार किया, जिनपर हमें शंका हुई। बाद में हमें मालूम हुआ कि वे खतरनाक लोग नहीं हैं।''

फिर भी, राजा का मन शांत नहीं हुआ। वह बार-बार मंत्री को सावधान करता रहा कि इतवार के सूर्योदय होने तक कोई दुर्घटना न घटे, जिससे उसकी मौत हो जाने की संभावना है। राजा के भय को दूर करने के लिए मंत्री ने मशहूर भूतवैद्य को बुलवाया। भूतवैद्य ने चौक पूरने का काम किया, उनके बीच आटे से बनी मूर्तियाँ रखीं और विचित्र ध्वनियों को गुंजाते हुए कितनी ही पूजाएँ कीं। फिर कहने लगा, ‘‘महाराज, कोई भी दुष्ट शक्ति आपको छूने का भी साहस नहीं करेगी। निर्भय रहिये।''
फिर भी राजा दिन भर अशांत रहा। क्षण प्रतिक्षण उसका भय बढ़ता गया।
शनिवार के दिन राजा ने कुछ भी खाया-पीया नहीं। वह इसी चिंता के मारे भयभीत था कि कल सूर्योदय के तुरंत बाद उसकी मृत्यु होकर रहेगी। उसने फिर एक और बार मंत्री को बुलवाया, ‘‘घोषणा कर दीजिये कि जो व्यक्ति कल सूर्योदय को रोकेगा, उसे आधा राज्य दे दूँगा।''
यह सुनकर मंत्री स्तंभित रह गया। उसने शांत स्वर में राजा से कहा, ‘‘भला सूर्योदय को कौन रोक सकता है?'' मन ही मन उसे लगा कि प्राण-भीति के कारण राजा की मति भ्रष्ट हो गयी। फिर भी राजा की आज्ञा के अनुसार उसने मुनादी पिटवा दी।
शाम को, ज्ञानशेखर नामक एक युवक राजा के पास आया और बोला, ‘‘महाराज, मैंने आपकी घोषणा सुनी। मैं सूर्योदय को रोकूँगा और आपको मौत के मुँह से बचाऊँगा।''
राजा ने आश्र्चर्य भरे नेत्रों से उसे देखते हुए कहा, ‘‘सूर्योदय को कैसे रोक सकते हो?''
‘‘परंपरा से अपने देश में हम यह करते आ रहे हैं। इस रहस्य भरी विद्या में हम निष्णात हैं। परंतु, आपको एक काम करना होगा।'' युवक ने कहा।
राजा ने बड़ी ही बेचैनी से पूछा, ‘‘कहो, वह काम क्या है?''
‘‘आप कल प्रातःकाल ही जाग जाइये। राजभवन के अपने शयनागार के पूरबी कमरे की खिड़की मात्र खोल रखिये। आकाश की ओर अपनी दृष्टि केंद्रित कीजिये। सूर्योदय आपको दिखायी नहीं पड़ेगा।

‘‘उसी प्रकार घोषणा करवाइये कि नगर की गलियों में जब तक घंटी का नाद सुनायी नहीं पड़ेगा तब तक कोई भी नागरिक अपने घर से बाहर न निकले। अब आप निश्चिंत और आश्वस्त रह सकते हैं।'' यों अभय देकर युवक चला गया। राजा का मन अब थोड़ा हल्का हुआ।
दूसरे दिन सवेरे ही राजा दुर्मुख अपने शयनागार की पूरबी खिड़की के पास बैठ गया और सांस रोककर आकाश की ओर देखता रहा। पूरबी पर्वतों के घने जंगलों से काले-काले मेघों की तरह का गाढ़ा धुआँ आकाश पर छा गया। एक घंटे तक यह धुआँ, जैसे था, वैसे ही छाया रहा। इतने में सूर्योदय का समय भी बीत गया। जब राजा को पक्का विश्वास हो गया कि मृत्यु से बच गया हूँ, अब मेरे प्राण संकट में नहीं हैं तो वह शयनागार से बाहर आया। थोड़ी ही देर में धुआँ ग़ायब हो गया और सूरज भी स्पष्ट दीखने लगा। इसके दूसरे ही क्षण नगर की गलियों में घंटी प्रतिध्वनित हुई और लोग अपने-अपने घरों से बाहर आये। किन्तु, आधे राज्य की मांग पेश करनेवाला ज्ञानशेखर नहीं आया।
केवल मंत्री विवेकवर्धन को ही मालूम था कि ज्ञानशेखर नहीं आयेगा, क्योंकि राजा को बुरे सपने से बचाने के लिए, उसके भय को दूर करने के लिए उसी ने ज्ञानशेखर को राजा के पास भेजा था। और राजा को विश्वास दिलवाया था कि वह सूर्योदय को रोकने की क्षमता रखता है। फिर, हज़ारों विश्वस्त अनुचरों को, हज़ारों बैलगाड़ियों में सूखी घास भरकर पूरबी पर्वतों के जंगलों में भेजा और इस घास पर ठंडा पानी छिडकवाया और सूर्योदय के थोड़े समय पहले उसमें आग लगवायी। इससे धुआँ फैल गया और उस धुएँ में राजा सूरज को देख नहीं पाया। यों मंत्री ने राजा के भय को दूर किया और किसी की जानकारी के बिना राजा की मर्यादा की रक्षा की। अन्यथा लोग राजा की हँसी उड़ाते और उसे डरपोक ठहराते।
मंत्री विवेकवर्धन के इस विवेकपूर्ण कार्य को जितना भी सराहा जाये, कम है।


जल्दबाज़ी

विष्णु, शांता का इकलौता बेटा था। पिता जिस व्यापार को छोड़कर स्वर्गवासी हो गये थे वह उसे बड़ी ही जिम्मेदारी तथा सतर्कता के साथ संभाल रहा था। शांता अपने बेटे को बहुत चाहती थी । एक दिन खाना परोसते हुए उसने बेटे विष्णु से कहा, ‘‘इस दशहरे पर तुम्हारे पिताजी के जिगरी दोस्त रामावतार अपनी बेटी को लेकर यहॉं आनेवाले हैं।’’


‘‘रामावतार ! लगता है, मैंने इनका नाम इसके पहले कभी नहीं सुना।’’ आश्चर्य प्रकट करते हुए विष्णु ने कहा। ‘‘हॉं’’ के भाव में सिर हिलाती हुई शांता ने कहा, ‘‘तुम्हारे जन्म के पहले हम दोनों एक ही घर में रहते थे। अलग होते हुए भी एक परिवार जैसा व्यवहार हम दोनों के बीच था। मेरे लिए वे भाई जैसे थे तो मैं उनके लिए बहन जैसी थी। तुम्हारे पिताजी और उनकी दोस्ती घनी थी। लोग उनकी घनी दोस्ती की वाहवाही करते हुए थकते नहीं थे । फिर कुछ सालों के बाद रामावतार व्यापार करने बहुत दूर चले गये। व्यापार में व्यस्त हो जाने के कारण यहॉं आना उनके लिए संभव नहीं हो पाया। अब हमसे मिलने के लिए वे लालायित हैं। उनके यहॉं आने के पीछे एक और कारण भी है। वे अपनी बेटी की शादी यहीं किसी अच्छे घराने में कराने की प्रबल इच्छा रखते हैं। इसीलिए उन्होंने यहॉं आने की ख़बर भिजवायी।’’


फिर दो-तीन क्षणों तक वह सोच में पड़ गयी और फिर बोली, ‘‘उन्हें मालूम भी हो गया होगा कि तुम अच्छी तरह से व्यापार संभाल रहे हो, योग्य हो। शायद वे अपनी बेटी की शादी तुमसे करना चाहते होंगे। उनके यहॉं आने के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है।’’ विष्णु ने मॉं के बोलने की पद्धति पर आश्चर्य करते हुए कहा, ‘‘तो क्या हुआ? आने दो।’’ ‘‘इस बात की मुझे बड़ी खुशी है कि वे लंबे समय के बाद हमें देखने यहॉं आ रहे हैं। परंतु सुनने में आया है कि रामावतार की पत्नी झगड़ालू और कंजूस है।


कहीं बेटी भी ऐसे ही स्वभाव की हो तो ! पड़ोसिन रुक्मिणी कह रही थी कि सीतापति अपनी बेटी जलजा का विवाह तुमसे करना चाहते हैं। इसलिए रामावतार इस विषय को लेकर तुमसे कोई बात करें तो उनसे कहना कि वे मुझसे बात करें। मुझसे पूछे बिना कोई निर्णय मत लेना।’’ त्योहार आ ही गया। रामावतार अपनी बेटी पद्मा को लेकर आ गये। शांता और विष्णु ने बड़े ही प्यार से उनका स्वागत किया। पद्मा की सुंदता ने शांता को मोह लिया। उसके स्वभाव पर भी वह रीझ गयी। रात को जब विष्णु घर आया, तब उसने उससे कहा, ‘‘बेटे, देखा, लड़की कितनी सुंदर है! स्वभाव से भी बड़ी अच्छी लगती है। बहू हो तो ऐसी हो। दो-तीन दिनों के बाद रामावतार कुछ कहे या न कहे, मैं ही इस रिश्ते का प्रस्ताव रखूँगी।’’


‘‘मॉं, बिना जाने कि उनकी क्या राय है, जल्दबाजी करना अच्छा नहीं है।’’ विष्णु ने यों मॉं को सावधान किया। दो दिनों के बाद शांता ने विष्णु से एकांत में कहा, ‘‘पद्मा मुझे बहुत अच्छी लगी। घर के काम-काजों में भी काफ़ी दिलचस्पी लेती है। मेरी समझ में नहीं आता कि रामावतार शादी को लेकर कोई भी बात क्यों नहीं कर रहे हैं। मैं ही उनके सामने यह प्रस्ताव रखना चाहती हूँ। कहो, तुम्हारी क्या राय है?’’ विष्णु ने ज़रा चिढ़ते हुए कहा, ‘‘वे लोग ह़फ़्ते भर यहीं रहनेवाले हैं। थोड़ी-सी सहनशक्ति से काम लो। तुम इस प्रकार जल्दबाजी करोगी तो उनकी नज़र में हमारी कोई इज्ज़त रह नहीं जायेगी।’’


शांता बिना कुछ बोले वहॉं से चली गयी। विष्णु भी जब वहॉं से जाने लगा तब पीछे से आवाज़ आयी। ‘‘विष्णु!’’ उस आवाज़ में मिठास भरी हुई थी।
विष्णु ने देखा कि पद्मा उसी की तरफ बढ़ी चली आ रही है । ‘‘तुमने अभी सासू से जो बातें कीं, मैंने सुन लीं।’’ विष्णु ने सकपकाते हुए कहा, ‘‘मॉं, हर बात में जल्दबाज़ी दिखाती है। इसलिए...’’ यों कहते हुए वह रुक गया।


पद्मा ने मंद मुस्कान भरते हुए कहा, ‘‘सासू के मन के सभी विचारोें को मैंने भांप लिया है। उन्हें भय है कि पता नहीं, कैसी बहू घर में क़दम रखेगी; इस वृद्धावस्था में उनकी ठीक तरह से देखभाल करेगी या नहीं। ऐसी स्थिति में उनका यह चाहना सही है कि शांत स्वभाव की कोई कन्या दिखायी पड़े तो यथाशीघ्र उसे अपनी बहू बनाने का निर्णय ले लेना चाहिये। और यह कोई जल्दबाजी नहीं कहलाती। आख़िर तुम इकलौते बेटे जो ठहरे।’’
विष्णु ने ‘हॉं’ के भाव में सिर हिलाया।


पद्मा फिर से कहने लगी, ‘‘मानव की मनोवृत्ति को सही तरह से समझने पर उसके व्यवहार के अच्छे और बुरे पक्षोें को भी जान पायेंगे। अन्यथा टूटे शीशे के प्रतिबिंबों की ही तरह टेढ़े-मेढ़े और अटपटेदिखने लगेंगे। मेरे पिताजी ने व्यापार में पर्याप्त सफलता प्राप्त की और कमाई का दुरुपयोग भी नहीं किया। मेरी मॉं तुनकमिजाज है, इसलिए लोग उसे कंजूस और झगड़ालू कहते हैं। यहॉं आने के बाद ही मेरे पिताजी को मालूम हो पाया कि मेरी मॉं के बारे में लोगों की, ख़ासकर हमारे रिश्तेदारों की क्या राय है। इस हालत में हमारे विवाह को लेकर सासजी से बात करने से वे सकुचा रहे हैं। अगर सासजी ही यह प्रस्ताव पेश करतीं तो हमारी दृष्टि में उनके प्रति आदर और बढ़ता।’’ यह कहते हुए उसकी आँखों में आँसू उमड़ आये । उसने तुरंत अपना सर झुका लिया।


विष्णु ने एक क़दम आगे बढ़कर उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, ‘‘जल्दबाज़ी मॉं की नहीं, मेरी है। आगे-पीछे सोचे बिना मैं बक गया। मुझे माफ़ करना। पर अब तो लगता है कि जल्दबाज़ी करनी ही होगी।’’ पद्मा ने चकित होकर पूछा, ‘‘जल्दबाज़ी किस बात में?’’ ‘‘हमारे विवाह कोे लेकर। जिस लड़की ने मेरी मॉं को और मुझे इतना आकर्षित किया है, उससे विवाह रचाने के विषय में जल्दबाज़ी करनी ही होगी न!’’ विष्णु ने हँसते हुए कहा। वहॉं से जाती हुई पद्मा ने सिर झुका लिया।


न्याय निर्णय

शांतिपुर नामक गांव में राम और भीम नामक दो किसान रहा करते थे। दोनों के खेत अगल-बग़ल में थे। राम ग़रीब था पर, गांव के लोग उसे बहुत अच्छा व भला आदमी कहते थे। भीम धनिक था। अव्वल दर्जे का खुदगर्ज़ था। किसी को पनपते हुए देखकर वह ईर्ष्या से जल उठता था।


एक दिन राम अपने खेत में हल चलाते हुए सोचने लगा, ‘‘पता नहीं, कब तक मुझे कष्ट झेलने होंगे। कोई भगवान मुझपर दया करें तो अच्छा होगा।’’ इतने में हल की लकड़ी से कोई पत्थर टकरा गया। वह वहीं रुक गया। राम ने कुदाल से उस पत्थर को हटाया। उस पत्थर के नीचे लोहे की एक पेटी थी। पेटी खोलकर देखी तो उसमें सोने के प्राचीन आभूषण थे। राम ने भगवान को धन्यवाद किया।


उसी व़क्त, बगल के ही खेत का मालिक भीम वहॉं आया। उसने भी गहनों की उस पेटी को देखा। वह सोचने लगा कि कैसे इन गहनों को हड़पूँ? फिर वह राम के पास आकर बोला, ‘‘राम, गहने देना, जरा देखूँ तो सही।’’ उन्हें हाथ में लेकर एक-एक करके देखने लगा और कहता गया, ‘‘अरे, ये सब मेरी मॉं के गहने हैं। बहुत पहले खो गये थे। कई जगहों पर ढूँढ़ा नहीं मिले। अच्छा हुआ, अब यहॉं मिल गये।’’कहता हुआ वह उन्हें अपने साथ लेता जाने लगा।


राम ने तुरंत उससे वे कहने छीन लिये और कहा, ‘‘ये तुम्हारी मॉं के गहने नहीं हैं। तुम झूठ बोल रहे हो। ये मुझे खेत में मिले। भगवान ने दिया है मुझे।’’
भीम ने नाराजगी का नाटक करते हुए कहा, ‘‘सौ फी सदी ये मेरी मॉं के ही गहने हैं। चलो, ग्रामाधिकारी के पास चलते हैं। फैसला हो जायेगा कि ये किसके गहने हैं।’’


ग्रामाधिकारी ने दोनों का बाद-विवाद सुना, पर इस समस्या के परिष्कार का मार्ग उसकी समझ में नहीं आया। ग्रामाधिकारी को भली-भांति मालूम था कि भीम एकदम स्वार्थी है। उसे यह भी मालूम था कि राम ईमानदार है। एक निर्णय पर आ चुकने के बाद उसने उन दोनों से कल आने को कहा।


दूसरे दिन, ग्रामाधिकारी का फ़ैसला सुनने दोनों आये। ग्रामाधिकारी का फैसला सुनने गॉंव के लोग भी बड़ी संख्या में आये। ग्रामाधिकारी ने पेटी को खोलकर ध्यान से देखते हुए कहा, ‘‘आप दोनों के बयानों को सुनने के बाद इस निर्णय पर आया हूँ कि ये गहने किसके हैं । वह और कुछ कहने ही जा रहा था कि इतने में दो घुड़सवार वहॉं आये। वे सिपाहियों की वर्दी पहने हुए थे। ग्रामाधिकारी के पास आकर उन्होंने कहा, ‘‘महाराज शिकार करने आये हैं। पास ही के जंगल में हैं। आपको साथ ले आने का आदेश दिया है।’’


उन सिपाहियों की दृष्टि अचानक उन गहनों पर पड़ी। चकित होकर उन्होंने गहने हाथ में लिये और ध्यान से देखते हुए कहा, ‘‘ये तो महारानी जी के आभूषण हैं। कुछ समय पहले इनकी चोरी हो गयी थी। आपको ये कहॉं से मिले?’’


ग्रामाधिकारी ने पूरा किस्सा सुनाया। ‘‘इसका यह मतलब हुआ कि ये दोनों मिले-जुले चोर हैं। चलिये महाराज के पास।’’ गरजते हुए सिपाहियों ने कहा।


भीम थर-थर कांपता हुआ ग्रामाधिकारी के पैरों पर गिर पड़ा। कहने लगा, ‘‘महाशय, इन गहनों से मेरा कोई संबंध नहीं है। ये राम को उसके खेत में मिले। मुझमें दुर्बुद्धि जगी और मैंने इन्हें हड़प लेना चाहा। मुझे माफ कर दीजिये।’’


‘‘भीम, तुम्हारी दुर्बुद्धि को तुम्हारे ही मुंह से कहलाने के लिए मैंने यह चाल चली। ये सिपाही नहीं हैं। मेरे ही आदमी हैं। तुमने मान लिया कि ये तुम्हारे गहने नहीं हैं, इसलिए राम को ये गहने सौंप रहा हूँ। तुमने राम को धोखा दिया, अच्छा होने का नाटक किया, इसलिए तुम्हें सौ अशर्फियें का जुरमाना भरना होगा। आगे से ही सही, ऐसी ग़लती मत करना।’’ ग्रामाधिकारी ने गंभीर स्वर में अपना फैसला सुनाया।


लोगों ने ग्रामाधिकारी के फैसले की वाहवाही की।

तेरा जैसा

रामेश और कामेश पड़ोसी किसान हैं। गाँव में सब लोग रामेश को शब्दों का मांत्रिक कहा करते हैं। उसकी हर बात में कोई न कोई विलक्षणता होती है। कामेश की तीव्र इच्छा है कि रामेश को हराऊँ और लोगों की प्रशंसा पाऊँ। परंतु जब कभी भी उसने इस दिशा में प्रयत्न किया, हारता ही रहा।
उस साल उस गाँव के मंदिर में गाँव के प्रमुख श्रीराम नवमी के उत्सव को लेकर चर्चा करने लगे। रामेश जो भी सलाहें देता था, उनका खंडन भीमेश नामक आदमी करने लगा। अब रामेश ने कोई सलाह न देने का निश्चय कर लिया।
कामेश ने सहानुभूति दिखाते हुए कहा, ‘‘क्या बात है रामेश? सलाह देना बंद क्यों कर दिया?''
‘‘जहाँ हमारी स्थिति हमारे अनुकूल नहीं, वहाँ चुप रहने में ही भलाई है,'' रामेश ने कहा।
‘‘तेरी बात कोई मान नहीं रहा इसलिए नाराज़ हो गये?'' कामेश ने उसे भड़काते हुए कहा।
‘‘ग़रीब की नाराज़ी उसे ही हानि पहुँचाती है,'' रामेश ने कहा।
‘‘समझ गया। तुम्हारा बड़प्पन कोई मानने के लिए तैयार नहीं है, इसलिए क्या सीताराम के विवाहोत्सव में भी भाग नहीं लोगे?'' ‘‘भगवान के विवाह पर कौन छोटा और कौन बड़ा। सब समान हैं।'' रामेश ने कहा।
‘‘सबको समान मानते हो? हर कोई पालकी में बैठे तो ढोयेगा कौन?'' कामेश ने इस कहावत का उपयोग करते हुए प्रशंसा पाने के उद्देश्य से सबकी ओर देखा। रामेश ने तुरंत कहा, ‘‘तेरा जैसा कोई न कोई तो होगा ही।'' उसकी बात पर सब ठठाकर हँस पडे। कामेश का चेहरा फीका पड़ गया।

आँसू तथा ये क्या कहते हैं?

स्वप्ना दत्ता बच्चों के लिए तीन दशकों से भी अधिक समय से लिख रही हैं और 40 से भी अधिक पुस्तकों के सृजन का श्रेय इन्हें प्राप्त है। इनकी कहानियाँ सभी प्रमुख दैनिक पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें चन्दामामा भी शामिल है। भारत की एनिड ब्लाइटन के रूप में प्रख्यात श्रीमती दत्ता की पुस्तकें चिल्ड्रेन्स बुक ट्रस्ट तथा अन्य के द्वारा प्रकाशित की गई हैं। ये टारगेट की सम्पादकीय सहायक, लिम्का बुक ऑफ रिकाडर्‌स की सहायक सम्पादिका तथा 1987 से 2002 तक इन्साइक्लोपिडिया ब्रिटैनिका की उप सम्पादिका रह चुकी हैं। इन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है जिनमें शामिल हैं राष्ट्रीय फेलोशिप, एक राष्ट्रीय पुरस्कार, म्यूनिक तथा वियेना इण्टरनेशनल यूथ लाइब्रेरी के लिए छात्रवृति। वह बंगलोर में रहती हैं।
क्या आँसू हमेशा शोक के संकेत होते हैं? तो क्या आँसू बहाना बन्द करके कोई सुखी रह सकता है? आँसू के महत्व और तात्पर्य के विषय में मेरी दादी ने यह कहानी मुझे तब सुनाई थी जब मैं बच्ची थी। इस सरल कहानी को अपने पाठकों के साथ बाँटना चाहूँगी, क्योंकि वे निश्चय ही इसे पसन्द करेंगे।
वसन्त ऋतु की प्रातः वेला थी। चारों ओर रंग-बिरंगे फूल खिल रहे थे। पक्षी गा रहे थे। झरने भी गुनगुना रहे थे। हरेक व्यक्ति खुश था। हरेक के होठों पर मुस्कान थी।
एक ऐसी प्रातः वेला में रानी मधुरिमा अपने भव्य राजमहल में सोकर उठी। उसने गवाक्ष से बाहर झाँका। उद्यान में रंगों की मानो प्रज्वलित भूलभुलैया हो। कोयल और अन्य पक्षी मधुर तान में गा रहे थे। उसक हृदय उल्लास से भर गया।
‘‘वसन्तोत्सव का आनन्द लेने के लिए क्या हम जंगलों में चल सकते हैं, मेरे स्वामी?'' उसने राजा से कहा। उसने मुस्कुरा कर सिर हिलाया। और काम खत्म हो जाने पर सम्मिलित होने का वचन दिया।
रानी अपनी सहेलियों के साथ जंगल में गई। उन सब ने सरोवर के स्वच्छ जल में स्नान किया। फूलों को चुनकर मालाएँ बनाईं। ताजे फलों का स्वाद लिया। वे तितलियों के पीछे भागे। चिड़ियों के साथ गुनगुनाये-गाये। सब उल्लास में डूबे थे। सबके लिए यह सबसे आनन्ददायक दिन था।

क्रमशः दिन ढलने लगा। पक्षी अपने घोंसलों में लौटने लगे। कमल दलों ने अपने पट बन्द कर लिये। कुमुदनी तन्द्रा में डूब गई। तारों ने अपने नयन खोले और टिमटिमाने लगे। पर राजा के आगमन का कोई संकेत नहीं था। क्या वे अपना वादा भूल गये। पर अब वन की सुन्दरता अन्धकार में खो गई थी। रानी मधुरिमा अपनी सहेलियों के साथ धीरे-धीरे भारी कदमों के साथ महल में लौट गई।
वह महल पहुँचकर जंगल में बीते हर्षोल्लासपूर्ण दिन के बारे में राजा को बताने के लिए उत्सुकता के साथ उनकी प्रतीक्षा करती रही। पर राजा नहीं आये। पल पल करके पहर बन गये। आसमान में चाँद चमकने लगा। महल के चतुर्दिक वीथियाँ निस्तब्ध हो गईं। पर राजा अभी तक दरबार से नहीं लौटे। रानी की बेसब्री रोष में बदल गई। आखिर जब राजा का पदचाप सुनाई पड़ा तब लगभग अर्धनिशा हो गई थी।
‘‘इतने विलम्ब का कारण स्वामी?'' रानी ने खिन्न स्वर में पूछा।
‘‘प्रजा का दुख दर्द।'' राजा ने कहा।
‘‘दुख दर्द !''
‘‘हाँ, उनकी समस्याएँ, उनकी कठिनाइयाँ! मुझे ये सब सुलझानी थीं। और कौन उनकी मदद करेगा? उनका राजा ही तो करेगा।''
मधुरिमा ने अपना सिर झटकते हुए कहा, ‘‘ऐसे खूबसूरत दिन को शिकायतें सुनने में बर्बाद करना कितनी शर्म की बात है!''
राजा मुस्कुराकर रह गया, कुछ बोला नहीं। दूसरे दिन भी ऐसा ही हुआ। तीसरे दिन भी। रानी यद्यपि वन के मनोरम वातावरण में अपना समय बीताती रही, पर राजा उसकी खुशी में सम्मिलित नहीं हो सका।
अन्ततोगत्वा रानी निराश और दुखी होकर बोली, ‘‘आपका राज्य जंगल से भिन्न क्यों है? यहाँ महल में आहें और आँसुओं के सिवा मुझे कुछ और दिखाई नहीं देता। दुख,दर्द-शोक और समस्याएँ ! मैं इन सब से तंग आ चुकी हूँ! मैं प्रसन्न रहना चाहती हूँ।''

‘‘किन्तु यह सम्भव नहीं, मधुरिमा'', राजा ने स्नेह से कहा, ‘‘जीवन प्रकाश-अन्धकार, सुख-दुख और हँसने-रोने का ताना-बाना है। हमें दोनों का सामना करना है। किसी एक को बाहर कर देना बिलकुल सम्भव नहीं है।''
रानी मधुरिमा ने हठपूर्वक सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘प्रयास करने पर हर चीज सम्भव है, स्वामी। आखिर आप यहाँ के राजा हैं। आप को घोषणा कर देनी चाहिये कि जो भी, एक बून्द भी आँसू बहायेगा, वह हमेशा के लिए राज्य से निष्कासित कर दिया जायेगा।''
राजा ने चकित और आहत होकर रानी पर नजर डाली। ‘‘तुम रानी और प्रजा की माता हो। तुम किसी के लिए इतनी निर्दय और अनुचित कामना कैसे कर सकते हो?''
‘‘मैं अवश्य ऐसी कामना करूँगी और आप वही करेंगे जो मैं कहती हूँ।'' रानी ने कहा।
‘‘ऐसा ही होगा'', राजा बोला, ‘‘किन्तु, तुम शीघ्र ही अपने इस निर्णय के लिए पछताओगी। तुम केवल आँसुओं को बन्द करके सुखी नहीं रह सकती।''
रानी मधुरिमा हँसती हुई दर्पण की ओर मुड़ी।
राज्य भर में घोषणा कर दी गई। लोगों ने इसे मूक विस्मय के साथ सुना। कौन पाषाण- हृदय नीच गरीबों के आँसू लूट रहा है, जो उनका एक मात्र सान्त्वनादाता है? वे विषाद, क्षति, दुख-दर्द के सामने कैसे मुस्कुरा और हँस सकते हैं? क्या खुशी थोपी जा सकती है? राज्य से निष्कासित लोगों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी।
मौसम, एक के बाद एक, बदलते गये। वर्ष-चक्र पूरा घूम गया। एक बार वन में पुनः वसन्त की बहार आ गई। जंगल फूलों के रंग से दमक उठा और उनकी खुशबू हवा में तैरने लगी। पक्षी गीत गाने लगे। पर इस बार रानी मधुरिमा के पास यह सब देखने के लिए समय नहीं था। उसका शिशु-बेटा, राजकुमार गम्भीर रूप से बीमार था। वह भारी हृदय के साथ अपने बेटे के पास बैठी थी। राज्य के सभी चिकित्सकों ने उपचार किया। पर व्यर्थ! दूसरे दिन के सूर्योदय के साथ उसके बेटे का सूर्यास्त हो गया।

रानी मधुरिमा का हृदय दुख से कराह उठा और आँसुओं से उमड़ पड़ा। उसकी मुस्कुराहट, लगा कि हमेशा के लिए विषाद में डूब गई।
अगले दिन सुबह राजा ने उसे दरबार में बुलाया। ‘‘तुमने अपने ही आदेश का उल्लंघन किया है, मधुरिमा।'' राजा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘‘अब तुम्हें देश-निकाला की सज़ा भुगतनी होगी।''
रानी ने स्तम्भित होकर राजा की ओर देखा, ‘‘पर निश्चय ही आप राज्य की रानी को राज्य से बाहर निकाल नहीं सकते!''
‘‘मैंने तुम्हारी आज्ञा से ही यह कानून बनाया और एक बार कानून बन जाये तो यह किसी को नहीं छोड़ता, राजसत्ता को भी नहीं।'' राजा ने दृढ़ता के साथ कहा।
रानी मधुरिमा को महल से बाहर कर घने जंगल में भेज गिया गया। बीहड़ रास्तों में भटकती गिरती जंगली जानवरों के भय से काँपती रोती-रोती वह अन्धी हो गई। उसने उन लोगों की आवाजें सुनीं जो राज्य से निष्काषित किये गये थे। उन सब ने अपनी रानी का स्वागत किया और उसके दुःख और पुत्र शोक की भारी विपदा को बाँटा। उन सबने उसके लिए कुटिया बनाई और स्नेहपूर्वक उसकी देखभाल की क्योंकि अब वह उन्हीं लोगों में से एक थी।
दिन गुजरते रहे। लोग निष्कासित रानी का सम्मान करने लगे। वे उसके साथ अपना सुख-दुख बाँटने लगे। रानी मधुरिमा अपने अहंकार और उद्दण्ड व्यवहार को भूल गई। उसने उन सब की सेवा की, परिश्रम किया और सहायता की जिन्होंने उसे नया जीवन दिया था। अन्ततोगत्वा वह एक सच्ची रानी और माता बन गई।
एक दिन स्वच्छ प्रातःकाल, राजा अपने सुनहले रथ में प्रकट हुआ।
जब वह चारों ओर निहार रहा था तब उसने रानी मधुरिमा को एक बीमार बच्चे की सेवा करते हुए देखा। बच्चा उसकी भुजाओं में सिमटा हुआ था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। राजा ने उस पर नज़र डाली। रानी नतमस्तक हो गई।
‘‘क्या तुमने आँसू के महत्व को समझ लिया, मधुरिमा?'' उसने स्नेह से पूछा।
‘‘हाँ, समझ गई, मेरे स्वामी'', वह विनयपूर्वक बोली।
‘‘तब तुम अपनी सभी बहिष्कृत प्रजा के साथ अपने राज्य में वापस लौट चलो,'' राजा ने कहा।