Thursday, June 30, 2011

नारायण पांडे की वाक् शुद्धि

माधव पांडे गदानगर का निवासी था। वह बड़ा ही राम भक्त था। उसकी पत्नी जानकी का स्वभाव और अभिरुचियाँ पति के ही जैसे थे। उनका बेटा नारायण पांडे गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त कर रहा था।
माधव पांडे राम की कथाएँ सुनाता था। कई लोग हर दिन इन कथाओं को सुनने उसके घर आया करते थे। संतुष्ट होकर जाने के पहले वे लोग थोडा-बहुत जो देते थे, उसी से वह अपना घर चलाया करता था।
नगरपाल गीर्वाणी उसकी राम कथाएँ सुनना चाहता था। एक दिन उसने माधव पांडे को बुलाया और कहा, ‘‘तुम्हारी कथाएँ सुनने की बड़ी इच्छा है। हर दिन मेरे दरबार में आना और सभिकों को कथाएँ सुनाना। जितना धन चाहते हो, दूँगा।''
माधव पांडे ने कहा, ‘‘यजमान्, आप धन देकर राम कथाएँ सुनना चाहते हैं। अगर मैं आपके दरबार में आऊँ और कथाएँ सुनाऊँ तो इसका यह मतलब हुआ कि मैं धन के लिए ही यह काम कर रहा हूँ। किन्तु मैं उन्हीं राम भक्तों को ये कथाएँ सुनाता हूँ, जो भक्ति-भाव से मेरे घर आते हैं। आप चाहें तो मेरे घर आकर वे कथाएँ सुन सकते हैं। आपसे मैं प्रतिफल भी नहीं मांगूँगा।''
गीर्वाणी नाराज़ हो उठा। पर कुछ कह नहीं पाया और चुप रह गया। माधव पांडे के पुत्र नारायण पांडे ने शिक्षा समाप्त की और दरबार में नौकरी पाने के लिए गीर्वाणी से मिला। गीर्वाणी ने खुश होते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे पिता केवल राम कथाएँ सुनाते हैं। तुम उपनिषद, वेद, अष्टादशपुराण, प्रबंध काव्य, नाटकों की कथाएँ आदि हर दिन मेरे दरबार में सुनाते रहना। लोग अगर तुम्हारे पिता से कथाएँ सुनना बंद कर दें और तुम्हारी कथाएँ सुनने मेरे दरबार में आने लगें तो तुम्हें बडी धन-राशि दूँगा।''

नारायण पांडे ने कहा, ‘‘रसीले ढंग से कथाएँ सुनाने की मेरी तीव्र इच्छा है। पर, आप चाहते हैं कि मैं अपने पिता से प्रतिस्पर्धा करूँ। यह मुझे समुचित नहीं लगता।''
‘‘मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि केवल पांडित्य में अपने पिता से प्रतिद्वंद्विता करो। अपनी कमाई से तुम सुखी रह सकते हो और अपने माता-पिता को भी सुखी रख सकते हो। इसमें अनुचित क्या है?'' गीर्वाणी ने पूछा।
नारायण पांडे को ये बातें सही लगीं। घर लौटने के बाद जब उसने यह विषय अपने पिता से कहा, तो उसने कहा, ‘‘जो तुम्हें सही लगता है, करना। केवल धन ही को महत्व मत देना।''
नारायण पांडे, गीर्वाणी के दरबार में काम पर लग गया। गीर्वाणी ने उसके बारे में विस्तृत रूप से प्रचार कराया। इस वजह से नारायण पांडे से कथाएँ सुनने बड़ी संख्या में लोग दरबार में आने लगे। गीर्वाणी ने उसे बड़ी रक़म दी और उसका सत्कार किया।
नारायण पांडे ने उसी नगर में एक बड़ा घर खरीदा। लक्ष्मी नामक एक सुंदर लड़की से शादी की और आराम से ज़िन्दगी गुज़ारने लगा। परंतु, इससे पिता माधव पांडे को संतुष्टि नहीं मिली। क्रमशः उसकी कथाएँ सुनने आनेवालों की संख्या घटती गयी। वह चिंतित हो उठा। इस स्थिति में, श्री राम उसे सपने में दिखायी पड़े और बोले, ‘‘चक्रपुर में मेरा मंदिर उजड़ गया है। वहाँ चले जाना और मेरी पूजा करना।''
जैसे ही वह जागा, उसने लोगों से पूछकर चक्रपुर के बारे में जानकारी प्राप्त की। मालूम हुआ कि वह गदानगर से दूर पर्वतों के बीच में स्थित है। वहाँ की भूमि खेती के योग्य है, पर वर्षा के अभाव के कारण वहाँ पीने के लिए भी पानी नहीं मिलता। इसी वजह से ग्रमीण वह प्रदेश छोड़कर चले गये और कहीं बस गये। अब उस गाँव में कुछ जंगली रहते हैं। राम के मंदिर की देखभाल करनेवाला कोई नहीं रहा।
माधव पांडे पत्नी समेत चक्रपुर पहुँच गया। जंगल के सरदार को जब उनके आने का कारण मालूम हुआ तो उसने माधव पांडे से कहा, ‘‘तुम दोनों उस उजड़े मंदिर में पूजा करोगे तो हम एक हफ्ते तक तुम दोनों की देखभाल करेंगे। इस बीच कोई चमत्कार हो जाए तो तुम लोग यहीं रह सकते हो। अन्यथा तुम्हें गाँव में रहने नहीं देंगे।''

माधव पांडे और जानकी राम मंदिर गये। मंदिर में दीप जलाये और पूजा की। रात को जब वे वहीं सो गये तब सपने में श्रीराम प्रत्यक्ष हुए और माधव पांडे से कहा, ‘‘तुम्हारी भक्ति-श्रद्धा पर मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हें जो चाहिये, माँगो।''
माधव पांडे ने श्रीराम को प्रणाम करके कहा, ‘‘इस हफ्ते में ग्रमीणों को अपनी कोई महिमा दिखाइये।''
‘‘ठीक है, जैसे ही नींद से जागोगे, तुम्हें तुम्हारे बग़ल में चंदन की एक अच्छी लकड़ी दिखायी देगी। पहले उसे अपने दायें हाथ में लो। तब तुम्हें ज्ञात होगा कि कब क्या किया जाए। फिर उसे बायें हाथ में लेना। तुम जो कहोगे, वह होकर रहेगा। चंदन की लकड़ी केवल तुम्हारे वारिसों के उपयोग में ही आयेगी।'' यों कहकर श्रीराम अदृश्य हो गये।
जागने पर माधव पांडे ने बग़ल में चंदन की लकड़ी पायी। उसने अपने सपने के बारे में पत्नी को भी बताया। दोनों पास ही के सरोवर में जाकर नहाये। माधव पांडे ने बायें हाथ में चंदन की लकड़ी ली और कहा, ‘‘यह मंदिर बिल्कुल ही संगमरमर का नवीन मंदिर बन जाए।''
देखते-देखते वह उजड़ा मंदिर संगमरमर के मंदिर में परिवर्तित हो गया। इस चमत्कार को देखकर सभी ग्रमीण माधव के पैरों पर गिर पड़े।
इस बीच गदानगर में चंद परिवर्तन हुए। जब समाचार फैल गया कि नारायण पांडे ने कथाएँ सुनाकर पर्याप्त धन कमा लिया तो कलाकार नर्तकियाँ वहाँ आ पहुँचीं। इससे नारायण पांडे की कथाओं में नगरवासियों की कोई अभिरुचि नहीं रही। आमदनी बहुत कम हो गयी। उसने यह बात गीर्वाणी से बतायी।
गीर्वाणी ने कहा, ‘‘तुम अपने पिता के इकलौते बेटे हो। यहाँ रहकर करोगे भी क्या? चक्रपुर जाओ और उन्हीं के साथ रहना।'' व्यंग्य-भरे स्वर में उसने कहा।
नारायण पांडे भांप गया कि गीर्वाणी के मन में अब उसके लिए कोई सद्भावना नहीं है। वह पत्नी को लेकर दूसरे ही दिन चक्रपुर गया। बेटे और बहू को देखकर माधव पांडे और जानकी बेहद खुश हुए। माधव पांडे ने बेटे को थोड़ी दूर ले जाकर चंदन की महिमा के बारे में उसे बताया। फिर कहा, ‘‘स्वयं भगवान श्रीराम तुम्हें यहॉं ले आये। अपना हृदय राम भक्ति से भर लो। जैसे ही तुम योग्य बन जाओगे, इस मंदिर की जिम्मेदारी तुम्हें सौंप दूँगा।''

चंदन की लकड़ी की महिमा के बारे में नारायण पांडे ने अपनी पत्नी लक्ष्मी को भी बताया। यह सुनते ही लक्ष्मी के मन में दुर्बुद्धि जगी कि उसका पति इस मंदिर का पुजारी बने। वह एक दवा जानती थी, जिसे खानेवाला एक महीने तक पलंग पर ही अस्वस्थ होकर लेटा रहेगा और फिर उसके बाद ठीक हो जायेगा। लक्ष्मी ने अपने ससुर को वह दवा खिलायी। माधव पांडे तुरंत अस्वस्थ हो गया और पलंग पर लेटा रहा।
वैद्यों ने माधव पांडे की परीक्षा की और कहा, ‘‘यह बीमारी ख़तरनाक नहीं है, इसकी कोई दवा भी नहीं है। बस, पानी में भीगना मत।''
पिता के बीमार पड जाने के कारण नारायण पांडे मंदिर का पुजारी बन गया। इसी को मौक़ा समझकर लक्ष्मी ने पति से कहा, ‘‘अपनी वाक् शुद्धि का सबूत प्रजा को दो और उनकी प्रशंसा पाओ।''
पत्नी के कहे अनुसार नारायण पांडे ने पहले दिन मंदिर में आये लोगों से कहा, ‘‘मुझमें वाक् शुद्धि है। आपमें से जिन्हें जो माँगना है, माँगो।''
कुछ लोगों ने चाहा कि उनके व्यापार में वृद्धि हो, कुछ ने निधियाँ चाहीं। यों तरह-तरह की इच्छाएँ लोगों ने प्रकट कीं। वे सब फलीभूत हुईं। परंतु नारायण पांडे की पत्नी लक्ष्मी अकस्मात् पक्षाघात की शिकार हो गई। कारण जानने के लिए नारायण पांडे ने चंदन की लकड़ी हाथ में ली तो उसका सारा शरीर जलने लगा। वह बहुत ही परेशान हो उठा। ऐसे समय पर गाँव के सब लोग उसके पास आये और कहने लगे, ‘‘आपके पिता ने हम सबकी भलाई की। वे अब बहुत ही अस्वस्थ हैं। उनकी पीड़ा हमसे देखी नहीं जाती। हम चाहते हैं कि जब तक आपके पिता स्वस्थ न हो जाएँ तब तक हमारे गाँव में वर्षा न हो।''


उनकी प्रार्थना के प्रभाव के कारण उस गाँव में वर्षा नहीं हुई। तालाब सूख गये। लोगों से ये तकलीफ़ें सही नहीं गयीं। तो वे फिर नारायण पांडे के पास आये और उन्हें बचाने की प्रार्थना की। नारायण पांडे उन सबको लेकर पिता के पास गया और अनजाने में उससे जो अपराध हुआ, उसे क्षमा करने की विनती की। उसने चंदन की लकड़ी को पिता के हाथ में रखा। उसकी सहायता से माधव पांडे पूरा विषय जान गया और कहा, ‘‘बेटे, पश्चाताप से बढ़कर कोई प्रायश्चित्त नहीं। अपने मन में श्रीराम को भर लो और निस्वार्थ होकर अपना कर्तव्य निभाओ।'' यह कहकर उसने चंदन की लकड़ी बेटे को दी।
नारायण पांडे ने चंदन की लकड़ी को क्या पकड़ा, उसके बदन की जलन गायब हो गयी। तब उसने जनता से कहा, ‘‘आप सबकी प्रार्थना है कि मेरे पिता स्वस्थ हो जाएँ। आप सब यही चाहते हैं कि जब तक वे स्वस्थ न हो जायें तब तक वर्षा न हो। वर्षा के अभाव का यही कारण है। उनके स्वस्थ होने में एक महीना लग सकता है। तब तक उन्हें हम गाँव से दूर रखेंगे। तब यहाँ वर्षा होगी।''
जनता ने यह मान लिया। नारायण पांडे स्वयं माँ सहित पिता को रामापुर ले गया। जैसे ही वह चक्रपुर लौटा, भारी वर्षा हुई। लोगों ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी वाक्शुद्धि अद्भुत है। भविष्य में तुम्हीं राम मंदिर के पुजारी बनो ।''
इसके एक महीने के बाद नारायण पांडे की पत्नी लक्ष्मी स्वस्थ हो गयी। पति-पत्नी दोनों मिलकर रामापुर गये। तब तक माधव पांडे बिल्कुल स्वस्थ हो गयाथा । पत्नी समेत नारायण पांडे ने पिता के पैर छूते हुए कहा, ‘‘पिताश्री, मैं पितृ द्रोही हूँ। देव पूजाओं के योग्य नहीं हूँ। आप चक्रपुर आइये और पूजा की जिम्मेदारियाँ स्वयं संभालिये।''
माधव पांडे ने प्यार से अपने बेटे को गले लगाया और कहा, ‘‘बेटे, तुममें वाक् शुद्धि है। स्वार्थ जब तक अपना फन नहीं फैलाता, तब तक वह रहेगी । स्वार्थ से छुटकारा पाना हो तो स्वानुभव चाहिये। श्रीराम की कृपा से वह तुम्हें प्राप्त होगा। भविष्य में सतर्क रहना। अब तुम पुजारी होने के सर्वथा योग्य हो।'' यों उन्होंने आशीर्वाद दिया।





मज़ाक

चारुलता और हेमलता अड़ोस-पड़ोस में रहती हैं। दोनों अधेड़ उम्र की हैं। शिक्षित भी हैं। उनके पति कुशल व दक्ष हैं, इसलिए व्यापार करते हुए खूब कमा रहे हैं। जब उनके पति अपने-अपने काम पर चले जाते हैं, तब वे जल्दी-जल्दी अपने घर के काम निबटाने में जुट जाती हैं। घर के काम पूरा होते ही, दोनों औरतें, किसी न किसी के चबूतरे पर बैठ जाती हैं और गपशप करती रहती हैं। देखने में वे दोनों बहुत गहरे दोस्त लगती हैं, पर एक-दूसरे का मज़ाक उड़ाने का मौक़ा ढूँढ़ती रहती हैं।


एक दिन शाम को आराम से बैठकर बातें करते समय, अपने पति के बारे में बोलती हुई चारुलता ने कहा, ‘‘इधर कुछ समय से मेरे पति मेरे प्रति पहले की तरह प्रेम नहीं दिखा रहे हैं, मेरा आदर नहीं कर रहे हैं।’’ हेमलता ने मन ही मन सोचा कि इसे चिढ़ाने का यह अच्छा मौका है। इसलिए उसने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘क्या ऐसी बात है? किन्तु देखा, मेरे पति का बर्ताव। तुम्हारे पति के बर्ताव के बिलकुल विरुद्ध। पहले से भी ज्यादा वे मेरे प्रति और प्रेम दिखा रहे हैं, मेरा आदर कर रहे हैं। आये दिन कुछ न कुछ मेरे लिए भेंट ला रहे हैं।’’


यह सुनते ही चारुलता ने तपाक से कहा, ‘‘हाँ, हाँ, क्यों नहीं। तुम्हारे पति पुरावस्तुओं के व्यापारी जो ठहरे।’’ इस पर हेमलता को कोई जवाब देते न बना।



सुनहला चाँद

जलपोतों के एक धनी व्यापारी के सात बेटे और एक बेटी थी। बेटों की शादी हो चुकी थी और वे सब व्यापार में पिता की मदद कर रहे थे। व्यापारी पूरे परिवार के साथ एक बड़े भवन में रहता था। सबसे छोटी बेटी तपोई सबकी आँखों का तारा थी। परिवार के सभी सदस्य उसे बहुत प्यार करते थे। विशेष रूप से उसके पिता उसकी हर इच्छा पूरी करने का प्रयास करते। फिर भी, तपोई ने ऐसा कभी प्रकट नहीं होने दिया कि वह एक धनी पिता की एकलौती बेटी है और वह साधारण खिलौनों के साथ ही खेलने में मस्त रहती थी।
एक दिन, तपोई "घर-घर'' खेल रही थी और मिट्टी के छोटे-छोटे बर्तनों में खाना पकाने की कोशिश कर रही थी। तभी उधर से गुजरती हुई एक बूढ़ी औरत उसके पास आई और मुस्कुराती हुई बोली, "प्यारी बच्ची, क्या तुम्हें मिट्टी के खिलौनों के साथ खेलने में शर्म नहीं आती, जबकि तुम्हारे पिता के पास इतना धन है कि वे तुम्हें एक सुनहला चाँद लाकर दे सकते हैं।
'' तपोई ने खेलना बन्द कर दिया, और अन्दर जाकर शान्तिपूर्वक सोचने लगी। मिट्टी के खिलौनों और गुड़ियों से खेलने में क्या खराबी है? उसने अपने आप से सवाल पूछा। यदि उसके पिता एक सुनहला चाँद लाकर उसे दे भी दें तो वह उसका क्या करेगी? अधिक से अधिक, वह अपनी सहेलियों से यह कहेगी कि उसके पास एक सुनहला चाँद है। "क्या वे मुझसे ईर्ष्या करेंगे अथवा मुझ पर केवल हॅंस भर देंगे?''
उसकी सबसे छोटी भाभी नीलेन्दी उसके पास आकर उसके साथ जमीन पर बैठ गई और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बोली, "तपोई, क्या मुझसे नहीं बोलोगी? बोलो न, क्या बात है? मैं तुम्हारी समस्या का समाधान निकालूंगी। चलो, बोलो न मेरी छोटी प्यारी बच्ची!'' वह उसके के बालों को सहलाने लगी।

तपोई ने सोचा कि इस पर भरोसा किया जा सकता है। "वह बूढ़ी औरत! उसने मुझे मिट्टी के खिलौनों के साथ खेलते देखकर मेरा मजाक उड़ाया। उसने कहा कि यदि मैं चाहूँ तो मेरे पिता मुझे एक सुनहला चाँद दे सकते हैं। क्या मैं एक सुनहला चाँद पिता से माँग लूँ, भाभी?''
"ओह! तो यह है तुम्हारी समस्या! अच्छ, ठीक है। मैं माँ से बात करूँगी और वे पिता जी को बतायेंगी। निश्चय ही, वे तुम्हारे लिए सुनहला चाँद ला देंगे। जो भी खिलौना और गुड़िया है, उसी से खेलो।'' नीलेन्दी ने उसे प्यार से थपथपाया ।
जब व्यापारी भोजन के लिए घर पर आया, उसकी पत्त्नी ने धीरे से तपोई की अभिलाषा की चर्चा की। वह सिर्फ मुस्कुराया और बोला, "जब मैं आराम करता हूँ तब उसे मेरे पास भेज देना। मैं उससे पूछूँगा कि उसे कितना बड़ा सुनहला चॉंद चाहिये।'' उसकी पत्नी को इस बात की खुशी हुई कि व्यापारी को क्रोध नहीं आया और तपोई पर नाराज नहीं हुआ। वह जानती थी कि वह बेटी को बहुत प्यार करता है।
वह अभी मुश्किल से लेटा ही था कि तपोई आ गई। "पिताजी, क्या आपने मुझे बुलाया?''
व्यापारी ने तपोई से यह नहीं पूछा कि उसके मन में यह विचार कैसे आया। उसने सिर्फ यह जानना चाहा कि सुनहला चाँद कितना बड़ा होना चाहिये। "क्या खाने के प्लेट के बराबर?''
तपोई को अब जवाब देने में शर्म आने लगी। "तुम इसके साथ खेलना चाहती हो, यही न? मुझे मालूम है, इसे कितना बड़ा होना चाहिये। तुम्हें यह जल्दी ही मिल जायेगा।'' उसने प्यार से तपोई के सिर और मुखड़े को सहलाया और छाती से लगाते हुए कहा, "जाओ, अब खाना खा लो, मेरी अच्छी बच्ची!''
व्यापारी ने स्थानीय सुनार को एक सुनहला प्लेट बनाने का आदेश दे दिया। सुनार ने तुरन्त उसे बनाना शुरू कर दिया। दुर्भाग्यवश इसी बीच व्यापारी की मृत्यु हो गई। जब सुनहला चाँद बनाकर दे दिया गया तब उसकी माँ की भी मृत्यु हो गई। अब तपोई की सुनहला चाँद से खेलने की रुचि जाती रही । वह यह सोचकर परेशान रहने लगी कि सुनहले चाँद की उसकी इच्छा के कारण ही शायद उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई है।

तपोई ने सोचा कि इस पर भरोसा किया जा सकता है। "वह बूढ़ी औरत! उसने मुझे मिट्टी के खिलौनों के साथ खेलते देखकर मेरा मजाक उड़ाया। उसने कहा कि यदि मैं चाहूँ तो मेरे पिता मुझे एक सुनहला चाँद दे सकते हैं। क्या मैं एक सुनहला चाँद पिता से माँग लूँ, भाभी?''
"ओह! तो यह है तुम्हारी समस्या! अच्छ, ठीक है। मैं माँ से बात करूँगी और वे पिता जी को बतायेंगी। निश्चय ही, वे तुम्हारे लिए सुनहला चाँद ला देंगे। जो भी खिलौना और गुड़िया है, उसी से खेलो।'' नीलेन्दी ने उसे प्यार से थपथपाया ।
जब व्यापारी भोजन के लिए घर पर आया, उसकी पत्त्नी ने धीरे से तपोई की अभिलाषा की चर्चा की। वह सिर्फ मुस्कुराया और बोला, "जब मैं आराम करता हूँ तब उसे मेरे पास भेज देना। मैं उससे पूछूँगा कि उसे कितना बड़ा सुनहला चॉंद चाहिये।'' उसकी पत्नी को इस बात की खुशी हुई कि व्यापारी को क्रोध नहीं आया और तपोई पर नाराज नहीं हुआ। वह जानती थी कि वह बेटी को बहुत प्यार करता है।
वह अभी मुश्किल से लेटा ही था कि तपोई आ गई। "पिताजी, क्या आपने मुझे बुलाया?''
व्यापारी ने तपोई से यह नहीं पूछा कि उसके मन में यह विचार कैसे आया। उसने सिर्फ यह जानना चाहा कि सुनहला चाँद कितना बड़ा होना चाहिये। "क्या खाने के प्लेट के बराबर?''
तपोई को अब जवाब देने में शर्म आने लगी। "तुम इसके साथ खेलना चाहती हो, यही न? मुझे मालूम है, इसे कितना बड़ा होना चाहिये। तुम्हें यह जल्दी ही मिल जायेगा।'' उसने प्यार से तपोई के सिर और मुखड़े को सहलाया और छाती से लगाते हुए कहा, "जाओ, अब खाना खा लो, मेरी अच्छी बच्ची!''
व्यापारी ने स्थानीय सुनार को एक सुनहला प्लेट बनाने का आदेश दे दिया। सुनार ने तुरन्त उसे बनाना शुरू कर दिया। दुर्भाग्यवश इसी बीच व्यापारी की मृत्यु हो गई। जब सुनहला चाँद बनाकर दे दिया गया तब उसकी माँ की भी मृत्यु हो गई। अब तपोई की सुनहला चाँद से खेलने की रुचि जाती रही । वह यह सोचकर परेशान रहने लगी कि सुनहले चाँद की उसकी इच्छा के कारण ही शायद उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई है।

"कौन? वह शैतान छोकरी? और तुम सब उसे खुश रखने के लिए पसीना बहा रहे हो ! यह सोचना बेवकूफी होगी कि वह तुम्हारे पतियों को तुम्हारे बारे में अच्छी बात कहेगी। तुम उसे किसी काम पर जरूर लगा दो।'' वह बुढ़िया पास में जाकर उसके कान में फुसफुसाई, "मैं बताऊँगी क्या करना है। उसे भेड़ चराने के लिए जंगल में भेज दो। या तो कोई लोमड़ी खा जायेगी या साँप काट लेगा। तुम कह देना कि बीमारी से मर गई।''
जब बुढ़िया चली गई तब बड़ी बहू ने अन्दर जाकर दूसरी बहुओं को भिखारिन के बारे में बताया। सभी बहुओं को बुढ़िया की सलाह अच्छी लगी। लेकिन नीलेन्दी को नहीं। पर अकेली वह क्या कर सकेगी? उस दिन से तपोई का भाग्य विपरीत हो गया और जिन्दगी मुसीबतों से भर गई। उसे हर तरह का घरेलू काम करना पड़ा। उसके काम में, उसकी भाभी कुछ न कुछ नुख्स ज़रूर निकालती। उसे भर पेट खाना भी नहीं मिलता था। वह आधा पेट खाकर यह प्रार्थना करती हुई सो जाती, "हे मंगलादेवी, कृपा करके मेरे भाइयों को शीघ्र वापस ला दो।''
एक दिन उसकी सबसे बड़ी भाभी ने उसे बुलाकर कहा, "आज भेड़ों को चराने के लिए जंगल में ले जाओ। यह रहा तुम्हारा भोजन।''
तपोई ने किसी प्रकार अपने आँसुओं को रोका। तपती धूप में वह पैदल जंगल कैसे जायेगी? भेड़ों को चरने के लिए छोड़ने के बाद वह भोजन करने बैठी। लेकिन भोजन के पैकेट में थोड़ा सा चावल और लकड़ी का बुरादा भरा पड़ा था। उसने खाना छोड़ दिया और शाम को घर भूखी ही लौटी। दूसरे पाँच दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। सातवें दिन नीलेन्दी ने भोजन का पैकेट दिया जिसमें भर पेट खाने के लिए काफी खाना था। दिन और सप्ताह गुजरते गये। जिस दिन नीलेन्दी खाना देती, उस दिन को छोड़ कर बाकी दिनों में तपोई को भूखी रहना पड़ता। एक दिन शाम को भेड़ों के झुण्ड से एक मेमना गायब हो गया। तपोई ने उसे इधर-उधर खोजा, उसका नाम लेकर पुकारा। कहीं से कोई उत्तर नहीं मिला। अन्धकार हो रहा था और फैले बादल मंडरा रहे थे। इसलिए तपोई मेमने की अधिक खोज न कर शेष भेड़ों को लेकर घर वापस चली गई।

सबसे बड़ी भाभी उस पर बरस पड़ी और उसे मारने के लिए एक मोटी लकड़ी लेकर दौड़ी। तपोई डर कर जंगल की तरफ भाग गई। जंगल में घना अन्धकार था। तपोई ने डर से चिल्लाती हुई मंगलादेवी से प्रार्थना की, "माँ त्राहि माम, त्राहि माम! दया करो, माता! मेरे भाइयों को शीघ्र बुला दो माँ! मुझसे अब दुख सहा नहीं जाता।'' वह बार-बार रोती-बिलखती रही और मंगलादेवी को रक्षा के लिए बुलाती रही।
संयोग से, सातों भाइयों का पोत जंगल से गुजरते हुए वापस आ रहा था। भाइयों को एक लड़की की रोती-बिलखती आवाज सुनाई पड़ी। उन्हें सन्देह हुआ कि इतनी अन्धेरी रात में कौन रो रही होगी। दो भाई जहाज से उतरकर जंगल में उधर देखने गये जहाँ से रोने की आवाज आ रही थी। उन्होंने एक लड़की को देखा लेकिन उसे पहचानने और जानने में देर लगी कि यह उन्हीं की बहन तपोई है।
"तपोई, तुम इस समय जंगल में कैसे आई?'' दोनों भाइयों ने पूछा। तपोई ने अपनी दुख भरी कहानी सुनाई। भाइयों ने उसे सान्त्वना दी और वे अपने साथ पोत में ले गये। अन्य पाँचों भाइयों ने भी उसका बड़े प्यार से स्वागत किया। उन सब ने यह अनुभव किया कि नीलेन्दी को छोड़ कर बाकी सभी भाभियों ने इसके साथ निर्दयतापूर्वक व्यवहार किया है।
पोत के पहुँचने की खबर पाकर सभी बहुएँ उत्तेजित हो अपने पतियों का स्वागत करने के लिए समुद्र तट पर पहुँचीं। सबसे बड़ी बहू ने सबको यह हिदायत कर दी थी कि भाइयों के पूछने पर तपोई के बारे में उन्हें क्या बताना है। उन्हें बल्कि तपोई को सबके पीछे, गहनों और महॅंगे लिबास में सजी धजी देखकर ताज्जुब हुआ। अपनी पित्त्नियों को देखकर सभी भाइयों की भौहें चढ़ गईं। घर पहुँचकर उन सबने सारे उपहार नीलेन्दी को दे दिये और अन्य पत्त्नियों को अपनी बहन के साथ दुर्व्यवहार के लिए कोड़ों से पिटाई की। बहुत दिनों तक भाइयों ने तपोई को राजकुमारी की तरह रखा।
दन्तकथाओं के अनुसार तपोई की कहानी करीब पाँच शताब्दी पुरानी है। उड़िया लड़कियाँ आज भी "तपोई त्योहार'' मनाती हैं और उपवास रख कर मंगलादेवी से आशीर्वाद माँगती हैं ।





धर्म की जीत



लक्ष्मीपुर नामक गाँव में अनुपम नामक एक धनी रहा करता था। धन के साथ साथ वह कितने ही उपजाऊ खेतों का मालिक भी था। गरीब किसानों से वह खेती करवाया करता था और इसके लिए आवश्यक पूंजी भी उन्हें देता था। किसान प्यार से उसे ज़मींदार कहकर बुलाते थे। बिना किसी कमी के वे आराम से ज़िन्दगी गुजार रहे थे। अनुपम के पूर्वज महान मल्लयोद्धा थे। वह भी स्वयं उत्तम कोटि का मल्लयोद्धा था। अपने पूर्वजों की स्मृति में वह हर साल मल्लयुद्ध प्रतियोगिताएँ चलाया करता था। विजेताओं को वह पुरस्कार प्रदान करता था और उन्हें प्रोत्साहन देता था। इस वजह से अनुपम का नाम सब लोग जानते थे।

लक्ष्मीपुर, समस्तपुर ज़मींदारी के गाँवों में से एक था। समस्तपुर के ज़मींदार कृष्णभूपति ने अनुपम के बारे में सुना। उसने दिवान से कहा, ‘‘लक्ष्मीपुर हमारी ज़मींदारी का एक हिस्सा ही है न? सुना है कि अनुपम ने हमसे भी अधिक ख्याति कमायी। हम अगर इसे ऐसा ही बरक़रार रहने देंगे तो वह और मशहूर हो जायेगा। चूँकि हम ज़मींदार हैं, इसलिए ऐसा कोई उपाय सोचिये, जिससे उसके खेत हमारे अधीन हो जायें।’’

इस पर दिवान ने विनयपूर्वक कहा, ‘‘प्रभु, ऐसे विषयों में बैर से बढ़कर मैत्री ही सही होगी। अनुपम की एक सुंदर बेटी है। हमारे युवराज भी शादी की उम्र के हो गये हैं। अनुपम की पुत्री को अपनी बहू बना लीजिये।’’

कृष्ण भूपति को यह सलाह अच्छी लगी। ठाठ-बाट से वह लक्ष्मीपुर गया। अनुपम ने सादर उसका स्वागत किया। दोनों ने कुछ देर तक गाँव की हालत पर आपस में चर्चा की। आख़िर कृष्ण भूपति ने विवाह का प्रस्ताव रखा।

अनुपम ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘प्रभु, आप ज़मींदार हैं। मैं सामान्य हूँ। मेरा मानना है कि मेरी बेटी ज़मींदार के परिवार में समा नहीं सकती। दूसरी बात यह है कि अपने एक जिगरी दोस्त के बेटे के साथ उसकी शादी करने का बहुत पहले ही वचन दे चुका हूँ। कुछ ही दिनों में उनका विवाह भी संपन्न होगा। क्षमा कीजिये।’’



ज़मींदार कृष्ण भूपति नाराज़ हो उठा। बग़ल ही में बैठे दिवान ने कहा, ‘‘घर में लक्ष्मी आयी है और तुम उसे ठुकरा रहे हो। यह भूल भी रहे हो इस विवाह के लिए सहमति न देने पर तुम पर क्या बीतेगा।’’

अनुपम भयभीत हो गया। उसने धीमे स्वर में कहा, ‘‘मुझे सोचने के लिए थोड़ा समय दीजिये।’’

ज़मींदार परिवार सहित लौट आया । उनके चले जाने के बाद अनुपम ने इसके परिणामों पर खूब सोचा-विचारा। उसे लगा कि ज़मींदार से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसने यह भी निर्णय लिया कि जो भी हो, दोस्त के बेटे के साथ ही उसकी बेटी की शादी होगी। उसने अपने इस निर्णय को तुरंत कार्यान्वित भी किया। दोस्त के बेटे से बेटी की शादी करा दी।

ज़मींदार ने इसे अपमान माना। उसने दिवान से कहा, ‘‘आपकी सलाह पर मैं लक्ष्मीपुर गया। देख लिया न, क्या हुआ? आपको मालूम है कि मुझे अनुपम की बेटी नहीं मुझे उसकी जायदाद चाहिये। घोषणा कर दीजिये कि आज ही उसकी संपत्ति हमारे अधीन हो जायेगी।’’ क्रोध-भरे स्वर में उसने कहा।

उस समय युवराज शांतिवर्मा भी वहाँ उपस्थित था। उसने पिता से कहा, ‘‘अनुपम ने आपका ही नहीं, मेरा भी अपमान किया। उसने मुझे दामाद बनाने से इनकार करके बड़ा अपराध किया। मैं खुद उसे सबक़ सिखाऊँगा। इसके लिए मैंने एक उपाय भी सोच रखाहै ।’’

तब शांतिवर्मा ने उस उपाय पर प्रकाश डालते हुए कहा, ‘‘आप तो जानते ही हैं कि मल्लयुद्ध में मेरी बराबरी का कोई है नहीं। उस वृद्ध अनुपम को मैं आसानी से हरा सकता हूँ। मल्लयुद्ध के नियमों के अनुसार, मैं अनुपम को प्रतियोगिता के लिए बुलाऊँगा। मैं शर्त रखूँगा कि अगर वह हार जाए तो अपनी जायदाद मेरे सुपुर्द करे। यह नाइन्साफी लगे, पर यह अचूक उपाय है।’’


जैसा सोचा था, मल्लयुद्ध की प्रतियोगिता में शांतिवर्मा ने प्रसिद्ध मल्लयोद्धाओं को भी आसानी से हरा दिया। तब उसने सबके सामने घोषणा की, ‘‘ये प्रतियोगिताएँ तभी सफल मानी जाएँगी, जब मेरा मुकाबला श्री अनुपम से हो। श्री अनुपम अगर जीत जाएँ तो मैं उन्हें बराबर का ज़मींदार मानूँगा। अगर उनकी हार हो जाए तो उनकी जायदाद मेरी हो जायेगी और वे एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन बिताएँगे।’’

यह सुनते ही अनुपम के किसानों, ग्रामीणों तथा वहाँ उपस्थित और लोगों ने इसका ज़ोरदार विरोध किया। इसे अन्याय कहते हुए वे चिल्लाने लगे। अनुपम ने नाराज़ लोगों को शांत करते हुए कहा, ‘‘आप शांत हो जाइये। हाँ, मानता हूँ कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ, फिर भी मुझमें लड़ने की शक्ति है। उनकी चुनौती स्वीकार करूँगा। मेरा पूरा विश्वास है कि धर्म की विजय होगी।’’ कहते हुए वह आगे आया।

अनुपम के मुख की दीप्ति और तेजस्व को देखकर एक क्षण के लिए शांतिवर्मा चौंक उठा। अंदर ही अंदर उसमें डर पैदा हो गया। ‘‘धर्म की विजय होगी’’ उसके कानों में गूँजने लगा।
अनुपम और शांतिवर्मा के बीच मल्लयुद्ध शुरू हो गया। पर, विचित्र बात यह हुई कि पहले ही दौर में युवराज ज़मीन पर गिर गया। वह अपने को असहाय महसूस करने लगा। मन ही मन उसने ठान लिया कि अनुपम को जीतना असंभव है। उसने लोगों को संबोधित करते हुए और अपनी हार मानते हुए कहा, ‘‘उम्र, बल, प्रशिक्षण की दृष्टि से मुझे ही जीतना चाहिये था, परंतु पहले ही दौर में श्री अनुपम ने मुझे ज़मीन पर पटक डाला, इसका कारण शायद उनका धर्म बल ही होगा।’’

कृष्णभूपति ने सोचा भी नहीं था कि मल्लयुद्ध का यह परिणाम होगा। उसे पूरा विश्वास था कि उसका बेटा ही जीतेगा। इस परिणाम को लेकर वह बेहद दुखी हुआ। कर भी क्या सकता था? उसने अनुपम को बधाई दी और युवराज सहित समस्तुपर लौट गया। अनुपम यथावत् किसानों का आदर करता रहा, भरसक उनकी सहायता करता रहा और यों लंबे अर्से तक उसने सुखी जीवन बिताया।

बच्चों में भगवान

एक जमाने में विदर्भ देश में महेन्द्र नामक एक नामी जादूगर था। उसने राजाओं- महाराजाओं को प्रसन्न कर अनेक उपाधियाँ प्राप्त कीं और अपार धनार्जन भी किया। लेकिन वह बड़ा दानी था, इसलिए उसकी कमाई का अधिकांश भाग उसके हाथों ही ख़र्च हो गया।
महेन्द्र का पुत्र जितेन्द्र जादूगरी विद्या में अपने पिता से अधिक प्रवीण था। मगर उसके जमाने में जादूगरी के प्रति आदर घट गया था। आमदनी कम हो जाने पर भी जितेन्द्र अपने पिता जैसे दान देकर निर्धन बन गया।
जितेन्द्र के दो पुत्र थे। उसने अपने दोनों पुत्रों को जादूगरी सिखाई। जितेन्द्र ने इस विचार से यह विद्या अपने पुत्रों को सिखाई कि एक तो वह उनका पेशा है और दूसरी बात यह है कि फिर से शायद जादूगरी की लोकप्रियता बढ़ जाये।
जितेन्द्र का बड़ा पुत्र रामभद्र हद से ज़्यादा धन ख़र्च करता था। बचपन में उसे अपने पिता से सदा बिना माँगे धन मिला करता था। मगर हालत के बदल जाने के कारण उसके माँगने पर पिता जब धन न देते तो वह घर में ही चोरी करने लग गया । यह बात मालूम होने पर जितेन्द्र ने गुस्से में आकर रामभद्र को पीटा। रामभद्र रूठकर घर से चला गया और फिर लौटकर कभी नहीं आया।
क्रोध में जितेन्द्र ने रामभद्र को पीटा थामगर वह उसको अपने प्राणों से ज़्यादा प्यार करता था। उसके भाग जाने पर उसके माता-पिता उसी की चिंता में बीमार पड़े और कुछ ही दिनों में मर गये। तब जितेन्द्र का दूसरा पुत्र लक्ष्मीचन्द अकेला रह गया।
लक्ष्मीचन्द दृढ़ चित्तवाला था। वह गाँवों में घूमते, गलियों में जादू दिखाते, थोड़ी-बहुत कमाई से संतुष्ट होकर दिन बिताने लगा।

एक दिन लक्ष्मीचन्द एक गली में अपने जादू का प्रदर्शन कर रहा था। उसे देखने कई बच्चे वहाँ पर जमा हुए। लक्ष्मीचन्द यह जानता था कि उन बच्चों के द्वारा उसे ज़्यादा पैसे मिलनेवाले नहीं हैं। फिर भी अपना जादू उन्हें दिखाकर सबको प्रसन्न चित्त बना रहा था।
इतने में बगल के घर से एक लड़के के दहाड़ मारकर रोने की आवाज़ सुनाई दी। लक्ष्मीचन्द ने अपने जादू का प्रदर्शन रोक दिया और उस घर में पहुँच कर देखा कि एक गृहिणी अपने चार साल के लड़के को बुरी तरह से पीट रही है।
लक्ष्मीचन्द के कारण पूछने पर उस गृहिणी ने बताया कि उस लड़के का पिता हाल में बीमार पड़ गया था। उस गृहिणी ने भगवान से मनौती की थी कि यदि उसके पति की बीमारी दूर हो जाएगी तो घर भर के लोग एक सप्ताह दुपहर तक उपवास करके भगवान के दर्शन कर तब भोजन करेंगे। भगवान की कृपा से बीमारी ठीक हो गई। जैसे-तैसे छे दिन बीत गये। आज लड़के को दुपहर तक खाना खिलाये बिना रोकना मुश्किल हो गया। वह लड़का भूख के मारे रो रहा है। उस गृहिणी को भगवान के दर्शन करने के लिए जाना था। समझाने-बुझाने पर भी वह मानता न था, इसलिए उसे पीट रही है।
लक्ष्मीचन्द को लगा कि लड़के को भूखा रखने के साथ पीटना भी कितना अन्याय है। उसने उस गृहिणी से कहा, ‘‘माई! लोग कहते हैं कि बच्चों में भगवान निवास करते हैं। मेरी समझ में नहीं आता कि यदि आप इस बच्चे में भगवान को नहीं देख पातीं तो किस भगवान को देखने आप जा रही हैं?''
इस पर उस गृहिणी ने ख़ीझकर कहा, ‘‘इसीलिए तुम्हारी ज़िंदगी ऐसी हो गई है! यदि तुम्हें इसके भीतर सचमुच भगवान दिखाई देते हैं तो इसको संभाल लो। मैं भगवान के दर्शन करके लौटूँगी, तब तुम्हें भी खाना खिलाऊँगी।''
लक्ष्मीचन्द ने मान लिया, मीठी बातों तथा जादू के खेल दिखाकर उस बच्चे को भुलावे में रखा। गृहिणी ने लौटकर लक्ष्मीचन्द की तारीफ़ की और उसको भी खाना खिलाया।
खाने के बाद लक्ष्मीचन्द ने उस गृहिणी से कहा, ‘‘माई! अपने पुत्र से भी ज़्यादा जिन्हें मानती हैं, वे आप के भगवान कहाँ पर हैं? उन्हें देखने की मेरी भी बड़ी इच्छा है।''

गृहिणी ने हँसकर कहा, ‘‘भगवान का मतलब क्या तुम साधारण भगवान को समझते हो? वह तो प्रत्यक्ष देवता है! तुमसे बात करेगा। सवालों का जवाब देगा। तुम पर स्नेह बरसा कर तुम्हारी तक़लीफ़ों को दूर करेगा।''
लक्ष्मीचन्द का कुतूहल और बढ़ गया। वह उस जगह गया जहाँ पर भगवान के सशरीर विराजमान होने की बात गृहिणी ने बताई। वहाँ पर बड़ी भीड़ जमा थी। सब लोग मौन बैठे थे। एक ऊँचे आसन पर दाढ़ी और मूँछवाले एक साधु बैठा हुआ था। वह जनता को उपदेश दे रहा था कि सच्चे मार्ग पर चलो। जो लोग विपत्तियों में थे, उन्हें अपने निकट बुलाकर समझा रहा था कि उसने जनता के दुखों को दूर करने के लिए ही यह अवतार लिया है। बीच-बीच वह व्यक्ति हवा में ही भभूत की सृष्टि करके लोगों पर छिड़क रहा था। जब-तब हवा में उड़कर थोड़े क्षण वैसे ही रहता था। इस पर भक्त उच्च स्वर में पुकार रहे थे, ‘‘हे परमात्मा! हमारा उद्धार करो।''
लक्ष्मीचन्द को यह सब विचित्र-सा प्रतीत हुआ। साधु ने जो विद्याएँ प्रदर्शित कीं, वे सब वह भी जानता था। मगर वह एक साधारण जादूगर ही रह गया और यह साधु भगवान बन बैठा है। इस रहस्य का पता लगाने के लिए लक्ष्मीचन्द अर्द्ध रात्रि को एकांत में उस साधु से मिला।
‘‘तुम कौन हो?'' साधु ने लक्ष्मीचन्द से पूछा।
‘‘मैं एक जादूगर हूँ। मैंने आपके प्रदर्शन देखे हैं। उन्हें देख लोग महिमा मान रहे हैं। उन्हीं प्रदर्शनों को करते रहने पर भी मुझे भर पेट खाना मिलना मुश्किल प्रतीत हो रहा है। लोग आप को भगवान बता रहे हैं। उसी रहस्य का पता लगाने आया हूँ।'' लक्ष्मीचन्द ने कहा। उसने उस दिन का अपना अनुभव भी साधु को बताया।
‘‘इसमें रहस्य की कोई बात नहीं है कि मैं भगवान का अवतार हूँ! मुझे सहज रूप में जो शक्तियाँ प्राप्त हैं, उन्हें तुमने परिश्रम करके एक विद्या के रूप में सीख लिया है। तुम्हारे प्रदर्शन के लिए उपकरणों की आवश्यकता है। मेरे लिए उनकी ज़रूरत नहीं।'' साधु ने जवाब दिया।
‘‘ऐसी बात है! तब तो मैं अपनी उंगली काट लेता हूँ। क्या उसको आप फिर से चिपका सकते हैं?'' लक्ष्मीचन्द ने पूछा।



पन्ना दाई का अनुपम त्याग

लगभग पाँच सौ साल पहले राणा संग्रम सिंह ने राजस्थान के मेवाड़ पर शासन किया। वे अपने धैर्य, साहस व धर्मनिष्ठ शासन के लिए सुप्रसिद्ध थे। उनका नाम सुनते ही प्रजा उनके प्रति आदर भाव दर्शाती थी।
बाबर ने भारत पर हमला किया और 1526 अप्रैल 1 को प्रथम पानीपत युद्ध में इब्राहिम लोदी को हरायातथा दिल्ली और आगरा को भी अपने अधीन करके उन्होंने मुग़ल साम्राज्य की स्थापना की। फिर उसकी दृष्टि राजस्थान पर पड़ी।
राजपूत सैनिकों ने जमकर मुग़ल सैनिकों के साथ लड़ाई लड़ी। उनकी बहादुरी और साहस बहुत ही प्रशंसनीय था। किन्तु अपनी ही सेना के दलनायक के द्रोह के कारण राणा संग्रम को पास ही के पर्वतों में जाकर छिप जाना पड़ा। किसी भी हालत में वे मुग़ल सेना को हराना चाहते थे, उन्होंने इसके लिए भरसक प्रयत्न किये। पर 1527 में राणा की मृत्यु हो गई। इसके बाद बाबर ने सोचा कि राजपूत वीरों को और सताना उचित नहीं होगा, इसलिए वे दिल्ली चले गये। बाबर को इस बात का डर भी था कि राजपूत योद्धाओं से और लड़ने से उसे ही नुकसान होगा और उसके कितने ही सैनिक मारे भी जायेंगे।
राणा संग्रम सिंह का ज्येष्ठ पुत्र रत्नसिंह मेवाड़ का राजा बना। किन्तु पड़ोसी राज्य के युवराज से जो लड़ाई हुई, उसमें वह मारा गया। तब उसका छोटा भाई विक्रमजीत सिंहासन पर आसीन हुआ।
वह दुरहंकारी और विनोद प्रिय था। जनता के क्षेम के विषय में वह सोचता ही नहीं था। वह सदा मल्ल युद्धों तथा अन्य क्रीड़ाओं में ही दिलचस्पी लेता था। सामंतों व प्रमुखों की इज्ज़त करता नहीं था। इस वजह से मेवाड़ में अराजक परिस्थितियाँ उत्प हो गयीं। इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए गुजरात सुल्तान बहादुरशाह ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ को घेर लिया।


राजपूत योद्धाओं ने डटकर सामना किया, पर जीतने की आशा न थी । इस संकटपूर्ण स्थिति से बचने की कोई उम्मीद नहीं रही। अतः चित्तौड़ के किले की चौदह हज़ार स्त्रियों ने चिता जलाकर उसमें साहसपूर्वक प्रवेश करके प्राण त्याग दिये।
इस वीरोचित कार्य को करवाया, राणा संग्रमसिंह की वीर पत्नी ने, जो युवराज उदय सिंह की माँ रानी कर्नावती थी। उदयसिंह उस समय शिशु था। पिता की मृत्यु के बाद उसका जन्म हुआ। शत्रुओं से बचाने के लिए उदयसिंह सुरक्षित स्थान में भेज दिया गया। इसके उपरांत यद्यपि मुगलों ने विक्रमजीत को सिंहासन सौंपा पर प्रजा उसके दुःशासन को सह नहीं पायी।
सिंहासन का वारिस उदयसिंह जब तक बालिग़ न हो, तब तक शासन का भार कौन संभाले? राजपूत प्रमुखों ने चाहा कि राणा संग्रमसिंह के भाई पृथ्वीराज का बेटा बनवीर शासन की बागडोर अपने हाथ में ले। उसने प्रमुखों की सलाह को स्वीकार किया।
शासन की बागडोर अपने हाथ में लेने के बाद बनवीर में दुराशा जगी कि वही भविष्य में भी राजा बना रहे। इसके लिए उसने राजा संग्रहसिंह के दोनों पुत्रों को मार डालना चाहा। प्रजा की घृणा व द्वेष का शिकार बनकर जब विक्रमजीत भाग रहा था तब बनवीर ने उसे मार डाला। अब शिशु उदयसिंह मात्र जीवित था। उस शिशु का भी अंत करने के लिए क्रूर, दुष्ट बनवीर ने एक व्यूह रचा।
प्रशांत रात थी। चित्तौड़ किले के अंतःपुर से मधुर लोरी सुनायी दे रही थी। पा दाई सोये हुए राजकुमार का पालना हिलाती हुई लोरी गा रही थी। उसका भी अपना एक शिशु था, जो राजकुमार की उम्र का ही था।
आधी रात के समय एक नौकर दौड़ा-दौड़ा आया और पा के कानों में कुछ कहा। उसकी बातें सुनते ही पा दाई का चेहरा फीका पड़ गया।


वह एकदम घबरा गयी। उसने तुरंत अपने बेटे को पालने में लिटाया। पालने में सोये राजकुमार के आभूषणों व वस्त्रों को अपने बच्चे को पहनाया। भवन के रसोइये को बुलाया और उससे फलों की टोकरी ले आने को कहा। राजकुमार को बड़ी ही सावधानी से उस टोकरी में सुलाया और उस टोकरी को पत्तों से ढक दिया। रसोइये से उसने विनती की कि वह शिशु को क़िले से बाहर ले जाए।
थोड़ी देर बार दुष्ट राज प्रतिनिधि बनवीर वहाँ आया। उसने शिशु के शरीर में तलवार भोंकी और उसे सदा के लिए सुला दिया। बिना विलंब किये वह तेज़ी से वहाँ से चला गया। युवराज को मरा समझकर राजा के परिवारवाले ज़ोर-ज़ोर से रोने बिलखने लगे। किन्तु ऐसी स्थिति में भी पा दाई ने पुत्र शोक को निगल डाला और राजभवन से तुरंत बाहर आयी।
जब वह नदी के तट पर पहुँची तब विश्वासपात्र रसोइया टोकरी सहित पा की प्रतीक्षा कर रहा था। अच्छा हुआ, शिशु अब भी सोया हुआ था। वे तुरंत डोला गये और युवराज के लिए आश्रय माँगा। युवराज के प्रति यद्यपि सहानुभूति थी, पर दुष्ट बनवीर से वे डरते थे, इसलिए उन्होंने आश्रय देने से इनकार किया। वहाँ के शासक ने अपनी असहायता जताते हुए उन्हें वहाँ से भेज दिया।
किसान औरत के वेष में शिशु को लेकर रसोइये के साथ वह डोंगरपुर जाने निकली। आशा-निराशा के बीच परेशान वह पर्वत पर के भवन में पहुँची। किन्तु वहाँ भी उसे निराश होना पड़ा। सामंत राजा रावल अयुस्कुर्न ने भी उन्हें वहाँ से भेज दिया, क्योंकि वह भी निर्दयी व क्रूर बनवीर से डरता था।
मेवाड़ के भविष्य के राजा को बचाने के लिए पा ने हर प्रकार का प्रयत्न किया। उसका एकमात्र लक्ष्य था, युवराज की रक्षा करना। इसके लिए उसने सब प्रकार के कष्ट सहे। वह पर्वतों व जंगलों को पार करती हुई अरावली पर्वत श्रेणियों में स्थित कोमुल्मेर की ओर जाने लगी। रसोइया अकस्मात् बीमार पड़ गया। स्थानीय दयालु भीलों ने रसोइये की सहायता करने का वचन दिया और पा को रास्ता दिखाया।
सवेरे-सवेरे छोटे-से पर्वत पर कोमुल्मेर का राजभवन बादल महल जब पा को दिखायी पड़ा, तब उसमें नयी आशाएँ पैदा हुईं। राजा अत्सासाह ने उसपर दया दिखायी और उसका आदर किया। पा ने चित्तोड़ की दुर्गति का वर्णन किया और कहा, ‘‘इस शिशु राजकुमार को सुरक्षित इस स्थल पर आश्रय देंगे तो मेरा मन शांत होगा''।

उस समय उसकी आँखें आँसुओं से भरी हुई थीं। अत्सासाह कुछ बता नहीं पाये। वे किसी निर्णय पर नहीं आ पा रहे थे। तब उसकी माँ ने अपने बेटे से कहा, ‘‘इसको लेकर इतना क्यों सोच रहे हो? यह शिशु राणा संग्रमसिंह का पुत्र है। जिनमें राजा के प्रति विश्वास और प्रेम है, उन्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारे सामने जो पा खड़ी है, वह एक साधारण दाई है। उसने जो अद्वितीय त्याग और असमान धैर्य दिखाया और जो कठोर कष्ट सहे, उन्हें जानने के बाद भी इतना संकोच क्यों कर रहे हो? यह दुविधा कैसी?''
तब राजा ने शिशु को अपने हाथ में लिया और आश्वासन देते हुए कहा, ‘‘इस शिशु राजकुमार की रक्षा का भार मुझ पर है। तुम निश्चिंत जा सकती हो।''
इस आश्वासन से पा के चेहरे पर खुशी छा गयी। उसका अशांत मन शांत हुआ। उसने शिशु को एक बार अपने हाथों में लिया, हृदय से लगाया और फिर से राजा को सौंपा। आँसू भरे नयनों से उसने एक और बार राजा को प्रणाम किया। शिशु की माँ रानी को उसने वचन दिया था कि वह हर हालत में राजकुमार की रक्षा करेगी। उसने वह वचन निभाया। इसी तृप्ति को लेकर वह भवन से बाहर आयी।
सात साल गुज़र गये। अत्सासाह का बेटा भी उदयसिंह की उम्र का ही था। दोनों साथ-साथ पलने लगे। अत्सासाह का मित्र एक राजपूत प्रमुख उसके राजभवन में अतिथि बनकर आये। उदयसिंह को देखते ही चकित होकर उसने पूछा, ‘‘यह राजकुमार कौन है?'' अत्सासाह को सच बताना पड़्रा। राजपूत प्रमुख ने उदयसिंह को नमस्कार किया। बहुत ही कम अवधि में ही सबको यह बात मालूम हो गयी। मेवाड़ के प्रमुखों और आसपास के नेताओं ने न्यायबद्ध युवराज को अपना समर्थन जताया।
अति दुष्ट और दुरहंकारी बनवीर के प्रति प्रजा में तीव्र विरोध शुरू हो गया। छोटे युवराज के नेतृत्व में बड़ी सेना ने चित्तौड़ के किले को घेर लिया। बनवीर की सेना उनका सामना नहीं कर सकी। बनवीर डर के मारे भाग गया। जनता के आनंद व उत्साह के बीच राणा उदयसिंह 1587 में मेवाड़ सिंहासन पर आसीन हुए।




व्यापारी की जिम्मेदारी

हरिनारायण अनाज का व्यापार करता था और खूब कमाता था। वह दानी भी था और भगवान में उसका अटूट विश्वास था। उसने एक धर्मार्थ सराय का निर्माण करवाया; और सराय में अन्नदान भी करता था। मंदिर में अक्सर धार्मिक प्रवचनों का प्रबंध भी करता था।
एक दिन जब वह भोजन कर रहा था, तब उसकी पत्नी सरस्वती ने कहा, ‘‘हमारे तीनों लड़के अब वयस्क हो गये हैं। व्यापार का पूरा भार आप कब तक संभालते रहेंगे? तीनों में से किसी एक को व्यापार की जिम्मेदारी सौंप दें तो अच्छा होगा।''
‘‘मैं भी यही सोच रहा हूँ। साथ ही सोच में हूँ कि किसको यह व्यापार सौंपने से वह दक्षता से संभालेगा और हमारी परंपरा को क़ायम रखेगा।'' हरिनारायण ने कहा।
‘‘तीनों बेटे अच्छे स्वभाव के हैं। किसी को भी सौंपिये। वह जिम्मेदारी के साथ उसे संभालेगा'', सरस्वती ने अपनी राय दी।
‘‘अपने बेटों के बारे में तुम्हारी राय सही है। पर, व्यापार करने के लिए अच्छे गुण मात्र का होना पर्याप्त नहीं है। अ़क्लमंदी के साथ-साथ व्यापार के प्रति रुचि भी होनी चाहिये। यह जानने के लिए हमारे तीनों बेटों की परीक्षा लेनी होगी। उनकी योग्यता तुम्हीं देखोगी।'' हरिनारायण ने कहा।
दूसरे दिन हरिनारायण ने अपने तीनों बेटों को बुलाया। तीनों को एक-एक रुपया दिया और कहा, ‘‘इस एक रुपये से शाम तक कोई अच्छा काम करके आओ। इससे मालूम हो जायेगा कि तुम तीनों में से कौन दक्ष हो।''
शाम को जब वह घर लौटा, तब उसने देखा कि उसके तीनों बेटे उसी की प्रतीक्षा में हैं।

उसने बड़े बेटे सोमशेखर से पूछा,‘‘तुमने उस एक रुपये से क्या अच्छा काम किया?''
‘‘मैंने राम के मंदिर के पास एक भूखी औरत को देखा। वह रुपया मैंने उसे दे दिया'', सोमशेखर ने कहा। हरिनारायण ने मुस्कुराते हुए दूसरे बेटे कमल की ओर देखा।
‘‘हमारे व्यापार की अच्छी वृद्धि हो, इसके लिए मैंने मंदिर में पूजा करवायी और वह रुपया पुजारी की थाली में डाल दिया,'' कमल ने कहा।
हरिनारायण ने उसी प्रकार की मुस्कान लिये छोटे बेटे नारायण से पूछा, ‘‘तुमने क्या किया?''
नारायण ने चुपके से अपनी जेब से एक रुपये का सिक्का निकाला और अपने पिता के सामने रख दिया। ‘‘रुपया खर्च किये बिना तुमने उसे ऐसे ही सुरक्षित रखा?'' हरिनारायण ने पूछा।
‘‘नहीं पिताजी, आपने जो रुपया दिया, उसे लेकर बगीचे में गया और उससे चार नींबू खरीदे। बाज़ार में बैठकर मैं लोगों से कहने लगा कि यह एक विशेष प्रकार का नींबू है और उन्हें दो रुपयों में बेच दिया। एक रुपये का जो फायदा हुआ, उसमें से आधे रुपये की मिठाई खरीदी और उसे एक भूखे बच्चे को दिया। बाकी आधा रुपया भगवान की हुँडी में डाल कर प्रार्थना की वे सब पर दया करें। शेष बचा पूंजी का रुपया ले आया हूँ।'' नारायण ने धीरे-से कहा।
हरिनारायण उसकी होशियारी और दयालुता पर बड़ा ही मुग्ध हुआ और निर्णय कर लिया कि व्यापार नारायण को ही सौंपूँगा। फिर दोनों बेटों की ओर मुड़कर कहा, ‘‘किसी भी अच्छे काम को करने के लिए धन की ज़रूरत होती है। विशेषकर व्यापार के लिए यह नितांत आवश्यक है। इसलिए जिसे व्यापार करना है, उसे पहले लाभ कमाना चाहिये। नारायण ने यह काम किया। कमाने के बाद फिर करो दान धर्म। तुममें से एक संभालो, हमारा अपना धर्मार्थ सराय, दूसरा संभाले, हमारे राममंदिर की जिम्मेदारियों को। नारायण व्यापार संभालेगा और दोनों उसे सहयोग देकर व्यापार की और वृद्धि करेंगे।''
दोनों भाइयों ने सहर्ष स्वीकार किया। पति के इस निर्णय पर सरस्वती बहुत ही खुश हुई।